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AYANAAYURVEDAby Dr Vijaya Dwarampudi
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58. mūtrāghātapratiṣēdhādhyāyaḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতো মূত্রাঘাতপ্রতিষেধমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातो मूत्राघातप्रतिषेधमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3-4) · Śloka 4

বাতকুণ্ডলিকাঽষ্ঠীলা বাতবস্তিস্তথৈব চ | মূত্রাতীতঃ সজঠরো মূত্রোত্সঙ্গঃ ক্ষযস্তথা ||৩|| মূত্রগ্রন্থির্মূত্রশুক্রমুষ্ণবাতস্তথৈব চ | মূত্রৌকসাদৌ দ্বৌ চাপি রোগা দ্বাদশ কীর্তিতাঃ ||৪||

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वातकुण्डलिकाऽष्ठीला वातबस्तिस्तथैव च | मूत्रातीतः सजठरो मूत्रोत्सङ्गः क्षयस्तथा ||३|| मूत्रग्रन्थिर्मूत्रशुक्रमुष्णवातस्तथैव च | मूत्रौकसादौ द्वौ चापि रोगा द्वादश कीर्तिताः ||४||

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Adhikarana 3 (5-6) · Śloka 6

রৌক্ষ্যাদ্বেগবিঘাতাদ্বা বাযুরন্তরমাশ্রিতঃ | মূত্রং চরতি সঙ্গৃহ্য বিগুণঃ কুণ্ডলীকৃতঃ ||৫|| সৃজেদল্পাল্পমথবা সরুজস্কং শনৈঃ শনৈঃ | বাতকুণ্ডলিকাং তং তু ব্যাধিং বিদ্যাত্ সুদারুণম্ ||৬||

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रौक्ष्याद्वेगविघाताद्वा वायुरन्तरमाश्रितः | मूत्रं चरति सङ्गृह्य विगुणः कुण्डलीकृतः ||५|| सृजेदल्पाल्पमथवा सरुजस्कं शनैः शनैः | वातकुण्डलिकां तं तु व्याधिं विद्यात् सुदारुणम् ||६||

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Adhikarana 4 (7-8) · Śloka 8

শকৃন্মার্গস্য বস্তেশ্চ বাযুরন্তরমাশ্রিতঃ | অষ্ঠীলাবদ্ধনং গ্রন্থিং করোত্যচলমুন্নতম্ ||৭|| বিণ্মূত্রানিলসঙ্গশ্চ তত্রাধ্মানং চ জাযতে | বেদনা চ পরা বস্তৌ বাতাষ্ঠীলেতি তাং বিদুঃ ||৮||

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शकृन्मार्गस्य बस्तेश्च वायुरन्तरमाश्रितः | अष्ठीलावद्धनं ग्रन्थिं करोत्यचलमुन्नतम् ||७|| विण्मूत्रानिलसङ्गश्च तत्राध्मानं च जायते | वेदना च परा बस्तौ वाताष्ठीलेति तां विदुः ||८||

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Adhikarana 5 (9-10) · Śloka 10

বেগং বিধারযেদ্যস্তু মূত্রস্যাকুশলো নরঃ | নিরুণদ্ধি মুখং তস্য বস্তের্বস্তিগতোঽনিলঃ ||৯|| মূত্রসঙ্গো ভবেত্তেন বস্তিকুক্ষিনিপীডিতঃ | বাতবস্তিঃ স বিজ্ঞেযো ব্যাধিঃ কৃচ্ছ্রপ্রসাধনঃ ||১০||

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वेगं विधारयेद्यस्तु मूत्रस्याकुशलो नरः | निरुणद्धि मुखं तस्य बस्तेर्बस्तिगतोऽनिलः ||९|| मूत्रसङ्गो भवेत्तेन बस्तिकुक्षिनिपीडितः | वातबस्तिः स विज्ञेयो व्याधिः कृच्छ्रप्रसाधनः ||१०||

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Adhikarana 6 (11-12) · Śloka 12

বেগং সন্ধার্য মূত্রস্য যো ভূযঃ স্রষ্টুমিচ্ছতি | তস্য নাভ্যেতি যদি বা কথঞ্চিত্সম্প্রবর্ততে ||১১|| প্রবাহতো মন্দরুজমল্পমল্পং পুনঃ পুনঃ | মূত্রাতীতং তু তং বিদ্যান্মূত্রবেগবিঘাতজম্ ||১২||

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वेगं सन्धार्य मूत्रस्य यो भूयः स्रष्टुमिच्छति | तस्य नाभ्येति यदि वा कथञ्चित्सम्प्रवर्तते ||११|| प्रवाहतो मन्दरुजमल्पमल्पं पुनः पुनः | मूत्रातीतं तु तं विद्यान्मूत्रवेगविघातजम् ||१२||

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Adhikarana 7 (13-14) · Śloka 14

মূত্রস্য বিহতে বেগে তদুদাবর্তহেতুনা | অপানঃ কুপিতো বাযুরুদরং পূরযেদ্ভৃশম্ ||১৩|| নাভেরধস্তাদাধ্মানং জনযেত্তীব্রবেদনম্ | তং মূত্রজঠরং বিদ্যাদধঃস্রোতোনিরোধনম্ ||১৪||

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मूत्रस्य विहते वेगे तदुदावर्तहेतुना | अपानः कुपितो वायुरुदरं पूरयेद्भृशम् ||१३|| नाभेरधस्तादाध्मानं जनयेत्तीव्रवेदनम् | तं मूत्रजठरं विद्यादधःस्रोतोनिरोधनम् ||१४||

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Adhikarana 8 (15-16) · Śloka 16

বস্তৌ বাঽপ্যথবা নালে মণৌ বা যস্য দেহিনঃ | মূত্রং প্রবৃত্তং সজ্জেত সরক্তং বা প্রবাহতঃ ||১৫|| স্রবেচ্ছনৈরল্পমল্পং সরুজং বাঽথ নীরুজম্ | বিগুণানিলজো ব্যাধিঃ স মূত্রোত্সঙ্গসঞ্জ্ঞিতঃ ||১৬||

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बस्तौ वाऽप्यथवा नाले मणौ वा यस्य देहिनः | मूत्रं प्रवृत्तं सज्जेत सरक्तं वा प्रवाहतः ||१५|| स्रवेच्छनैरल्पमल्पं सरुजं वाऽथ नीरुजम् | विगुणानिलजो व्याधिः स मूत्रोत्सङ्गसञ्ज्ञितः ||१६||

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Adhikarana 9 (17) · Śloka 17

রূক্ষস্য ক্লান্তদেহস্য বস্তিস্থৌ পিত্তমারুতৌ | সদাহবেদনং কৃচ্ছ্রং কুর্যাতাং মূত্রসঙ্ক্ষযম্ ||১৭||

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रूक्षस्य क्लान्तदेहस्य बस्तिस्थौ पित्तमारुतौ | सदाहवेदनं कृच्छ्रं कुर्यातां मूत्रसङ्क्षयम् ||१७||

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Adhikarana 10 (18-19) · Śloka 19

অভ্যন্তরে বস্তিমুখে বৃত্তোঽল্পঃ স্থির এব চ | বেদনাবানতি সদা মূত্রমার্গনিরোধনঃ ||১৮|| জাযতে সহসা যস্য গ্রন্থিরশ্মরিলক্ষণঃ | স মূত্রগ্রন্থিরিত্যেবমুচ্যতে বেদনাদিভিঃ ||১৯||

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अभ्यन्तरे बस्तिमुखे वृत्तोऽल्पः स्थिर एव च | वेदनावानति सदा मूत्रमार्गनिरोधनः ||१८|| जायते सहसा यस्य ग्रन्थिरश्मरिलक्षणः | स मूत्रग्रन्थिरित्येवमुच्यते वेदनादिभिः ||१९||

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Adhikarana 11 (20-21) · Śloka 21

প্রত্যুপস্থিতমূত্রস্তু মৈথুনং যোঽভিনন্দতি | তস্য মূত্রযুতং রেতঃ সহসা সম্প্রবর্ততে ||২০|| পুরস্তাদ্বাঽপি মূত্রস্য পশ্চাদ্বাঽপি কদাচন | ভস্মোদকপ্রতীকাশং মূত্রশুক্রং তদুচ্যতে ||২১||

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प्रत्युपस्थितमूत्रस्तु मैथुनं योऽभिनन्दति | तस्य मूत्रयुतं रेतः सहसा सम्प्रवर्तते ||२०|| पुरस्ताद्वाऽपि मूत्रस्य पश्चाद्वाऽपि कदाचन | भस्मोदकप्रतीकाशं मूत्रशुक्रं तदुच्यते ||२१||

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Adhikarana 12 (22-23) · Śloka 23

ব্যাযামাধ্বাতপৈঃ পিত্তং বস্তিং প্রাপ্যানিলাবৃতম্ | বস্তিং মেঢ্রং গুদং চৈব প্রদহন্ স্রাবযেদধঃ ||২২|| মূত্রং হারিদ্রমথবা সরক্তং রক্তমেব বা | কৃচ্ছ্রাত্ প্রবর্ততে জন্তোরুষ্ণবাতং বদন্তি তম্ ||২৩||

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व्यायामाध्वातपैः पित्तं बस्तिं प्राप्यानिलावृतम् | बस्तिं मेढ्रं गुदं चैव प्रदहन् स्रावयेदधः ||२२|| मूत्रं हारिद्रमथवा सरक्तं रक्तमेव वा | कृच्छ्रात् प्रवर्तते जन्तोरुष्णवातं वदन्ति तम् ||२३||

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Adhikarana 13 (24-26) · Śloka 26

বিশদং পীতকং মূত্রং সদাহং বহলং তথা | শুষ্কং ভবতি যচ্চাপি রোচনাচূর্ণসন্নিভম্ ||২৪|| মূত্রৌকসাদং তং বিদ্যাদ্রোগং পিত্তকৃতং বুধঃ | পিচ্ছিলং সংহতং শ্বেতং তথা কৃচ্ছ্রপ্রবর্তনম্ ||২৫|| শুষ্কং ভবতি যচ্চাপি শঙ্খচূর্ণপ্রপাণ্ডুরম্ | মূত্রৌকসাদং তং বিদ্যাদামযং দ্বাদশং কফাত্ ||২৬||

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विशदं पीतकं मूत्रं सदाहं बहलं तथा | शुष्कं भवति यच्चापि रोचनाचूर्णसन्निभम् ||२४|| मूत्रौकसादं तं विद्याद्रोगं पित्तकृतं बुधः | पिच्छिलं संहतं श्वेतं तथा कृच्छ्रप्रवर्तनम् ||२५|| शुष्कं भवति यच्चापि शङ्खचूर्णप्रपाण्डुरम् | मूत्रौकसादं तं विद्यादामयं द्वादशं कफात् ||२६||

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Adhikarana 14 (27) · Śloka 28

কষাযকল্কসর্পীংষি ভক্ষ্যান্ লেহান্ পযাংসি চ | ক্ষারমদ্যা(ধ্বা)সবস্বেদান্ বস্তীংশ্চোত্তরসঞ্জ্ঞিতান্ ||২৭|| বিদধ্যান্মতিমাংস্তত্র বিধিং চাশ্মরিনাশনম্ |২৮|

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कषायकल्कसर्पींषि भक्ष्यान् लेहान् पयांसि च | क्षारमद्या(ध्वा)सवस्वेदान् बस्तींश्चोत्तरसञ्ज्ञितान् ||२७|| विदध्यान्मतिमांस्तत्र विधिं चाश्मरिनाशनम् |२८|

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Adhikarana 15 (28) · Śloka 28

মূত্রোদাবর্তযোগাংশ্চ কার্ত্স্ন্যেনাত্র প্রযোজযেত্ ||২৮||

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मूत्रोदावर्तयोगांश्च कार्त्स्न्येनात्र प्रयोजयेत् ||२८||

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Adhikarana 16 (29) · Śloka 29

কল্কমের্বারুবীজানামক্ষমাত্রং সসৈন্ধবম্ | ধান্যাম্লযুক্তং পীত্বৈব মূত্রকৃচ্ছ্রাত্ প্রমুচ্যতে ||২৯||

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कल्कमेर्वारुबीजानामक्षमात्रं ससैन्धवम् | धान्याम्लयुक्तं पीत्वैव मूत्रकृच्छ्रात् प्रमुच्यते ||२९||

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Adhikarana 17 (30) · Śloka 30

সুরাং সৌবর্চলবতীং মূত্রকৃচ্ছ্রী পিবেন্নরঃ | মধু মাংসোপদংশং বা পিবেদ্বাঽপ্যথ গৌডিকম্ ||৩০||

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सुरां सौवर्चलवतीं मूत्रकृच्छ्री पिबेन्नरः | मधु मांसोपदंशं वा पिबेद्वाऽप्यथ गौडिकम् ||३०||

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Adhikarana 18 (31) · Śloka 31

পিবেত্ কুঙ্কুমকর্ষং বা মধূদকসমাযুতম্ | রাত্রিপর্যুষিতং প্রাতস্তথা সুখমবাপ্নুযাত্ ||৩১||

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पिबेत् कुङ्कुमकर्षं वा मधूदकसमायुतम् | रात्रिपर्युषितं प्रातस्तथा सुखमवाप्नुयात् ||३१||

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Adhikarana 19 (32) · Śloka 32

দাডিমাম্লাং যুতাং মুখ্যামেলাজীরকনাগরৈঃ | পীত্বা সুরাং সলবণাং মূত্রকৃচ্ছ্রাত্ প্রমুচ্যতে ||৩২||

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दाडिमाम्लां युतां मुख्यामेलाजीरकनागरैः | पीत्वा सुरां सलवणां मूत्रकृच्छ्रात् प्रमुच्यते ||३२||

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Adhikarana 20 (33-34) · Śloka 34

পৃথক্পর্ণ্যাদিবর্গস্য মূলং গোক্ষুরকস্য চ | অর্ধপ্রস্থেন তোযস্য পচেত্ ক্ষীরচতুর্গুণম্ ||৩৩|| ক্ষীরাবশিষ্টং তচ্ছীতং সিতাক্ষৌদ্রযুতং পিবেত্ | নরো মারুতপিত্তোত্থমূত্রাঘাতনিবারণম্ ||৩৪||

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पृथक्पर्ण्यादिवर्गस्य मूलं गोक्षुरकस्य च | अर्धप्रस्थेन तोयस्य पचेत् क्षीरचतुर्गुणम् ||३३|| क्षीरावशिष्टं तच्छीतं सिताक्षौद्रयुतं पिबेत् | नरो मारुतपित्तोत्थमूत्राघातनिवारणम् ||३४||

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Adhikarana 21 (35) · Śloka 35

নিষ্পীড্য বাসসা সম্যগ্বর্চো রাসভবাজিনোঃ | রসস্য কুডবং তস্য পিবেন্মূত্ররুজাপহম্ ||৩৫||

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निष्पीड्य वाससा सम्यग्वर्चो रासभवाजिनोः | रसस्य कुडवं तस्य पिबेन्मूत्ररुजापहम् ||३५||

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Adhikarana 22 (36) · Śloka 36

মুস্তাভযাদেবদারুমূর্বাণাং মধুকস্য চ | পিবেদক্ষসমং কল্কং মূত্রদোষনিবারণম্ ||৩৬||

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मुस्ताभयादेवदारुमूर्वाणां मधुकस्य च | पिबेदक्षसमं कल्कं मूत्रदोषनिवारणम् ||३६||

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Adhikarana 23 (37) · Śloka 37

অভযামলকাক্ষাণাং কল্কং বদরসম্মিতম্ | অম্ভসাঽলবণোপেতং পিবেন্মূত্ররুজাপহম্ ||৩৭||

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अभयामलकाक्षाणां कल्कं बदरसम्मितम् | अम्भसाऽलवणोपेतं पिबेन्मूत्ररुजापहम् ||३७||

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Adhikarana 24 (38) · Śloka 38

উদুম্বরসমং কল্কং দ্রাক্ষাযা জলসংযুতম্ | পিবেত্ পর্যুষিতং রাত্রৌ শীতং মূত্ররুজাপহম্ ||৩৮||

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उदुम्बरसमं कल्कं द्राक्षाया जलसंयुतम् | पिबेत् पर्युषितं रात्रौ शीतं मूत्ररुजापहम् ||३८||

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Adhikarana 25 (39) · Śloka 39

নিদিগ্ধিকাযাঃ স্বরসং পিবেত্ কুডবসম্মিতম্ | মূত্রদোষহরং কল্য ... |৩৯|

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निदिग्धिकायाः स्वरसं पिबेत् कुडवसम्मितम् | मूत्रदोषहरं कल्य ... |३९|

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Adhikarana 26 (39-40) · Śloka 40

... মথবা ক্ষৌদ্রসংযুতম্ ||৩৯|| প্রপীড্যামলকানাং তু রসং কুডবসম্মিতম্ | পীত্বাঽগদী ভবেজ্জন্তুর্মূত্রদোষরুজাতুরঃ ||৪০||

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... मथवा क्षौद्रसंयुतम् ||३९|| प्रपीड्यामलकानां तु रसं कुडवसम्मितम् | पीत्वाऽगदी भवेज्जन्तुर्मूत्रदोषरुजातुरः ||४०||

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Adhikarana 27 (41) · Śloka 41

ধাত্রীফলরসেনৈবং সূক্ষ্মৈলাং বা পিবেন্নরঃ |৪১|

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धात्रीफलरसेनैवं सूक्ष्मैलां वा पिबेन्नरः |४१|

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Adhikarana 28 (41-42) · Śloka 42

পিষ্ট্বাঽথবা সুশীতেন শালিতণ্ডুলবারিণা ||৪১|| তালস্য তরুণং মূলং ত্রপুসস্য রসং তথা | শ্বেতং কর্কটকং চৈব প্রাতস্তু পযসা পিবেত্ ||৪২||

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पिष्ट्वाऽथवा सुशीतेन शालितण्डुलवारिणा ||४१|| तालस्य तरुणं मूलं त्रपुसस्य रसं तथा | श्वेतं कर्कटकं चैव प्रातस्तु पयसा पिबेत् ||४२||

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Adhikarana 29 (43) · Śloka 43

শৃতং বা মধুরৈঃ ক্ষীরং সর্পির্মিশ্রং পিবেন্নরঃ | মূত্রদোষবিশুদ্ধ্যর্থং তথৈবাশ্মরিনাশনম্ ||৪৩||

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शृतं वा मधुरैः क्षीरं सर्पिर्मिश्रं पिबेन्नरः | मूत्रदोषविशुद्ध्यर्थं तथैवाश्मरिनाशनम् ||४३||

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Adhikarana 30 (44-45) · Śloka 45

বলাশ্বদংষ্ট্রাক্রৌঞ্চাস্থিকোকিলাক্ষকতণ্ডুলান্ | শতপর্বকমূলং চ দেবদারু সচিত্রকম্ ||৪৪|| অক্ষবীজং চ সুরযা কল্কীকৃত্য পিবেন্নরঃ | মূত্রদোষবিশুদ্ধ্যর্থং তথৈবাশ্মরিনাশনম্ ||৪৫||

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बलाश्वदंष्ट्राक्रौञ्चास्थिकोकिलाक्षकतण्डुलान् | शतपर्वकमूलं च देवदारु सचित्रकम् ||४४|| अक्षबीजं च सुरया कल्कीकृत्य पिबेन्नरः | मूत्रदोषविशुद्ध्यर्थं तथैवाश्मरिनाशनम् ||४५||

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Adhikarana 31 (46) · Śloka 46

পাটলাক্ষারমাহৃত্য সপ্তকৃত্বঃ পরিস্রুতম্ | পিবেন্মূত্রবিকারঘ্নং সংসৃষ্টং তৈলমাত্রযা ||৪৬||

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पाटलाक्षारमाहृत्य सप्तकृत्वः परिस्रुतम् | पिबेन्मूत्रविकारघ्नं संसृष्टं तैलमात्रया ||४६||

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Adhikarana 32 (47) · Śloka 47

নলাশ্মভেদদর্ভেক্ষুত্রপুসৈর্বারুবীজকান্ | ক্ষীরে পরিশৃতান্ তত্র পিবেত্ সর্পিঃসমাযুতান্ ||৪৭||

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नलाश्मभेददर्भेक्षुत्रपुसैर्वारुबीजकान् | क्षीरे परिशृतान् तत्र पिबेत् सर्पिःसमायुतान् ||४७||

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Adhikarana 33 (48) · Śloka 49

পাটল্যা যাবশূকাচ্চ পারিভদ্রাত্তিলাদাপি | ক্ষারোদকেন মতিমান্ ত্বগেলোষণচূর্ণকম্ ||৪৮|| পিবেদ্গুডেন মিশ্রং বা লিহ্যাল্লেহান্ পৃথক্ পৃথক্ |৪৯|

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पाटल्या यावशूकाच्च पारिभद्रात्तिलादापि | क्षारोदकेन मतिमान् त्वगेलोषणचूर्णकम् ||४८|| पिबेद्गुडेन मिश्रं वा लिह्याल्लेहान् पृथक् पृथक् |४९|

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Adhikarana 34 (49-50) · Śloka 50

অত ঊর্ধ্বং প্রবক্ষ্যামি মূত্রদোষে ক্রমং হিতম্ ||৪৯|| স্নেহস্বেদোপপন্নানাং হিতং তেষু বিরেচনম্ | ততঃ সংশুদ্ধদেহানাং হিতাশ্চোত্তরবস্তযঃ ||৫০||

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अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि मूत्रदोषे क्रमं हितम् ||४९|| स्नेहस्वेदोपपन्नानां हितं तेषु विरेचनम् | ततः संशुद्धदेहानां हिताश्चोत्तरबस्तयः ||५०||

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Adhikarana 35 (51) · Śloka 51

স্ত্ত্রীণামতিপ্রসঙ্গেন শোণিতং যস্য দৃশ্যতে | মৈথুনোপরমস্তস্য বৃংহণশ্চ বিধিঃ স্মৃতঃ ||৫১||

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स्त्त्रीणामतिप्रसङ्गेन शोणितं यस्य दृश्यते | मैथुनोपरमस्तस्य बृंहणश्च विधिः स्मृतः ||५१||

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Adhikarana 36 (52) · Śloka 52

তাম্রচূডবসা তৈলং হিতং চোত্তরবস্তিষু | বিধানং তস্য পূর্বং হি ব্যাসতঃ পরিকীর্তিতম্ ||৫২||

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ताम्रचूडवसा तैलं हितं चोत्तरबस्तिषु | विधानं तस्य पूर्वं हि व्यासतः परिकीर्तितम् ||५२||

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Adhikarana 37 (53-57) · Śloka 57

ক্ষৌদ্রার্ধপাত্রং দত্ত্বা চ পাত্রং তু ক্ষীরসর্পিষঃ | শর্করাযাশ্চ চূর্ণং চ দ্রাক্ষাচূর্ণং চ তত্সমম্ ||৫৩|| স্বযঙ্গুপ্তাফলং চৈব তথৈবেক্ষুরকস্য চ | পিপ্পলীচূর্ণসংযুক্তমর্ধভাগং প্রকল্পযেত্ ||৫৪|| তদৈকধ্যং সমানীয খজেনাভিপ্রমন্থযেত্ | ততঃ পাণিতলং চূর্ণং লীঢ্বা ক্ষীরং ততঃ পিবেত্ ||৫৫|| এতত্ সর্পিঃ প্রযুঞ্জানঃ শুদ্ধদেহো নরঃ সদা | মূত্রদোষাঞ্জযেত্ সর্বানন্যযোগৈঃ সুদুর্জযান্ ||৫৬|| জযেচ্ছোণিতদোষাংশ্চ বন্ধ্যা গর্ভং লভেত চ | নারী চৈতত্ প্রযুঞ্জানা যোনিদোষাত্ প্রমুচ্যতে ||৫৭||

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क्षौद्रार्धपात्रं दत्त्वा च पात्रं तु क्षीरसर्पिषः | शर्करायाश्च चूर्णं च द्राक्षाचूर्णं च तत्समम् ||५३|| स्वयङ्गुप्ताफलं चैव तथैवेक्षुरकस्य च | पिप्पलीचूर्णसंयुक्तमर्धभागं प्रकल्पयेत् ||५४|| तदैकध्यं समानीय खजेनाभिप्रमन्थयेत् | ततः पाणितलं चूर्णं लीढ्वा क्षीरं ततः पिबेत् ||५५|| एतत् सर्पिः प्रयुञ्जानः शुद्धदेहो नरः सदा | मूत्रदोषाञ्जयेत् सर्वानन्ययोगैः सुदुर्जयान् ||५६|| जयेच्छोणितदोषांश्च वन्ध्या गर्भं लभेत च | नारी चैतत् प्रयुञ्जाना योनिदोषात् प्रमुच्यते ||५७||

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Adhikarana 38 (58-64) · Śloka 65

বলা কোলাস্থি মধুকং শ্বদংষ্ট্রাঽথ শতাবরী | মৃণালং চ কশেরুশ্চ বীজানীক্ষুরকস্য চ ||৫৮|| সহস্রবীর্যাংঽশুমতী পযস্যা সহ কালযা | শৃগালবিন্নাঽতিবলা বৃংহণীযো গণস্তথা ||৫৯|| এতানি সমভাগানি মতিমান্ সহ সাধযেত্ | চতুর্গুণেন পযসা গুডস্য তুলযা সহ ||৬০|| দ্রোণাবশিষ্টং তত্ পূতং পচেত্তেন ঘৃতাঢকম্ | তত্ সিদ্ধং কলশে স্থাপ্যং ক্ষৌদ্রপ্রস্থেন সংযুতম্ ||৬১|| সর্পিরেতত্ প্রযুঞ্জানো মূত্রদোষাত্ প্রমুচ্যতে | তুগাক্ষীর্যাশ্চ চূর্ণানি শর্করাযাস্তথৈব চ ||৬২|| ক্ষৌদ্রেণ তুল্যান্যালোড্য প্রশস্তেঽহনি লেহযেত্ | তস্য খাদেদ্যথাশক্তি মাত্রাং ক্ষীরং ততঃ পিবেত্ ||৬৩|| শুক্রদোষাঞ্জযেন্মর্ত্যঃ প্রাশ্য সম্যক্ সুযন্ত্রিতঃ | ব্যবাযক্ষীণরেতাস্তু সদ্যঃ সংলভতে সুখম্ ||৬৪|| ওজস্বী বলবান্মর্ত্যঃ পিবন্নেব চ হৃষ্যতি |৬৫|

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बला कोलास्थि मधुकं श्वदंष्ट्राऽथ शतावरी | मृणालं च कशेरुश्च बीजानीक्षुरकस्य च ||५८|| सहस्रवीर्यांऽशुमती पयस्या सह कालया | शृगालविन्नाऽतिबला बृंहणीयो गणस्तथा ||५९|| एतानि समभागानि मतिमान् सह साधयेत् | चतुर्गुणेन पयसा गुडस्य तुलया सह ||६०|| द्रोणावशिष्टं तत् पूतं पचेत्तेन घृताढकम् | तत् सिद्धं कलशे स्थाप्यं क्षौद्रप्रस्थेन संयुतम् ||६१|| सर्पिरेतत् प्रयुञ्जानो मूत्रदोषात् प्रमुच्यते | तुगाक्षीर्याश्च चूर्णानि शर्करायास्तथैव च ||६२|| क्षौद्रेण तुल्यान्यालोड्य प्रशस्तेऽहनि लेहयेत् | तस्य खादेद्यथाशक्ति मात्रां क्षीरं ततः पिबेत् ||६३|| शुक्रदोषाञ्जयेन्मर्त्यः प्राश्य सम्यक् सुयन्त्रितः | व्यवायक्षीणरेतास्तु सद्यः संलभते सुखम् ||६४|| ओजस्वी बलवान्मर्त्यः पिबन्नेव च हृष्यति |६५|

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Adhikarana 39 (65-72) · Śloka 72

চিত্রকঃ সারিবা চৈব বলা কালানুসারিবা ||৬৫|| দ্রাক্ষা বিশালা পিপ্পল্যস্তথা চিত্রফলা ভবেত্ | তথৈব মধুকং পথ্যাং দদ্যাদামলকানি চ ||৬৬|| ঘৃতাঢকং পচেদেভিঃ কল্কৈঃ কর্ষসমন্বিতৈঃ | ক্ষীরদ্রোণে জলদ্রোণে তত্সিদ্ধমবতারযেত্ ||৬৭|| শীতং পরিস্রুতং চৈব শর্করাপ্রস্থসংযুতম্ | তুগাক্ষীর্যাশ্চ তত্ সর্বং মতিমান্ পরিমিশ্রযেত্ ||৬৮|| ততো মিতং পিবেত্কালে যথাদোষং যথাবলম্ | বাতরেতাঃ শ্লেষ্মরেতাঃ পিত্তরেতাস্তু যো ভবেত্ ||৬৯|| রক্তরেতা গ্রন্থিরেতাঃ পিবেদিচ্ছন্নরোগতাম্ | জীবনীযং চ বৃষ্যং চ সর্পিরেতদ্বলাবহম্ ||৭০|| প্রজ্ঞাহিতং চ ধন্যং চ সর্বরোগাপহং শিবম্ | সর্পিরেতত্ প্রযুঞ্জানা স্ত্রী গর্ভং লভতেঽচিরাত্ ||৭১|| অসৃগ্দোষাঞ্জযেচ্চাপি যোনিদোষাংশ্চ সংহতান্ | মূত্রদোষেষু সর্বেষু কুর্যাদেতচ্চিকিত্সিতম্ ||৭২||

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चित्रकः सारिवा चैव बला कालानुसारिवा ||६५|| द्राक्षा विशाला पिप्पल्यस्तथा चित्रफला भवेत् | तथैव मधुकं पथ्यां दद्यादामलकानि च ||६६|| घृताढकं पचेदेभिः कल्कैः कर्षसमन्वितैः | क्षीरद्रोणे जलद्रोणे तत्सिद्धमवतारयेत् ||६७|| शीतं परिस्रुतं चैव शर्कराप्रस्थसंयुतम् | तुगाक्षीर्याश्च तत् सर्वं मतिमान् परिमिश्रयेत् ||६८|| ततो मितं पिबेत्काले यथादोषं यथाबलम् | वातरेताः श्लेष्मरेताः पित्तरेतास्तु यो भवेत् ||६९|| रक्तरेता ग्रन्थिरेताः पिबेदिच्छन्नरोगताम् | जीवनीयं च वृष्यं च सर्पिरेतद्बलावहम् ||७०|| प्रज्ञाहितं च धन्यं च सर्वरोगापहं शिवम् | सर्पिरेतत् प्रयुञ्जाना स्त्री गर्भं लभतेऽचिरात् ||७१|| असृग्दोषाञ्जयेच्चापि योनिदोषांश्च संहतान् | मूत्रदोषेषु सर्वेषु कुर्यादेतच्चिकित्सितम् ||७२||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 58

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযামুত্তরতন্ত্রান্তর্গতে কাযচিকিত্সাতন্ত্রে মূত্রাঘাতপ্রতিষেধো নাম (বিংশোঽধ্যাযঃ, আদিতঃ) অষ্টপঞ্চাশত্তমোঽধ্যাযঃ ||৫৮||

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इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते कायचिकित्सातन्त्रे मूत्राघातप्रतिषेधो नाम (विंशोऽध्यायः, आदितः) अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ||५८||

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