Adhikarana doShopakramaNIyAdhyAyaH (2) · Śloka 2
অতস্তমেবোপক্রমং দর্শযিতুং দোষোপক্রমণীযমারিরিপ্সুরিদমাহ - - - - অথাতো দোষোপক্রমণীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ|
ইতি হ স্মাহুরাত্রেযাদযো মহর্ষযঃ|
(গদ্যসূত্রে|২|
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अतस्तमेवोपक्रमं दर्शयितुं दोषोपक्रमणीयमारिरिप्सुरिदमाह - - - - अथातो दोषोपक्रमणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः|
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः|
(गद्यसूत्रे|२|
Adhikarana vAtasyopakramaH (1-3) · Śloka 3
সর্বদোষেভ্যশ্চ প্রধানো বাত ইতি তদুপক্রমং পূর্বমাহ - - - - বাতস্যোপক্রমঃ স্নেহঃ স্বেদঃ সংশোধনং মৃদু|
স্বাদ্বম্ললবণোষ্ণানি ভোজ্যান্যভ্যঙ্গমর্দনম্||১||
বেষ্টনং ত্রাসনং সেকো মদ্যং পৈষ্টিকগৌডিকম্|
স্নিগ্ধোষ্ণা বস্তযো বস্তিনিযমঃ সুখশীলতা||২||
দীপনৈঃ পাচনৈঃ সিদ্ধাঃ স্নেহাশ্চানেকযোনযঃ|
বিশেষান্মেদ্যপিশিতরসতৈলানুবাসনম্||৩||
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सर्वदोषेभ्यश्च प्रधानो वात इति तदुपक्रमं पूर्वमाह - - - - वातस्योपक्रमः स्नेहः स्वेदः संशोधनं मृदु|
स्वाद्वम्ललवणोष्णानि भोज्यान्यभ्यङ्गमर्दनम्||१||
वेष्टनं त्रासनं सेको मद्यं पैष्टिकगौडिकम्|
स्निग्धोष्णा बस्तयो बस्तिनियमः सुखशीलता||२||
दीपनैः पाचनैः सिद्धाः स्नेहाश्चानेकयोनयः|
विशेषान्मेद्यपिशितरसतैलानुवासनम्||३||
Adhikarana pittasyopakramaH (4-9) · Śloka 9
পিত্তস্যোপক্রমং বক্তি - - - - পিত্তস্য সর্পিষঃ পানং স্বাদুশীতৈর্বিরেচনম্|
স্বাদুতিক্তকষাযাণি ভোজনান্যৌষধানি চ||৪||
সুগন্ধিশীতহৃদ্যানাং গন্ধানামুপসেবনম্|
কণ্ঠেগুণানাং হারাণাং মণীনামুরসা ধৃতিঃ||৫||
কর্পূরচন্দনোশীরৈরনুলেপঃ ক্ষণে ক্ষণে|
প্রদোষশ্চন্দ্রমাঃ সৌধং হারি গীতং হিমোঽনিলঃ||৬||
অযন্ত্রণসুখং মিত্রং পুত্রঃ সন্দিগ্ধমুগ্ধবাক্|
ছন্দানুবর্তিনো দারাঃ প্রিযাঃ শীলবিভূষিতাঃ||৭||
শীতাম্বুধারাগর্ভাণি গৃহাণ্যুদ্যানদীর্ঘিকাঃ|
সুতীর্থবিপুলস্বচ্ছসলিলাশযসৈকতে||৮||
সাম্ভোজজলতীরান্তে কাযমানে দ্রুমাকুলে|
সৌম্যা ভাবাঃ পযঃ সর্পির্বিরেকশ্চ বিশেষতঃ||৯||
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पित्तस्योपक्रमं वक्ति - - - - पित्तस्य सर्पिषः पानं स्वादुशीतैर्विरेचनम्|
स्वादुतिक्तकषायाणि भोजनान्यौषधानि च||४||
सुगन्धिशीतहृद्यानां गन्धानामुपसेवनम्|
कण्ठेगुणानां हाराणां मणीनामुरसा धृतिः||५||
कर्पूरचन्दनोशीरैरनुलेपः क्षणे क्षणे|
प्रदोषश्चन्द्रमाः सौधं हारि गीतं हिमोऽनिलः||६||
अयन्त्रणसुखं मित्रं पुत्रः सन्दिग्धमुग्धवाक्|
छन्दानुवर्तिनो दाराः प्रियाः शीलविभूषिताः||७||
शीताम्बुधारागर्भाणि गृहाण्युद्यानदीर्घिकाः|
सुतीर्थविपुलस्वच्छसलिलाशयसैकते||८||
साम्भोजजलतीरान्ते कायमाने द्रुमाकुले|
सौम्या भावाः पयः सर्पिर्विरेकश्च विशेषतः||९||
Adhikarana shleShmaNa upakramaH (10-12) · Śloka 12
আধুনা শ্লেষ্মণ উপক্রমমাহ - - - - শ্লেষ্মণো বিধিনা যুক্তং তীক্ষ্ণং বমনরেচনম্|
অন্নং রূক্ষাল্পতীক্ষ্ণোষ্ণং কটুতিক্তকষাযকম্||১০||
দীর্ঘকালস্থিতং মদ্যং রতিপ্রীতিঃ প্রজাগরঃ|
অনেকরূপো ব্যাযামশ্চিন্তা রূক্ষং বিমর্দনম্||১১||
বিশেষাদ্বমনং যূষঃ ক্ষৌদ্রং মেদোঘ্নমৌষধম্|
ধূমোপবাসগণ্ডূষা নিঃসুখত্বং সুখায চ||১২||
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आधुना श्लेष्मण उपक्रममाह - - - - श्लेष्मणो विधिना युक्तं तीक्ष्णं वमनरेचनम्|
अन्नं रूक्षाल्पतीक्ष्णोष्णं कटुतिक्तकषायकम्||१०||
दीर्घकालस्थितं मद्यं रतिप्रीतिः प्रजागरः|
अनेकरूपो व्यायामश्चिन्ता रूक्षं विमर्दनम्||११||
विशेषाद्वमनं यूषः क्षौद्रं मेदोघ्नमौषधम्|
धूमोपवासगण्डूषा निःसुखत्वं सुखाय च||१२||
Adhikarana saMsargasannipAtabhedAnAmupakramaH (13) · Śloka 13
ইদানীং সংসর্গোপক্রমং বক্তি - - - উপক্রমঃ পৃথগ্দোষান্ যোঽযমুদ্দিশ্য কীর্তিতঃ|
সংসর্গসন্নিপাতেষু তং যথাস্বং বিকল্পযেত্||১৩||
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इदानीं संसर्गोपक्रमं वक्ति - - - उपक्रमः पृथग्दोषान् योऽयमुद्दिश्य कीर्तितः|
संसर्गसन्निपातेषु तं यथास्वं विकल्पयेत्||१३||
Adhikarana saMsargabhedAnAmupakramAntaram (14) · Śloka 14
সংসর্গে ভূযোঽপ্যুপক্রমমাহ - - - - গ্রৈষ্মঃ প্রাযো মরুত্পিত্তে বাসন্তঃ কফমারুতে|
মরুতো যোগবাহিত্বাত্, কফপিত্তে তু শারদঃ||১৪||
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संसर्गे भूयोऽप्युपक्रममाह - - - - ग्रैष्मः प्रायो मरुत्पित्ते वासन्तः कफमारुते|
मरुतो योगवाहित्वात्, कफपित्ते तु शारदः||१४||
Adhikarana upakramasya kAlaH (15) · Śloka 15
সম্প্রত্যুপক্রমস্য কালং বক্তি - - - - চয এব জযেদ্দোষং কুপিতং ত্ববিরোধযন্|
সর্বকোপে বলীযাংসং শেষদোষাবিরোধতঃ||১৫||
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सम्प्रत्युपक्रमस्य कालं वक्ति - - - - चय एव जयेद्दोषं कुपितं त्वविरोधयन्|
सर्वकोपे बलीयांसं शेषदोषाविरोधतः||१५||
Adhikarana ashuddhashuddhaprayogayorlakShaNam (16) · Śloka 16
প্রযোগঃ শমযেদ্ব্যাধিমেকং যোঽন্যমুদীরযেত্|
নাঽসৌ বিশুদ্ধঃ শুদ্ধস্তু শমযেদ্যো ন কোপযেত্||১৬||
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प्रयोगः शमयेद्व्याधिमेकं योऽन्यमुदीरयेत्|
नाऽसौ विशुद्धः शुद्धस्तु शमयेद्यो न कोपयेत्||१६||
Adhikarana doShANAM sthAnAntaraprAptiprakAraH (17-19) · Śloka 19
অত কথং দোষাঃ কোষ্ঠাচ্ছাখাস্থিমর্মসু যান্তি ? ইত্যাহ - - - - ব্যাযামাদূষ্মণস্তৈক্ষ্ণ্যাদহিতাচরণাদপি|
কোষ্ঠাচ্ছাখাস্থিমর্মাণি দ্রুতত্বান্মারুতস্য চ||১৭||
শাখাদিভ্যঃ কথং দোষাঃ কোষ্ঠং যান্তি ? ইত্যাহ - - - - দোষা যান্তিতথা তেভ্যঃ স্রোতোমুখবিশোধনাত্|
বৃদ্ধ্যাঽভিষ্যন্দনাত্পাকাত্কোষ্ঠং বাযোশ্চ নিগ্রহাত্||১৮||
কোষ্ঠস্থা দোষাঃ কিং কুর্যঃ ? ইত্যাহ - - - - তত্রস্থাশ্চ বিলম্বেরন্ ভূযো হেতুপ্রতীক্ষিণঃ|
|১৯|
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अत कथं दोषाः कोष्ठाच्छाखास्थिमर्मसु यान्ति ? इत्याह - - - - व्यायामादूष्मणस्तैक्ष्ण्यादहिताचरणादपि|
कोष्ठाच्छाखास्थिमर्माणि द्रुतत्वान्मारुतस्य च||१७||
शाखादिभ्यः कथं दोषाः कोष्ठं यान्ति ? इत्याह - - - - दोषा यान्तितथा तेभ्यः स्रोतोमुखविशोधनात्|
वृद्ध्याऽभिष्यन्दनात्पाकात्कोष्ठं वायोश्च निग्रहात्||१८||
कोष्ठस्था दोषाः किं कुर्यः ? इत्याह - - - - तत्रस्थाश्च विलम्बेरन् भूयो हेतुप्रतीक्षिणः|
|१९|
Adhikarana doShAH kAlAdibalenAnyasthAne~api kupyanti (19) · Śloka 19
যদ্যেবং কিং কদাচিদপ্যন্যস্থানগতা দোষা হীনশক্তিত্বান্ন রোগান্ কুর্যুঃ ? ইত্যাহ - - - - |
তে কালাদিবলং লব্ধ্বা কুপযন্ত্যন্যাশ্রযেষ্বপি||১৯||
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यद्येवं किं कदाचिदप्यन्यस्थानगता दोषा हीनशक्तित्वान्न रोगान् कुर्युः ? इत्याह - - - - |
ते कालादिबलं लब्ध्वा कुपयन्त्यन्याश्रयेष्वपि||१९||
Adhikarana AgantudoShasyAlpabalasya sthAnicikitsA (20) · Śloka 20
ইদানীং পরস্থানগতানাং দোষাণাং বিকল্পেন চিকিত্সামুপদিশন্নাহ - - - - তত্রান্যস্থানসংস্থেষু তদীযামবলেষু তু|
কুর্যাচ্চিকিত্সাম্|২০|
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इदानीं परस्थानगतानां दोषाणां विकल्पेन चिकित्सामुपदिशन्नाह - - - - तत्रान्यस्थानसंस्थेषु तदीयामबलेषु तु|
कुर्याच्चिकित्साम्|२०|
Adhikarana prabalasyAgantoH svacikitsA (20) · Śloka 20
অত এবাহ - - - - |
স্বামেব বলেনান্যাভিভাবিষু||২০||
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अत एवाह - - - - |
स्वामेव बलेनान्याभिभाविषु||२०||
Adhikarana AgantusthAninostulyabalayoH krameNa cikitsA (21) · Śloka 21
কিমেষ এব নিযমঃ ? যদন্যস্থানগতেষ্ববলেষ্বাগন্তুষু স্থানিদোষসম্বন্ধিনীং চিকিত্সাং কুর্যাত্|
বলবত্সু পুনরাগন্তুসম্বন্ধিনীং চিকিত্সাং কুর্যাত্|
অথ পক্ষান্তরোঽপি কুত্রচিত্ কশ্চিদস্তি ? ইত্যাহ - - - - আগন্তুং শমযেদ্দোষং স্থানিনং প্রতিকৃত্য বা|
|২১|
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किमेष एव नियमः ? यदन्यस्थानगतेष्वबलेष्वागन्तुषु स्थानिदोषसम्बन्धिनीं चिकित्सां कुर्यात्|
बलवत्सु पुनरागन्तुसम्बन्धिनीं चिकित्सां कुर्यात्|
अथ पक्षान्तरोऽपि कुत्रचित् कश्चिदस्ति ? इत्याह - - - - आगन्तुं शमयेद्दोषं स्थानिनं प्रतिकृत्य वा|
|२१|
Adhikarana tiryaggateShu doSheShu sAvadhAnena cikitsA (21-22) · Śloka 22
তির্যগ্গতেষু দোষেষু যত্কার্যং তদাহ - - - - |
প্রাযস্তির্যগ্গতা দোষাঃ ক্লেশযন্ত্যাতুরাংশ্চিরম্||২১||
কুর্যান্ন তেষু ত্বরযা দেহাগ্নিবলবিত্ ক্রিযাম্|
|২২|
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तिर्यग्गतेषु दोषेषु यत्कार्यं तदाह - - - - |
प्रायस्तिर्यग्गता दोषाः क्लेशयन्त्यातुरांश्चिरम्||२१||
कुर्यान्न तेषु त्वरया देहाग्निबलवित् क्रियाम्|
|२२|
Adhikarana taccikitsAprakAraH (22-23) · Śloka 23
কথং তেষামুপক্রমঃ কার্যঃ ? ইত্যাহ - - - - |
শমযেত্তান্ প্রযোগেণ সুখং বা কোষ্ঠমানযেত্||২২||
জ্ঞাত্বা কোষ্ঠপ্রপন্নাংশ্চ যথাসন্নং বিনির্হরেত্|
|২৩|
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कथं तेषामुपक्रमः कार्यः ? इत्याह - - - - |
शमयेत्तान् प्रयोगेण सुखं वा कोष्ठमानयेत्||२२||
ज्ञात्वा कोष्ठप्रपन्नांश्च यथासन्नं विनिर्हरेत्|
|२३|
Adhikarana sAmadoShalakShaNam, nirAmadoShalakShaNam (23-24) · Śloka 24
সম্প্রতি সামমললিঙ্গমাহ - - - - |
স্রোতোরোধবলভ্রংশগৌরবানিলমূঢতাঃ||২৩||
আলস্যাপক্তিনিষ্ঠীবমলসঙ্গারুচিক্লমাঃ|
লিঙ্গং মলানাং সামানাং, নিরামাণাং বিপর্যযঃ||২৪||
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सम्प्रति साममललिङ्गमाह - - - - |
स्रोतोरोधबलभ्रंशगौरवानिलमूढताः||२३||
आलस्यापक्तिनिष्ठीवमलसङ्गारुचिक्लमाः|
लिङ्गं मलानां सामानां, निरामाणां विपर्ययः||२४||
Adhikarana AmalakShaNam (25) · Śloka 25
সম্প্রত্যামলিঙ্গমাহ - - - - ঊষ্মণোঽল্পবলত্বেন ধাতুমাদ্যমপাচিতম্|
দুষ্টমামাশযগতং রসমামং প্রচক্ষতে||২৫||
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सम्प्रत्यामलिङ्गमाह - - - - ऊष्मणोऽल्पबलत्वेन धातुमाद्यमपाचितम्|
दुष्टमामाशयगतं रसमामं प्रचक्षते||२५||
Adhikarana anyamatenAmalakShaNam (26) · Śloka 26
অন্যে দোষেভ্য এবাতিদুষ্টেভ্যোঽন্যোন্যমূর্চ্ছনাত্|
কোদ্রবেভ্যো বিষস্যেব বদন্ত্যামস্য সম্ভবম্||২৬||
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अन्ये दोषेभ्य एवातिदुष्टेभ्योऽन्योन्यमूर्च्छनात्|
कोद्रवेभ्यो विषस्येव वदन्त्यामस्य सम्भवम्||२६||
Adhikarana sAmA doShA rogAshca (27) · Śloka 27
আমেন তেন সম্পৃক্তা দোষা দূষ্যাশ্চ দূষিতাঃ|
সামা ইত্যুপদিশ্যন্তে যে চ রোগাস্তদুদ্ভবাঃ||২৭||
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आमेन तेन सम्पृक्ता दोषा दूष्याश्च दूषिताः|
सामा इत्युपदिश्यन्ते ये च रोगास्तदुद्भवाः||२७||
Adhikarana sAmadoShANAM cikitsA, sarvadehapravisRutAdisAmadoSheShu shodhananiShedhaH (28-29) · Śloka 29
সামা অপি দোষা যাদৃশা ন নির্হার্যাস্তাদৃশান্ দর্শযতি - - - - সর্বদেহপ্রবিসৃতান্ সামান্ দোষান্ ন নির্হরেত্|
লীনান্ ধাতুষ্বনুত্ক্লিষ্টান্ ফলাদামাদ্রসানিব||২৮||
আশ্রযস্য হি নাশায তে স্যুর্দুর্নির্হরত্বতঃ|
|২৯|
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सामा अपि दोषा यादृशा न निर्हार्यास्तादृशान् दर्शयति - - - - सर्वदेहप्रविसृतान् सामान् दोषान् न निर्हरेत्|
लीनान् धातुष्वनुत्क्लिष्टान् फलादामाद्रसानिव||२८||
आश्रयस्य हि नाशाय ते स्युर्दुर्निर्हरत्वतः|
|२९|
Adhikarana tAn shedhanayogyAn kRutva yathAsannaM shodhayet (29-30) · Śloka 30
তর্হীদৃশে দোষে কিং কার্যম্ ? ইত্যাহ - - - - |
পাচনৈর্দীপনৈঃ স্নেহৈস্তান্ স্বেদৈশ্চ পরিষ্কৃতান্||২৯||
শোধযেচ্ছোধনৈঃ কালে যথাসন্নং যথাবলম্|
|৩০|
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तर्हीदृशे दोषे किं कार्यम् ? इत्याह - - - - |
पाचनैर्दीपनैः स्नेहैस्तान् स्वेदैश्च परिष्कृतान्||२९||
शोधयेच्छोधनैः काले यथासन्नं यथाबलम्|
|३०|
Adhikarana yathAsannamArgaH (30-31) · Śloka 31
কস্য কো মার্গ আসন্নঃ ? ইত্যাহ - - - - |
হন্ত্যাশু যুক্তং বক্ক্রেণ দ্রব্যমামাশযান্মলান্||৩০||
ঘ্রাণেন চোর্ধ্বজত্রূত্থান্ পক্বাধানাদ্গুদেন চ|
|৩১|
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कस्य को मार्ग आसन्नः ? इत्याह - - - - |
हन्त्याशु युक्तं वक्क्रेण द्रव्यमामाशयान्मलान्||३०||
घ्राणेन चोर्ध्वजत्रूत्थान् पक्वाधानाद्गुदेन च|
|३१|
Adhikarana svayaMpravRuttAnsAmAnna stambhayet (31-32) · Śloka 32
ইদানীং যাদৃশা আমা ন ধার্যাস্তাদৃশান্ দর্শযতি - - - - |
উত্ক্লিষ্টানধ ঊর্ধ্বং বা ন চামান্ বহতঃ স্বযম্||৩১||
ধারযেদৌষধৈর্দোষান্ বিধৃতাস্তে হি রোগদাঃ|
|৩২|
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इदानीं यादृशा आमा न धार्यास्तादृशान् दर्शयति - - - - |
उत्क्लिष्टानध ऊर्ध्वं वा न चामान् वहतः स्वयम्||३१||
धारयेदौषधैर्दोषान् विधृतास्ते हि रोगदाः|
|३२|
Adhikarana teShUpekShaiva bheShajam, savibandheShu teShu pAcanA nirharaNaM vA (32-33) · Śloka 33
তেষু তু যত্কার্যং তদাহ - - - - |
প্রবৃত্তান্ প্রাগতো দোষানুপেক্ষেত হিতাশিনঃ||৩২||
বিবদ্ধান্ পাচনৈস্তৈস্তৈঃ পাচযন্নির্হরেত বা|
|৩৩|
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तेषु तु यत्कार्यं तदाह - - - - |
प्रवृत्तान् प्रागतो दोषानुपेक्षेत हिताशिनः||३२||
विबद्धान् पाचनैस्तैस्तैः पाचयन्निर्हरेत वा|
|३३|
Adhikarana svasthasya shodhanakAlaH (33-34) · Śloka 34
অথ কঃ শোধনকালঃ ? ইত্যাহ - - - - |
শ্রাবণে কার্তিকে চৈত্রে মাসি সাধারণে ক্রমাত্||৩৩||
গ্রীষ্মবর্ষাহিমচিতান্ বায্বাদীনাশু নির্হরেত্|
|৩৪|
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अथ कः शोधनकालः ? इत्याह - - - - |
श्रावणे कार्तिके चैत्रे मासि साधारणे क्रमात्||३३||
ग्रीष्मवर्षाहिमचितान् वाय्वादीनाशु निर्हरेत्|
|३४|
Adhikarana asandhau shodhananiShedhaH (34-35) · Śloka 35
ননু, গ্রীষ্মাদিষ্বেব কস্মাদ্বাতাদযো ন শোধ্যন্তে ? ইত্যাহ - - - - |
অত্যুষ্ণবর্ষশীতা হি গ্রীষ্মবর্ষাহিমাগমাঃ||৩৪||
সন্ধৌ সাধারণে তেষাং দুষ্টান্ দোষান্ বিশোধযেত্|
সংশোধনসাধ্যস্যাযমেব সংশোধনকালঃ ? নেত্যাহ - - - - স্বস্থবৃত্তমভিপ্রেত্য, ব্যাধৌ ব্যাধিবশেন তু||৩৫||
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ननु, ग्रीष्मादिष्वेव कस्माद्वातादयो न शोध्यन्ते ? इत्याह - - - - |
अत्युष्णवर्षशीता हि ग्रीष्मवर्षाहिमागमाः||३४||
सन्धौ साधारणे तेषां दुष्टान् दोषान् विशोधयेत्|
संशोधनसाध्यस्यायमेव संशोधनकालः ? नेत्याह - - - - स्वस्थवृत्तमभिप्रेत्य, व्याधौ व्याधिवशेन तु||३५||
Adhikarana vyAdhitasya shodhanakAlaH (36) · Śloka 36
যদি হেমন্তাদাবতিশীতোষ্ণাদৌ কালে ব্যাধিঃ সংশোধনসাধ্যঃ সম্ভবেত্, তদা কথং সংশোধনং কার্যম্ ? ইত্যাহ - - - - কৃত্বা শীতোষ্ণবৃষ্টীনাং প্রতীকারং যথাযথম্|
প্রযোজযেত্ক্রিযাং প্রাপ্তাং ক্রিযাকালং ন হাপযেত্||৩৬||
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यदि हेमन्तादावतिशीतोष्णादौ काले व्याधिः संशोधनसाध्यः सम्भवेत्, तदा कथं संशोधनं कार्यम् ? इत्याह - - - - कृत्वा शीतोष्णवृष्टीनां प्रतीकारं यथायथम्|
प्रयोजयेत्क्रियां प्राप्तां क्रियाकालं न हापयेत्||३६||
Adhikarana shamanauShadhakAlAH dasha (37) · Śloka 37
সম্প্রত্যৌষধকালান্ দর্শযন্নাহ - - - - যুঞ্জ্যাদনন্নমন্নাদৌ মধ্যেঽন্তে কবলান্তরে|
গ্রাসে গ্রাসে মুহুঃ সান্নং সামুদ্গং নিশিচৌষধম্||৩৭||
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सम्प्रत्यौषधकालान् दर्शयन्नाह - - - - युञ्ज्यादनन्नमन्नादौ मध्येऽन्ते कवलान्तरे|
ग्रासे ग्रासे मुहुः सान्नं सामुद्गं निशिचौषधम्||३७||
Adhikarana anannasya viShayaH, prAgbhaktasya viShayaH, madhyebhaktasya viShayaH, adhobhaktasya viShayaH, grAsagrAsAntayorviShayaH, muhurauShadhasya viShayaH, sAnnasya viShayaH, sAmudrasya viShayaH, naishauShadhasya viShayaH (13) · Śloka 13
অধুনা বিষযবিভাগেন যস্মিন্ ব্যাধৌ যদুপযুজ্যতে তদ্দর্শযতি - - - - কফোদ্রেকে গদেঽনন্নং বলিনো রোগরোগিণোঃ|
অন্নাদৌ বিগুণেঽপানে, সমানে মধ্য ইষ্যতে||৩৮||
ব্যানেঽন্তে প্রাতরাশস্য, সাযমাশস্য তূত্তরে|
গ্রাসগ্রাসান্তযোঃ প্রাণে প্রদুষ্টে মাতরিশ্বনি||৩৯||
মুহুর্মুহুর্বিষচ্ছর্দিহিধ্মাতৃট্শ্বাসকাসিষু|
যোজ্যং সভোজ্যং ভৈষজ্যং ভোজ্যৈশ্চিত্রৈররোচকে||৪০||
কম্পাক্ষেপকহিধ্মাসু সামুদ্রং লঘুভোজিনাম্|
ঊর্ধ্বজত্রুবিকারেষু স্বপ্নকালে প্রশস্যতে||৪১||
ইতি শ্রীবৈদ্যপতিসিংহগুপ্তসূনুশ্রীমদ্বাগ্ভটবিরচিতাযামষ্টাঙ্গহৃদযসংহিতাযাং সূত্রস্থানে দোষোপক্রমণীযো নাম ত্রযোদশোঽধ্যাযঃ||১৩||
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अधुना विषयविभागेन यस्मिन् व्याधौ यदुपयुज्यते तद्दर्शयति - - - - कफोद्रेके गदेऽनन्नं बलिनो रोगरोगिणोः|
अन्नादौ विगुणेऽपाने, समाने मध्य इष्यते||३८||
व्यानेऽन्ते प्रातराशस्य, सायमाशस्य तूत्तरे|
ग्रासग्रासान्तयोः प्राणे प्रदुष्टे मातरिश्वनि||३९||
मुहुर्मुहुर्विषच्छर्दिहिध्मातृट्श्वासकासिषु|
योज्यं सभोज्यं भैषज्यं भोज्यैश्चित्रैररोचके||४०||
कम्पाक्षेपकहिध्मासु सामुद्रं लघुभोजिनाम्|
ऊर्ध्वजत्रुविकारेषु स्वप्नकाले प्रशस्यते||४१||
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां सूत्रस्थाने दोषोपक्रमणीयो नाम त्रयोदशोऽध्यायः||१३||