Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাত আত্রেযভদ্রকাপ্যীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथात आत्रेयभद्रकाप्यीयमध्यायं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাত আত্রেযভদ্রকাপ্যীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथात आत्रेयभद्रकाप्यीयमध्यायं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3-7) · Śloka 7
আত্রেযো ভদ্রকাপ্যশ্চ শাকুন্তেযস্তথৈব চ| পূর্ণাক্ষশ্চৈব মৌদ্গল্যো হিরণ্যাক্ষশ্চ কৌশিকঃ||৩|| যঃ কুমারশিরা নাম ভরদ্বাজঃ স চানঘঃ| শ্রীমান্ বার্যোবিদশ্চৈব রাজা মতিমতাং বরঃ||৪|| নিমিশ্চ রাজা বৈদেহো বডিশশ্চ মহামতিঃ| কাঙ্কাযনশ্চ বাহ্লীকো বাহ্লীকভিষজাং বরঃ||৫|| এতে শ্রুতবযোবৃদ্ধা জিতাত্মানো মহর্ষযঃ| বনে চৈত্ররথে রম্যে সমীযুর্বিজিহীর্ষবঃ||৬|| তেষাং তত্রোপবিষ্টানামিযমর্থবতী কথা| বভূবার্থবিদাং সম্যগ্রসাহারবিনিশ্চযে||৭||
आत्रेयो भद्रकाप्यश्च शाकुन्तेयस्तथैव च| पूर्णाक्षश्चैव मौद्गल्यो हिरण्याक्षश्च कौशिकः||३|| यः कुमारशिरा नाम भरद्वाजः स चानघः| श्रीमान् वार्योविदश्चैव राजा मतिमतां वरः||४|| निमिश्च राजा वैदेहो बडिशश्च महामतिः| काङ्कायनश्च बाह्लीको बाह्लीकभिषजां वरः||५|| एते श्रुतवयोवृद्धा जितात्मानो महर्षयः| वने चैत्ररथे रम्ये समीयुर्विजिहीर्षवः||६|| तेषां तत्रोपविष्टानामियमर्थवती कथा| बभूवार्थविदां सम्यग्रसाहारविनिश्चये||७||
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Adhikarana 3 (8) · Śloka 8
এক এব রস ইত্যুবাচ ভদ্রকাপ্যঃ, যং পঞ্চানামিন্দ্রিযার্থানামন্যতমং জিহ্বাবৈষযিকং ভাবমাচক্ষতে কুশলাঃ, স পুনরুদকাদনন্য ইতি| দ্বৌ রসাবিতি শাকুন্তেযো ব্রাহ্মণঃ, ছেদনীয উপশমনীযশ্চেতি| ত্রযো রসা ইতি পূর্ণাক্ষো মৌদ্গল্যঃ, ছেদনীযোপশমনীযসাধারণা ইতি| চত্বারো রসা ইতি হিরণ্যাক্ষঃ কৌশিকঃ, স্বাদুর্হিতশ্চ স্বাদুরহিতশ্চাস্বাদুর্হিতশ্চাস্বাদুরহিতশ্চেতি| পঞ্চ রসা ইতি কুমারশিরা ভরদ্বাজঃ, ভৌমৌদকাগ্নেযবাযব্যান্তরিক্ষাঃ| ষড্রসা ইতি বার্যোবিদো রাজর্ষিঃ, গুরুলঘুশীতোষ্ণস্নিগ্ধরূক্ষাঃ| সপ্ত রসা ইতি নিমির্বৈদেহঃ, মধুরাম্ললবণকটুতিক্তকষাযক্ষারাঃ| অষ্টৌ রসা ইতি বডিশো ধামার্গবঃ, মধুরাম্ললবণকটুতিক্তকষাযক্ষারাব্যক্তাঃ| অপরিসঙ্খ্যেযা রসা ইতি কাঙ্কাযনো বাহ্লীকভিষক্, আশ্রযগুণকর্মসংস্বাদবিশেষাণামপরিসঙ্খ্যেযত্বাত্||৮||
एक एव रस इत्युवाच भद्रकाप्यः, यं पञ्चानामिन्द्रियार्थानामन्यतमं जिह्वावैषयिकं भावमाचक्षते कुशलाः, स पुनरुदकादनन्य इति| द्वौ रसाविति शाकुन्तेयो ब्राह्मणः, छेदनीय उपशमनीयश्चेति| त्रयो रसा इति पूर्णाक्षो मौद्गल्यः, छेदनीयोपशमनीयसाधारणा इति| चत्वारो रसा इति हिरण्याक्षः कौशिकः, स्वादुर्हितश्च स्वादुरहितश्चास्वादुर्हितश्चास्वादुरहितश्चेति| पञ्च रसा इति कुमारशिरा भरद्वाजः, भौमौदकाग्नेयवायव्यान्तरिक्षाः| षड्रसा इति वार्योविदो राजर्षिः, गुरुलघुशीतोष्णस्निग्धरूक्षाः| सप्त रसा इति निमिर्वैदेहः, मधुराम्ललवणकटुतिक्तकषायक्षाराः| अष्टौ रसा इति बडिशो धामार्गवः, मधुराम्ललवणकटुतिक्तकषायक्षाराव्यक्ताः| अपरिसङ्ख्येया रसा इति काङ्कायनो बाह्लीकभिषक्, आश्रयगुणकर्मसंस्वादविशेषाणामपरिसङ्ख्येयत्वात्||८||
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Adhikarana 4 (9) · Śloka 9
ষডেব রসা ইত্যুবাচ ভগবানাত্রেযঃ পুনর্বসুঃ, মধুরাম্ললবণকটুতিক্তকষাযাঃ| তেষাং ষণ্ণাং রসানাং যোনিরুদকং, ছেদনোপশমনে দ্বে কর্মণী, তযোর্মিশ্রীভাবাত্ সাধারণত্বং, স্বাদ্বস্বাদুতা ভক্তিঃ , হিতাহিতৌ প্রভাবৌ, পঞ্চমহাভূতবিকারাস্ত্বাশ্রযাঃ প্রকৃতিবিকৃতিবিচারদেশকালবশাঃ, তেষ্বাশ্রযেষু দ্রব্যসঞ্জ্ঞকেষু গুণা গুরুলঘুশীতোষ্ণস্নিগ্ধরূক্ষাদ্যাঃ; ক্ষরণাত্ ক্ষারঃ, নাসৌ রসঃ দ্রব্যং তদনেকরসসমুত্পন্নমনেকরসং কটুকলবণভূযিষ্ঠমনেকেন্দ্রিযার্থসমন্বিতং করণাভিনির্বৃত্তম্; অব্যক্তীভাবস্তু খলু রসানাং প্রকৃতৌ ভবত্যনুরসেঽনুরসসমন্বিতে বা দ্রব্যে; অপরিসঙ্খ্যেযত্বং পুনস্তেষামাশ্রযাদীনাং ভাবানাং বিশেষাপরিসঙ্খ্যেযত্বান্ন যুক্তম্, একৈকোঽপি হ্যেষামাশ্রযাদীনাং ভাবানাং বিশেষানাশ্রযতে বিশেষাপরিসঙ্খ্যেযত্বাত্, ন চ তস্মাদন্যত্বমুপপদ্যতে; পরস্পরসংসৃষ্টভূযিষ্ঠত্বান্ন চৈষামভিনির্বৃত্তের্গুণপ্রকৃতীনামপরিসঙ্খ্যেযত্বং ভবতি; তস্মান্ন সংসৃষ্টানাং রসানাং কর্মোপদিশন্তি বুদ্ধিমন্তঃ| তচ্চৈব কারণমপেক্ষমাণাঃ ষণ্ণাং রসানাং পরস্পরেণাসংসৃষ্টানাং লক্ষণপৃথক্ত্বমুপদেক্ষ্যামঃ||৯||
षडेव रसा इत्युवाच भगवानात्रेयः पुनर्वसुः, मधुराम्ललवणकटुतिक्तकषायाः| तेषां षण्णां रसानां योनिरुदकं, छेदनोपशमने द्वे कर्मणी, तयोर्मिश्रीभावात् साधारणत्वं, स्वाद्वस्वादुता भक्तिः , हिताहितौ प्रभावौ, पञ्चमहाभूतविकारास्त्वाश्रयाः प्रकृतिविकृतिविचारदेशकालवशाः, तेष्वाश्रयेषु द्रव्यसञ्ज्ञकेषु गुणा गुरुलघुशीतोष्णस्निग्धरूक्षाद्याः; क्षरणात् क्षारः, नासौ रसः द्रव्यं तदनेकरससमुत्पन्नमनेकरसं कटुकलवणभूयिष्ठमनेकेन्द्रियार्थसमन्वितं करणाभिनिर्वृत्तम्; अव्यक्तीभावस्तु खलु रसानां प्रकृतौ भवत्यनुरसेऽनुरससमन्विते वा द्रव्ये; अपरिसङ्ख्येयत्वं पुनस्तेषामाश्रयादीनां भावानां विशेषापरिसङ्ख्येयत्वान्न युक्तम्, एकैकोऽपि ह्येषामाश्रयादीनां भावानां विशेषानाश्रयते विशेषापरिसङ्ख्येयत्वात्, न च तस्मादन्यत्वमुपपद्यते; परस्परसंसृष्टभूयिष्ठत्वान्न चैषामभिनिर्वृत्तेर्गुणप्रकृतीनामपरिसङ्ख्येयत्वं भवति; तस्मान्न संसृष्टानां रसानां कर्मोपदिशन्ति बुद्धिमन्तः| तच्चैव कारणमपेक्षमाणाः षण्णां रसानां परस्परेणासंसृष्टानां लक्षणपृथक्त्वमुपदेक्ष्यामः||९||
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Adhikarana 5 (10) · Śloka 10
অগ্রে তু তাবদ্দ্রব্যভেদমভিপ্রেত্য কিঞ্চিদভিধাস্যামঃ| সর্বং দ্রব্যং পাঞ্চভৌতিকমস্মিন্নর্থে ; তচ্চেতনাবদচেতনং চ, তস্য গুণাঃ শব্দাদযো গুর্বাদযশ্চ দ্রবান্তাঃ, কর্ম পঞ্চবিধমুক্তং বমনাদি||১০||
अग्रे तु तावद्द्रव्यभेदमभिप्रेत्य किञ्चिदभिधास्यामः| सर्वं द्रव्यं पाञ्चभौतिकमस्मिन्नर्थे ; तच्चेतनावदचेतनं च, तस्य गुणाः शब्दादयो गुर्वादयश्च द्रवान्ताः, कर्म पञ्चविधमुक्तं वमनादि||१०||
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Adhikarana 6 (11) · Śloka 11
তত্র দ্রব্যাণি গুরুখরকঠিনমন্দস্থিরবিশদসান্দ্রস্থূলগন্ধগুণবহুলানি পার্থিবানি , তান্যুপচযসঙ্ঘাতগৌরবস্থৈর্যকরাণি; দ্রবস্নিগ্ধশীতমন্দমৃদুপিচ্ছিলরসগুণবহুলান্যাপ্যানি, তান্যুপক্লেদস্নেহবন্ধবিষ্যন্দমার্দবপ্রহ্লাদকরাণি; উষ্ণতীক্ষ্ণসূক্ষ্মলঘুরূক্ষবিশদরূপগুণবহুলান্যাগ্নেযানি, তানি দাহপাকপ্রভাপ্রকাশবর্ণকরাণি; লঘুশীতরূক্ষখরবিশদসূক্ষ্মস্পর্শগুণবহুলানি বাযব্যানি, তানি রৌক্ষ্যগ্লানিবিচারবৈশদ্যলাঘবকরাণি; মৃদুলঘুসূক্ষ্মশ্লক্ষ্ণশব্দগুণবহুলান্যাকাশাত্মকানি, তানি মার্দবসৌষির্যলাঘবকরাণি||১১||
तत्र द्रव्याणि गुरुखरकठिनमन्दस्थिरविशदसान्द्रस्थूलगन्धगुणबहुलानि पार्थिवानि , तान्युपचयसङ्घातगौरवस्थैर्यकराणि; द्रवस्निग्धशीतमन्दमृदुपिच्छिलरसगुणबहुलान्याप्यानि, तान्युपक्लेदस्नेहबन्धविष्यन्दमार्दवप्रह्लादकराणि; उष्णतीक्ष्णसूक्ष्मलघुरूक्षविशदरूपगुणबहुलान्याग्नेयानि, तानि दाहपाकप्रभाप्रकाशवर्णकराणि; लघुशीतरूक्षखरविशदसूक्ष्मस्पर्शगुणबहुलानि वायव्यानि, तानि रौक्ष्यग्लानिविचारवैशद्यलाघवकराणि; मृदुलघुसूक्ष्मश्लक्ष्णशब्दगुणबहुलान्याकाशात्मकानि, तानि मार्दवसौषिर्यलाघवकराणि||११||
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Adhikarana 7 (12) · Śloka 12
অনেনোপদেশেন নানৌষধিভূতং জগতি কিঞ্চিদ্দ্রব্যমুপলভ্যতে তাং তাং যুক্তিমর্থং চ তং তমভিপ্রেত্য||১২||
अनेनोपदेशेन नानौषधिभूतं जगति किञ्चिद्द्रव्यमुपलभ्यते तां तां युक्तिमर्थं च तं तमभिप्रेत्य||१२||
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Adhikarana 8 (13) · Śloka 13
ন তু কেবলং গুণপ্রভাবাদেব দ্রব্যাণি কার্মুকাণি ভবন্তি; দ্রব্যাণি হি দ্রব্যপ্রভাবাদ্গুণপ্রভাবাদ্দ্রব্যগুণপ্রভাবাচ্চ তস্মিংস্তস্মিন্ কালে তত্তদধিকরণমাসাদ্য তাং তাং চ যুক্তিমর্থং চ তং তমভিপ্রেত্য যত্ কুর্বন্তি, তত্ কর্ম; যেন কুর্বিন্তি, তদ্বীর্যং; যত্র কুর্বন্তি, তদধিকরণং; যদা কুর্বন্তি, স কালঃ; যথা কুর্বন্তি, স উপাযঃ; যত্ সাধযন্তি, তত্ ফলম্||১৩||
न तु केवलं गुणप्रभावादेव द्रव्याणि कार्मुकाणि भवन्ति; द्रव्याणि हि द्रव्यप्रभावाद्गुणप्रभावाद्द्रव्यगुणप्रभावाच्च तस्मिंस्तस्मिन् काले तत्तदधिकरणमासाद्य तां तां च युक्तिमर्थं च तं तमभिप्रेत्य यत् कुर्वन्ति, तत् कर्म; येन कुर्विन्ति, तद्वीर्यं; यत्र कुर्वन्ति, तदधिकरणं; यदा कुर्वन्ति, स कालः; यथा कुर्वन्ति, स उपायः; यत् साधयन्ति, तत् फलम्||१३||
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Adhikarana 9 (14) · Śloka 14
ভেদশ্চৈষাং ত্রিষষ্টিবিধবিকল্পো দ্রব্যদেশকালপ্রভাবাদ্ভবতি, তমুপদেক্ষ্যামঃ||১৪||
भेदश्चैषां त्रिषष्टिविधविकल्पो द्रव्यदेशकालप्रभावाद्भवति, तमुपदेक्ष्यामः||१४||
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Adhikarana 10 (15) · Śloka 15
স্বাদুরম্লাদিভির্যোগং শেষৈরম্লাদযঃ পৃথক্| যান্তি পঞ্চদশৈতানি দ্রব্যাণি দ্বিরসানি তু||১৫||
स्वादुरम्लादिभिर्योगं शेषैरम्लादयः पृथक्| यान्ति पञ्चदशैतानि द्रव्याणि द्विरसानि तु||१५||
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Adhikarana 11 (16) · Śloka 17
পৃথগম্লাদিযুক্তস্য যোগঃ শেষৈঃ পৃথগ্ভবেত্| মধুরস্য তথাঽম্লস্য লবণস্য কটোস্তথা||১৬|| ত্রিরসানি যথাসঙ্খ্যং দ্রব্যাণ্যুক্তানি বিংশতিঃ|১৭|
पृथगम्लादियुक्तस्य योगः शेषैः पृथग्भवेत्| मधुरस्य तथाऽम्लस्य लवणस्य कटोस्तथा||१६|| त्रिरसानि यथासङ्ख्यं द्रव्याण्युक्तानि विंशतिः|१७|
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Adhikarana 12 (17-20) · Śloka 21
বক্ষ্যন্তে তু চতুষ্কেণ দ্রব্যাণি দশ পঞ্চ চ||১৭|| স্বাদ্বম্লৌ সহিতৌ যোগং লবণাদ্যৈঃ পৃথগ্গতৌ| যোগং শেষৈঃ পৃথগ্যাতশ্চতুষ্করসসঙ্খ্যযা||১৮|| সহিতৌ স্বাদুলবণৌ তদ্বত্ কট্বাদিভিঃ পৃথক্| যুক্তৌ শেষৈঃ পৃথগ্যোগং যাতঃ স্বাদূষণৌ তথা||১৯|| কট্বাদ্যৈরম্ললবণৌ সংযুক্তৌ সহিতৌ পৃথক্| যাতঃ শেষৈঃ পৃথগ্যোগং শেষৈরম্লকটূ তথা||২০|| যুজ্যতে তু কষাযেণ সতিক্তৌ লবণোষণৌ|২১|
वक्ष्यन्ते तु चतुष्केण द्रव्याणि दश पञ्च च||१७|| स्वाद्वम्लौ सहितौ योगं लवणाद्यैः पृथग्गतौ| योगं शेषैः पृथग्यातश्चतुष्करससङ्ख्यया||१८|| सहितौ स्वादुलवणौ तद्वत् कट्वादिभिः पृथक्| युक्तौ शेषैः पृथग्योगं यातः स्वादूषणौ तथा||१९|| कट्वाद्यैरम्ललवणौ संयुक्तौ सहितौ पृथक्| यातः शेषैः पृथग्योगं शेषैरम्लकटू तथा||२०|| युज्यते तु कषायेण सतिक्तौ लवणोषणौ|२१|
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Adhikarana 13 (21) · Śloka 22
ষট্ তু পঞ্চরসান্যাহুরেকৈকস্যাপবর্জনাত্||২১|| ষট্ চৈবৈকরসানি স্যুরেকং ষড্রসমেব তু|২২|
षट् तु पञ्चरसान्याहुरेकैकस्यापवर्जनात्||२१|| षट् चैवैकरसानि स्युरेकं षड्रसमेव तु|२२|
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Adhikarana 14 (22-23) · Śloka 23
ইতি ত্রিষষ্টির্দ্রব্যাণাং নির্দিষ্টা রসসঙ্খ্যযা||২২|| ত্রিষষ্টিঃ স্যাত্ত্বসঙ্খ্যেযা রসানুরসকল্পনাত্ | রসাস্তরতমাভ্যাং তাং সঙ্খ্যামতিপতন্তি হি||২৩||
इति त्रिषष्टिर्द्रव्याणां निर्दिष्टा रससङ्ख्यया||२२|| त्रिषष्टिः स्यात्त्वसङ्ख्येया रसानुरसकल्पनात् | रसास्तरतमाभ्यां तां सङ्ख्यामतिपतन्ति हि||२३||
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Adhikarana 15 (24) · Śloka 24
সংযোগাঃ সপ্তপঞ্চাশত্ কল্পনা তু ত্রিষষ্টিধা| রসানাং তত্র যোগ্যত্বাত্ কল্পিতা রসচিন্তকৈঃ||২৪||
संयोगाः सप्तपञ्चाशत् कल्पना तु त्रिषष्टिधा| रसानां तत्र योग्यत्वात् कल्पिता रसचिन्तकैः||२४||
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Adhikarana 16 (25-26) · Śloka 26
ক্বচিদেকো রসঃ কল্প্যঃ সংযুক্তাশ্চ রসাঃ ক্বচিত্| দোষৌষধাদীন্ সঞ্চিন্ত্য ভিষজা সিদ্ধিমিচ্ছতা||২৫|| দ্রব্যাণি দ্বিরসাদীনি সংযুক্তাংশ্চ রসান্ বুধাঃ| রসানেকৈকশো বাঽপি কল্পযন্তি গদান্ প্রতি||২৬||
क्वचिदेको रसः कल्प्यः संयुक्ताश्च रसाः क्वचित्| दोषौषधादीन् सञ्चिन्त्य भिषजा सिद्धिमिच्छता||२५|| द्रव्याणि द्विरसादीनि संयुक्तांश्च रसान् बुधाः| रसानेकैकशो वाऽपि कल्पयन्ति गदान् प्रति||२६||
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Adhikarana 17 (27) · Śloka 27
যঃ স্যাদ্রসবিকল্পজ্ঞঃ স্যাচ্চ দোষবিকল্পবিত্| ন স মুহ্যেদ্বিকারাণাং হেতুলিঙ্গোপশান্তিষু ||২৭||
यः स्याद्रसविकल्पज्ञः स्याच्च दोषविकल्पवित्| न स मुह्येद्विकाराणां हेतुलिङ्गोपशान्तिषु ||२७||
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Adhikarana 18 (28) · Śloka 28
ব্যক্তঃ শুষ্কস্য চাদৌ চ রসো দ্রব্যস্য লক্ষ্যতে| বিপর্যযেণানুরসো রসো নাস্তি হি সপ্তমঃ||২৮||
व्यक्तः शुष्कस्य चादौ च रसो द्रव्यस्य लक्ष्यते| विपर्ययेणानुरसो रसो नास्ति हि सप्तमः||२८||
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Adhikarana 19 (29-35) · Śloka 35
পরাপরত্বে যুক্তিশ্চ সঙ্খ্যা সংযোগ এব চ| বিভাগশ্চ পৃথক্ত্বং চ পরিমাণমথাপি চ||২৯|| সংস্কারোঽভ্যাস ইত্যেতে গুণা জ্ঞেযাঃ পরাদযঃ| সিদ্ধ্যুপাযাশ্চিকিত্সাযা লক্ষণৈস্তান্ প্রচক্ষ্মহে||৩০|| দেশকালবযোমানপাকবীর্যরসাদিষু| পরাপরত্বে, যুক্তিশ্চ যোজনা যা তু যুজ্যতে||৩১|| সঙ্খ্যা স্যাদ্গণিতং, যোগঃ সহ সংযোগ উচ্যতে| দ্রব্যাণাং দ্বন্দ্বসর্বৈককর্মজোঽনিত্য এব চ||৩২|| বিভাগস্তু বিভক্তিঃ স্যাদ্বিযোগো ভাগশো গ্রহঃ| পৃথক্ত্বং স্যাদসংযোগো বৈলক্ষণ্যমনেকতা||৩৩|| পরিমাণং পুনর্মানং, সংস্কারঃ করণং মতম্| ভাবাভ্যসনমভ্যাসঃ শীলনং সততক্রিযা||৩৪|| ইতি স্বলক্ষণৈরুক্তা গুণাঃ সর্বে পরাদযঃ| চিকিত্সা যৈরবিদিতৈর্ন যথাবত্ প্রবর্ততে||৩৫||
परापरत्वे युक्तिश्च सङ्ख्या संयोग एव च| विभागश्च पृथक्त्वं च परिमाणमथापि च||२९|| संस्कारोऽभ्यास इत्येते गुणा ज्ञेयाः परादयः| सिद्ध्युपायाश्चिकित्साया लक्षणैस्तान् प्रचक्ष्महे||३०|| देशकालवयोमानपाकवीर्यरसादिषु| परापरत्वे, युक्तिश्च योजना या तु युज्यते||३१|| सङ्ख्या स्याद्गणितं, योगः सह संयोग उच्यते| द्रव्याणां द्वन्द्वसर्वैककर्मजोऽनित्य एव च||३२|| विभागस्तु विभक्तिः स्याद्वियोगो भागशो ग्रहः| पृथक्त्वं स्यादसंयोगो वैलक्षण्यमनेकता||३३|| परिमाणं पुनर्मानं, संस्कारः करणं मतम्| भावाभ्यसनमभ्यासः शीलनं सततक्रिया||३४|| इति स्वलक्षणैरुक्ता गुणाः सर्वे परादयः| चिकित्सा यैरविदितैर्न यथावत् प्रवर्तते||३५||
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Adhikarana 20 (36) · Śloka 36
গুণা গুণাশ্রযা নোক্তাস্তস্মাদ্রসগুণান্ ভিষক্| বিদ্যাদ্দ্রব্যগুণান্ কর্তুরভিপ্রাযাঃ পৃথগ্বিধাঃ||৩৬||
गुणा गुणाश्रया नोक्तास्तस्माद्रसगुणान् भिषक्| विद्याद्द्रव्यगुणान् कर्तुरभिप्रायाः पृथग्विधाः||३६||
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Adhikarana 21 (37) · Śloka 37
অতশ্চ প্রকৃতং বুদ্ধ্বা দেশকালান্তরাণি চ| তন্ত্রকর্তুরভিপ্রাযানুপাযাংশ্চার্থমাদিশেত্||৩৭||
अतश्च प्रकृतं बुद्ध्वा देशकालान्तराणि च| तन्त्रकर्तुरभिप्रायानुपायांश्चार्थमादिशेत्||३७||
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Adhikarana 22 (38) · Śloka 38
ষড্বিভক্তীঃ প্রবক্ষ্যামি রসানামত উত্তরম্| ষট্ পঞ্চভূতপ্রভবাঃ সঙ্খ্যাতাশ্চ যথা রসাঃ||৩৮||
षड्विभक्तीः प्रवक्ष्यामि रसानामत उत्तरम्| षट् पञ्चभूतप्रभवाः सङ्ख्याताश्च यथा रसाः||३८||
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Adhikarana 23 (39) · Śloka 39
সৌম্যাঃ খল্বাপোঽন্তরিক্ষপ্রভবাঃ প্রকৃতিশীতা লঘ্ব্যশ্চাব্যক্তরসাশ্চ, তাস্ত্বন্তরিক্ষাদ্ভ্রশ্যমানা ভ্রষ্টাশ্চ পঞ্চমহাভূতগুণসমন্বিতা জঙ্গমস্থাবরাণাং ভূতানাং মূর্তীরভিপ্রীণযন্তি, তাসু মূর্তিষু ষডভিমূর্চ্ছন্তি রসাঃ||৩৯||
सौम्याः खल्वापोऽन्तरिक्षप्रभवाः प्रकृतिशीता लघ्व्यश्चाव्यक्तरसाश्च, तास्त्वन्तरिक्षाद्भ्रश्यमाना भ्रष्टाश्च पञ्चमहाभूतगुणसमन्विता जङ्गमस्थावराणां भूतानां मूर्तीरभिप्रीणयन्ति, तासु मूर्तिषु षडभिमूर्च्छन्ति रसाः||३९||
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Adhikarana 24 (40) · Śloka 40
তেষাং ষণ্ণাং রসানাং সোমগুণাতিরেকান্মধুরো রসঃ, পৃথিব্যগ্নিভূযিষ্ঠত্বাদম্লঃ, সলিলাগ্নিভূযিষ্ঠত্বাল্লবণঃ, বায্বগ্নিভূযিষ্ঠত্বাত্ কটুকঃ, বায্বাকাশাতিরিক্তত্বাত্তিক্তঃ, পবনপৃথিবীব্যতিরেকাত্ কষায ইতি| এবমেষাং রসানাং ষট্ত্বমুপপন্নং ন্যূনাতিরেকবিশেষান্মহাভূতানাং ভূতানামিব স্থাবরজঙ্গমানাং নানাবর্ণাকৃতিবিশেষাঃ; ষডৃতুকত্বাচ্চ কালস্যোপপন্নো মহাভূতানাং ন্যূনাতিরেকবিশেষঃ||৪০||
तेषां षण्णां रसानां सोमगुणातिरेकान्मधुरो रसः, पृथिव्यग्निभूयिष्ठत्वादम्लः, सलिलाग्निभूयिष्ठत्वाल्लवणः, वाय्वग्निभूयिष्ठत्वात् कटुकः, वाय्वाकाशातिरिक्तत्वात्तिक्तः, पवनपृथिवीव्यतिरेकात् कषाय इति| एवमेषां रसानां षट्त्वमुपपन्नं न्यूनातिरेकविशेषान्महाभूतानां भूतानामिव स्थावरजङ्गमानां नानावर्णाकृतिविशेषाः; षडृतुकत्वाच्च कालस्योपपन्नो महाभूतानां न्यूनातिरेकविशेषः||४०||
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Adhikarana 25 (41) · Śloka 41
তত্রাগ্নিমারুতাত্মকা রসাঃ প্রাযেণোর্ধ্বভাজঃ, লাঘবাদুত্প্লবনত্বাচ্চ বাযোরূর্ধ্বজ্বলনত্বাচ্চ বহ্নেঃ; সলিলপৃথিব্যাত্মকাস্তু প্রাযেণাধোভাজঃ, পৃথিব্যা গুরুত্বান্নিম্নগত্বাচ্চোদকস্য; ব্যামিশ্রাত্মকাঃ পুনরুভযতোভাজঃ||৪১||
तत्राग्निमारुतात्मका रसाः प्रायेणोर्ध्वभाजः, लाघवादुत्प्लवनत्वाच्च वायोरूर्ध्वज्वलनत्वाच्च वह्नेः; सलिलपृथिव्यात्मकास्तु प्रायेणाधोभाजः, पृथिव्या गुरुत्वान्निम्नगत्वाच्चोदकस्य; व्यामिश्रात्मकाः पुनरुभयतोभाजः||४१||
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Adhikarana 26 (42) · Śloka 42
তেষাং ষণ্ণাং রসানামেকৈকস্য যথাদ্রব্যং গুণকর্মাণ্যনুব্যাখ্যাস্যামঃ||৪২||
तेषां षण्णां रसानामेकैकस्य यथाद्रव्यं गुणकर्माण्यनुव्याख्यास्यामः||४२||
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Adhikarana 27 (43) · Śloka 43
তত্র, মধুরো রসঃ শরীরসাত্ম্যাদ্রসরুধিরমাংসমেদোস্থিমজ্জৌজঃশুক্রাভিবর্ধন আযুষ্যঃ ষডিন্দ্রিযপ্রসাদনো বলবর্ণকরঃ পিত্তবিষমারুতঘ্নস্তৃষ্ণাদাহপ্রশমনস্ত্বচ্যঃ কেশ্যঃ কণ্ঠ্যো বল্যঃ প্রীণনো জীবনস্তর্পণো বৃংহণঃ স্থৈর্যকরঃ ক্ষীণক্ষতসন্ধানকরো ঘ্রাণমুখকণ্ঠৌষ্ঠজিহ্বাপ্রহ্লাদনো দাহমূর্চ্ছাপ্রশমনঃ ষট্পদপিপীলিকানামিষ্টতমঃ স্নিগ্ধঃ শীতো গুরুশ্চ| স এবঙ্গুণোঽপ্যেক এবাত্যর্থমুপযুজ্যমানঃ স্থৌল্যং মার্দবমালস্যমতিস্বপ্নং গৌরবমনন্নাভিলাষমগ্নের্দৌর্বল্যমাস্যকণ্ঠযোর্মাংসাভিবৃদ্ধিং শ্বাসকাসপ্রতিশ্যাযালসকশীতজ্বরানাহাস্যমাধুর্যবমথুসঞ্জ্ঞাস্বরপ্রণাশগলগণ্ডগণ্ডমালাশ্লীপদ- গলশোফবস্তিধমনীগলোপলেপাক্ষ্যামযাভিষ্যন্দানিত্যেবম্প্রভৃতীন্ কফজান্ বিকারানুপজনযতি (১)|৪৩|
तत्र, मधुरो रसः शरीरसात्म्याद्रसरुधिरमांसमेदोस्थिमज्जौजःशुक्राभिवर्धन आयुष्यः षडिन्द्रियप्रसादनो बलवर्णकरः पित्तविषमारुतघ्नस्तृष्णादाहप्रशमनस्त्वच्यः केश्यः कण्ठ्यो बल्यः प्रीणनो जीवनस्तर्पणो बृंहणः स्थैर्यकरः क्षीणक्षतसन्धानकरो घ्राणमुखकण्ठौष्ठजिह्वाप्रह्लादनो दाहमूर्च्छाप्रशमनः षट्पदपिपीलिकानामिष्टतमः स्निग्धः शीतो गुरुश्च| स एवङ्गुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपयुज्यमानः स्थौल्यं मार्दवमालस्यमतिस्वप्नं गौरवमनन्नाभिलाषमग्नेर्दौर्बल्यमास्यकण्ठयोर्मांसाभिवृद्धिं श्वासकासप्रतिश्यायालसकशीतज्वरानाहास्यमाधुर्यवमथुसञ्ज्ञास्वरप्रणाशगलगण्डगण्डमालाश्लीपद- गलशोफबस्तिधमनीगलोपलेपाक्ष्यामयाभिष्यन्दानित्येवम्प्रभृतीन् कफजान् विकारानुपजनयति (१)|४३|
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Adhikarana 28 (43) · Śloka 43
অম্লো রসো ভক্তং রোচযতি, অগ্নিং দীপযতি, দেহং বৃংহযতি ঊর্জযতি, মনো বোধযতি, ইন্দ্রিযাণি দৃঢীকরোতি, বলং বর্ধযতি, বাতমনুলোমযতি, হৃদযং তর্পযতি, আস্যমাস্রাবযতি, ভুক্তমপকর্ষযতি ক্লেদযতি জরযতি, প্রীণযতি, লঘুরুষ্ণঃ স্নিগ্ধশ্চ| স এবঙ্গুণোঽপ্যেক এবাত্যর্থমুপযুজ্যমানো দন্তান্ হর্ষযতি, তর্ষযতি, সম্মীলযত্যক্ষিণী, সংবেজযতি লোমানি, কফং বিলাপযতি, পিত্তমভিবর্ধযতি, রক্তং দূষযতি,মাংসং বিদহতি, কাযং শিথিলীকরোতি, ক্ষীণক্ষতকৃশদুর্বলানাং শ্বযথুমাপাদযতি, অপি চ ক্ষতাভিহতদষ্টদগ্ধভগ্নশূনপ্রচ্যুতাবমূত্রিতপরিসর্পিতমর্দিতচ্ছিন্নভিন্নবিশ্লিষ্টোদ্বিদ্ধোত্পিষ্টাদীনি পাচযত্যাগ্নেযস্বভাবাত্, পরিদহতি কণ্ঠমুরো হৃদযং চ (২)|৪৩|
अम्लो रसो भक्तं रोचयति, अग्निं दीपयति, देहं बृंहयति ऊर्जयति, मनो बोधयति, इन्द्रियाणि दृढीकरोति, बलं वर्धयति, वातमनुलोमयति, हृदयं तर्पयति, आस्यमास्रावयति, भुक्तमपकर्षयति क्लेदयति जरयति, प्रीणयति, लघुरुष्णः स्निग्धश्च| स एवङ्गुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपयुज्यमानो दन्तान् हर्षयति, तर्षयति, सम्मीलयत्यक्षिणी, संवेजयति लोमानि, कफं विलापयति, पित्तमभिवर्धयति, रक्तं दूषयति,मांसं विदहति, कायं शिथिलीकरोति, क्षीणक्षतकृशदुर्बलानां श्वयथुमापादयति, अपि च क्षताभिहतदष्टदग्धभग्नशूनप्रच्युतावमूत्रितपरिसर्पितमर्दितच्छिन्नभिन्नविश्लिष्टोद्विद्धोत्पिष्टादीनि पाचयत्याग्नेयस्वभावात्, परिदहति कण्ठमुरो हृदयं च (२)|४३|
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Adhikarana 29 (43) · Śloka 43
লবণো রসঃ পাচনঃ ক্লেদনো দীপনশ্চ্যাবনশ্ছেদনো ভেদনস্তীক্ষ্ণঃ সরো বিকাস্যধঃস্রংস্যবকাশকরো বাতহরঃ স্তম্ভবন্ধসঙ্ঘাতবিধমনঃ সর্বরসপ্রত্যনীকভূতঃ, আস্যমাস্রাবযতি, কফং বিষ্যন্দযতি, মার্গান্ বিশোধযতি, সর্বশরীরাবযবান্ মৃদূকরোতি, রোচযত্যাহারম্, আহারযোগী, নাত্যর্থং গুরুঃ স্নিগ্ধ উষ্ণশ্চ| স এবঙ্গুণোঽপ্যেক এবাত্যর্থমুপযুজ্যমানঃ পিত্তং কোপযতি, রক্তং বর্ধযতি, তর্ষযতি, মূর্চ্ছযতি , তাপযতি, দারযতি, কুষ্ণাতি মাংসানি, প্রগালযতি কুষ্ঠানি, বিষং বর্ধযতি, শোফান্ স্ফোটযতি, দন্তাংশ্চ্যাবযতি, পুংস্ত্বমুপহন্তি, ইন্দ্রিযাণ্যুপরুণদ্ভি, বলিপলিতখালিত্যমাপাদযতি, অপি চ লোহিতপিত্তাম্লপিত্তবিসর্পবাতরক্তবিচর্চিকেন্দ্রলুপ্তপ্রভৃতীন্বিকারানুপজনযতি (৩)|৪৩|
लवणो रसः पाचनः क्लेदनो दीपनश्च्यावनश्छेदनो भेदनस्तीक्ष्णः सरो विकास्यधःस्रंस्यवकाशकरो वातहरः स्तम्भबन्धसङ्घातविधमनः सर्वरसप्रत्यनीकभूतः, आस्यमास्रावयति, कफं विष्यन्दयति, मार्गान् विशोधयति, सर्वशरीरावयवान् मृदूकरोति, रोचयत्याहारम्, आहारयोगी, नात्यर्थं गुरुः स्निग्ध उष्णश्च| स एवङ्गुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपयुज्यमानः पित्तं कोपयति, रक्तं वर्धयति, तर्षयति, मूर्च्छयति , तापयति, दारयति, कुष्णाति मांसानि, प्रगालयति कुष्ठानि, विषं वर्धयति, शोफान् स्फोटयति, दन्तांश्च्यावयति, पुंस्त्वमुपहन्ति, इन्द्रियाण्युपरुणद्भि, वलिपलितखालित्यमापादयति, अपि च लोहितपित्ताम्लपित्तविसर्पवातरक्तविचर्चिकेन्द्रलुप्तप्रभृतीन्विकारानुपजनयति (३)|४३|
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Adhikarana 30 (43) · Śloka 43
কটুকো রসো বক্ত্রং শোধযতি, অগ্নিং দীপযতি, ভুক্তং শোষযতি, ঘ্রাণমাস্রাবযতি, চক্ষুর্বিরেচযতি, স্ফুটীকরোতীন্দ্রিযাণি, অলসকশ্বযথূপচযোদর্দাভিষ্যন্দস্নেহস্বেদক্লেদমলানুপহন্তি, রোচযত্যশনং, কণ্ডূর্বিনাশযতি , ব্রণানবসাদযতি, ক্রিমীন্ হিনস্তি, মাংসং বিলিখতি, শোণিতসঙ্ঘাতং ভিনত্তি, বন্ধাংশ্ছিনত্তি, মার্গান্ বিবৃণোতি, শ্লেষ্মাণং শমযতি, লঘুরুষ্ণো রূক্ষশ্চ| স এবঙ্গুণোঽপ্যেক এবাত্যর্থমুপযুজ্যমানো বিপাকপ্রভাবাত্ পুংস্ত্বমুপহন্তি, রসবীর্যপ্রভাবান্মোহযন্তি, গ্লাপযতি, সাদযতি, কর্শযতি, মূর্চ্ছযতি, নমযতি, তমযতি, ভ্রমযতি, কণ্ঠং পরিদহতি, শরীরতাপমুপজনযতি, বলং ক্ষিণোতি, তৃষ্ণাং জনযতি; অপি চ বায্বগ্নিগুণবাহুল্যাদ্ভ্রমদবথুকম্পতোদভেদৈশ্চরণভুজপার্শ্বপৃষ্ঠপ্রভৃতিষু মারুতজান্ বিকারানুপজনযতি (৪); তিক্তো রসঃ স্বযমরোচিষ্ণুরপ্যরোচকঘ্নো বিষঘ্নঃ ক্রিমিঘ্নো মূর্চ্ছাদাহকণ্ডূকুষ্ঠতৃষ্ণাপ্রশমনস্ত্বঙ্মাংসযোঃ স্থিরীকরণো জ্বরঘ্নো দীপনঃ পাচনঃ স্তন্যশোধনো লেখনঃ ক্লেদমেদোবসামজ্জলসীকাপূযস্বেদমূত্রপুরীষপিত্তশ্লেষ্মোপশোষণো রূক্ষঃ শীতো লঘুশ্চ| স এবঙ্গুণোঽপ্যেক এবাত্যর্থমুপযুজ্যমানো রৌক্ষ্যাত্খরবিষদস্বভাবাচ্চ রসরুধিরমাংসমেদোস্থিমজ্জশুক্রাণ্যুচ্ছোষযতি, স্রোতসাং খরত্বমুপপাদযতি, বলমাদত্তে, কর্শযতি, গ্লপযতি, মোহযতি, ভ্রমযতি, বদনমুপশোষযতি, অপরাংশ্চ বাতবিকারানুপজনযতি (৫); কষাযো রসঃ সংশমনঃ সঙ্গ্রাহী সন্ধানকরঃ পীডনো রোপণঃ শোষণঃ স্তম্ভনঃ শ্লেষ্মরক্তপিত্তপ্রশমনঃ শরীরক্লেদস্যোপযোক্তা রূক্ষঃ শীতোঽলঘুশ্চ| স এবঙ্গুণোঽপ্যেক এবাত্যর্থমুপযুজ্যমান আস্যং শোষযতি, হৃদযং পীডযতি, উদরমাধ্মাপযতি, বাচং নিগৃহ্ণাতি, স্রোতাংস্যববধ্নাতি, শ্যাবত্বমাপাদযতি, পুংস্ত্বমুপহন্তি, বিষ্টভ্য জরাং গচ্ছতি, বাতমূত্রপুরীষরেতাংস্যবগৃহ্ণাতি, কর্শযতি, গ্লপযতি, তর্ষযতি, স্তম্ভযতি, খরবিশদরূক্ষত্বাত্ পক্ষবধগ্রহাপতানকার্দিতপ্রভৃতীংশ্চ বাতবিকারানুপজনযতি||৪৩||
कटुको रसो वक्त्रं शोधयति, अग्निं दीपयति, भुक्तं शोषयति, घ्राणमास्रावयति, चक्षुर्विरेचयति, स्फुटीकरोतीन्द्रियाणि, अलसकश्वयथूपचयोदर्दाभिष्यन्दस्नेहस्वेदक्लेदमलानुपहन्ति, रोचयत्यशनं, कण्डूर्विनाशयति , व्रणानवसादयति, क्रिमीन् हिनस्ति, मांसं विलिखति, शोणितसङ्घातं भिनत्ति, बन्धांश्छिनत्ति, मार्गान् विवृणोति, श्लेष्माणं शमयति, लघुरुष्णो रूक्षश्च| स एवङ्गुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपयुज्यमानो विपाकप्रभावात् पुंस्त्वमुपहन्ति, रसवीर्यप्रभावान्मोहयन्ति, ग्लापयति, सादयति, कर्शयति, मूर्च्छयति, नमयति, तमयति, भ्रमयति, कण्ठं परिदहति, शरीरतापमुपजनयति, बलं क्षिणोति, तृष्णां जनयति; अपि च वाय्वग्निगुणबाहुल्याद्भ्रमदवथुकम्पतोदभेदैश्चरणभुजपार्श्वपृष्ठप्रभृतिषु मारुतजान् विकारानुपजनयति (४); तिक्तो रसः स्वयमरोचिष्णुरप्यरोचकघ्नो विषघ्नः क्रिमिघ्नो मूर्च्छादाहकण्डूकुष्ठतृष्णाप्रशमनस्त्वङ्मांसयोः स्थिरीकरणो ज्वरघ्नो दीपनः पाचनः स्तन्यशोधनो लेखनः क्लेदमेदोवसामज्जलसीकापूयस्वेदमूत्रपुरीषपित्तश्लेष्मोपशोषणो रूक्षः शीतो लघुश्च| स एवङ्गुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपयुज्यमानो रौक्ष्यात्खरविषदस्वभावाच्च रसरुधिरमांसमेदोस्थिमज्जशुक्राण्युच्छोषयति, स्रोतसां खरत्वमुपपादयति, बलमादत्ते, कर्शयति, ग्लपयति, मोहयति, भ्रमयति, वदनमुपशोषयति, अपरांश्च वातविकारानुपजनयति (५); कषायो रसः संशमनः सङ्ग्राही सन्धानकरः पीडनो रोपणः शोषणः स्तम्भनः श्लेष्मरक्तपित्तप्रशमनः शरीरक्लेदस्योपयोक्ता रूक्षः शीतोऽलघुश्च| स एवङ्गुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपयुज्यमान आस्यं शोषयति, हृदयं पीडयति, उदरमाध्मापयति, वाचं निगृह्णाति, स्रोतांस्यवबध्नाति, श्यावत्वमापादयति, पुंस्त्वमुपहन्ति, विष्टभ्य जरां गच्छति, वातमूत्रपुरीषरेतांस्यवगृह्णाति, कर्शयति, ग्लपयति, तर्षयति, स्तम्भयति, खरविशदरूक्षत्वात् पक्षवधग्रहापतानकार्दितप्रभृतींश्च वातविकारानुपजनयति||४३||
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Adhikarana 31 (44) · Śloka 44
ইত্যেবমেতে ষড্রসাঃ পৃথক্ত্বেনৈকত্বেন বা মাত্রশঃ সম্যগুপযুজ্যমানা উপকারায ভবন্ত্যধ্যাত্মলোকস্য, অপকারকরাঃ পুনরতোঽন্যথা ভবন্ত্যুপযুজ্যমানাঃ; তান্ বিদ্বানুপকারার্থমেব মাত্রশঃ সম্যগুপযোজযেদিতি||৪৪||
इत्येवमेते षड्रसाः पृथक्त्वेनैकत्वेन वा मात्रशः सम्यगुपयुज्यमाना उपकाराय भवन्त्यध्यात्मलोकस्य, अपकारकराः पुनरतोऽन्यथा भवन्त्युपयुज्यमानाः; तान् विद्वानुपकारार्थमेव मात्रशः सम्यगुपयोजयेदिति||४४||
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Adhikarana 32 (45) · Śloka 45
ভবন্তি চাত্র- শীতং বীর্যেণ যদ্দ্রব্যং মধুরং রসপাকযোঃ| তযোরম্লং যদুষ্ণং চ যদ্দ্রব্যং কটুকং তযোঃ||৪৫||
भवन्ति चात्र- शीतं वीर्येण यद्द्रव्यं मधुरं रसपाकयोः| तयोरम्लं यदुष्णं च यद्द्रव्यं कटुकं तयोः||४५||
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Adhikarana 33 (46-47) · Śloka 47
তেষাং রসোপদেশেন নির্দেশ্যো গুণসঙ্গ্রহঃ| বীর্যতোঽবিপরীতানাং পাকতশ্চোপদেক্ষ্যতে||৪৬|| যথা পযো যথা সর্পির্যথা বা চব্যচিত্রকৌ| এবমাদীনি চান্যানি নির্দিশেদ্রসতো ভিষক্||৪৭||
तेषां रसोपदेशेन निर्देश्यो गुणसङ्ग्रहः| वीर्यतोऽविपरीतानां पाकतश्चोपदेक्ष्यते||४६|| यथा पयो यथा सर्पिर्यथा वा चव्यचित्रकौ| एवमादीनि चान्यानि निर्दिशेद्रसतो भिषक्||४७||
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Adhikarana 34 (48-49) · Śloka 49
মধুরং কিঞ্চিদুষ্ণং স্যাত্ কষাযং তিক্তমেব চ| যথা মহত্পঞ্চমূলং যথাঽব্জানূপমামিষম্||৪৮|| লবণং সৈন্ধবং নোষ্ণমম্লমামলকং তথা| অর্কাগুরুগুডূচীনাং তিক্তানামুষ্ণমুচ্যতে||৪৯||
मधुरं किञ्चिदुष्णं स्यात् कषायं तिक्तमेव च| यथा महत्पञ्चमूलं यथाऽब्जानूपमामिषम्||४८|| लवणं सैन्धवं नोष्णमम्लमामलकं तथा| अर्कागुरुगुडूचीनां तिक्तानामुष्णमुच्यते||४९||
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Adhikarana 35 (50-52) · Śloka 52
কিঞ্চিদম্লং হি সঙ্গ্রাহি কিঞ্চিদম্লং ভিনত্তি চ| যথা কপিত্থং সঙ্গ্রাহি ভেদি চামলকং তথা||৫০|| পিপ্পলী নাগরং বৃষ্যং কটু চাবৃষ্যমুচ্যতে| কষাযঃ স্তম্ভনঃ শীতঃ সোঽভযাযামতোঽন্যথা||৫১|| তস্মাদ্রসোপদেশেন ন সর্বং দ্রব্যামাদিশেত্| দৃষ্টং তুল্যরসেঽপ্যেবং দ্রব্যে দ্রব্যে গুণান্তরম্||৫২||
किञ्चिदम्लं हि सङ्ग्राहि किञ्चिदम्लं भिनत्ति च| यथा कपित्थं सङ्ग्राहि भेदि चामलकं तथा||५०|| पिप्पली नागरं वृष्यं कटु चावृष्यमुच्यते| कषायः स्तम्भनः शीतः सोऽभयायामतोऽन्यथा||५१|| तस्माद्रसोपदेशेन न सर्वं द्रव्यामादिशेत्| दृष्टं तुल्यरसेऽप्येवं द्रव्ये द्रव्ये गुणान्तरम्||५२||
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Adhikarana 36 (53-56) · Śloka 57
রৌক্ষ্যাত্ কষাযো রূক্ষাণামুত্তমো মধ্যমঃ কটুঃ| তিক্তোঽবরস্তথোষ্ণানামুষ্ণত্বাল্লবণঃ পরঃ||৫৩|| মধ্যোঽম্লঃ কটুকশ্চান্ত্যঃ স্নিগ্ধানাং মধুরঃ পরঃ| মধ্যোঽম্লো লবণশ্চান্ত্যো রসঃ স্নেহান্নিরুচ্যতে||৫৪|| মধ্যোত্কৃষ্টাবরাঃ শৈত্যাত্ কষাযস্বাদুতিক্তকাঃ | স্বাদুর্গুরুত্বাদধিকঃ কষাযাল্লবণোঽবরঃ||৫৫|| অম্লাত্ কটুস্ততস্তিক্তো লঘুত্বাদুত্তমোত্তমঃ| কেচিল্লঘূনামবরমিচ্ছন্তি লবণং রসম্||৫৬|| গৌরবে লাঘবে চৈব সোঽবরস্তূভযোরপি|৫৭|
रौक्ष्यात् कषायो रूक्षाणामुत्तमो मध्यमः कटुः| तिक्तोऽवरस्तथोष्णानामुष्णत्वाल्लवणः परः||५३|| मध्योऽम्लः कटुकश्चान्त्यः स्निग्धानां मधुरः परः| मध्योऽम्लो लवणश्चान्त्यो रसः स्नेहान्निरुच्यते||५४|| मध्योत्कृष्टावराः शैत्यात् कषायस्वादुतिक्तकाः | स्वादुर्गुरुत्वादधिकः कषायाल्लवणोऽवरः||५५|| अम्लात् कटुस्ततस्तिक्तो लघुत्वादुत्तमोत्तमः| केचिल्लघूनामवरमिच्छन्ति लवणं रसम्||५६|| गौरवे लाघवे चैव सोऽवरस्तूभयोरपि|५७|
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Adhikarana 37 (57-58) · Śloka 58
পরং চাতো বিপাকানাং লক্ষণং সম্প্রবক্ষ্যতে||৫৭|| কটুতিক্তকষাযাণাং বিপাকঃ প্রাযশঃ কটুঃ| অম্লোঽম্লং পচ্যতে স্বাদুর্মধুরং লবণস্তথা||৫৮||
परं चातो विपाकानां लक्षणं सम्प्रवक्ष्यते||५७|| कटुतिक्तकषायाणां विपाकः प्रायशः कटुः| अम्लोऽम्लं पच्यते स्वादुर्मधुरं लवणस्तथा||५८||
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Adhikarana 38 (59-60) · Śloka 60
মধুরো লবণাম্লৌ চ স্নিগ্ধভাবাত্ত্রযো রসাঃ| বাতমূত্রপুরীষাণাং প্রাযো মোক্ষে সুখা মতাঃ||৫৯|| কটুতিক্তকষাযাস্তু রূক্ষভাবাত্ত্রযো রসাঃ| দুঃখায মোক্ষে দৃশ্যন্তে বাতবিণ্মূত্ররেতসাম্||৬০||
मधुरो लवणाम्लौ च स्निग्धभावात्त्रयो रसाः| वातमूत्रपुरीषाणां प्रायो मोक्षे सुखा मताः||५९|| कटुतिक्तकषायास्तु रूक्षभावात्त्रयो रसाः| दुःखाय मोक्षे दृश्यन्ते वातविण्मूत्ररेतसाम्||६०||
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Adhikarana 39 (61-62) · Śloka 62
শুক্রহা বদ্ধবিণ্মূত্রো বিপাকো বাতলঃ কটুঃ| মধুরঃ সৃষ্টবিণ্মূত্রো বিপাকঃ কফশুক্রলঃ||৬১|| পিত্তকৃত্ সৃষ্টবিণ্মূত্রঃ পাকোঽম্লঃ শুক্রনাশনঃ| তেষাং গুরুঃ স্যান্মধুরঃ কটুকাম্লাবতোঽন্যথা||৬২||
शुक्रहा बद्धविण्मूत्रो विपाको वातलः कटुः| मधुरः सृष्टविण्मूत्रो विपाकः कफशुक्रलः||६१|| पित्तकृत् सृष्टविण्मूत्रः पाकोऽम्लः शुक्रनाशनः| तेषां गुरुः स्यान्मधुरः कटुकाम्लावतोऽन्यथा||६२||
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Adhikarana 40 (63) · Śloka 63
বিপাকলক্ষণস্যাল্পমধ্যভূযিষ্ঠতাং প্রতি| দ্রব্যাণাং গুণবৈশেষ্যাত্তত্র তত্রোপলক্ষযেত্||৬৩||
विपाकलक्षणस्याल्पमध्यभूयिष्ठतां प्रति| द्रव्याणां गुणवैशेष्यात्तत्र तत्रोपलक्षयेत्||६३||
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Adhikarana 41 (64-65) · Śloka 65
মৃদুতীক্ষ্ণগুরুলঘুস্নিগ্ধরূক্ষোষ্ণশীতলম্| বীর্যমষ্টবিধং কেচিত্, কেচিদ্দ্বিবিধমাস্থিতাঃ||৬৪|| শীতোষ্ণমিতি, বীর্যং তু ক্রিযতে যেন যা ক্রিযা| নাবীর্যং কুরুতে কিঞ্চিত্ সর্বা বীর্যকৃতা ক্রিযা||৬৫||
मृदुतीक्ष्णगुरुलघुस्निग्धरूक्षोष्णशीतलम्| वीर्यमष्टविधं केचित्, केचिद्द्विविधमास्थिताः||६४|| शीतोष्णमिति, वीर्यं तु क्रियते येन या क्रिया| नावीर्यं कुरुते किञ्चित् सर्वा वीर्यकृता क्रिया||६५||
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Adhikarana 42 (66) · Śloka 66
রসো নিপাতে দ্রব্যাণাং, বিপাকঃ কর্মনিষ্ঠযা| বীর্যং যাবদধীবাসান্নিপাতাচ্চোপলভ্যতে||৬৬||
रसो निपाते द्रव्याणां, विपाकः कर्मनिष्ठया| वीर्यं यावदधीवासान्निपाताच्चोपलभ्यते||६६||
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Adhikarana 43 (67) · Śloka 67
রসবীর্যবিপাকানাং সামান্যং যত্র লক্ষ্যতে| বিশেষঃ কর্মণাং চৈব প্রভাবস্তস্য স স্মৃতঃ||৬৭||
रसवीर्यविपाकानां सामान्यं यत्र लक्ष्यते| विशेषः कर्मणां चैव प्रभावस्तस्य स स्मृतः||६७||
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Adhikarana 44 (68-72) · Śloka 73
কটুকঃ কটুকঃ পাকে বীর্যোষ্ণশ্চিত্রকো মতঃ| তদ্বদ্দন্তী প্রভাবাত্তু বিরেচযতি মানবম্ ||৬৮|| বিষং বিষঘ্নমুক্তং যত্ প্রভাবস্তত্র কারণম্| ঊর্ধ্বানুলোমিকং যচ্চ তত্ প্রভাবপ্রভাবিতম্||৬৯|| মণীনাং ধারণীযানাং কর্ম যদ্বিবিধাত্মকম্| তত্ প্রভাবকৃতং তেষাং প্রভাবোঽচিন্ত্য উচ্যতে ||৭০|| সম্যগ্বিপাকবীর্যাণি প্রভাবশ্চাপ্যুদাহৃতঃ| কিঞ্চিদ্রসেন কুরুতে কর্ম বীর্যেণ চাপরম্||৭১|| দ্রব্যং গুণেন পাকেন প্রভাবেণ চ কিঞ্চন| রসং বিপাকস্তৌ বীর্যং প্রভাবস্তানপোহতি||৭২|| বলসাম্যে রসাদীনামিতি নৈসর্গিকং বলম্|৭৩|
कटुकः कटुकः पाके वीर्योष्णश्चित्रको मतः| तद्वद्दन्ती प्रभावात्तु विरेचयति मानवम् ||६८|| विषं विषघ्नमुक्तं यत् प्रभावस्तत्र कारणम्| ऊर्ध्वानुलोमिकं यच्च तत् प्रभावप्रभावितम्||६९|| मणीनां धारणीयानां कर्म यद्विविधात्मकम्| तत् प्रभावकृतं तेषां प्रभावोऽचिन्त्य उच्यते ||७०|| सम्यग्विपाकवीर्याणि प्रभावश्चाप्युदाहृतः| किञ्चिद्रसेन कुरुते कर्म वीर्येण चापरम्||७१|| द्रव्यं गुणेन पाकेन प्रभावेण च किञ्चन| रसं विपाकस्तौ वीर्यं प्रभावस्तानपोहति||७२|| बलसाम्ये रसादीनामिति नैसर्गिकं बलम्|७३|
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Adhikarana 45 (74-79) · Śloka 79
ষণ্ণাং রসানাং বিজ্ঞানমুপদেক্ষ্যাম্যতঃ পরম্||৭৩|| স্নেহনপ্রীণনাহ্লাদমার্দবৈরুপলভ্যতে| মুখস্থো মধুরশ্চাস্যং ব্যাপ্নুবঁল্লিম্পতীব চ||৭৪|| দন্তহর্ষান্মুখাস্রাবাত্ স্বেদনান্মুখবোধনাত্| বিদাহাচ্চাস্যকণ্ঠস্য প্রাশ্যৈবাম্লং রসং বদেত্||৭৫|| প্রলীযন্ ক্লেদবিষ্যন্দমার্দবং কুরুতে মুখে| যঃ শীঘ্রং লবণো জ্ঞেযঃ স বিদাহান্মুখস্য চ||৭৬|| সংবেজযেদ্যো রসানাং নিপাতে তুদতীব চ| বিদহন্মুখনাসাক্ষি সংস্রাবী স কটুঃ স্মৃতঃ||৭৭|| প্রতিহন্তি নিপাতে যো রসনং স্বদতে ন চ| স তিক্তো মুখবৈশদ্যশোষপ্রহ্লাদকারকঃ ||৭৮|| বৈশদ্যস্তম্ভজাড্যৈর্যো রসনং যোজযেদ্রসঃ| বধ্নাতীব চ যঃ কণ্ঠং কষাযঃ স বিকাস্যপি||৭৯||
षण्णां रसानां विज्ञानमुपदेक्ष्याम्यतः परम्||७३|| स्नेहनप्रीणनाह्लादमार्दवैरुपलभ्यते| मुखस्थो मधुरश्चास्यं व्याप्नुवँल्लिम्पतीव च||७४|| दन्तहर्षान्मुखास्रावात् स्वेदनान्मुखबोधनात्| विदाहाच्चास्यकण्ठस्य प्राश्यैवाम्लं रसं वदेत्||७५|| प्रलीयन् क्लेदविष्यन्दमार्दवं कुरुते मुखे| यः शीघ्रं लवणो ज्ञेयः स विदाहान्मुखस्य च||७६|| संवेजयेद्यो रसानां निपाते तुदतीव च| विदहन्मुखनासाक्षि संस्रावी स कटुः स्मृतः||७७|| प्रतिहन्ति निपाते यो रसनं स्वदते न च| स तिक्तो मुखवैशद्यशोषप्रह्लादकारकः ||७८|| वैशद्यस्तम्भजाड्यैर्यो रसनं योजयेद्रसः| बध्नातीव च यः कण्ठं कषायः स विकास्यपि||७९||
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Adhikarana 46 (80) · Śloka 80
এবমুক্তবন্তং ভগবন্তমাত্রেযমগ্নিবেশ উবাচ- ভগবন্! শ্রুতমেতদবিতথমর্থসম্পদ্যুক্তং ভগবতো যথাবদ্দ্রব্যগুণকর্মাধিকারে বচঃ, পরং ত্বাহারবিকারাণাং বৈরোধিকানাং লক্ষণমনতিসঙ্ক্ষেপেণোপদিশ্যমানং শুশ্রূষামহ ইতি||৮০||
एवमुक्तवन्तं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच- भगवन्! श्रुतमेतदवितथमर्थसम्पद्युक्तं भगवतो यथावद्द्रव्यगुणकर्माधिकारे वचः, परं त्वाहारविकाराणां वैरोधिकानां लक्षणमनतिसङ्क्षेपेणोपदिश्यमानं शुश्रूषामह इति||८०||
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Adhikarana 47 (81) · Śloka 81
তমুবাচ ভগবানাত্রেযঃ- দেহধাতুপ্রত্যনীকভূতানি দ্রব্যাণি দেহধাতুভির্বিরোধমাপদ্যন্তে; পরস্পরগুণবিরুদ্ধানি কানিচিত্, কানিচিত্ সংযোগাত্, সংস্কারাদপরাণি, দেশকালমাত্রাদিভিশ্চাপরাণি, তথা স্বভাবাদপরাণি||৮১||
तमुवाच भगवानात्रेयः- देहधातुप्रत्यनीकभूतानि द्रव्याणि देहधातुभिर्विरोधमापद्यन्ते; परस्परगुणविरुद्धानि कानिचित्, कानिचित् संयोगात्, संस्कारादपराणि, देशकालमात्रादिभिश्चापराणि, तथा स्वभावादपराणि||८१||
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Adhikarana 48 (82-83) · Śloka 83
তত্র যান্যাহারমধিকৃত্য ভূযিষ্ঠমুপযুজ্যন্তে তেষামেকদেশং বৈরোধিকমধিকৃত্যোপদেক্ষ্যামঃ- ন মত্স্যান্ পযসা সহাভ্যবহরেত্, উভযং হ্যেতন্মধুরং মধুরবিপাকং মহাভিষ্যন্দি শীতোষ্ণত্বাদ্বিরুদ্ধবীর্যং বিরুদ্ধবীর্যত্বাচ্ছোণিতপ্রদূষণায মহাভিষ্যন্দিত্বান্মার্গোপরোধায চ||৮২|| তন্নিশম্যাত্রেযবচনমনু ভদ্রকাপ্যোঽগ্নিবেশমুবাচ- সর্বানেব মত্স্যান্ পযসা সহাভ্যবহরেদন্যত্রৈকস্মাচ্চিলিচিমাত্, স পুনঃ শকলী লোহিতনযনঃ সর্বতো লোহিতরাজী রোহিতাকারঃ প্রাযো ভূমৌ চরতি, তং চেত্ পযসা সহাভ্যবহরেন্নিঃসংশযং শোণিতজানাং বিবন্ধজানাং চ ব্যাধীনামন্যতমমথবা মরণং প্রাপ্নুযাদিতি||৮৩||
तत्र यान्याहारमधिकृत्य भूयिष्ठमुपयुज्यन्ते तेषामेकदेशं वैरोधिकमधिकृत्योपदेक्ष्यामः- न मत्स्यान् पयसा सहाभ्यवहरेत्, उभयं ह्येतन्मधुरं मधुरविपाकं महाभिष्यन्दि शीतोष्णत्वाद्विरुद्धवीर्यं विरुद्धवीर्यत्वाच्छोणितप्रदूषणाय महाभिष्यन्दित्वान्मार्गोपरोधाय च||८२|| तन्निशम्यात्रेयवचनमनु भद्रकाप्योऽग्निवेशमुवाच- सर्वानेव मत्स्यान् पयसा सहाभ्यवहरेदन्यत्रैकस्माच्चिलिचिमात्, स पुनः शकली लोहितनयनः सर्वतो लोहितराजी रोहिताकारः प्रायो भूमौ चरति, तं चेत् पयसा सहाभ्यवहरेन्निःसंशयं शोणितजानां विबन्धजानां च व्याधीनामन्यतममथवा मरणं प्राप्नुयादिति||८३||
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Adhikarana 49 (84) · Śloka 84
নেতি ভগবানাত্রেযঃ- সর্বানেব মত্স্যান্ন পযসা সহাভ্যবহরেদ্বিশেষতস্তু চিলিচিমং, স হি মহাভিষ্যন্দিত্বাত্ স্থূললক্ষণতরানেতান্ ব্যাধীনুপজনযত্যামবিষমুদীরযতি চ| গ্রাম্যানূপৌদকপিশিতানি চ মধুতিলগুডপযোমাষমূলকবিসৈর্বিরূঢধান্যৈর্বা নৈকধ্যমদ্যাত্, তন্মূলং হি বাধির্যান্ধ্যবেপথুজাড্যকলমূকতামৈণ্মিণ্যমথবা মরণমাপ্নোতি| ন পৌষ্করং রোহিণীকং শাকং কপোতান্ বা সর্ষপতৈলভ্রষ্টান্মধুপযোভ্যাং সহাভ্যবহরেত্, তন্মূলং হি শোণিতাভিষ্যন্দধমনীপ্রবি(তি)চযাপস্মারশঙ্খকগলগণ্ডরোহিণীনামন্যতমং প্রাপ্নোত্যথবা মরণমিতি| ন মূলকলশুনকৃষ্ণগন্ধার্জকসুমুখসুরসাদীনি ভক্ষযিত্বা পযঃ সেব্যং, কুষ্ঠাবাধভযাত্| ন জাতুকশাকং ন নিকুচং পক্বং মধুপযোভ্যাং সহোপযোজ্যম্, এতদ্ধি মরণাযাথবা বলবর্ণতেজোবীর্যোপরোধাযালঘুব্যাধযে ষাণ্ঢ্যায চেতি| তদেব নিকুচং পক্বং ন মাষসূপগুডসর্পির্ভিঃ সহোপযোজ্যং বৈরোধিকত্বাত্| তথাঽঽম্রাম্রাতকমাতুলুঙ্গনিকুচকরমর্দমোচদন্তশঠবদরকোশাম্রভব্যজাম্ববকপিত্থতিন্তিডীক- পারাবতাক্ষোডপনসনালিকেরদাডিমামলকান্যেবম্প্রকারাণি চান্যানি দ্রব্যাণি সর্বং চাম্লং দ্রবমদ্রবং চ পযসা সহ বিরুদ্ধম্| তথা কঙ্গুবনকমকুষ্ঠককুলত্থমাষনিষ্পাবাঃ পযসা সহ বিরুদ্ধাঃ| পদ্মোত্তরিকাশাকং শার্করো মৈরেযো মধু চ সহোপযুক্তং বিরুদ্ধং বাতং চাতিকোপযতি| হারিদ্রকঃ সর্ষপতৈলভৃষ্টো বিরুদ্ধঃ পিত্তং চাতিকোপযতি| পাযসো মন্থানুপানো বিরুদ্ধঃ শ্লেষ্মাণং চাতিকোপযতি| উপোদিকা তিলকল্কসিদ্ধা হেতুরতীসারস্য| বলাকা বারুণ্যা সহ কুল্মাষৈরপি বিরুদ্ধা, সৈব শূকরবসাপরিভৃষ্টা সদ্যো ব্যাপাদযতি| মযূরমাংসমেরণ্ডসীসকাবসক্তমেরণ্ডাগ্নিপ্লুষ্টমেরণ্ডতৈলযুক্তং সদ্যো ব্যাপাদযতি| হারিদ্রকমাংসং হারিদ্রসীসকাবসক্তং হারিদ্রাগ্নিপ্লুষ্টং সদ্যো ব্যাপাদযতি; তদেব ভস্মপাংশুপরিধ্বস্তং সক্ষৌদ্রং সদ্যো মরণায| মত্স্যনিস্তালনসিদ্ধাঃ পিপ্পল্যস্তথা কাকমাচী মধু চ মরণায| মধু চোষ্ণমুষ্ণার্তস্য চ মধু মরণায| মধুসর্পিষী সমঘৃতে, মধু বারি চান্তরিক্ষং সমঘৃতং, মধু পুষ্করবীজং, মধু পীত্বোষ্ণোদকং, ভল্লাতকোষ্ণোদকং, তক্রসিদ্ধঃ কম্পিল্লকঃ, পর্যুষিতা কাকমাচী, অঙ্গারশূল্যো ভাসশ্চেতি বিরুদ্ধানি| ইত্যেতদ্যথাপ্রশ্নমভিনির্দিষ্টং ভবতীতি||৮৪||
नेति भगवानात्रेयः- सर्वानेव मत्स्यान्न पयसा सहाभ्यवहरेद्विशेषतस्तु चिलिचिमं, स हि महाभिष्यन्दित्वात् स्थूललक्षणतरानेतान् व्याधीनुपजनयत्यामविषमुदीरयति च| ग्राम्यानूपौदकपिशितानि च मधुतिलगुडपयोमाषमूलकबिसैर्विरूढधान्यैर्वा नैकध्यमद्यात्, तन्मूलं हि बाधिर्यान्ध्यवेपथुजाड्यकलमूकतामैण्मिण्यमथवा मरणमाप्नोति| न पौष्करं रोहिणीकं शाकं कपोतान् वा सर्षपतैलभ्रष्टान्मधुपयोभ्यां सहाभ्यवहरेत्, तन्मूलं हि शोणिताभिष्यन्दधमनीप्रवि(ति)चयापस्मारशङ्खकगलगण्डरोहिणीनामन्यतमं प्राप्नोत्यथवा मरणमिति| न मूलकलशुनकृष्णगन्धार्जकसुमुखसुरसादीनि भक्षयित्वा पयः सेव्यं, कुष्ठाबाधभयात्| न जातुकशाकं न निकुचं पक्वं मधुपयोभ्यां सहोपयोज्यम्, एतद्धि मरणायाथवा बलवर्णतेजोवीर्योपरोधायालघुव्याधये षाण्ढ्याय चेति| तदेव निकुचं पक्वं न माषसूपगुडसर्पिर्भिः सहोपयोज्यं वैरोधिकत्वात्| तथाऽऽम्राम्रातकमातुलुङ्गनिकुचकरमर्दमोचदन्तशठबदरकोशाम्रभव्यजाम्बवकपित्थतिन्तिडीक- पारावताक्षोडपनसनालिकेरदाडिमामलकान्येवम्प्रकाराणि चान्यानि द्रव्याणि सर्वं चाम्लं द्रवमद्रवं च पयसा सह विरुद्धम्| तथा कङ्गुवनकमकुष्ठककुलत्थमाषनिष्पावाः पयसा सह विरुद्धाः| पद्मोत्तरिकाशाकं शार्करो मैरेयो मधु च सहोपयुक्तं विरुद्धं वातं चातिकोपयति| हारिद्रकः सर्षपतैलभृष्टो विरुद्धः पित्तं चातिकोपयति| पायसो मन्थानुपानो विरुद्धः श्लेष्माणं चातिकोपयति| उपोदिका तिलकल्कसिद्धा हेतुरतीसारस्य| बलाका वारुण्या सह कुल्माषैरपि विरुद्धा, सैव शूकरवसापरिभृष्टा सद्यो व्यापादयति| मयूरमांसमेरण्डसीसकावसक्तमेरण्डाग्निप्लुष्टमेरण्डतैलयुक्तं सद्यो व्यापादयति| हारिद्रकमांसं हारिद्रसीसकावसक्तं हारिद्राग्निप्लुष्टं सद्यो व्यापादयति; तदेव भस्मपांशुपरिध्वस्तं सक्षौद्रं सद्यो मरणाय| मत्स्यनिस्तालनसिद्धाः पिप्पल्यस्तथा काकमाची मधु च मरणाय| मधु चोष्णमुष्णार्तस्य च मधु मरणाय| मधुसर्पिषी समघृते, मधु वारि चान्तरिक्षं समघृतं, मधु पुष्करबीजं, मधु पीत्वोष्णोदकं, भल्लातकोष्णोदकं, तक्रसिद्धः कम्पिल्लकः, पर्युषिता काकमाची, अङ्गारशूल्यो भासश्चेति विरुद्धानि| इत्येतद्यथाप्रश्नमभिनिर्दिष्टं भवतीति||८४||
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Adhikarana 50 (85) · Śloka 85
ভবন্তি চাত্র শ্লোকাঃ- যত্ কিঞ্চিদ্দোষমাস্রাব্য ন নির্হরতি কাযতঃ| আহারজাতং তত্ সর্বমহিতাযোপপদ্যতে||৮৫||
भवन्ति चात्र श्लोकाः- यत् किञ्चिद्दोषमास्राव्य न निर्हरति कायतः| आहारजातं तत् सर्वमहितायोपपद्यते||८५||
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Adhikarana 51 (86-101) · Śloka 101
যচ্চাপি দেশকালাগ্নিমাত্রাসাত্ম্যানিলাদিভিঃ| সংস্কারতো বীর্যতশ্চ কোষ্ঠাবস্থাক্রমৈরপি||৮৬|| পরিহারোপচারাভ্যাং পাকাত্ সংযোগতোঽপি চ| বিরুদ্ধং তচ্চ ন হিতং হৃত্সম্পদ্বিধিভিশ্চ যত্||৮৭|| বিরুদ্ধং দেশতস্তাবদ্রূক্ষতীক্ষ্ণাদি ধন্বনি| আনূপে স্নিগ্ধশীতাদি ভেষজং যন্নিষেব্যতে||৮৮|| কালতোঽপি বিরুদ্ধং যচ্ছীতরূক্ষাদিসেবনম্| শীতে কালে, তথোষ্ণে চ কটুকোষ্ণাদিসেবনম্||৮৯|| বিরুদ্ধমনলে তদ্বদন্নপানং চতুর্বিধে| মধুসর্পিঃ সমধৃতং মাত্রযা তদ্বিরুধ্যতে||৯০|| কটুকোষ্ণাদিসাত্ম্যস্য স্বাদুশীতাদিসেবনম্| যত্তত্ সাত্ম্যবিরুদ্ধং তু বিরুদ্ধং ত্বনিলাদিভিঃ||৯১|| যা সমানগুণাভ্যাসবিরুদ্ধান্নৌষধক্রিযা| সংস্কারতো বিরুদ্ধং তদ্যদ্ভোজ্যং বিষবদ্ভবেত্||৯২|| এরণ্ডসীসকাসক্তং শিখিমাংসং যথৈব হি| বিরুদ্ধং বীর্যতো জ্ঞেযং বীর্যতঃ শীতলাত্মকম্||৯৩|| তত্ সংযোজ্যোষ্ণবীর্যেণ দ্রব্যেণ সহ সেব্যতে| ক্রূরকোষ্ঠস্য চাত্যল্পং মন্দবীর্যমভেদনম্||৯৪|| মৃদকোষ্ঠস্য গুরু চ ভেদনীযং তথা বহু| এতত্ কোষ্ঠবিরুদ্ধং তু, বিরুদ্ধং স্যাদবস্থযা||৯৫|| শ্রমব্যবাযব্যাযামসক্তস্যানিলকোপনম্| নিদ্রালসস্যালসস্য ভোজনং শ্লেষ্মকোপনম্||৯৬|| যচ্চানুত্সৃজ্য বিণ্মূত্রং ভুঙ্ক্তে যশ্চাবুভুক্ষিতঃ| তচ্চ ক্রমবিরুদ্ধং স্যাদ্যচ্চাতিক্ষুদ্বশানুগঃ||৯৭|| পরিহারবিরুদ্ধং তু বরাহাদীন্নিষেব্য যত্| সেবেতোষ্ণং ঘৃতাদীংশ্চ পীত্বা শীতং নিষেবতে||৯৮|| বিরুদ্ধং পাকতশ্চাপি দুষ্টদুর্দারুসাধিতম্| অপক্বতণ্ডুলাত্যর্থপক্বদগ্ধং চ যদ্ভবেত্| সংযোগতো বিরুদ্ধং তদ্যথাঽম্লং পযসা সহ||৯৯|| অমনোরুচিতং যচ্চ হৃদ্বিরুদ্ধং তদুচ্যতে| সম্পদ্বিরুদ্ধং তদ্বিদ্যাদসঞ্জাতরসং তু যত্||১০০|| অতিক্রান্তরসং বাঽপি বিপন্নরসমেব বা| জ্ঞেযং বিধিবিরুদ্ধং তু ভুজ্যতে নিভৃতে ন যত্| তদেবংবিধমন্নং স্যাদ্বিরুদ্ধমুপযোজিতম্||১০১||
यच्चापि देशकालाग्निमात्रासात्म्यानिलादिभिः| संस्कारतो वीर्यतश्च कोष्ठावस्थाक्रमैरपि||८६|| परिहारोपचाराभ्यां पाकात् संयोगतोऽपि च| विरुद्धं तच्च न हितं हृत्सम्पद्विधिभिश्च यत्||८७|| विरुद्धं देशतस्तावद्रूक्षतीक्ष्णादि धन्वनि| आनूपे स्निग्धशीतादि भेषजं यन्निषेव्यते||८८|| कालतोऽपि विरुद्धं यच्छीतरूक्षादिसेवनम्| शीते काले, तथोष्णे च कटुकोष्णादिसेवनम्||८९|| विरुद्धमनले तद्वदन्नपानं चतुर्विधे| मधुसर्पिः समधृतं मात्रया तद्विरुध्यते||९०|| कटुकोष्णादिसात्म्यस्य स्वादुशीतादिसेवनम्| यत्तत् सात्म्यविरुद्धं तु विरुद्धं त्वनिलादिभिः||९१|| या समानगुणाभ्यासविरुद्धान्नौषधक्रिया| संस्कारतो विरुद्धं तद्यद्भोज्यं विषवद्भवेत्||९२|| एरण्डसीसकासक्तं शिखिमांसं यथैव हि| विरुद्धं वीर्यतो ज्ञेयं वीर्यतः शीतलात्मकम्||९३|| तत् संयोज्योष्णवीर्येण द्रव्येण सह सेव्यते| क्रूरकोष्ठस्य चात्यल्पं मन्दवीर्यमभेदनम्||९४|| मृदकोष्ठस्य गुरु च भेदनीयं तथा बहु| एतत् कोष्ठविरुद्धं तु, विरुद्धं स्यादवस्थया||९५|| श्रमव्यवायव्यायामसक्तस्यानिलकोपनम्| निद्रालसस्यालसस्य भोजनं श्लेष्मकोपनम्||९६|| यच्चानुत्सृज्य विण्मूत्रं भुङ्क्ते यश्चाबुभुक्षितः| तच्च क्रमविरुद्धं स्याद्यच्चातिक्षुद्वशानुगः||९७|| परिहारविरुद्धं तु वराहादीन्निषेव्य यत्| सेवेतोष्णं घृतादींश्च पीत्वा शीतं निषेवते||९८|| विरुद्धं पाकतश्चापि दुष्टदुर्दारुसाधितम्| अपक्वतण्डुलात्यर्थपक्वदग्धं च यद्भवेत्| संयोगतो विरुद्धं तद्यथाऽम्लं पयसा सह||९९|| अमनोरुचितं यच्च हृद्विरुद्धं तदुच्यते| सम्पद्विरुद्धं तद्विद्यादसञ्जातरसं तु यत्||१००|| अतिक्रान्तरसं वाऽपि विपन्नरसमेव वा| ज्ञेयं विधिविरुद्धं तु भुज्यते निभृते न यत्| तदेवंविधमन्नं स्याद्विरुद्धमुपयोजितम्||१०१||
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Adhikarana 52 (102-103) · Śloka 103
ষাণ্ঢ্যান্ধ্যবীসর্পদকোদরাণাং বিস্ফোটকোন্মাদভগন্দরাণাম্| মূর্চ্ছামদাধ্মানগলগ্রহাণাং পাণ্ড্বামযস্যামবিষস্য চৈব||১০২|| কিলাসকুষ্ঠগ্রহণীগদানাং শোথাম্লপিত্তজ্বরপীনসানাম্ | সন্তানদোষস্য তথৈব মৃত্যোর্বিরুদ্ধমন্নং প্রবদন্তি হেতুম্||১০৩||
षाण्ढ्यान्ध्यवीसर्पदकोदराणां विस्फोटकोन्मादभगन्दराणाम्| मूर्च्छामदाध्मानगलग्रहाणां पाण्ड्वामयस्यामविषस्य चैव||१०२|| किलासकुष्ठग्रहणीगदानां शोथाम्लपित्तज्वरपीनसानाम् | सन्तानदोषस्य तथैव मृत्योर्विरुद्धमन्नं प्रवदन्ति हेतुम्||१०३||
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Adhikarana 53 (104-106) · Śloka 106
এষাং খল্বপরেষাং চ বৈরোধিকনিমিত্তানাং ব্যাধীনামিমে ভাবাঃ প্রতিকারা ভবন্তি| তদ্যথা- বমনং বিরেচনং চ, তদ্বিরোধিনাং চ দ্রব্যাণাং সংশমনার্থমুপযোগঃ, তথাবিধৈশ্চ দ্রব্যৈঃ পূর্বমভিসংস্কারঃ শরীরস্যেতি||১০৪|| ভবতশ্চাত্র- বিরুদ্ধাশনজান্ রোগান্ প্রতিহন্তি বিবেচনম্| বমনং শমনং চৈব পূর্বং বা হিতসেবনম্||১০৫|| সাত্ম্যতোঽল্পতযা বাঽপি দীপ্তাগ্নেস্তরুণস্য চ| স্নিগ্ধব্যাযামবলিনাং বিরুদ্ধং বিতথং ভবেত্||১০৬||
एषां खल्वपरेषां च वैरोधिकनिमित्तानां व्याधीनामिमे भावाः प्रतिकारा भवन्ति| तद्यथा- वमनं विरेचनं च, तद्विरोधिनां च द्रव्याणां संशमनार्थमुपयोगः, तथाविधैश्च द्रव्यैः पूर्वमभिसंस्कारः शरीरस्येति||१०४|| भवतश्चात्र- विरुद्धाशनजान् रोगान् प्रतिहन्ति विवेचनम्| वमनं शमनं चैव पूर्वं वा हितसेवनम्||१०५|| सात्म्यतोऽल्पतया वाऽपि दीप्ताग्नेस्तरुणस्य च| स्निग्धव्यायामबलिनां विरुद्धं वितथं भवेत्||१०६||
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Adhikarana 54 (107-113) · Śloka 113
তত্র শ্লোকাঃ- মতিরাসীন্মহর্ষীণাং যা যা রসবিনিশ্চযে| দ্রব্যাণি গুণকর্মভ্যাং দ্রব্যসঙ্খ্যা রসাশ্রযা||১০৭|| কারণং রসসঙ্খ্যাযা রসানুরসলক্ষণম্| পরাদীনাং গুণানাং চ লক্ষণানি পৃথক্পৃথক্||১০৮|| পঞ্চাত্মকানাং ষট্ত্বং চ রসানাং যেন হেতুনা| ঊর্ধ্বানুলোমভাজশ্চ যদ্গুণাতিশযাদ্রসাঃ||১০৯|| ষণ্ণাং রসানাং ষট্ত্বে চ সবিভক্তা বিভক্তযঃ| উদ্দেশশ্চাপবাদশ্চ দ্রব্যাণাং গুণকর্মণি||১১০|| প্রবরাবরমধ্যত্বং রসানাং গৌরবাদিষু| পাকপ্রভাবযোর্লিঙ্গং বীর্যসঙ্খ্যাবিনিশ্চযঃ||১১১|| ষণ্ণামাস্বাদ্যমানানাং রসানাং যত্ স্বলক্ষণম্| যদ্যদ্বিরুধ্যতে যস্মাদ্যেন যত্কারি চৈব যত্||১১২|| বৈরোধিকনিমিত্তানাং ব্যাধীনামৌষধং চ যত্| আত্রেযভদ্রকাপ্যীযে তত্ সর্বমবদন্মুনিঃ||১১৩||
तत्र श्लोकाः- मतिरासीन्महर्षीणां या या रसविनिश्चये| द्रव्याणि गुणकर्मभ्यां द्रव्यसङ्ख्या रसाश्रया||१०७|| कारणं रससङ्ख्याया रसानुरसलक्षणम्| परादीनां गुणानां च लक्षणानि पृथक्पृथक्||१०८|| पञ्चात्मकानां षट्त्वं च रसानां येन हेतुना| ऊर्ध्वानुलोमभाजश्च यद्गुणातिशयाद्रसाः||१०९|| षण्णां रसानां षट्त्वे च सविभक्ता विभक्तयः| उद्देशश्चापवादश्च द्रव्याणां गुणकर्मणि||११०|| प्रवरावरमध्यत्वं रसानां गौरवादिषु| पाकप्रभावयोर्लिङ्गं वीर्यसङ्ख्याविनिश्चयः||१११|| षण्णामास्वाद्यमानानां रसानां यत् स्वलक्षणम्| यद्यद्विरुध्यते यस्माद्येन यत्कारि चैव यत्||११२|| वैरोधिकनिमित्तानां व्याधीनामौषधं च यत्| आत्रेयभद्रकाप्यीये तत् सर्वमवदन्मुनिः||११३||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 26
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে শ্লোকস্থানে আত্রেযভদ্রকাপ্যীযো নাম ষড্বিংশোঽধ্যাযঃ||২৬||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते श्लोकस्थाने आत्रेयभद्रकाप्यीयो नाम षड्विंशोऽध्यायः||२६||
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