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50. hikkāpratiṣēdhādhyāyaḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতো হিক্কাপ্রতিষেধং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातो हिक्काप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3-5) · Śloka 5

বিদাহিগুরুবিষ্টম্ভিরূক্ষাভিষ্যন্দিভোজনৈঃ | শীতপানাসনস্থানরজোধূমানিলানলৈঃ ||৩|| ব্যাযামকর্মভারাধ্ববেগাঘাতাপতর্পণৈঃ | আমাদোষাভিঘাতস্ত্রীক্ষযদোষপ্রপীডনৈঃ ||৪|| বিষমাশনাধ্যনশনৈস্তথা সমশনৈরপি | হিক্কা শ্বাসশ্চ কাসশ্চ নৃণাং সমুপজাযতে ||৫||

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विदाहिगुरुविष्टम्भिरूक्षाभिष्यन्दिभोजनैः | शीतपानासनस्थानरजोधूमानिलानलैः ||३|| व्यायामकर्मभाराध्ववेगाघातापतर्पणैः | आमादोषाभिघातस्त्रीक्षयदोषप्रपीडनैः ||४|| विषमाशनाध्यनशनैस्तथा समशनैरपि | हिक्का श्वासश्च कासश्च नृणां समुपजायते ||५||

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Adhikarana 3 (6) · Śloka 6

মুহুর্মুহুর্বাযরুদেতি সস্বনো যকৃত্প্লিহান্ত্রাণি মুখাদিবাক্ষিপন্ | স ঘোষবানাশু হিনস্ত্যসূন্ যতস্ততস্তু হিক্কেতি ভিষগ্ভিরুচ্যতে ||৬||

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मुहुर्मुहुर्वायरुदेति सस्वनो यकृत्प्लिहान्त्राणि मुखादिवाक्षिपन् | स घोषवानाशु हिनस्त्यसून् यतस्ततस्तु हिक्केति भिषग्भिरुच्यते ||६||

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Adhikarana 4 (7) · Śloka 7

অন্নজাং যমলাং ক্ষুদ্রাং গম্ভীরাং মহতীং তথা | বাযুঃ কফেনানুগতঃ পঞ্চ হিক্কাঃ করোতি হি ||৭||

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अन्नजां यमलां क्षुद्रां गम्भीरां महतीं तथा | वायुः कफेनानुगतः पञ्च हिक्काः करोति हि ||७||

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Adhikarana 5 (8) · Śloka 8

মুখং কষাযমরতির্গৌরবং কণ্ঠবক্ষসোঃ | পূর্বরূপাণি হিক্কানামাটোপো জঠরস্য চ ||৮||

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मुखं कषायमरतिर्गौरवं कण्ठवक्षसोः | पूर्वरूपाणि हिक्कानामाटोपो जठरस्य च ||८||

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Adhikarana 6 (9) · Śloka 10

ত্বরমাণস্য চাহারং ভুঞ্জানস্যাথবা ঘনম্ | বাযুরন্নৈরবস্তীর্ণঃ কটুকৈরর্দিতো ভৃশম্ ||৯|| হিক্কযত্যূর্ধ্বগো ভূত্বা তাং বিদ্যাদন্নজাং ভিষক্ |১০|

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त्वरमाणस्य चाहारं भुञ्जानस्याथवा घनम् | वायुरन्नैरवस्तीर्णः कटुकैरर्दितो भृशम् ||९|| हिक्कयत्यूर्ध्वगो भूत्वा तां विद्यादन्नजां भिषक् |१०|

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Adhikarana 7 (10) · Śloka 11

চিরেণ যমলৈর্বেগৈর্যা হিক্কা সম্প্রবর্ততে ||১০|| কম্পযন্তী শিরোগ্রীবং যমলাং তাং বিনির্দিশেত্ |১১|

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चिरेण यमलैर्वेगैर्या हिक्का सम्प्रवर्तते ||१०|| कम्पयन्ती शिरोग्रीवं यमलां तां विनिर्दिशेत् |११|

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Adhikarana 8 (11) · Śloka 12

বিকৃষ্টকালৈর্যা বেগৈর্মন্দৈঃ সমভিবর্ততে ||১১|| ক্ষুদ্রিকা নাম সা হিক্কা জত্রুমূলাত্ প্রধাবিতা |১২|

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विकृष्टकालैर्या वेगैर्मन्दैः समभिवर्तते ||११|| क्षुद्रिका नाम सा हिक्का जत्रुमूलात् प्रधाविता |१२|

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Adhikarana 9 (12-13) · Śloka 13

নাভিপ্রবৃত্তা যা হিক্কা ঘোরা গম্ভীরনাদিনী ||১২|| শুষ্কৌষ্ঠকণ্ঠজিহ্বাস্যশ্বাসপার্শ্বরুজাকরী | অনেকোপদ্রবযুতা গম্ভীরা নাম সা স্মৃতা ||১৩||

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नाभिप्रवृत्ता या हिक्का घोरा गम्भीरनादिनी ||१२|| शुष्कौष्ठकण्ठजिह्वास्यश्वासपार्श्वरुजाकरी | अनेकोपद्रवयुता गम्भीरा नाम सा स्मृता ||१३||

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Adhikarana 10 (14) · Śloka 14

মর্মাণ্যাপীডযন্তীব সততং যা প্রবর্ততে | দেহমাযম্য বেগেন ঘোষযত্যতিতৃষ্যতঃ | মহাহিক্কেতি সা জ্ঞেযা সর্বগাত্রপ্রকম্পিনী ||১৪||

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मर्माण्यापीडयन्तीव सततं या प्रवर्तते | देहमायम्य वेगेन घोषयत्यतितृष्यतः | महाहिक्केति सा ज्ञेया सर्वगात्रप्रकम्पिनी ||१४||

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Adhikarana 11 (15) · Śloka 15

আযম্যতে হিক্কাঽতোঙ্গানি যস্য দৃষ্টিশ্চোর্ধ্বং তাম্যতে যস্য গাঢম্ | ক্ষীণোঽন্নদ্বিট্ কাসতে যশ্চ হিক্কী তৌ দ্বাবন্ত্যৌ বর্জযেদ্ধিক্কমানৌ ||১৫||

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आयम्यते हिक्काऽतोङ्गानि यस्य दृष्टिश्चोर्ध्वं ताम्यते यस्य गाढम् | क्षीणोऽन्नद्विट् कासते यश्च हिक्की तौ द्वावन्त्यौ वर्जयेद्धिक्कमानौ ||१५||

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Adhikarana 12 (16) · Śloka 16

প্রাণাযামোদ্বেজনত্রাসনানি সূচীতোদৈঃ সম্ভ্রমশ্চাত্র শস্তঃ |১৬|

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प्राणायामोद्वेजनत्रासनानि सूचीतोदैः सम्भ्रमश्चात्र शस्तः |१६|

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Adhikarana 13 (16) · Śloka 16

যষ্ট্যাহ্বং বা মাক্ষিকেণাবপীডে পিপ্পল্যো বা শর্করাচূর্ণযুক্তাঃ ||১৬||

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यष्ट्याह्वं वा माक्षिकेणावपीडे पिप्पल्यो वा शर्कराचूर्णयुक्ताः ||१६||

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Adhikarana 14 (17) · Śloka 17

সর্পিঃ কোষ্ণং ক্ষীরমিক্ষো রসো বা নাতিক্ষীণে ছর্দনং শান্তিহেতোঃ |১৭|

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सर्पिः कोष्णं क्षीरमिक्षो रसो वा नातिक्षीणे छर्दनं शान्तिहेतोः |१७|

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Adhikarana 15 (17) · Śloka 18

নারীপযঃপিষ্টমশুক্লচন্দনং ঘৃতং সুখোষ্ণং চ সসৈন্ধবং তথা ||১৭|| চূর্ণীকৃতং সৈন্ধবমম্ভসাঽথবা নিহন্তি হিক্কাং চ হিতং চ নস্যতঃ |১৮|

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नारीपयःपिष्टमशुक्लचन्दनं घृतं सुखोष्णं च ससैन्धवं तथा ||१७|| चूर्णीकृतं सैन्धवमम्भसाऽथवा निहन्ति हिक्कां च हितं च नस्यतः |१८|

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Adhikarana 16 (18) · Śloka 19

যুঞ্জ্যাদ্ধূমং শালনির্যাসজাতং নৈপালং বা গোবিষাণোদ্ভবং বা ||১৮|| সর্পিঃস্নিগ্ধৈশ্চর্মবালৈঃ কৃতং বা হিক্কাস্থানে স্বেদনং চাপি কার্যম্ |১৯|

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युञ्ज्याद्धूमं शालनिर्यासजातं नैपालं वा गोविषाणोद्भवं वा ||१८|| सर्पिःस्निग्धैश्चर्मबालैः कृतं वा हिक्कास्थाने स्वेदनं चापि कार्यम् |१९|

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Adhikarana 17 (19-20) · Śloka 21

ক্ষৌদ্রোপেতং গৈরিকং কাঞ্চনাহ্বং লিহ্যাদ্ভস্ম গ্রাম্যসত্ত্বাস্থিজং বা ||১৯|| তদ্বচ্ছ্বাবিন্মেষগোশল্য(ল্ল)কানাং রোমাণ্যন্তর্ধূমদগ্ধানি চাত্র | মধ্বাজ্যাক্তং বর্হিপত্রপ্রসূতমেবং ভস্মৌদুম্বরং তৈল্বকং বা ||২০|| স্বর্জিক্ষারং বীজপূরাদ্রসেন ক্ষৌদ্রোপেতং হন্তি লীঢ্বাঽঽশু হিক্কাম্ |২১|

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क्षौद्रोपेतं गैरिकं काञ्चनाह्वं लिह्याद्भस्म ग्राम्यसत्त्वास्थिजं वा ||१९|| तद्वच्छ्वाविन्मेषगोशल्य(ल्ल)कानां रोमाण्यन्तर्धूमदग्धानि चात्र | मध्वाज्याक्तं बर्हिपत्रप्रसूतमेवं भस्मौदुम्बरं तैल्वकं वा ||२०|| स्वर्जिक्षारं बीजपूराद्रसेन क्षौद्रोपेतं हन्ति लीढ्वाऽऽशु हिक्काम् |२१|

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Adhikarana 18 (21) · Śloka 21

সর্পিঃস্নিগ্ধা ঘ্নন্তি হিক্কাং যবাগ্বঃ কোষ্ণগ্রাসাঃ পাযসো বা সুখোষ্ণঃ ||২১||

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सर्पिःस्निग्धा घ्नन्ति हिक्कां यवाग्वः कोष्णग्रासाः पायसो वा सुखोष्णः ||२१||

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Adhikarana 19 (22) · Śloka 22

শুণ্ঠীতোযে সাধিতং ক্ষীরমাজং তদ্বত্ পীতং শর্করাসংযুতং বা | আতৃপ্তের্বা সেব্যমানং নিহন্যাদ্ ঘ্রাতং হিক্কামাশু মূত্রং ত্বজাব্যোঃ ||২২||

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शुण्ठीतोये साधितं क्षीरमाजं तद्वत् पीतं शर्करासंयुतं वा | आतृप्तेर्वा सेव्यमानं निहन्याद् घ्रातं हिक्कामाशु मूत्रं त्वजाव्योः ||२२||

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Adhikarana 20 (23) · Śloka 23

সপূতিকীটং লশুনোগ্রগন্ধাহিঙ্গ্বব্জমাচূর্ণ্য সুভাবিতং তত্ |২৩|

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सपूतिकीटं लशुनोग्रगन्धाहिङ्ग्वब्जमाचूर्ण्य सुभावितं तत् |२३|

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Adhikarana 21 (23) · Śloka 23

ক্ষৌদ্রং সিতাং বারণকেশরং চ পিবেদ্রসেনেক্ষুমধূকজেন ||২৩||

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क्षौद्रं सितां वारणकेशरं च पिबेद्रसेनेक्षुमधूकजेन ||२३||

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Adhikarana 22 (24) · Śloka 24

পিবেত্ পলং বা লবণোত্তমস্য দ্বাভ্যাং পলাভ্যাং হবিষঃ সমগ্রম্ |২৪|

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पिबेत् पलं वा लवणोत्तमस्य द्वाभ्यां पलाभ्यां हविषः समग्रम् |२४|

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Adhikarana 23 (24-25) · Śloka 25

হরীতকীং কোষ্ণজলানুপানাং পিবেদ্ঘৃতং ক্ষারমধূপপন্নম্ ||২৪|| রসং কপিত্থান্মধুপিপ্পলীভ্যাং শুক্তিপ্রমাণং প্রপিবেত্ সুখায ||২৫||

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हरीतकीं कोष्णजलानुपानां पिबेद्घृतं क्षारमधूपपन्नम् ||२४|| रसं कपित्थान्मधुपिप्पलीभ्यां शुक्तिप्रमाणं प्रपिबेत् सुखाय ||२५||

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Adhikarana 24 (26) · Śloka 26

কৃষ্ণাং সিতাং চামলকং চ লীঢং সশৃঙ্গবেরং মধুনাঽথবাঽপি | কোলাস্থিমজ্জাঞ্জনলাজচূর্ণং হিক্কা নিহন্যান্মধুনাঽবলীঢম্ ||২৬||

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कृष्णां सितां चामलकं च लीढं सशृङ्गवेरं मधुनाऽथवाऽपि | कोलास्थिमज्जाञ्जनलाजचूर्णं हिक्का निहन्यान्मधुनाऽवलीढम् ||२६||

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Adhikarana 25 (27-28) · Śloka 28

পাটলাযাঃ ফলং পুষ্পং গৈরিকং কটুরোহিণী | খর্জূরমধ্যং মাগধ্যঃ কাশীশং দধিনাম চ ||২৭|| চত্বার এতে যোগাঃ স্যুঃ প্রতিপাদপ্রদর্শিতাঃ | মধুদ্বিতীযাঃ কর্তব্যাস্তে হিক্কাসু বিজানতা ||২৮||

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पाटलायाः फलं पुष्पं गैरिकं कटुरोहिणी | खर्जूरमध्यं मागध्यः काशीशं दधिनाम च ||२७|| चत्वार एते योगाः स्युः प्रतिपादप्रदर्शिताः | मधुद्वितीयाः कर्तव्यास्ते हिक्कासु विजानता ||२८||

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Adhikarana 26 (29) · Śloka 29

কপোতপারাবতলাবশ(ল্ল)কশ্বদংষ্ট্রগোধাবৃষদংশজান্ রসান্ | পিবেত্ ফলাম্লানহিমান্ সসৈন্ধবান্ স্নিগ্ধাংস্তথৈবর্ষ্যমৃগদ্বিজোদ্ভবান্ ||২৯||

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कपोतपारावतलावश(ल्ल)कश्वदंष्ट्रगोधावृषदंशजान् रसान् | पिबेत् फलाम्लानहिमान् ससैन्धवान् स्निग्धांस्तथैवर्ष्यमृगद्विजोद्भवान् ||२९||

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Adhikarana 27 (30) · Śloka 30

বিরেচনং পথ্যতমং সসৈন্ধবং ঘৃতং সুখোষ্ণং চ সিতোপলাযুতম্ | সদাগতাবূর্ধ্বগতেঽনুবাসনং বদন্তি কেচিচ্চ হিতায হিক্কিনাম্ ||৩০||

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विरेचनं पथ्यतमं ससैन्धवं घृतं सुखोष्णं च सितोपलायुतम् | सदागतावूर्ध्वगतेऽनुवासनं वदन्ति केचिच्च हिताय हिक्किनाम् ||३०||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 50

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযামুত্তরতন্ত্রান্তর্গতে কাযচিকিত্সাতন্ত্রে হিক্কাপ্রতিষেধো নাম (দ্বাদশোঽধ্যাযঃ, আদিতঃ) পঞ্চাশত্তমোঽধ্যাযঃ ||৫০||

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इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते कायचिकित्सातन्त्रे हिक्काप्रतिषेधो नाम (द्वादशोऽध्यायः, आदितः) पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ||५०||

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50. hikkāpratiṣēdhādhyāyaḥ — Sushruta Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi