Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো বস্তিসূত্রীযাং সিদ্ধিং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथातो बस्तिसूत्रीयां सिद्धिं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো বস্তিসূত্রীযাং সিদ্ধিং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातो बस्तिसूत्रीयां सिद्धिं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3-5) · Śloka 5
কৃতক্ষণং শৈলবরস্য রম্যে স্থিতং ধনেশাযতনস্য পার্শ্বে| মহর্ষিসঙ্ঘৈর্বৃতমগ্নিবেশঃ পুনর্বসুং প্রাঞ্জলিরন্বপৃচ্ছত্||৩|| বস্তির্নরেভ্যঃ কিমপেক্ষ্য দত্তঃ স্যাত্ সিদ্ধিমান্ কিম্মযমস্য নেত্রম্| কীদৃক্প্রমাণাকৃতি কিঙ্গুণং চ কেভ্যশ্চ কিংযোনিগুণশ্চ বস্তিঃ||৪|| নিরূহকল্পঃ প্রণিধানমাত্রা স্নেহস্য কা বা শযনে বিধিঃ কঃ| কে বস্তযঃ কেষু হিতা ইতীদং শ্রুত্বোত্তরং প্রাহ বচো মহর্ষিঃ||৫||
कृतक्षणं शैलवरस्य रम्ये स्थितं धनेशायतनस्य पार्श्वे| महर्षिसङ्घैर्वृतमग्निवेशः पुनर्वसुं प्राञ्जलिरन्वपृच्छत्||३|| बस्तिर्नरेभ्यः किमपेक्ष्य दत्तः स्यात् सिद्धिमान् किम्मयमस्य नेत्रम्| कीदृक्प्रमाणाकृति किङ्गुणं च केभ्यश्च किंयोनिगुणश्च बस्तिः||४|| निरूहकल्पः प्रणिधानमात्रा स्नेहस्य का वा शयने विधिः कः| के बस्तयः केषु हिता इतीदं श्रुत्वोत्तरं प्राह वचो महर्षिः||५||
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Adhikarana 3 (6) · Śloka 6
সমীক্ষ্য দোষৌষধদেশকালসাত্ম্যাগ্নিসত্ত্বাদিবযোবলানি| বস্তিঃ প্রযুক্তো নিযতং গুণায স্যাত্ সর্বকর্মাণি চ সিদ্ধিমন্তি||৬||
समीक्ष्य दोषौषधदेशकालसात्म्याग्निसत्त्वादिवयोबलानि| बस्तिः प्रयुक्तो नियतं गुणाय स्यात् सर्वकर्माणि च सिद्धिमन्ति||६||
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Adhikarana 4 (7) · Śloka 7
সুবর্ণরূপ্যত্রপুতাম্ররীতিকাংস্যাস্থিশস্ত্রদ্রুমবেণুদন্তৈঃ | নলৈর্বিষাণৈর্মণিভিশ্চ তৈস্তৈর্নেত্রাণি কার্যাণি সু(ত্রি)কর্ণিকানি ||৭||
सुवर्णरूप्यत्रपुताम्ररीतिकांस्यास्थिशस्त्रद्रुमवेणुदन्तैः | नलैर्विषाणैर्मणिभिश्च तैस्तैर्नेत्राणि कार्याणि सु(त्रि)कर्णिकानि ||७||
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Adhikarana 5 (8-9) · Śloka 10
ষড্দ্বাদশাষ্টাঙ্গুলসম্মিতানি ষড্বিংশতিদ্বাদশবর্ষজানাম্| স্যুর্মুদ্গকর্কন্ধুসতীনবাহিচ্ছিদ্রাণি বর্ত্যাঽপিহিতানি চৈব||৮|| যথাবযোঽঙ্গুষ্ঠকনিষ্ঠিকাভ্যাং মূলাগ্রযোঃ স্যুঃ পরিণাহবন্তি| ঋজূনি গোপুচ্ছসমাকৃতীনি শ্লক্ষ্ণানি চ স্যুর্গুডিকামুখানি||৯|| স্যাত্ কর্ণিকৈকাঽগ্রচতুর্থভাগে মূলাশ্রিতে বস্তিনিবন্ধনে দ্বে|১০|
षड्द्वादशाष्टाङ्गुलसम्मितानि षड्विंशतिद्वादशवर्षजानाम्| स्युर्मुद्गकर्कन्धुसतीनवाहिच्छिद्राणि वर्त्याऽपिहितानि चैव||८|| यथावयोऽङ्गुष्ठकनिष्ठिकाभ्यां मूलाग्रयोः स्युः परिणाहवन्ति| ऋजूनि गोपुच्छसमाकृतीनि श्लक्ष्णानि च स्युर्गुडिकामुखानि||९|| स्यात् कर्णिकैकाऽग्रचतुर्थभागे मूलाश्रिते बस्तिनिबन्धने द्वे|१०|
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Adhikarana 6 (10-11) · Śloka 11
জারদ্গবো মাহিষহারিণৌ বা স্যাচ্ছৌকরো বস্তিরজস্য বাঽপি||১০|| দৃঢস্তনুর্নষ্টসিরো বিগন্ধঃ কষাযরক্তঃ সুমৃদুঃ সুশুদ্ধঃ | নৃণাং বযো বীক্ষ্য যথানুরূপং নেত্রেষু যোজ্যস্তু সুবদ্ধসূত্রঃ||১১||
जारद्गवो माहिषहारिणौ वा स्याच्छौकरो बस्तिरजस्य वाऽपि||१०|| दृढस्तनुर्नष्टसिरो विगन्धः कषायरक्तः सुमृदुः सुशुद्धः | नृणां वयो वीक्ष्य यथानुरूपं नेत्रेषु योज्यस्तु सुबद्धसूत्रः||११||
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Adhikarana 7 (12) · Śloka 12
বস্তেরলাভে প্লবজো গলো বা স্যাদঙ্কপাদঃ সুঘনঃ পটো বা|১২|
बस्तेरलाभे प्लवजो गलो वा स्यादङ्कपादः सुघनः पटो वा|१२|
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Adhikarana 8 (12) · Śloka 13
আস্থাপনার্হং পুরুষং বিধিজ্ঞঃ সমীক্ষ্য পুণ্যেঽহনি শুক্লপক্ষে||১২|| প্রশস্তনক্ষত্রমুহূর্তযোগে জীর্ণান্নমেকাগ্রমুপক্রমেত |১৩|
आस्थापनार्हं पुरुषं विधिज्ञः समीक्ष्य पुण्येऽहनि शुक्लपक्षे||१२|| प्रशस्तनक्षत्रमुहूर्तयोगे जीर्णान्नमेकाग्रमुपक्रमेत |१३|
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Adhikarana 9 (13-19) · Śloka 20
বলাং গুডূচীং ত্রিফলাং সরাস্নাং দ্বে পঞ্চমূলে চ পলোন্মিতানি||১৩|| অষ্টৌ ফলান্যর্ধতুলাং চ মাংসাচ্ছাগাত্ পচেদপ্সু চতুর্থশেষম্| পূতং যবানীফলবিল্বকুষ্ঠবচাশতাহ্বাঘনপিপ্পলীনাম্||১৪|| কল্কৈর্গুডক্ষৌদ্রঘৃতৈঃ সতৈলৈর্যুতং সুখোষ্ণৈস্তু পিচুপ্রমাণৈঃ| গুডাত্ পলং দ্বিপ্রসৃতাং তু মাত্রাং স্নেহস্য যুক্ত্যা মধু সৈন্ধবং চ||১৫|| প্রক্ষিপ্য বস্তৌ মথিতং খজেন সুবদ্ধমুচ্ছ্বাস্য চ নির্বলীকম্| অঙ্গুষ্ঠমধ্যেন মুখং পিধায নেত্রাগ্রসংস্থামপনীয বর্তিম্||১৬|| তৈলাক্তগাত্রং কৃতমূত্রবিট্কং নাতিক্ষুধার্তং শযনে মনুষ্যম্| সমেঽথবেষন্নতশীর্ষকে বা নাত্যুচ্ছ্রিতে স্বাস্তরণোপপন্নে||১৭|| সব্যেন পার্শ্বেন সুখং শযানং কৃত্বর্জুদেহং স্বভুজোপধানম্| সঙ্কোচ্য সব্যেতরদস্য সক্থি বামং প্রসার্য প্রণযেত্ততস্তম্||১৮|| স্নিগ্ধে গুদে নেত্রচতুর্থভাগং স্নিগ্ধং শনৈরৃজ্বন পৃষ্ঠবংশম্| অকম্পনাবেপনলাঘবাদীন্ পাণ্যোর্গুণাংশ্চাপি বিদর্শযংস্তম্ ||১৯|| প্রপীড্য চৈকগ্রহণেন দত্তং নেত্রং শনৈরেব ততোঽপকর্ষেত্|২০|
बलां गुडूचीं त्रिफलां सरास्नां द्वे पञ्चमूले च पलोन्मितानि||१३|| अष्टौ फलान्यर्धतुलां च मांसाच्छागात् पचेदप्सु चतुर्थशेषम्| पूतं यवानीफलबिल्वकुष्ठवचाशताह्वाघनपिप्पलीनाम्||१४|| कल्कैर्गुडक्षौद्रघृतैः सतैलैर्युतं सुखोष्णैस्तु पिचुप्रमाणैः| गुडात् पलं द्विप्रसृतां तु मात्रां स्नेहस्य युक्त्या मधु सैन्धवं च||१५|| प्रक्षिप्य बस्तौ मथितं खजेन सुबद्धमुच्छ्वास्य च निर्वलीकम्| अङ्गुष्ठमध्येन मुखं पिधाय नेत्राग्रसंस्थामपनीय वर्तिम्||१६|| तैलाक्तगात्रं कृतमूत्रविट्कं नातिक्षुधार्तं शयने मनुष्यम्| समेऽथवेषन्नतशीर्षके वा नात्युच्छ्रिते स्वास्तरणोपपन्ने||१७|| सव्येन पार्श्वेन सुखं शयानं कृत्वर्जुदेहं स्वभुजोपधानम्| सङ्कोच्य सव्येतरदस्य सक्थि वामं प्रसार्य प्रणयेत्ततस्तम्||१८|| स्निग्धे गुदे नेत्रचतुर्थभागं स्निग्धं शनैरृज्वन पृष्ठवंशम्| अकम्पनावेपनलाघवादीन् पाण्योर्गुणांश्चापि विदर्शयंस्तम् ||१९|| प्रपीड्य चैकग्रहणेन दत्तं नेत्रं शनैरेव ततोऽपकर्षेत्|२०|
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Adhikarana 10 (20-22) · Śloka 23
তির্যক্ প্রণীতে তু ন যাতি ধারা গুদে ব্রণঃ স্যাচ্চলিতে তু নেত্রে||২০|| দত্তঃ শনৈর্নাশযমেতি বস্তিঃ কণ্ঠং প্রধাবত্যতিপীডিতশ্চ| শীতস্ত্বতিস্তম্ভকরো বিদাহং মূর্চ্ছাং চ কুর্যাদতিমাত্রমুষ্ণঃ||২১|| স্নিগ্ধোঽতিজাড্যং পবনং তু রূক্ষস্তন্বল্পমাত্রালবণস্ত্বযোগম্| করোতি মাত্রাভ্যধিকোঽতিযোগং ক্ষামং তু সান্দ্রঃ সুচিরেণ চৈতি||২২|| দাহাতিসারৌ লবণোঽতি কুর্যাত্তস্মাত্ সুযুক্তং সমমেব দদ্যাত্|২৩|
तिर्यक् प्रणीते तु न याति धारा गुदे व्रणः स्याच्चलिते तु नेत्रे||२०|| दत्तः शनैर्नाशयमेति बस्तिः कण्ठं प्रधावत्यतिपीडितश्च| शीतस्त्वतिस्तम्भकरो विदाहं मूर्च्छां च कुर्यादतिमात्रमुष्णः||२१|| स्निग्धोऽतिजाड्यं पवनं तु रूक्षस्तन्वल्पमात्रालवणस्त्वयोगम्| करोति मात्राभ्यधिकोऽतियोगं क्षामं तु सान्द्रः सुचिरेण चैति||२२|| दाहातिसारौ लवणोऽति कुर्यात्तस्मात् सुयुक्तं सममेव दद्यात्|२३|
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Adhikarana 11 (23) · Śloka 24
পূর্বং হি দদ্যান্মধু সৈন্ধবং তু স্নেহং বিনির্মথ্যং ততোঽনু কল্কম্||২৩|| বিমথ্য সংযোজ্য পুনর্দ্রবৈস্তং বস্তৌ নিদধ্যান্মথিতং খজেন|২৪|
पूर्वं हि दद्यान्मधु सैन्धवं तु स्नेहं विनिर्मथ्यं ततोऽनु कल्कम्||२३|| विमथ्य संयोज्य पुनर्द्रवैस्तं बस्तौ निदध्यान्मथितं खजेन|२४|
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Adhikarana 12 (24) · Śloka 25
বামাশ্রযে হি গ্রহণীগুদে চ তত্ পার্শ্বসংস্থস্য সুখোপলব্ধিঃ||২৪|| লীযন্ত এবং বলযশ্চ তস্মাত্ সব্যং শযানোঽর্হতি বস্তিদানম্|২৫|
वामाश्रये हि ग्रहणीगुदे च तत् पार्श्वसंस्थस्य सुखोपलब्धिः||२४|| लीयन्त एवं वलयश्च तस्मात् सव्यं शयानोऽर्हति बस्तिदानम्|२५|
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Adhikarana 13 (25) · Śloka 26
বিড্বাতবেগো যদি চার্ধদত্তে নিষ্কৃষ্য মুক্তে প্রণযেদশেষম্ ||২৫|| উত্তানদেহশ্চ কৃতোপধানঃ স্যাদ্বীর্যমাপ্নোতি তথাঽস্য দেহম্ |২৬|
विड्वातवेगो यदि चार्धदत्ते निष्कृष्य मुक्ते प्रणयेदशेषम् ||२५|| उत्तानदेहश्च कृतोपधानः स्याद्वीर्यमाप्नोति तथाऽस्य देहम् |२६|
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Adhikarana 14 (26) · Śloka 26
একোঽপকর্ষত্যনিলং স্বমার্গাত্ পিত্তং দ্বিতীযস্তু কফং তৃতীযঃ||২৬||
एकोऽपकर्षत्यनिलं स्वमार्गात् पित्तं द्वितीयस्तु कफं तृतीयः||२६||
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Adhikarana 15 (27-29) · Śloka 30
প্রত্যাগতে কোষ্ণজলাবসিক্তঃ শাল্যন্নমদ্যাত্তনুনা রসেন| জীর্ণে তু সাযং লঘু চাল্পমাত্রং ভুক্তোঽনুবাস্যঃ পরিবৃংহণার্থম্||২৭|| নিরূহপাদাংশসমেন তৈলেনাম্লানিলঘ্নৌষধসাধিতেন| দত্ত্বা স্ফিচৌ পাণিতলেন হন্যাত্ স্নেহস্য শীঘ্রাগমরক্ষণার্থম্||২৮|| ঈষচ্চ পাদাঙ্গুলিযুগ্মমাঞ্ছেদুত্তানদেহস্য তলৌ প্রমৃজ্যাত্| স্নেহেন পার্ষ্ণ্যঙ্গুলিপিণ্ডিকাশ্চ যে চাস্য গাত্রাবযবা রুগার্তাঃ||২৯|| তাংশ্চাবমদ্গীত সুখং ততশ্চ নিদ্রামুপাসীত কৃতোপধানঃ|৩০|
प्रत्यागते कोष्णजलावसिक्तः शाल्यन्नमद्यात्तनुना रसेन| जीर्णे तु सायं लघु चाल्पमात्रं भुक्तोऽनुवास्यः परिबृंहणार्थम्||२७|| निरूहपादांशसमेन तैलेनाम्लानिलघ्नौषधसाधितेन| दत्त्वा स्फिचौ पाणितलेन हन्यात् स्नेहस्य शीघ्रागमरक्षणार्थम्||२८|| ईषच्च पादाङ्गुलियुग्ममाञ्छेदुत्तानदेहस्य तलौ प्रमृज्यात्| स्नेहेन पार्ष्ण्यङ्गुलिपिण्डिकाश्च ये चास्य गात्रावयवा रुगार्ताः||२९|| तांश्चावमद्गीत सुखं ततश्च निद्रामुपासीत कृतोपधानः|३०|
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Adhikarana 16 (30) · Śloka 31
ভাগাঃ কষাযস্য তু পঞ্চ, পিত্তে স্নেহস্য ষষ্ঠঃ প্রকৃতৌ স্থিতে চ||৩০|| বাতে বিবৃদ্ধে তু চতুর্থভাগো, মাত্রা নিরূহেষু কফেঽষ্টভাগঃ|৩১|
भागाः कषायस्य तु पञ्च, पित्ते स्नेहस्य षष्ठः प्रकृतौ स्थिते च||३०|| वाते विवृद्धे तु चतुर्थभागो, मात्रा निरूहेषु कफेऽष्टभागः|३१|
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Adhikarana 17 (31-32) · Śloka 33
নিরূহমাত্রা প্রসৃতার্ধমাদ্যে বর্ষে ততোঽর্ধপ্রসৃতাভিবৃদ্ধিঃ||৩১|| আদ্বাদশাত্ স্যাত্ প্রসৃতাভিবৃদ্ধিরষ্টাদশাদ্ দ্বাদশতঃ পরং স্যুঃ| আসপ্ততেস্তদ্বিহিতং প্রমাণমতঃ পরং ষোডশবদ্বিধেযম্||৩২|| নিরূহমাত্রা প্রসৃতপ্রমাণা বালে চ বৃদ্ধে চ মৃদুর্বিশেষঃ|৩৩|
निरूहमात्रा प्रसृतार्धमाद्ये वर्षे ततोऽर्धप्रसृताभिवृद्धिः||३१|| आद्वादशात् स्यात् प्रसृताभिवृद्धिरष्टादशाद् द्वादशतः परं स्युः| आसप्ततेस्तद्विहितं प्रमाणमतः परं षोडशवद्विधेयम्||३२|| निरूहमात्रा प्रसृतप्रमाणा बाले च वृद्धे च मृदुर्विशेषः|३३|
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Adhikarana 18 (33) · Śloka 34
নাত্যুচ্ছ্রিতং নাপ্যতিনীচপাদং সপাদপীঠং শযনং প্রশস্তম্||৩৩|| প্রধানমৃদ্বাস্তরণোপপন্নং প্রাক্শীর্ষকং শুক্লপটোত্তরীযম্|৩৪|
नात्युच्छ्रितं नाप्यतिनीचपादं सपादपीठं शयनं प्रशस्तम्||३३|| प्रधानमृद्वास्तरणोपपन्नं प्राक्शीर्षकं शुक्लपटोत्तरीयम्|३४|
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Adhikarana 19 (34) · Śloka 35
ভোজ্যং পুনর্ব্যাধিমবেক্ষ্য তদ্বত্ প্রকল্পযেদ্যূষপযোরসাদ্যৈঃ||৩৪|| সর্বেষু বিদ্যাদ্বিধিমেতমাদ্যং বক্ষ্যামি বস্তীনত উত্তরীযান্|৩৫|
भोज्यं पुनर्व्याधिमवेक्ष्य तद्वत् प्रकल्पयेद्यूषपयोरसाद्यैः||३४|| सर्वेषु विद्याद्विधिमेतमाद्यं वक्ष्यामि बस्तीनत उत्तरीयान्|३५|
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Adhikarana 20 (35-45) · Śloka 45
দ্বিপঞ্চমূলস্য রসোঽম্লযুক্তঃ সচ্ছাগমাংসস্য সপূর্বপেষ্যঃ||৩৫|| ত্রিস্নেহযুক্তঃ প্রবরো নিরূহঃ সর্বানিলব্যাধিহরঃ প্রদিষ্টঃ| স্থিরাদিবর্গস্য বলাপটোলত্রাযন্তিকৈরণ্ডযবৈর্যুতস্য||৩৬|| প্রস্থো রসাচ্ছাগরসার্ধযুক্তঃ সাধ্যঃ পুনঃ প্রস্থসমস্তু যাবত্| প্রিযঙ্গুকৃষ্ণাঘনকল্কযুক্তঃ সতৈলসর্পির্মধুসৈন্ধবশ্চ||৩৭|| স্যাদ্দীপনো মাংসবলপ্রদশ্চ চক্ষুর্বলং চাপি দদাতি বস্তিঃ | এরণ্ডমূলং ত্রিপলং পলাশা হ্রস্বানি মূলানি চ যানি পঞ্চ||৩৮|| রাস্নাশ্বগন্ধাতিবলাগুডূচী পুনর্নবারগ্বধদেবদারু| ভাগাঃ পলাংশা মদনাষ্টযুক্তা জলদ্বিকংসে ক্বথিতেঽষ্টশেষে||৩৯|| পেষ্যাঃ শতাহ্বা হপুষা প্রিযঙ্গুঃ সপিপ্পলীকং মধুকং বলা চ| রসাঞ্জনং বত্সকবীজমুস্তং ভাগাক্ষমাত্রং লবণাংশযুক্তম্||৪০|| সমাক্ষিকস্তৈলযুতঃ সমূত্রো বস্তির্নৃণাং দীপনলেখনীযঃ| জঙ্ঘোরুপাদত্রিকপৃষ্ঠশূলং কফাবৃতিং মারুতনিগ্রহং চ||৪১|| বিণ্মূত্রবাতগ্রহণং সশূলমাধ্মানতামশ্মরিশর্করে চ| আনাহমর্শোগ্রহণীপ্রদোষানেরণ্ডবস্তিঃ শমযেত্ প্রযুক্তঃ||৪২|| চতুষ্পলে তৈলঘৃতস্য ভৃষ্টাচ্ছাগাচ্ছতার্ধো দধিদাডিমাম্লঃ| রসঃ সপেষ্যো বলমাংসবর্ণরেতোগ্নিদশ্চান্ধ্যশিরোর্তিশস্তঃ ||৪৩|| জলদ্বিকংসেঽষ্টপলং পলাশাত্ পক্ত্বা রসোঽর্ধাঢকমাত্রশেষঃ| কল্কৈর্বচামাগধিকাপলাভ্যাং যুক্তঃ শতাহ্বাদ্বিপলেন চাপি||৪৪|| সসৈন্ধবঃ ক্ষৌদ্রযুতঃ সতৈলো দেযো নিরূহো বলবর্ণকারী| আনাহপার্শ্বামযযোনিদোষান্ গুল্মানুদাবর্তরুজং চ হন্যাত্||৪৫||
द्विपञ्चमूलस्य रसोऽम्लयुक्तः सच्छागमांसस्य सपूर्वपेष्यः||३५|| त्रिस्नेहयुक्तः प्रवरो निरूहः सर्वानिलव्याधिहरः प्रदिष्टः| स्थिरादिवर्गस्य बलापटोलत्रायन्तिकैरण्डयवैर्युतस्य||३६|| प्रस्थो रसाच्छागरसार्धयुक्तः साध्यः पुनः प्रस्थसमस्तु यावत्| प्रियङ्गुकृष्णाघनकल्कयुक्तः सतैलसर्पिर्मधुसैन्धवश्च||३७|| स्याद्दीपनो मांसबलप्रदश्च चक्षुर्बलं चापि ददाति बस्तिः | एरण्डमूलं त्रिपलं पलाशा ह्रस्वानि मूलानि च यानि पञ्च||३८|| रास्नाश्वगन्धातिबलागुडूची पुनर्नवारग्वधदेवदारु| भागाः पलांशा मदनाष्टयुक्ता जलद्विकंसे क्वथितेऽष्टशेषे||३९|| पेष्याः शताह्वा हपुषा प्रियङ्गुः सपिप्पलीकं मधुकं बला च| रसाञ्जनं वत्सकबीजमुस्तं भागाक्षमात्रं लवणांशयुक्तम्||४०|| समाक्षिकस्तैलयुतः समूत्रो बस्तिर्नृणां दीपनलेखनीयः| जङ्घोरुपादत्रिकपृष्ठशूलं कफावृतिं मारुतनिग्रहं च||४१|| विण्मूत्रवातग्रहणं सशूलमाध्मानतामश्मरिशर्करे च| आनाहमर्शोग्रहणीप्रदोषानेरण्डबस्तिः शमयेत् प्रयुक्तः||४२|| चतुष्पले तैलघृतस्य भृष्टाच्छागाच्छतार्धो दधिदाडिमाम्लः| रसः सपेष्यो बलमांसवर्णरेतोग्निदश्चान्ध्यशिरोर्तिशस्तः ||४३|| जलद्विकंसेऽष्टपलं पलाशात् पक्त्वा रसोऽर्धाढकमात्रशेषः| कल्कैर्वचामागधिकापलाभ्यां युक्तः शताह्वाद्विपलेन चापि||४४|| ससैन्धवः क्षौद्रयुतः सतैलो देयो निरूहो बलवर्णकारी| आनाहपार्श्वामययोनिदोषान् गुल्मानुदावर्तरुजं च हन्यात्||४५||
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Adhikarana 21 (46-55) · Śloka 55
যষ্ট্যাহ্বযস্যাষ্টপলেন সিদ্ধং পযঃ শতাহ্বাফলপিপ্পলীভিঃ| যুক্তং সসর্পির্মধু বাতরক্তবৈস্বর্যবীসর্পহিতো নিরূহঃ||৪৬|| যষ্ট্যাহ্বলোধ্রাভযচন্দনৈশ্চ শৃতং পযোঽগ্র্যং কমলোত্পলৈশ্চ| সশর্করং ক্ষৌদ্রযুতং সুশীতং পিত্তামযান্ হন্তি সজীবনীযম্||৪৭|| দ্বিকার্ষিকাশ্চন্দনপদ্মকর্ধিযষ্ট্যাহ্বরাস্নাবৃষসারিবাশ্চ| সলোধ্রমঞ্জিষ্ঠমথাপ্যনন্তাবলাস্থিরাদিতৃণপঞ্চমূলম্ ||৪৮|| তোযে সমুত্ক্বাথ্য রসেন তেন শৃতং পযোঽর্ধাঢকমম্বুহীনম্| জীবন্তিমেদর্ধিশতাবরীভির্বীরাদ্বিকাকোলিকশেরুকাভিঃ||৪৯|| সিতোপলাজীবকপদ্মরেণু প্রপৌণ্ডরীকৈঃ কমলোত্পলৈশ্চ| লোধ্রাত্মগুপ্তামধুকৈর্বিদারীমুঞ্জাতকৈঃ কেশরচন্দনৈশ্চ||৫০|| পিষ্টৈর্ঘৃতক্ষৌদ্রযুতৈর্নিরূহং সসৈন্ধবং শীতলমেব দদ্যাত্| প্রত্যাগতে ধন্বরসেন শালীন্ ক্ষীরেণ বাঽদ্যাত্ পরিষিক্তগাত্রঃ||৫১|| দাহাতিসারপ্রদরাস্রপিত্তহৃত্পাণ্ডুরোগান্ বিষমজ্বরং চ| সগুল্মমূত্রগ্রহকামলাদীন্ সর্বামযান্ পিত্তকৃতান্নিহন্তি||৫২|| দ্রাক্ষাদিকাশ্মর্যমধূকসেব্যৈঃ সসারিবাচন্দনশীতপাক্যৈঃ| পযঃ শৃতং শ্রাবণিমুদ্গপর্ণীতুগাত্মগুপ্তামধুযষ্টিকল্কৈঃ||৫৩|| গোধূমচূর্ণৈশ্চ তথাঽক্ষমাত্রৈঃ সক্ষৌদ্রসর্পির্মধুযষ্টিতৈলৈঃ| পথ্যাবিদারীক্ষুরসৈর্গুডেন বস্তিং যুতং পিত্তহরং বিদধ্যাত্||৫৪|| হৃন্নাভিপার্শ্বোত্তমদেহদাহে দাহেঽন্তরস্থে চ সকৃচ্ছ্রমূত্রে| ক্ষীণে ক্ষতে রেতসি চাপি নষ্টে পৈত্তেঽতিসারে চ নৃণাং প্রশস্তঃ||৫৫||
यष्ट्याह्वयस्याष्टपलेन सिद्धं पयः शताह्वाफलपिप्पलीभिः| युक्तं ससर्पिर्मधु वातरक्तवैस्वर्यवीसर्पहितो निरूहः||४६|| यष्ट्याह्वलोध्राभयचन्दनैश्च शृतं पयोऽग्र्यं कमलोत्पलैश्च| सशर्करं क्षौद्रयुतं सुशीतं पित्तामयान् हन्ति सजीवनीयम्||४७|| द्विकार्षिकाश्चन्दनपद्मकर्धियष्ट्याह्वरास्नावृषसारिवाश्च| सलोध्रमञ्जिष्ठमथाप्यनन्ताबलास्थिरादितृणपञ्चमूलम् ||४८|| तोये समुत्क्वाथ्य रसेन तेन शृतं पयोऽर्धाढकमम्बुहीनम्| जीवन्तिमेदर्धिशतावरीभिर्वीराद्विकाकोलिकशेरुकाभिः||४९|| सितोपलाजीवकपद्मरेणु प्रपौण्डरीकैः कमलोत्पलैश्च| लोध्रात्मगुप्तामधुकैर्विदारीमुञ्जातकैः केशरचन्दनैश्च||५०|| पिष्टैर्घृतक्षौद्रयुतैर्निरूहं ससैन्धवं शीतलमेव दद्यात्| प्रत्यागते धन्वरसेन शालीन् क्षीरेण वाऽद्यात् परिषिक्तगात्रः||५१|| दाहातिसारप्रदरास्रपित्तहृत्पाण्डुरोगान् विषमज्वरं च| सगुल्ममूत्रग्रहकामलादीन् सर्वामयान् पित्तकृतान्निहन्ति||५२|| द्राक्षादिकाश्मर्यमधूकसेव्यैः ससारिवाचन्दनशीतपाक्यैः| पयः शृतं श्रावणिमुद्गपर्णीतुगात्मगुप्तामधुयष्टिकल्कैः||५३|| गोधूमचूर्णैश्च तथाऽक्षमात्रैः सक्षौद्रसर्पिर्मधुयष्टितैलैः| पथ्याविदारीक्षुरसैर्गुडेन बस्तिं युतं पित्तहरं विदध्यात्||५४|| हृन्नाभिपार्श्वोत्तमदेहदाहे दाहेऽन्तरस्थे च सकृच्छ्रमूत्रे| क्षीणे क्षते रेतसि चापि नष्टे पैत्तेऽतिसारे च नृणां प्रशस्तः||५५||
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Adhikarana 22 (56-64) · Śloka 64
কোষাতকারগ্বধদেবদারুশার্ঙ্গেষ্টমূর্বাকুটজার্কপাঠাঃ | পক্ত্বা কুলত্থান্ বৃহতীং চ তোযে রসস্য তস্য প্রসৃতা দশ স্যুঃ||৫৬|| তান্ সর্ষপৈলামদনৈঃ সকুষ্ঠৈরক্ষপ্রমাণৈঃ প্রসৃতৈশ্চ যুক্তান্| ফলাহ্বতৈলস্য সমাক্ষিকস্য ক্ষারস্য তৈলস্য চ সার্ষপস্য||৫৭|| দদ্যান্নিরূহং কফরোগিণে জ্ঞো মন্দাগ্নযে চাপ্যশনদ্বিষে চ| পটোলপথ্যামরদারুভির্বা সপিপ্পলীকৈঃ ক্বথিতৈর্জলেঽগ্নৌ||৫৮|| দ্বিপঞ্চমূলে ত্রিফলাং সবিল্বাং ফলানি গোমূত্রযুতঃ কষাযঃ| কলিঙ্গপাঠাফলমুস্তকল্কঃ সসৈন্ধবঃ ক্ষারযুতঃ সতৈলঃ||৫৯|| নিরূহমুখ্যঃ কফজান্ বিকারান্ সপাণ্ডুরোগালসকামদোষান্| হন্যাত্তথা মারুতমূত্রসঙ্গং বস্তেস্তথাঽঽটোপমথাপি ঘোরম্||৬০|| রাস্নামৃতৈরণ্ডবিডঙ্গদার্বীসপ্তচ্ছদোশীরসুরাহ্বনিম্বৈঃ| শম্পাকভূনিম্বপটোলপাঠাতিক্তাখুপর্ণীদশমূলমুস্তৈঃ||৬১|| ত্রাযন্তিকাশিগ্রুফলত্রিকৈশ্চ ক্বাথঃ সপিণ্ডীতকতোযমূত্রঃ| যষ্ট্যাহ্বকৃষ্ণাফলিনীশতাহ্বারসাঞ্জনশ্বেতবচাবিডঙ্গৈঃ||৬২|| কলিঙ্গপাঠাম্বুদসৈন্ধবৈশ্চ কল্কৈঃ সসর্পির্মধুতৈলমিশ্রঃ| অযং নিরূহঃ ক্রিমিকুষ্ঠমেহব্রধ্নোদরাজীর্ণকফাতুরেভ্যঃ||৬৩|| রূক্ষৌষধৈরপ্যপতর্পিতেভ্য এতেষু রোগেষ্বপি সত্সু দত্তঃ| নিহত্য বাতং জ্বলনং প্রদীপ্য বিজিত্য রোগাংশ্চ বলং করোতি||৬৪||
कोषातकारग्वधदेवदारुशार्ङ्गेष्टमूर्वाकुटजार्कपाठाः | पक्त्वा कुलत्थान् बृहतीं च तोये रसस्य तस्य प्रसृता दश स्युः||५६|| तान् सर्षपैलामदनैः सकुष्ठैरक्षप्रमाणैः प्रसृतैश्च युक्तान्| फलाह्वतैलस्य समाक्षिकस्य क्षारस्य तैलस्य च सार्षपस्य||५७|| दद्यान्निरूहं कफरोगिणे ज्ञो मन्दाग्नये चाप्यशनद्विषे च| पटोलपथ्यामरदारुभिर्वा सपिप्पलीकैः क्वथितैर्जलेऽग्नौ||५८|| द्विपञ्चमूले त्रिफलां सबिल्वां फलानि गोमूत्रयुतः कषायः| कलिङ्गपाठाफलमुस्तकल्कः ससैन्धवः क्षारयुतः सतैलः||५९|| निरूहमुख्यः कफजान् विकारान् सपाण्डुरोगालसकामदोषान्| हन्यात्तथा मारुतमूत्रसङ्गं बस्तेस्तथाऽऽटोपमथापि घोरम्||६०|| रास्नामृतैरण्डविडङ्गदार्वीसप्तच्छदोशीरसुराह्वनिम्बैः| शम्पाकभूनिम्बपटोलपाठातिक्ताखुपर्णीदशमूलमुस्तैः||६१|| त्रायन्तिकाशिग्रुफलत्रिकैश्च क्वाथः सपिण्डीतकतोयमूत्रः| यष्ट्याह्वकृष्णाफलिनीशताह्वारसाञ्जनश्वेतवचाविडङ्गैः||६२|| कलिङ्गपाठाम्बुदसैन्धवैश्च कल्कैः ससर्पिर्मधुतैलमिश्रः| अयं निरूहः क्रिमिकुष्ठमेहब्रध्नोदराजीर्णकफातुरेभ्यः||६३|| रूक्षौषधैरप्यपतर्पितेभ्य एतेषु रोगेष्वपि सत्सु दत्तः| निहत्य वातं ज्वलनं प्रदीप्य विजित्य रोगांश्च बलं करोति||६४||
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Adhikarana 23 (65-68) · Śloka 68
পুনর্নবৈরণ্ডবৃষাশ্মভেদবৃশ্চীরভূতীকবলাপলাশাঃ | দ্বিপঞ্চমূলং চ পলাংশিকানি ক্ষুণ্ণানি ধৌতানি ফলানি চাষ্টৌ||৬৫|| বিল্বং যবান্ কোলকুলত্থধান্যফলানি চৈব প্রসৃতোন্মিতানি| পযোজলদ্ব্যাঢকবচ্ছৃতং তত্ ক্ষীরাবশেষং সিতবস্ত্রপূতম্||৬৬|| বচাশতাহ্বামরদারুকুষ্ঠযষ্ট্যাহ্বসিদ্ধার্থকপিপ্পলীনাম্ | কল্কৈর্যবান্যা মদনৈশ্চ যুক্তং নাত্যুষ্ণশীতং গুডসৈন্ধবাক্তম্||৬৭|| ক্ষৌদ্রস্য তৈলস্য চ সর্পিষশ্চ তথৈব যুক্তং প্রসৃতৈস্ত্রিভিশ্চ | দদ্যান্নিরূহং বিধিনা বিবিজ্ঞঃ স সর্বসংসর্গকৃতামযঘ্নঃ||৬৮||
पुनर्नवैरण्डवृषाश्मभेदवृश्चीरभूतीकबलापलाशाः | द्विपञ्चमूलं च पलांशिकानि क्षुण्णानि धौतानि फलानि चाष्टौ||६५|| बिल्वं यवान् कोलकुलत्थधान्यफलानि चैव प्रसृतोन्मितानि| पयोजलद्व्याढकवच्छृतं तत् क्षीरावशेषं सितवस्त्रपूतम्||६६|| वचाशताह्वामरदारुकुष्ठयष्ट्याह्वसिद्धार्थकपिप्पलीनाम् | कल्कैर्यवान्या मदनैश्च युक्तं नात्युष्णशीतं गुडसैन्धवाक्तम्||६७|| क्षौद्रस्य तैलस्य च सर्पिषश्च तथैव युक्तं प्रसृतैस्त्रिभिश्च | दद्यान्निरूहं विधिना विविज्ञः स सर्वसंसर्गकृतामयघ्नः||६८||
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Adhikarana 24 (69) · Śloka 69
স্নিগ্ধোষ্ণ একঃ পবনে সমাংসো দ্বৌ স্বাদুশীতৌ পযসা চ পিত্তে| ত্রযঃ সমূত্রাঃ কটুকোষ্ণতীক্ষ্ণাঃ কফে নিরূহা ন পরং বিধেযাঃ||৬৯||
स्निग्धोष्ण एकः पवने समांसो द्वौ स्वादुशीतौ पयसा च पित्ते| त्रयः समूत्राः कटुकोष्णतीक्ष्णाः कफे निरूहा न परं विधेयाः||६९||
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Adhikarana 25 (70-71) · Śloka 71
রসেন বাতে প্রতিভোজনং স্যাত্ ক্ষীরেণ পিত্তে তু কফে চ যূষৈঃ| তথাঽনুবাস্যেষু চ বিল্বতৈলং স্যাজ্জীবনীযং ফলসাধিতং চ||৭০|| ইতীদমুক্তং নিখিলং যথাবদ্বস্তিপ্রদানস্য বিধানমগ্র্যম্| যোঽধীত্য বিদ্বানিহ বস্তিকর্ম করোতি লোকে লভতে স সিদ্ধিম্||৭১||
रसेन वाते प्रतिभोजनं स्यात् क्षीरेण पित्ते तु कफे च यूषैः| तथाऽनुवास्येषु च बिल्वतैलं स्याज्जीवनीयं फलसाधितं च||७०|| इतीदमुक्तं निखिलं यथावद्बस्तिप्रदानस्य विधानमग्र्यम्| योऽधीत्य विद्वानिह बस्तिकर्म करोति लोके लभते स सिद्धिम्||७१||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 3
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতেঽপ্রাপ্তে দৃঢবলসম্পূরিতে সিদ্ধিস্থানে বস্তিসূত্রীযসিদ্ধির্নাম তৃতীযোঽধ্যাযঃ||৩||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृतेऽप्राप्ते दृढबलसम्पूरिते सिद्धिस्थाने बस्तिसूत्रीयसिद्धिर्नाम तृतीयोऽध्यायः||३||
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