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AYANAAYURVEDAby Dr Vijaya Dwarampudi
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12. raktābhiṣyandapratiṣēdhādhyāyaḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতো রক্তাভিষ্যন্দপ্রতিষেধং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातो रक्ताभिष्यन्दप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

মন্থং স্যন্দং সিরোত্পাতং সিরাহর্ষং চ রক্তজম্ | একেনৈব বিধানেন চিকিত্সেচ্চতুরো গদান্ ||৩||

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मन्थं स्यन्दं सिरोत्पातं सिराहर्षं च रक्तजम् | एकेनैव विधानेन चिकित्सेच्चतुरो गदान् ||३||

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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4

ব্যাধ্যার্তাংশ্চতুরোঽপ্যেতান্ স্নিগ্ধান্কৌম্ভেন সর্পিষা | রসৈরুদারৈরথবা সিরামোক্ষেণ যোজযেত্ ||৪||

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व्याध्यार्तांश्चतुरोऽप्येतान् स्निग्धान्कौम्भेन सर्पिषा | रसैरुदारैरथवा सिरामोक्षेण योजयेत् ||४||

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Adhikarana 4 (5) · Śloka 6

বিরিক্তানাং প্রকামং চ শিরাংস্যেষাং বিশোধযেত্ | বৈরেচনিকসিদ্ধেন সিতাযুক্তেন সর্পিষা ||৫|| (মজ্জ্ঞা বা তদ্বিমিশ্রেণ মেদসা তচ্ছৃতেন বা) |৬|

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विरिक्तानां प्रकामं च शिरांस्येषां विशोधयेत् | वैरेचनिकसिद्धेन सितायुक्तेन सर्पिषा ||५|| (मज्ज्ञा वा तद्विमिश्रेण मेदसा तच्छृतेन वा) |६|

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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6

ততঃ প্রদেহাঃ পরিষেচনানি নস্যানি ধূমাশ্চ যথাস্বমেব | আশ্চ্যোতনাভ্যঞ্জনতর্পণানি স্নিগ্ধাশ্চ কার্যাঃ পুটপাকযোগাঃ ||৬||

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ततः प्रदेहाः परिषेचनानि नस्यानि धूमाश्च यथास्वमेव | आश्च्योतनाभ्यञ्जनतर्पणानि स्निग्धाश्च कार्याः पुटपाकयोगाः ||६||

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Adhikarana 6 (7) · Śloka 7

নীলোত্পলোশীরকটঙ্কটেরীকালীযযষ্টীমধুমুস্তরোধ্রৈঃ | সপদ্মকৈর্ধৌতঘৃতপ্রদিগ্ধৈরক্ষ্ণোঃ প্রলেপং পরিতঃ প্রকুর্যাত্ ||৭||

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नीलोत्पलोशीरकटङ्कटेरीकालीययष्टीमधुमुस्तरोध्रैः | सपद्मकैर्धौतघृतप्रदिग्धैरक्ष्णोः प्रलेपं परितः प्रकुर्यात् ||७||

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Adhikarana 7 (8-9) · Śloka 9

রুজাযাং চাপ্যতিভৃশং স্বেদাশ্চ মৃদবো হিতাঃ | অক্ষ্ণোঃ সমন্ততঃ কার্যং পাতনং চ জলৌকসাম্ ||৮|| ঘৃতস্য মহতী মাত্রা পীতা চার্তিং নিযচ্ছতি | পিত্তাভিষ্যন্দশমনো বিধিশ্চাপ্যুপপাদিতঃ ||৯||

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रुजायां चाप्यतिभृशं स्वेदाश्च मृदवो हिताः | अक्ष्णोः समन्ततः कार्यं पातनं च जलौकसाम् ||८|| घृतस्य महती मात्रा पीता चार्तिं नियच्छति | पित्ताभिष्यन्दशमनो विधिश्चाप्युपपादितः ||९||

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Adhikarana 8 (10) · Śloka 10

কশেরুমধুকাভ্যাং বা চূর্ণমম্বরসংবৃতম্ | ন্যস্তমপ্স্বান্তরিক্ষাসু হিতমাশ্চ্যোতনং ভবেত্ ||১০||

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कशेरुमधुकाभ्यां वा चूर्णमम्बरसंवृतम् | न्यस्तमप्स्वान्तरिक्षासु हितमाश्च्योतनं भवेत् ||१०||

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Adhikarana 9 (11-12) · Śloka 12

পাটল্যর্জুনশ্রীপর্ণীধাতকীধাত্রিবিল্বতঃ | পুষ্পাণ্যথ বৃহত্যোশ্চ বিম্বীলোটাচ্চ তুল্যশঃ ||১১|| সমঞ্জিষ্ঠানি মধুনা পিষ্টানীক্ষুরসেন বা | রক্তাভিষ্যন্দশান্ত্যর্থমেতদঞ্জনমিষ্যতে ||১২||

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पाटल्यर्जुनश्रीपर्णीधातकीधात्रिबिल्वतः | पुष्पाण्यथ बृहत्योश्च बिम्बीलोटाच्च तुल्यशः ||११|| समञ्जिष्ठानि मधुना पिष्टानीक्षुरसेन वा | रक्ताभिष्यन्दशान्त्यर्थमेतदञ्जनमिष्यते ||१२||

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Adhikarana 10 (13-14) · Śloka 14

চন্দনং কুমুদং পত্রং শিলাজতু সকুঙ্কুমম্ | অযস্তাম্ররজস্তুত্থং নিম্বনির্যাসমঞ্জনম্ ||১৩|| ত্রপু কাংস্যমলং চাপি পিষ্ট্বা পুষ্পরসেন তু | বিপুলা যাঃ কৃতা বর্ত্যঃ পূজিতাশ্চাঞ্জনে সদা ||১৪||

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चन्दनं कुमुदं पत्रं शिलाजतु सकुङ्कुमम् | अयस्ताम्ररजस्तुत्थं निम्बनिर्यासमञ्जनम् ||१३|| त्रपु कांस्यमलं चापि पिष्ट्वा पुष्परसेन तु | विपुला याः कृता वर्त्यः पूजिताश्चाञ्जने सदा ||१४||

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Adhikarana 11 (15-16) · Śloka 17

স্যাদঞ্জনং ঘৃতং ক্ষৌদ্রং সিরোত্পাতস্য ভেষজম্ | তদ্বত্সৈন্ধবকাসীসং স্তন্যঘৃষ্টং চ পূজিতম্ ||১৫|| মধুনা শঙ্খনৈপালীতুত্থদার্ব্যঃ সসৈন্ধবাঃ | রসঃ শিরীষপুষ্পাচ্চ সুরামরিচমাক্ষিকৈঃ ||১৬|| যুক্তং তু মধুনা বাঽপি গৈরিকং হিতমঞ্জনে |১৭|

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स्यादञ्जनं घृतं क्षौद्रं सिरोत्पातस्य भेषजम् | तद्वत्सैन्धवकासीसं स्तन्यघृष्टं च पूजितम् ||१५|| मधुना शङ्खनैपालीतुत्थदार्व्यः ससैन्धवाः | रसः शिरीषपुष्पाच्च सुरामरिचमाक्षिकैः ||१६|| युक्तं तु मधुना वाऽपि गैरिकं हितमञ्जने |१७|

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Adhikarana 12 (17-18) · Śloka 18

সিরাহর্ষেঽঞ্জনং কুর্যাত্ ফাণিতং মধুসংযুতম্ ||১৭|| মধুনা তার্ক্ষ্যজং বাঽপি কাসীসং বা সসৈন্ধবম্ | বেত্রাম্লস্তন্যসংযুক্তং ফাণিতং চ সসৈন্ধবম্ ||১৮||

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सिराहर्षेऽञ्जनं कुर्यात् फाणितं मधुसंयुतम् ||१७|| मधुना तार्क्ष्यजं वाऽपि कासीसं वा ससैन्धवम् | वेत्राम्लस्तन्यसंयुक्तं फाणितं च ससैन्धवम् ||१८||

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Adhikarana 13 (19-23) · Śloka 24

পৈত্তং বিধিমশেষেণ কুর্যাদর্জুনশান্তযে | ইক্ষুক্ষৌদ্রসিতাস্তন্যদার্বীমধুকসৈন্ধবৈঃ ||১৯|| সেকাঞ্জনং চাত্র হিতমম্লৈরাশ্চ্যোতনং তথা | সিতামধুককট্বঙ্গমস্তুক্ষৌদ্রাম্লসৈন্ধবৈঃ ||২০|| বীজপূরককোলাম্লদাডিমাম্লৈশ্চ যুক্তিতঃ | একশো বা দ্বিশো বাঽপি যোজিতং বা ত্রিভিস্ত্রিভিঃ ||২১|| স্ফটিকং বিদ্রুমং শঙ্খো মধুকং মধু চৈব হি | শঙ্খক্ষৌদ্রসিতাযুক্তঃ সামুদ্রঃ ফেন এব বা ||২২|| দ্বাবিমৌ বিহিতৌ যোগাবঞ্জনেঽর্জুননাশনৌ | সৈন্ধবক্ষৌদ্রকতকাঃ সক্ষৌদ্রং বা রসাঞ্জনম্ ||২৩|| কাসীসং মধুনা বাঽপি যোজ্যমত্রাঞ্জনে সদা |২৪|

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पैत्तं विधिमशेषेण कुर्यादर्जुनशान्तये | इक्षुक्षौद्रसितास्तन्यदार्वीमधुकसैन्धवैः ||१९|| सेकाञ्जनं चात्र हितमम्लैराश्च्योतनं तथा | सितामधुककट्वङ्गमस्तुक्षौद्राम्लसैन्धवैः ||२०|| बीजपूरककोलाम्लदाडिमाम्लैश्च युक्तितः | एकशो वा द्विशो वाऽपि योजितं वा त्रिभिस्त्रिभिः ||२१|| स्फटिकं विद्रुमं शङ्खो मधुकं मधु चैव हि | शङ्खक्षौद्रसितायुक्तः सामुद्रः फेन एव वा ||२२|| द्वाविमौ विहितौ योगावञ्जनेऽर्जुननाशनौ | सैन्धवक्षौद्रकतकाः सक्षौद्रं वा रसाञ्जनम् ||२३|| कासीसं मधुना वाऽपि योज्यमत्राञ्जने सदा |२४|

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Adhikarana 14 (24-26) · Śloka 27

লোহচূর্ণানি সর্বাণি ধাতবো লবণানি চ ||২৪|| রত্নানি দন্তাঃ শৃঙ্গাণি গণশ্চাপ্যবসাদনঃ | কুক্কুটাণ্ডকপালানি লশুনং কটুকত্রযম্ ||২৫|| করঞ্জবীজমেলা চ লেখ্যাঞ্জনমিদং স্মৃতম্ | পুটপাকাবসানেন রক্তবিস্রাবণাদিনা ||২৬|| সম্পাদিতস্য বিধিনা কৃত্স্নেন স্যন্দঘাতিনা |২৭|

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लोहचूर्णानि सर्वाणि धातवो लवणानि च ||२४|| रत्नानि दन्ताः शृङ्गाणि गणश्चाप्यवसादनः | कुक्कुटाण्डकपालानि लशुनं कटुकत्रयम् ||२५|| करञ्जबीजमेला च लेख्याञ्जनमिदं स्मृतम् | पुटपाकावसानेन रक्तविस्रावणादिना ||२६|| सम्पादितस्य विधिना कृत्स्नेन स्यन्दघातिना |२७|

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Adhikarana 15 (27) · Śloka 27

অনেনাপহরেচ্ছুক্রমব্রণং কুশলো ভিষক্ ||২৭||

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अनेनापहरेच्छुक्रमव्रणं कुशलो भिषक् ||२७||

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Adhikarana 16 (28-35) · Śloka 36

উত্তানমবগাঢং বা কর্কশং বাঽপি সব্রণম্ | শিরীষবীজমরিচপিপ্পলীসৈন্ধবৈরপি ||২৮|| শুক্রস্য ঘর্ষণং কার্যমথবা সৈন্ধবেন তু | কুর্যাত্তাম্ররজঃশঙ্খশিলামরিচসৈন্ধবৈঃ ||২৯|| অন্ত্যাদ্দ্বিগুণিতৈরেভিরঞ্জনং শুক্রনাশনম্ | কুর্যাদঞ্জনযোগৌ বা সম্যক্ শ্লোকার্ধিকাবিমৌ ||৩০|| শঙ্খকোলাস্থিকতকদ্রাক্ষামধুকমাক্ষিকৈঃ | ক্ষৌদ্রদন্তার্ণবমলশিরীষকুসুমৈরপি ||৩১|| ক্ষারাঞ্জনং বা বিতরেদ্বলাসগ্রথিতাপহম্ | মুদ্গান্ বা নিস্তুষান্ ভৃষ্টান্ শঙ্খক্ষৌদ্রসিতাযুতান্ ||৩২|| মধূকসারং মধুনা যোজযেচ্চাঞ্জনে সদা | বিভীতকাস্থিমজ্জা বা সক্ষৌদ্রঃ শুক্রনাশনঃ ||৩৩|| শঙ্খশুক্তিমধুদ্রাক্ষামধুকং কতকানি চ | দ্বিত্বগ্গতে সশূলে বা বাতঘ্নং তর্পণং হিতম্ ||৩৪|| বংশজারুষ্করৌ তালং নারিকেলং চ দাহযেত্ | বিস্রাব্য ক্ষারবচ্চূর্ণং ভাবযেত্করভাস্থিজম্ ||৩৫|| বহুশোঽঞ্জনমেতত্স্যাচ্ছুক্রবৈবর্ণ্যনাশনম্ |৩৬|

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उत्तानमवगाढं वा कर्कशं वाऽपि सव्रणम् | शिरीषबीजमरिचपिप्पलीसैन्धवैरपि ||२८|| शुक्रस्य घर्षणं कार्यमथवा सैन्धवेन तु | कुर्यात्ताम्ररजःशङ्खशिलामरिचसैन्धवैः ||२९|| अन्त्याद्द्विगुणितैरेभिरञ्जनं शुक्रनाशनम् | कुर्यादञ्जनयोगौ वा सम्यक् श्लोकार्धिकाविमौ ||३०|| शङ्खकोलास्थिकतकद्राक्षामधुकमाक्षिकैः | क्षौद्रदन्तार्णवमलशिरीषकुसुमैरपि ||३१|| क्षाराञ्जनं वा वितरेद्बलासग्रथितापहम् | मुद्गान् वा निस्तुषान् भृष्टान् शङ्खक्षौद्रसितायुतान् ||३२|| मधूकसारं मधुना योजयेच्चाञ्जने सदा | बिभीतकास्थिमज्जा वा सक्षौद्रः शुक्रनाशनः ||३३|| शङ्खशुक्तिमधुद्राक्षामधुकं कतकानि च | द्वित्वग्गते सशूले वा वातघ्नं तर्पणं हितम् ||३४|| वंशजारुष्करौ तालं नारिकेलं च दाहयेत् | विस्राव्य क्षारवच्चूर्णं भावयेत्करभास्थिजम् ||३५|| बहुशोऽञ्जनमेतत्स्याच्छुक्रवैवर्ण्यनाशनम् |३६|

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Adhikarana 17 (36-37) · Śloka 37

অজকাং পার্শ্বতো বিদ্ধ্বা সূচ্যা বিস্রাব্য চোদকম্ ||৩৬|| ব্রণং গোমাংসচূর্ণেন পূরযেত্ সর্পিষা সহ | বহুশোঽবলিখেচ্চাপি বর্ত্মাস্যোপগতং যদি ||৩৭||

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अजकां पार्श्वतो विद्ध्वा सूच्या विस्राव्य चोदकम् ||३६|| व्रणं गोमांसचूर्णेन पूरयेत् सर्पिषा सह | बहुशोऽवलिखेच्चापि वर्त्मास्योपगतं यदि ||३७||

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Adhikarana 18 (38) · Śloka 39

সশোফশ্চাপ্যশোফশ্চ দ্বৌ পাকৌ যৌ প্রকীর্তিতৌ | স্নেহস্বেদোপপন্নস্য তত্র বিদ্ধ্বা সিরাং ভিষক্ ||৩৮|| সেকাশ্চ্যোতননস্যানি পুটপাকাংশ্চ কারযেত্ |৩৯|

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सशोफश्चाप्यशोफश्च द्वौ पाकौ यौ प्रकीर्तितौ | स्नेहस्वेदोपपन्नस्य तत्र विद्ध्वा सिरां भिषक् ||३८|| सेकाश्च्योतननस्यानि पुटपाकांश्च कारयेत् |३९|

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Adhikarana 19 (39-41) · Śloka 42

সর্বতশ্চাপি শুদ্ধস্য কর্তব্যমিদমঞ্জনম্ ||৩৯|| তাম্রপাত্রস্থিতং মাসং সর্পিঃ সৈন্ধবসংযুতম্ | মৈরেযং বাঽপি দধ্যেবং দধ্যুত্তরকমেব বা ||৪০|| ঘৃতং কাংস্যমলোপেতং স্তন্যং বাঽপি সসৈন্ধবম্ | মধূকসারং মধুনা তুল্যাংশং গৈরিকেণ বা ||৪১|| সর্পিঃসৈন্ধবতাম্রাণি যোষিত্স্তন্যযুতানি বা |৪২|

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सर्वतश्चापि शुद्धस्य कर्तव्यमिदमञ्जनम् ||३९|| ताम्रपात्रस्थितं मासं सर्पिः सैन्धवसंयुतम् | मैरेयं वाऽपि दध्येवं दध्युत्तरकमेव वा ||४०|| घृतं कांस्यमलोपेतं स्तन्यं वाऽपि ससैन्धवम् | मधूकसारं मधुना तुल्यांशं गैरिकेण वा ||४१|| सर्पिःसैन्धवताम्राणि योषित्स्तन्ययुतानि वा |४२|

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Adhikarana 20 (42) · Śloka 42

দাডিমারেবতাশমন্তকোলাম্লৈশ্চ সসৈন্ধবাম্ | রসক্রিযাং বা বিতরেত্সম্যক্পাকজিঘাংসযা ||৪২||

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दाडिमारेवताशमन्तकोलाम्लैश्च ससैन्धवाम् | रसक्रियां वा वितरेत्सम्यक्पाकजिघांसया ||४२||

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Adhikarana 21 (43) · Śloka 43

মাসং সৈন্ধবসংযুক্তং স্থিতং সর্পিষি নাগরম্ | আশ্চ্যোতনাঞ্জনং যোজ্যমবলাক্ষীরসংযুতম্ ||৪৩||

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मासं सैन्धवसंयुक्तं स्थितं सर्पिषि नागरम् | आश्च्योतनाञ्जनं योज्यमबलाक्षीरसंयुतम् ||४३||

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Adhikarana 22 (44) · Śloka 44

জাত্যাঃ পুষ্পং সৈন্ধবং শৃঙ্গবেরং কৃষ্ণাবীজং কীটশত্রোশ্চ সারম্ | এতত্ পিষ্টং নেত্রপাকেঽঞ্জনার্থং ক্ষৌদ্রোপেতং নির্বিশঙ্কং প্রযোজ্যম্ ||৪৪||

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जात्याः पुष्पं सैन्धवं शृङ्गवेरं कृष्णाबीजं कीटशत्रोश्च सारम् | एतत् पिष्टं नेत्रपाकेऽञ्जनार्थं क्षौद्रोपेतं निर्विशङ्कं प्रयोज्यम् ||४४||

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Adhikarana 23 (45) · Śloka 45

পূযালসে শোণিতমোক্ষণং চ হিতং তথৈবাপ্যুপনাহনং চ | কৃত্স্নো বিধিশ্চেক্ষণপাকঘাতী যথাবিধানং ভিষজা প্রযোজ্যঃ ||৪৫||

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पूयालसे शोणितमोक्षणं च हितं तथैवाप्युपनाहनं च | कृत्स्नो विधिश्चेक्षणपाकघाती यथाविधानं भिषजा प्रयोज्यः ||४५||

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Adhikarana 24 (46) · Śloka 46

কাসীসসিন্ধুপ্রভবার্দ্রকৈস্তু হিতং ভবেদঞ্জনমেব চাত্র | ক্ষৌদ্রান্বিতৈরেভিরথোপযুঞ্জ্যাদন্যত্তু তাম্রাযসচূর্ণযুক্তৈঃ ||৪৬||

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कासीससिन्धुप्रभवार्द्रकैस्तु हितं भवेदञ्जनमेव चात्र | क्षौद्रान्वितैरेभिरथोपयुञ्ज्यादन्यत्तु ताम्रायसचूर्णयुक्तैः ||४६||

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Adhikarana 25 (47) · Śloka 47

স্নেহাদিভিঃ সম্যগপাস্য দোষাংস্তৃপ্তিং বিধাযাথ যথাস্বমেব | প্রক্লিন্নবর্ত্মানমুপক্রমেত সেকাঞ্জনাশ্চ্যোতননস্যধূমৈঃ ||৪৭||

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स्नेहादिभिः सम्यगपास्य दोषांस्तृप्तिं विधायाथ यथास्वमेव | प्रक्लिन्नवर्त्मानमुपक्रमेत सेकाञ्जनाश्च्योतननस्यधूमैः ||४७||

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Adhikarana 26 (48) · Śloka 48

মুস্তাহরিদ্রামধুকপ্রিযঙ্গুসিদ্ধার্থরোধ্রোত্পলসারিবাভিঃ | ক্ষুণ্ণাভিরাশ্চ্যোতনমেব কার্যমত্রাঞ্জনং চাঞ্জনমাক্ষিকং স্যাত্ ||৪৮||

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मुस्ताहरिद्रामधुकप्रियङ्गुसिद्धार्थरोध्रोत्पलसारिवाभिः | क्षुण्णाभिराश्च्योतनमेव कार्यमत्राञ्जनं चाञ्जनमाक्षिकं स्यात् ||४८||

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Adhikarana 27 (49) · Śloka 50

পত্রং ফলং চামলকস্য পক্ত্বা ক্রিযাং বিদধ্যাদথবাঽঞ্জনার্থে | বংশস্য মূলেন রসক্রিযাং বা বর্তীকৃতাং তাম্রকপালপক্বাম্ ||৪৯|| রসক্রিযাং বা ত্রিফলাবিপক্বাং পলাশপুষ্পৈঃ খরমঞ্জরের্বা |৫০|

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पत्रं फलं चामलकस्य पक्त्वा क्रियां विदध्यादथवाऽञ्जनार्थे | वंशस्य मूलेन रसक्रियां वा वर्तीकृतां ताम्रकपालपक्वाम् ||४९|| रसक्रियां वा त्रिफलाविपक्वां पलाशपुष्पैः खरमञ्जरेर्वा |५०|

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Adhikarana 28 (50) · Śloka 51

পিষ্ট্বা ছগল্যাঃ পযসা মলং বা কাংসস্য দগ্ধ্বা সহ তান্তবেন ||৫০|| প্রত্যঞ্জনং তন্মরিচৈরুপেতং চূর্ণেন তাম্রস্য সহোপযোজ্যম্ |৫১|

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पिष्ट्वा छगल्याः पयसा मलं वा कांसस्य दग्ध्वा सह तान्तवेन ||५०|| प्रत्यञ्जनं तन्मरिचैरुपेतं चूर्णेन ताम्रस्य सहोपयोज्यम् |५१|

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Adhikarana 29 (51) · Śloka 52

সমুদ্রফেনং লবণোত্তমং চ শঙ্খোঽথ মুদ্গো মরিচং চ শুক্লম্ ||৫১|| চূর্ণাঞ্জনং জাড্যমথাপি কণ্ডূমক্লিন্নবর্ত্মান্যুপহন্তি শীঘ্রম্ |৫২|

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समुद्रफेनं लवणोत्तमं च शङ्खोऽथ मुद्गो मरिचं च शुक्लम् ||५१|| चूर्णाञ्जनं जाड्यमथापि कण्डूमक्लिन्नवर्त्मान्युपहन्ति शीघ्रम् |५२|

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Adhikarana 30 (52) · Śloka 52

প্রক্লিন্নবর্ত্মন্যপি চৈত এব যোগাঃ প্রযোজ্যাশ্চ সমীক্ষ্য দোষম্ ||৫২||

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प्रक्लिन्नवर्त्मन्यपि चैत एव योगाः प्रयोज्याश्च समीक्ष्य दोषम् ||५२||

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Adhikarana 31 (53) · Śloka 53

সকজ্জলং তাম্রঘটে চ ঘৃষ্ঠং সর্পির্যুতং তুত্থকমঞ্জনং চ ||৫৩||

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सकज्जलं ताम्रघटे च घृष्ठं सर्पिर्युतं तुत्थकमञ्जनं च ||५३||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 12

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযামুত্তরতন্ত্রান্তর্গতে শালাক্যতেন্ত্রে রক্তাভিষ্যন্দপ্রতিষেধো নাম দ্বাদশোঽধ্যাযঃ ||১২||

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इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते शालाक्यतेन्त्रे रक्ताभिष्यन्दप्रतिषेधो नाम द्वादशोऽध्यायः ||१२||

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