Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতস্তিস্রৈষণীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथातस्तिस्रैषणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতস্তিস্রৈষণীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातस्तिस्रैषणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
ইহ খলু পুরুষেণানুপহতসত্ত্ববুদ্ধিপৌরুষপরাক্রমেণ হিতমিহ চামুষ্মিংশ্চ লোকে সমনুপশ্যতা তিস্র এষণাঃ পর্যেষ্টব্যা ভবন্তি| তদ্যথা- প্রাণৈষণা, ধনৈষণা, পরলোকৈষণেতি||৩||
इह खलु पुरुषेणानुपहतसत्त्वबुद्धिपौरुषपराक्रमेण हितमिह चामुष्मिंश्च लोके समनुपश्यता तिस्र एषणाः पर्येष्टव्या भवन्ति| तद्यथा- प्राणैषणा, धनैषणा, परलोकैषणेति||३||
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
আসাং তু খল্বেষণানাং প্রাণৈষণাং তাবত্ পূর্বতরমাপদ্যেত| কস্মাত্? প্রাণপরিত্যাগে হি সর্বত্যাগঃ| তস্যানুপালনং- স্বস্থস্য স্বস্থবৃত্তানুবৃত্তিঃ, আতুরস্য বিকারপ্রশমনেঽপ্রমাদঃ, তদুভযমেতদুক্তং বক্ষ্যতে চ; তদ্যথোক্তমনুবর্তমানঃ প্রাণানুপালনাদ্দীর্ঘমাযুরবাপ্নোতীতি প্রথমৈষণা ব্যাখ্যাতা ভবতি||৪||
आसां तु खल्वेषणानां प्राणैषणां तावत् पूर्वतरमापद्येत| कस्मात्? प्राणपरित्यागे हि सर्वत्यागः| तस्यानुपालनं- स्वस्थस्य स्वस्थवृत्तानुवृत्तिः, आतुरस्य विकारप्रशमनेऽप्रमादः, तदुभयमेतदुक्तं वक्ष्यते च; तद्यथोक्तमनुवर्तमानः प्राणानुपालनाद्दीर्घमायुरवाप्नोतीति प्रथमैषणा व्याख्याता भवति||४||
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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5
অথ দ্বিতীযাং ধনৈষণমাপদ্যেত, প্রাণেভ্যো হ্যনন্তরং ধনমেব পর্যেষ্টব্যং ভবতি ; ন হ্যতঃ পাপাত্ পাপীযোঽস্তি যদনুপকরণস্য দীর্ঘমাযুঃ, তস্মাদুপকরণানি পর্যেষ্টুং যতেত| তত্রোপকরণোপাযাননুব্যাখ্যাস্যামঃ; তদ্যথা- কৃষিপাশুপাল্যবাণিজ্যরাজোপসেবাদীনি, যানি চান্যান্যপি সতামবিগর্হিতানি কর্মাণি বৃত্তিপুষ্টিকরাণি বিদ্যাত্তান্যারভেত কর্তুং; তথা কুর্বন্ দীর্ঘজীবিতং জীবত্যনবমতঃ পুরুষো ভবতি | ইতি দ্বিতীযা ধনৈষণা ব্যাখ্যাতা ভবতি||৫||
अथ द्वितीयां धनैषणमापद्येत, प्राणेभ्यो ह्यनन्तरं धनमेव पर्येष्टव्यं भवति ; न ह्यतः पापात् पापीयोऽस्ति यदनुपकरणस्य दीर्घमायुः, तस्मादुपकरणानि पर्येष्टुं यतेत| तत्रोपकरणोपायाननुव्याख्यास्यामः; तद्यथा- कृषिपाशुपाल्यवाणिज्यराजोपसेवादीनि, यानि चान्यान्यपि सतामविगर्हितानि कर्माणि वृत्तिपुष्टिकराणि विद्यात्तान्यारभेत कर्तुं; तथा कुर्वन् दीर्घजीवितं जीवत्यनवमतः पुरुषो भवति | इति द्वितीया धनैषणा व्याख्याता भवति||५||
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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6
অথ তৃতীযাং পরলোকৈষণামাপদ্যেত| সংশযশ্চাত্র, কথং? ভবিষ্যাম ইতশ্চ্যুতা নবেতি; কুতঃ পুনঃ সংশয ইতি, উচ্যতে- সন্তি হ্যেকে প্রত্যক্ষপরাঃ পরোক্ষত্বাত্ পুনর্ভবস্য নাস্তিক্যমাশ্রিতাঃ, সন্তি চাগমপ্রত্যযাদেব পুনর্ভবমিচ্ছন্তি; শ্রুতিভেদাচ্চ- ‘মাতরং পিতরং চৈকে মন্যন্তে জন্মকারণম্ | স্বভাবং পরনির্মাণং যদৃচ্ছাং চাপরে জনাঃ’ || ইতি | অতঃ সংশযঃ- কিং নু খল্বস্তি পুনর্ভবো ন বেতি||৬||
अथ तृतीयां परलोकैषणामापद्येत| संशयश्चात्र, कथं? भविष्याम इतश्च्युता नवेति; कुतः पुनः संशय इति, उच्यते- सन्ति ह्येके प्रत्यक्षपराः परोक्षत्वात् पुनर्भवस्य नास्तिक्यमाश्रिताः, सन्ति चागमप्रत्ययादेव पुनर्भवमिच्छन्ति; श्रुतिभेदाच्च- ‘मातरं पितरं चैके मन्यन्ते जन्मकारणम् | स्वभावं परनिर्माणं यदृच्छां चापरे जनाः’ || इति | अतः संशयः- किं नु खल्वस्ति पुनर्भवो न वेति||६||
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Adhikarana 6 (7) · Śloka 7
তত্র বুদ্ধিমান্নাস্তিক্যবুদ্ধিং জহ্যাদ্বিচিকিত্সাং চ| কস্মাত্? প্রত্যক্ষং হ্যল্পম্; অনল্পমপ্রত্যক্ষমস্তি, যদাগমানুমানযুক্তিভিরুপলভ্যতে; যৈরেব তাবদিন্দ্রিযৈঃ প্রত্যক্ষমুপলভ্যতে, তান্যেব সন্তি চাপ্রত্যক্ষাণি||৭||
तत्र बुद्धिमान्नास्तिक्यबुद्धिं जह्याद्विचिकित्सां च| कस्मात्? प्रत्यक्षं ह्यल्पम्; अनल्पमप्रत्यक्षमस्ति, यदागमानुमानयुक्तिभिरुपलभ्यते; यैरेव तावदिन्द्रियैः प्रत्यक्षमुपलभ्यते, तान्येव सन्ति चाप्रत्यक्षाणि||७||
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Adhikarana 7 (8) · Śloka 8
সতাং চ রূপাণামতিসন্নিকর্ষাদতিবিপ্রকর্ষাদাবরণাত্ করণদৌর্বল্যান্মনোনবস্থানাত্ সমানাভিহারাদভিভবাদতিসৌক্ষ্ম্যাচ্চ প্রত্যক্ষানুপলব্ধিঃ; তস্মাদপরীক্ষিতমেতদুচ্যতে- প্রত্যক্ষমেবাস্তি, নান্যদস্তীতি||৮||
सतां च रूपाणामतिसन्निकर्षादतिविप्रकर्षादावरणात् करणदौर्बल्यान्मनोनवस्थानात् समानाभिहारादभिभवादतिसौक्ष्म्याच्च प्रत्यक्षानुपलब्धिः; तस्मादपरीक्षितमेतदुच्यते- प्रत्यक्षमेवास्ति, नान्यदस्तीति||८||
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Adhikarana 8 (9-10) · Śloka 10
শ্রুতযশ্চৈতা ন কারণং, যুক্তিবিরোধাত্| আত্মা মাতুঃ পিতুর্বা যঃ সোঽপত্যং যদি সঞ্চরেত্| দ্বিবিধং সঞ্চরেদাত্মা সর্বোবাঽবযবেন বা||৯|| সর্বশ্চেত্ সঞ্চরেন্মাতুঃ পিতুর্বা মরণং ভবেত্| নিরন্তরং, নাবযবঃ কশ্চিত্সূক্ষ্মস্য চাত্মনঃ||১০||
श्रुतयश्चैता न कारणं, युक्तिविरोधात्| आत्मा मातुः पितुर्वा यः सोऽपत्यं यदि सञ्चरेत्| द्विविधं सञ्चरेदात्मा सर्वोवाऽवयवेन वा||९|| सर्वश्चेत् सञ्चरेन्मातुः पितुर्वा मरणं भवेत्| निरन्तरं, नावयवः कश्चित्सूक्ष्मस्य चात्मनः||१०||
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Adhikarana 9 (11) · Śloka 11
বুদ্ধির্মনশ্চ নির্ণীতে যথৈবাত্মা তথৈব তে| যেষাং চৈষা মতিস্তেষাং যোনির্নাস্তি চতুর্বিধা||১১||
बुद्धिर्मनश्च निर्णीते यथैवात्मा तथैव ते| येषां चैषा मतिस्तेषां योनिर्नास्ति चतुर्विधा||११||
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Adhikarana 10 (12) · Śloka 12
বিদ্যাত্ স্বাভাবিকং ষণ্ণাং ধাতূনাং যত্ স্বলক্ষণম্| সংযোগে চ বিযোগে চ তেষাং কর্মৈব কারণম্||১২||
विद्यात् स्वाभाविकं षण्णां धातूनां यत् स्वलक्षणम्| संयोगे च वियोगे च तेषां कर्मैव कारणम्||१२||
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Adhikarana 11 (13) · Śloka 13
অনাদেশ্চেতনাধাতোর্নেষ্যতে পরনির্মিতিঃ| পর আত্মা স চেদ্ধেতুরিষ্টোঽস্তু পরনির্মিতিঃ||১৩||
अनादेश्चेतनाधातोर्नेष्यते परनिर्मितिः| पर आत्मा स चेद्धेतुरिष्टोऽस्तु परनिर्मितिः||१३||
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Adhikarana 12 (14-15) · Śloka 15
ন পরীক্ষা ন পরীক্ষ্যং ন কর্তা কারণং ন চ| ন দেবা নর্ষযঃ সিদ্ধাঃ কর্ম কর্মফলং ন চ||১৪|| নাস্তিকস্যাস্তি নৈবাত্মা যদৃচ্ছোপহতাত্মনঃ| পাতকেভ্যঃ পরং চৈতত্ পাতকং নাস্তিকগ্রহঃ||১৫||
न परीक्षा न परीक्ष्यं न कर्ता कारणं न च| न देवा नर्षयः सिद्धाः कर्म कर्मफलं न च||१४|| नास्तिकस्यास्ति नैवात्मा यदृच्छोपहतात्मनः| पातकेभ्यः परं चैतत् पातकं नास्तिकग्रहः||१५||
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Adhikarana 13 (16) · Śloka 16
তস্মান্মতিং বিমুচ্যৈতামমার্গপ্রসৃতাং বুধঃ| সতাং বুদ্ধিপ্রদীপেন পশ্যেত্সর্বং যথাতথম্||১৬||
तस्मान्मतिं विमुच्यैताममार्गप्रसृतां बुधः| सतां बुद्धिप्रदीपेन पश्येत्सर्वं यथातथम्||१६||
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Adhikarana 14 (17) · Śloka 17
দ্বিবিধমেব খলু সর্বং সচ্চাসচ্চ; তস্য চতুর্বিধা পরীক্ষা- আপ্তোপদেশঃ, প্রত্যক্ষম্, অনুমানং, যুক্তিশ্চেতি||১৭||
द्विविधमेव खलु सर्वं सच्चासच्च; तस्य चतुर्विधा परीक्षा- आप्तोपदेशः, प्रत्यक्षम्, अनुमानं, युक्तिश्चेति||१७||
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Adhikarana 15 (18-19) · Śloka 19
আপ্তাস্তাবত্- রজস্তমোভ্যাং নির্মুক্তাস্তপোজ্ঞানবলেন যে| যেষাং ত্রিকালমমলং জ্ঞানমব্যাহতং সদা||১৮|| আপ্তাঃ শিষ্টা বিবুদ্ধাস্তে তেষাং বাক্যমসংশযম্| সত্যং, বক্ষ্যন্তি তে কস্মাদসত্যং নীরজস্তমাঃ ||১৯||
आप्तास्तावत्- रजस्तमोभ्यां निर्मुक्तास्तपोज्ञानबलेन ये| येषां त्रिकालममलं ज्ञानमव्याहतं सदा||१८|| आप्ताः शिष्टा विबुद्धास्ते तेषां वाक्यमसंशयम्| सत्यं, वक्ष्यन्ति ते कस्मादसत्यं नीरजस्तमाः ||१९||
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Adhikarana 16 (20) · Śloka 20
আত্মেন্দ্রিযমনোর্থানাং সন্নিকর্ষাত্ প্রবর্ততে| ব্যক্তা তদাত্বে যা বুদ্ধিঃ প্রত্যক্ষং স নিরুচ্যতে||২০||
आत्मेन्द्रियमनोर्थानां सन्निकर्षात् प्रवर्तते| व्यक्ता तदात्वे या बुद्धिः प्रत्यक्षं स निरुच्यते||२०||
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Adhikarana 17 (21-22) · Śloka 22
প্রত্যক্ষপূর্বং ত্রিবিধং ত্রিকালং চানুমীযতে| বহ্নির্নিগূঢো ধূমেন মৈথুনং গর্ভদর্শনাত্||২১|| এবং ব্যবস্যন্ত্যতীতং বীজাত্ ফলমনাগতম্| দৃষ্ট্বা বীজাত্ ফলং জাতমিহৈব সদৃশং বুধাঃ||২২||
प्रत्यक्षपूर्वं त्रिविधं त्रिकालं चानुमीयते| वह्निर्निगूढो धूमेन मैथुनं गर्भदर्शनात्||२१|| एवं व्यवस्यन्त्यतीतं बीजात् फलमनागतम्| दृष्ट्वा बीजात् फलं जातमिहैव सदृशं बुधाः||२२||
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Adhikarana 18 (23-24) · Śloka 24
জলকর্ষণবীজর্তুসংযোগাত্ সস্যসম্ভবঃ| যুক্তিঃ ষড্ধাতুসংযোগাদ্গর্ভাণাং সম্ভবস্তথা||২৩|| মথ্যমন্থন(ক)মন্থানসংযোগাদগ্নিসম্ভবঃ| যুক্তিযুক্তা চতুষ্পাদসম্পদ্ব্যাধিনিবর্হণী||২৪||
जलकर्षणबीजर्तुसंयोगात् सस्यसम्भवः| युक्तिः षड्धातुसंयोगाद्गर्भाणां सम्भवस्तथा||२३|| मथ्यमन्थन(क)मन्थानसंयोगादग्निसम्भवः| युक्तियुक्ता चतुष्पादसम्पद्व्याधिनिबर्हणी||२४||
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Adhikarana 19 (25) · Śloka 25
বুদ্ধিঃ পশ্যতি যা ভাবান্ বহুকারণযোগজান্| যুক্তিস্ত্রিকালা সা জ্ঞেযা ত্রিবর্গঃ সাধ্যতে যযা||২৫||
बुद्धिः पश्यति या भावान् बहुकारणयोगजान्| युक्तिस्त्रिकाला सा ज्ञेया त्रिवर्गः साध्यते यया||२५||
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Adhikarana 20 (26) · Śloka 26
এষা পরীক্ষা নাস্ত্যন্যা যযা সর্বং পরীক্ষ্যতে| পরীক্ষ্যং সদসচ্চৈবং তযা চাস্তি পুনর্ভবঃ||২৬||
एषा परीक्षा नास्त्यन्या यया सर्वं परीक्ष्यते| परीक्ष्यं सदसच्चैवं तया चास्ति पुनर्भवः||२६||
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Adhikarana 21 (27) · Śloka 27
তত্রাপ্তাগমস্তাবদ্বেদঃ , যশ্চান্যোঽপি কশ্চিদ্বেদার্থাদবিপরীতঃ পরীক্ষকৈঃ প্রণীতঃ শিষ্টানুমতো লোকানুগ্রহপ্রবৃত্তঃ শাস্ত্রবাদঃ, স চাঽঽপ্তাগমঃ; আপ্তাগমাদুপলভ্যতেদানতপোযজ্ঞসত্যাহিংসাব্রহ্মচর্যাণ্যভ্যুদযনিঃশ্রেযসকরাণীতি||২৭||
तत्राप्तागमस्तावद्वेदः , यश्चान्योऽपि कश्चिद्वेदार्थादविपरीतः परीक्षकैः प्रणीतः शिष्टानुमतो लोकानुग्रहप्रवृत्तः शास्त्रवादः, स चाऽऽप्तागमः; आप्तागमादुपलभ्यतेदानतपोयज्ञसत्याहिंसाब्रह्मचर्याण्यभ्युदयनिःश्रेयसकराणीति||२७||
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Adhikarana 22 (28) · Śloka 28
ন চানতিবৃত্তসত্ত্বদোষাণামদোষৈরপুনর্ভবো ধর্মদ্বারেষূপদিশ্যতে||২৮||
न चानतिवृत्तसत्त्वदोषाणामदोषैरपुनर्भवो धर्मद्वारेषूपदिश्यते||२८||
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Adhikarana 23 (29) · Śloka 29
ধর্মদ্বারাবহিতৈশ্চ ব্যপগতভযরাগদ্বেষলোভমোহমানৈর্ব্রহ্মপরৈরাপ্তৈঃ কর্মবিদ্ভিরনুপহতসত্ত্ববুদ্ধিপ্রচারৈঃ পূর্বৈঃ পূর্বতরৈর্মহর্ষিভির্দিব্যচক্ষুভির্দৃষ্ট্বোপদিষ্টঃ পুনর্ভব ইতি ব্যবস্যেদেবম্ ||২৯||
धर्मद्वारावहितैश्च व्यपगतभयरागद्वेषलोभमोहमानैर्ब्रह्मपरैराप्तैः कर्मविद्भिरनुपहतसत्त्वबुद्धिप्रचारैः पूर्वैः पूर्वतरैर्महर्षिभिर्दिव्यचक्षुभिर्दृष्ट्वोपदिष्टः पुनर्भव इति व्यवस्येदेवम् ||२९||
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Adhikarana 24 (30) · Śloka 30
প্রত্যক্ষমপি চোপলভ্যতে- মাতাপিত্রোর্বিসদৃশান্যপত্যানি, তুল্যসম্ভবানাং বর্ণস্বরাকৃতিসত্ত্ববুদ্ধিভাগ্যবিশেষাঃ, প্রবরাবরকুলজন্ম, দাস্যৈশ্বর্যং, সুখাসুখমাযুঃ, আযুষো বৈষম্যম্, ইহ কৃতস্যাবাপ্তিঃ, অশিক্ষিতানাং চ রুদিতস্তনপানহাসত্রাসাদীনাং প্রবৃত্তিঃ, লক্ষণোত্পত্তিঃ, কর্মসাদৃশ্যে ফলবিশেষঃ, মেধা ক্বচিত্ ক্বচিত্ কর্মণ্যমেধা, জাতিস্মরণম্- ইহাগমনমিতশ্চ্যুতানামিতি , সমদর্শনে প্রিযাপ্রিযত্বম্||৩০||
प्रत्यक्षमपि चोपलभ्यते- मातापित्रोर्विसदृशान्यपत्यानि, तुल्यसम्भवानां वर्णस्वराकृतिसत्त्वबुद्धिभाग्यविशेषाः, प्रवरावरकुलजन्म, दास्यैश्वर्यं, सुखासुखमायुः, आयुषो वैषम्यम्, इह कृतस्यावाप्तिः, अशिक्षितानां च रुदितस्तनपानहासत्रासादीनां प्रवृत्तिः, लक्षणोत्पत्तिः, कर्मसादृश्ये फलविशेषः, मेधा क्वचित् क्वचित् कर्मण्यमेधा, जातिस्मरणम्- इहागमनमितश्च्युतानामिति , समदर्शने प्रियाप्रियत्वम्||३०||
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Adhikarana 25 (31) · Śloka 31
অত এবানুমীযতে- যত্- স্বকৃতমপরিহার্যমবিনাশি পৌর্বদেহিকং দৈবসঞ্জ্ঞকমানুবন্ধিকং কর্ম, তস্যৈতত্ ফলম্; ইতশ্চান্যদ্ভবিষ্যতীতি; ফলদ্বীজমনুমীযতে, ফলং চ বীজাত্||৩১||
अत एवानुमीयते- यत्- स्वकृतमपरिहार्यमविनाशि पौर्वदेहिकं दैवसञ्ज्ञकमानुबन्धिकं कर्म, तस्यैतत् फलम्; इतश्चान्यद्भविष्यतीति; फलद्बीजमनुमीयते, फलं च बीजात्||३१||
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Adhikarana 26 (32) · Śloka 32
যুক্তিশ্চৈষা- ষড্ধাতুসমুদযাদ্গর্ভজন্ম, কর্তৃকরণসংযোগাত্ ক্রিযা; কৃতস্য কর্মণঃ ফলং নাকৃতস্য, নাঙ্কুরোত্পত্তিরবীজাত্; কর্মসদৃশং ফলং, নান্যস্মাদ্বীজাদন্যস্যোত্পত্তিঃ; ইতি যুক্তিঃ||৩২||
युक्तिश्चैषा- षड्धातुसमुदयाद्गर्भजन्म, कर्तृकरणसंयोगात् क्रिया; कृतस्य कर्मणः फलं नाकृतस्य, नाङ्कुरोत्पत्तिरबीजात्; कर्मसदृशं फलं, नान्यस्माद्बीजादन्यस्योत्पत्तिः; इति युक्तिः||३२||
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Adhikarana 27 (33) · Śloka 33
এবং প্রমাণৈশ্চতুর্ভিরুপদিষ্টে পুনর্ভবে ধর্মদ্বারেষ্ববধীযেত; তদ্যথা- গুরুশুশ্রূষাযামধ্যযনে ব্রতচর্যাযাং দারক্রিযাযামপত্যোত্পাদনে ভৃত্যভরণেঽতিথিপূজাযাং দানেঽনভিধ্যাযাং তপস্যনসূযাযাং দেহবাঙ্মানসে কর্মণ্যক্লিষ্টে দেহেন্দ্রিযমনোর্থবুদ্ধ্যাত্মপরীক্ষাযাং মনঃসমাধাবিতি; যানি চান্যান্যপ্যেবংবিধানি কর্মাণি সতামবিগর্হিতানি স্বর্গ্যাণি বৃত্তিপুষ্টিকরাণি বিদ্যাত্তান্যারভেত কর্তুং; তথা কুর্বন্নিহ চৈব যশো লভতে প্রেত্য চ স্বর্গম্| ইতি তৃতীযা পরলোকৈষণা ব্যাখ্যাতা ভবতি||৩৩||
एवं प्रमाणैश्चतुर्भिरुपदिष्टे पुनर्भवे धर्मद्वारेष्ववधीयेत; तद्यथा- गुरुशुश्रूषायामध्ययने व्रतचर्यायां दारक्रियायामपत्योत्पादने भृत्यभरणेऽतिथिपूजायां दानेऽनभिध्यायां तपस्यनसूयायां देहवाङ्मानसे कर्मण्यक्लिष्टे देहेन्द्रियमनोर्थबुद्ध्यात्मपरीक्षायां मनःसमाधाविति; यानि चान्यान्यप्येवंविधानि कर्माणि सतामविगर्हितानि स्वर्ग्याणि वृत्तिपुष्टिकराणि विद्यात्तान्यारभेत कर्तुं; तथा कुर्वन्निह चैव यशो लभते प्रेत्य च स्वर्गम्| इति तृतीया परलोकैषणा व्याख्याता भवति||३३||
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Adhikarana 28 (34) · Śloka 34
অথ খলু ত্রয উপস্তম্ভাঃ, ত্রিবিধং বলং, ত্রীণ্যাযতনানি, ত্রযো রোগাঃ, ত্রযো রোগমার্গাঃ, ত্রিবিধা ভিষজঃ, ত্রিবিধমৌষধমিতি||৩৪||
अथ खलु त्रय उपस्तम्भाः, त्रिविधं बलं, त्रीण्यायतनानि, त्रयो रोगाः, त्रयो रोगमार्गाः, त्रिविधा भिषजः, त्रिविधमौषधमिति||३४||
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Adhikarana 29 (35) · Śloka 35
ত্রয উপস্তম্ভা ইতি- আহারঃ, স্বপ্নো, ব্রহ্মচর্যমিতি; এভিস্ত্রিভির্যুক্তিযুক্তৈরুপস্তব্ধমুপস্তম্ভৈঃ শরীরং বলবর্ণোপচযোপচিতমনুবর্ততে যাবদাযুঃসংস্কারাত্ সংস্কারমহিতমনুপসেবমানস্য , য ইহৈবোপদেক্ষ্যতে||৩৫||
त्रय उपस्तम्भा इति- आहारः, स्वप्नो, ब्रह्मचर्यमिति; एभिस्त्रिभिर्युक्तियुक्तैरुपस्तब्धमुपस्तम्भैः शरीरं बलवर्णोपचयोपचितमनुवर्तते यावदायुःसंस्कारात् संस्कारमहितमनुपसेवमानस्य , य इहैवोपदेक्ष्यते||३५||
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Adhikarana 30 (36) · Śloka 36
ত্রিবিধং বলমিতি- সহজং, কালজং, যুক্তিকৃতং চ| সহজং যচ্ছরীরসত্ত্বযোঃ প্রাকৃতং, কালকৃতমৃতুবিভাগজং বযঃকৃতং চ, যুক্তিকৃতং পুনস্তদ্যদাহারচেষ্টাযোগজম্||৩৬||
त्रिविधं बलमिति- सहजं, कालजं, युक्तिकृतं च| सहजं यच्छरीरसत्त्वयोः प्राकृतं, कालकृतमृतुविभागजं वयःकृतं च, युक्तिकृतं पुनस्तद्यदाहारचेष्टायोगजम्||३६||
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Adhikarana 31 (37) · Śloka 37
ত্রীণ্যাযতনানীতি- অর্থানাং কর্মণঃ কালস্য চাতিযোগাযোগমিথ্যাযোগাঃ| তত্রাতিপ্রভাবতাং দৃশ্যানামতিমাত্রং দর্শনমতিযোগঃ, সর্বশোঽদর্শনমযোগঃ, অতিশ্লিষ্টাতিবিপ্রকৃষ্টরৌদ্রভৈরবাদ্ভুতদ্বিষ্টবীভত্সনবিকৃতবিত্রাসনাদিরূপদর্শনং মিথ্যাযোগঃ; তথাঽতিমাত্রস্তনিতপটহোত্ক্রুষ্টাদীনাং শব্দানামতিমাত্রং শ্রবণমতিযোগঃ, সর্বশোঽশ্রবণমযোগঃ, পরুষেষ্টবিনাশোপঘাতপ্রধর্ষণভীষণাদিশব্দশ্রবণং মিথ্যাযোগঃ; তথাঽতিতীক্ষ্ণোগ্রাভিষ্যন্দিনাং গন্ধানামতিমাত্রং ঘ্রাণমতিযোগঃ, সর্বশোঽঘ্রাণমযোগঃ, পূতিদ্বিষ্টামেধ্যক্লিন্নবিষপবনকুণপগন্ধাদিঘ্রাণং মিথ্যাযোগঃ; তথা রসানামত্যাদানমতিযোগঃ, সর্বশোঽনাদানমযোগঃ, মিথ্যাযোগো রাশিবর্জ্যেষ্বাহারবিধিবিশেষাযতনেষূপদেক্ষ্যতে; তথাঽতিশীতোষ্ণানাং স্পৃশ্যানাং স্নানাভ্যঙ্গোত্সাদনাদীনাং চাত্যুপসেবনমতিযোগঃ, সর্বশোঽনুপসেবনমযোগঃ, স্নানাদীনাং শীতোষ্ণাদীনাং চ স্পৃশ্যানামনানুপূর্ব্যোপসেবনং বিষমস্থানাভিঘাতাশুচিভূতসংস্পর্শাদযশ্চেতি মিথ্যাযোগঃ||৩৭||
त्रीण्यायतनानीति- अर्थानां कर्मणः कालस्य चातियोगायोगमिथ्यायोगाः| तत्रातिप्रभावतां दृश्यानामतिमात्रं दर्शनमतियोगः, सर्वशोऽदर्शनमयोगः, अतिश्लिष्टातिविप्रकृष्टरौद्रभैरवाद्भुतद्विष्टबीभत्सनविकृतवित्रासनादिरूपदर्शनं मिथ्यायोगः; तथाऽतिमात्रस्तनितपटहोत्क्रुष्टादीनां शब्दानामतिमात्रं श्रवणमतियोगः, सर्वशोऽश्रवणमयोगः, परुषेष्टविनाशोपघातप्रधर्षणभीषणादिशब्दश्रवणं मिथ्यायोगः; तथाऽतितीक्ष्णोग्राभिष्यन्दिनां गन्धानामतिमात्रं घ्राणमतियोगः, सर्वशोऽघ्राणमयोगः, पूतिद्विष्टामेध्यक्लिन्नविषपवनकुणपगन्धादिघ्राणं मिथ्यायोगः; तथा रसानामत्यादानमतियोगः, सर्वशोऽनादानमयोगः, मिथ्यायोगो राशिवर्ज्येष्वाहारविधिविशेषायतनेषूपदेक्ष्यते; तथाऽतिशीतोष्णानां स्पृश्यानां स्नानाभ्यङ्गोत्सादनादीनां चात्युपसेवनमतियोगः, सर्वशोऽनुपसेवनमयोगः, स्नानादीनां शीतोष्णादीनां च स्पृश्यानामनानुपूर्व्योपसेवनं विषमस्थानाभिघाताशुचिभूतसंस्पर्शादयश्चेति मिथ्यायोगः||३७||
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Adhikarana 32 (38) · Śloka 38
তত্রৈকং স্পর্শনমিন্দ্রিযাণামিন্দ্রিযব্যাপকং , চেতঃ- সমবাযি, স্পর্শনব্যাপ্তের্ব্যাপকমপি চ চেতঃ; তস্মাত্ সর্বেন্দ্রিযাণাং ব্যাপকস্পর্শকৃতো যো ভাববিশেষঃ, সোঽযমনুপশযাত্ পঞ্চবিধস্ত্রিবিধবিকল্পো ভবত্যসাত্ম্যেন্দ্রিযার্থসংযোগঃ; সাত্ম্যার্থো হ্যুপশযার্থঃ||৩৮||
तत्रैकं स्पर्शनमिन्द्रियाणामिन्द्रियव्यापकं , चेतः- समवायि, स्पर्शनव्याप्तेर्व्यापकमपि च चेतः; तस्मात् सर्वेन्द्रियाणां व्यापकस्पर्शकृतो यो भावविशेषः, सोऽयमनुपशयात् पञ्चविधस्त्रिविधविकल्पो भवत्यसात्म्येन्द्रियार्थसंयोगः; सात्म्यार्थो ह्युपशयार्थः||३८||
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Adhikarana 33 (39) · Śloka 39
কর্ম বাঙ্মনঃশরীরপ্রবৃত্তিঃ| তত্র বাঙ্মনঃশরীরাতিপ্রবৃত্তিরতিযোগঃ; সর্বশোঽপ্রবৃত্তিরযোগঃ; বেগধারণোদীরণবিষমস্খলনপতনাঙ্গপ্রণিধানাঙ্গপ্রদূষণপ্রহারমর্দনপ্রাণোপরোধসঙ্ক্লেশনাদিঃ শারীরো মিথ্যাযোগঃ, সূচকানৃতাকালকলহাপ্রিযাবদ্ধানুপচারপরুষবচনাদির্বাঙ্মিথ্যাযোগঃ, ভযশোকক্রোধলোভমোহমানের্ষ্যামিথ্যাদর্শনাদির্মানসো মিথ্যাযোগঃ||৩৯||
कर्म वाङ्मनःशरीरप्रवृत्तिः| तत्र वाङ्मनःशरीरातिप्रवृत्तिरतियोगः; सर्वशोऽप्रवृत्तिरयोगः; वेगधारणोदीरणविषमस्खलनपतनाङ्गप्रणिधानाङ्गप्रदूषणप्रहारमर्दनप्राणोपरोधसङ्क्लेशनादिः शारीरो मिथ्यायोगः, सूचकानृताकालकलहाप्रियाबद्धानुपचारपरुषवचनादिर्वाङ्मिथ्यायोगः, भयशोकक्रोधलोभमोहमानेर्ष्यामिथ्यादर्शनादिर्मानसो मिथ्यायोगः||३९||
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Adhikarana 34 (40) · Śloka 40
সঙ্গ্রহেণ চাতিযোগাযোগবর্জং কর্ম বাঙ্মনঃশরীরজমহিতমনুপদিষ্টং যত্তচ্চ মিথ্যাযোগং বিদ্যাত্||৪০||
सङ्ग्रहेण चातियोगायोगवर्जं कर्म वाङ्मनःशरीरजमहितमनुपदिष्टं यत्तच्च मिथ्यायोगं विद्यात्||४०||
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Adhikarana 35 (41) · Śloka 41
ইতি ত্রিবিধবিকল্পং ত্রিবিধমেব কর্ম প্রজ্ঞাপরাধ ইতি ব্যবস্যেত্||৪১||
इति त्रिविधविकल्पं त्रिविधमेव कर्म प्रज्ञापराध इति व्यवस्येत्||४१||
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Adhikarana 36 (42) · Śloka 42
শীতোষ্ণবর্ষলক্ষণাঃ পুনর্হেমন্তগ্রীষ্মবর্ষাঃ সংবত্সরঃ, স কালঃ| তত্রাতিমাত্রস্বলক্ষণঃ কালঃ কালাতিযোগঃ, হীনস্বলক্ষণঃ (কালঃ) কালাযোগঃ, যথাস্বলক্ষণবিপরীতলক্ষণস্তু (কালঃ) কালমিথ্যাযোগঃ| কালঃ পুনঃ পরিণাম উচ্যতে||৪২||
शीतोष्णवर्षलक्षणाः पुनर्हेमन्तग्रीष्मवर्षाः संवत्सरः, स कालः| तत्रातिमात्रस्वलक्षणः कालः कालातियोगः, हीनस्वलक्षणः (कालः) कालायोगः, यथास्वलक्षणविपरीतलक्षणस्तु (कालः) कालमिथ्यायोगः| कालः पुनः परिणाम उच्यते||४२||
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Adhikarana 37 (43) · Śloka 43
ইত্যসাত্ম্যেন্দ্রিযার্থসংযোগঃ, প্রজ্ঞাপরাধঃ, পরিণামশ্চেতি ত্রযস্ত্রিবিধবিকল্পা হেতবো বিকারাণাং; সমযোগযুক্তাস্তু প্রকৃতিহেতবো ভবন্তি||৪৩||
इत्यसात्म्येन्द्रियार्थसंयोगः, प्रज्ञापराधः, परिणामश्चेति त्रयस्त्रिविधविकल्पा हेतवो विकाराणां; समयोगयुक्तास्तु प्रकृतिहेतवो भवन्ति||४३||
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Adhikarana 38 (44) · Śloka 44
সর্বেষামেব ভাবানাং ভাবাভাবৌ নান্তরেণ যোগাযোগাতিযোগমিথ্যাযোগান্ সমুপলভ্যেতে; যথাস্বযুক্ত্যপেক্ষিণৌ হি ভাবাভাবৌ||৪৪||
सर्वेषामेव भावानां भावाभावौ नान्तरेण योगायोगातियोगमिथ्यायोगान् समुपलभ्येते; यथास्वयुक्त्यपेक्षिणौ हि भावाभावौ||४४||
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Adhikarana 39 (45) · Śloka 45
ত্রযো রোগা ইতি- নিজাগন্তুমানসাঃ| তত্র নিজঃ শারীরদোষসমুত্থঃ, আগন্তুর্ভূতবিষবায্বগ্নিসম্প্রহারাদিসমুত্থঃ, মানসঃ পুনরিষ্টস্য লাভাল্লাভাচ্চানিষ্টস্যোপজাযতে||৪৫||
त्रयो रोगा इति- निजागन्तुमानसाः| तत्र निजः शारीरदोषसमुत्थः, आगन्तुर्भूतविषवाय्वग्निसम्प्रहारादिसमुत्थः, मानसः पुनरिष्टस्य लाभाल्लाभाच्चानिष्टस्योपजायते||४५||
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Adhikarana 40 (46) · Śloka 46
তত্র বুদ্ধিমতা মানসব্যাধিপরীতেনাপি সতা বুদ্ধ্যা হিতাহিতমবেক্ষ্যাবেক্ষ্য ধর্মার্থকামানামহিতানামনুপসেবনে হিতানাং চোপসেবনে প্রযতিতব্যং, ন হ্যন্তরেণ লোকে ত্রযমেতন্মানসং কিঞ্চিন্নিষ্পদ্যতে সুখং বা দুঃখং বা; তস্মাদেতচ্চানুষ্ঠেযং- তদ্বিদ্যানাং চোপসেবনে প্রযতিতব্যম্, আত্মদেশকুলকালবলশক্তিজ্ঞানে যথাবচ্চেতি||৪৬||
तत्र बुद्धिमता मानसव्याधिपरीतेनापि सता बुद्ध्या हिताहितमवेक्ष्यावेक्ष्य धर्मार्थकामानामहितानामनुपसेवने हितानां चोपसेवने प्रयतितव्यं, न ह्यन्तरेण लोके त्रयमेतन्मानसं किञ्चिन्निष्पद्यते सुखं वा दुःखं वा; तस्मादेतच्चानुष्ठेयं- तद्विद्यानां चोपसेवने प्रयतितव्यम्, आत्मदेशकुलकालबलशक्तिज्ञाने यथावच्चेति||४६||
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Adhikarana 41 (47) · Śloka 47
ভবতি চাত্র- মানসং প্রতি ভৈষজ্যং ত্রিবর্গস্যান্ববেক্ষণম্| তদ্বিদ্যসেবা বিজ্ঞানমাত্মাদীনাং চ সর্বশঃ||৪৭||
भवति चात्र- मानसं प्रति भैषज्यं त्रिवर्गस्यान्ववेक्षणम्| तद्विद्यसेवा विज्ञानमात्मादीनां च सर्वशः||४७||
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Adhikarana 42 (48) · Śloka 48
ত্রযো রোগমার্গা ইতি- শাখা, মর্মাস্থিসন্ধযঃ, কোষ্ঠশ্চ| তত্র শাখা রক্তাদযো ধাতবস্ত্বক্ চ, স বাহ্যো রোগমার্গঃ; মর্মাণি পুনর্বস্তিহৃদযমূর্ধাদীনি, অস্থিসন্ধযোঽস্থিসংযোগাস্তত্রোপনিবদ্ধাশ্চ স্নাযুকণ্ডরাঃ , স মধ্যমো রোগমার্গঃ; কোষ্ঠঃ পুনরুচ্যতে মহাস্রোতঃ শরীরমধ্যং মহানিম্নমামপক্বাশযশ্চেতি পর্যাযশব্দৈস্তন্ত্রে, স রোগমার্গ আভ্যন্তরঃ||৪৮||
त्रयो रोगमार्गा इति- शाखा, मर्मास्थिसन्धयः, कोष्ठश्च| तत्र शाखा रक्तादयो धातवस्त्वक् च, स बाह्यो रोगमार्गः; मर्माणि पुनर्बस्तिहृदयमूर्धादीनि, अस्थिसन्धयोऽस्थिसंयोगास्तत्रोपनिबद्धाश्च स्नायुकण्डराः , स मध्यमो रोगमार्गः; कोष्ठः पुनरुच्यते महास्रोतः शरीरमध्यं महानिम्नमामपक्वाशयश्चेति पर्यायशब्दैस्तन्त्रे, स रोगमार्ग आभ्यन्तरः||४८||
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Adhikarana 43 (49) · Śloka 49
তত্র, গণ্ডপিডকালজ্যপচীচর্মকীলাধিমাংসমষককুষ্ঠব্যঙ্গাদযো বিকারা বহির্মার্গজাশ্চ বিসর্পশ্বযথুগুল্মার্শোবিদ্রধ্যাদযঃ শাখানুসারিণো ভবন্তি রোগাঃ; পক্ষবধগ্রহাপতানকার্দিতশোষরাজযক্ষ্মাস্থিসন্ধিশূলগুদভ্রংশাদযঃ শিরোহৃদ্বস্তিরোগাদযশ্চ মধ্যমমার্গানুসারিণো ভবন্তি রোগাঃ; জ্বরাতীসারচ্ছর্দ্যলসকবিসূচিকাকাসশ্বাসহিক্কানাহোদরপ্লীহাদযোঽন্তর্মার্গজাশ্চ বিসর্পশ্বযথুগুল্মার্শোবিদ্রধ্যাদযঃ কোষ্ঠানুসারিণো ভবন্তি রোগাঃ||৪৯||
तत्र, गण्डपिडकालज्यपचीचर्मकीलाधिमांसमषककुष्ठव्यङ्गादयो विकारा बहिर्मार्गजाश्च विसर्पश्वयथुगुल्मार्शोविद्रध्यादयः शाखानुसारिणो भवन्ति रोगाः; पक्षवधग्रहापतानकार्दितशोषराजयक्ष्मास्थिसन्धिशूलगुदभ्रंशादयः शिरोहृद्बस्तिरोगादयश्च मध्यममार्गानुसारिणो भवन्ति रोगाः; ज्वरातीसारच्छर्द्यलसकविसूचिकाकासश्वासहिक्कानाहोदरप्लीहादयोऽन्तर्मार्गजाश्च विसर्पश्वयथुगुल्मार्शोविद्रध्यादयः कोष्ठानुसारिणो भवन्ति रोगाः||४९||
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Adhikarana 44 (50-53) · Śloka 53
ত্রিবিধা ভিষজ ইতি- ভিষক্ছদ্মচরাঃ সন্তি সন্ত্যেকে সিদ্ধসাধিতাঃ| সন্তি বৈদ্যগুণৈর্যুক্তাস্ত্রিবিধা ভিষজো ভুবি||৫০|| বৈদ্যভাণ্ডৌষধৈঃ পুস্তৈঃ পল্লবৈরবলোকনৈঃ| লভন্তে যে ভিষক্শব্দমজ্ঞাস্তে প্রতিরূপকাঃ||৫১|| শ্রীযশোজ্ঞানসিদ্ধানাং ব্যপদেশাদতদ্বিধাঃ| বৈদ্যশব্দং লভন্তে যে জ্ঞেযাস্তে সিদ্ধসাধিতাঃ||৫২|| প্রযোগজ্ঞানবিজ্ঞানসিদ্ধিসিদ্ধাঃ সুখপ্রদাঃ| জীবিতাভিসরাস্তে স্যুর্বৈদ্যত্বং তেষ্ববস্থিতমিতি||৫৩||
त्रिविधा भिषज इति- भिषक्छद्मचराः सन्ति सन्त्येके सिद्धसाधिताः| सन्ति वैद्यगुणैर्युक्तास्त्रिविधा भिषजो भुवि||५०|| वैद्यभाण्डौषधैः पुस्तैः पल्लवैरवलोकनैः| लभन्ते ये भिषक्शब्दमज्ञास्ते प्रतिरूपकाः||५१|| श्रीयशोज्ञानसिद्धानां व्यपदेशादतद्विधाः| वैद्यशब्दं लभन्ते ये ज्ञेयास्ते सिद्धसाधिताः||५२|| प्रयोगज्ञानविज्ञानसिद्धिसिद्धाः सुखप्रदाः| जीविताभिसरास्ते स्युर्वैद्यत्वं तेष्ववस्थितमिति||५३||
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Adhikarana 45 (54) · Śloka 54
ত্রিবিধমৌষধমিতি- দৈবব্যপাশ্রযং, যুক্তিব্যপাশ্রযং, সত্ত্বাবজযশ্চ| তত্র দৈবব্যপাশ্রযং- মন্ত্রৌষধিমণিমঙ্গলবল্যুপহারহোমনিযমপ্রাযশ্চিত্তোপবাসস্বস্ত্যযনপ্রণিপাতগমনাদি, যুক্তিব্যপাশ্রযং- পুনরাহারৌষধদ্রব্যাণাং যোজনা, সত্ত্বাবজযঃ- পুনরহিতেভ্যোঽর্থেভ্যো মনোনিগ্রহঃ||৫৪||
त्रिविधमौषधमिति- दैवव्यपाश्रयं, युक्तिव्यपाश्रयं, सत्त्वावजयश्च| तत्र दैवव्यपाश्रयं- मन्त्रौषधिमणिमङ्गलबल्युपहारहोमनियमप्रायश्चित्तोपवासस्वस्त्ययनप्रणिपातगमनादि, युक्तिव्यपाश्रयं- पुनराहारौषधद्रव्याणां योजना, सत्त्वावजयः- पुनरहितेभ्योऽर्थेभ्यो मनोनिग्रहः||५४||
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Adhikarana 46 (55) · Śloka 55
শরীরদোষপ্রকোপে খলু শরীরমেবাশ্রিত্য প্রাযশস্ত্রিবিধমৌষধমিচ্ছন্তি- অন্তঃপরিমার্জনং, বহিঃপরিমার্জনং, শস্ত্রপ্রণিধানং চেতি| তত্রান্তঃপরিমার্জনং যদন্তঃশরীরমনুপ্রবিশ্যৌষধমাহারজাতব্যাধীন্ প্রমার্ষ্টি, যত্পুনর্বহিঃস্পর্শমাশ্রিত্যাভ্যঙ্গস্বেদপ্রদেহপরিষেকোন্মর্দনাদ্যৈরামযান্ প্রমার্ষ্টি তদ্বহিঃপরিমার্জনং, শস্ত্রপ্রণিধানং পুনশ্ছেদনভেদনব্যধনদারণলেখনোত্পাটনপ্রচ্ছনসীবনৈষণক্ষারজলৌকসশ্চেতি||৫৫||
शरीरदोषप्रकोपे खलु शरीरमेवाश्रित्य प्रायशस्त्रिविधमौषधमिच्छन्ति- अन्तःपरिमार्जनं, बहिःपरिमार्जनं, शस्त्रप्रणिधानं चेति| तत्रान्तःपरिमार्जनं यदन्तःशरीरमनुप्रविश्यौषधमाहारजातव्याधीन् प्रमार्ष्टि, यत्पुनर्बहिःस्पर्शमाश्रित्याभ्यङ्गस्वेदप्रदेहपरिषेकोन्मर्दनाद्यैरामयान् प्रमार्ष्टि तद्बहिःपरिमार्जनं, शस्त्रप्रणिधानं पुनश्छेदनभेदनव्यधनदारणलेखनोत्पाटनप्रच्छनसीवनैषणक्षारजलौकसश्चेति||५५||
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Adhikarana 47 (56-63) · Śloka 63
ভবন্তি চাত্র- প্রাজ্ঞো রোগে সমুত্পন্নে বাহ্যেনাভ্যন্তরেণ বা| কর্মণা লভতে শর্ম শস্ত্রোপক্রমণেন বা||৫৬|| বালস্তু খলু মোহাদ্বা প্রমাদাদ্বা ন বুধ্যতে| উত্পদ্যমানং প্রথমং রোগং শত্রুমিবাবুধঃ||৫৭|| অণুর্হি প্রথমং ভূত্বা রোগঃ পশ্চাদ্বিবর্ধতে| স জাতমূলো মুষ্ণাতি বলমাযুশ্চ দুর্মতেঃ||৫৮|| ন মূঢো লভতে সঞ্জ্ঞাং তাবদ্যাবন্ন পীড্যতে| পীডিতস্তু মতিং পশ্চাত্ কুরুতে ব্যাধিনিগ্রহে||৫৯|| অথ পুত্রাংশ্চ দারাংশ্চ জ্ঞাতীংশ্চাহূয ভাষতে| সর্বস্বেনাপি মে কশ্চিদ্ভিষগানীযতামিতি||৬০|| তথাবিধং চ কঃ শক্তো দুর্বলং ব্যাধিপীডিতম্| কৃশং ক্ষীণেন্দ্রিযং দীনং পরিত্রাতুং গতাযুষম্||৬১|| স ত্রাতারমনাসাদ্য বালস্ত্যজতি জীবিতম্| গোধা লাঙ্গূলবদ্ধেবাকৃষ্যমাণা বলীযসা||৬২|| তস্মাত্ প্রাগেব রোগেভ্যো রোগেষু তরুণেষু বা| ভেষজৈঃ প্রতিকুর্বীত য ইচ্ছেত্ সুখমাত্মনঃ||৬৩||
भवन्ति चात्र- प्राज्ञो रोगे समुत्पन्ने बाह्येनाभ्यन्तरेण वा| कर्मणा लभते शर्म शस्त्रोपक्रमणेन वा||५६|| बालस्तु खलु मोहाद्वा प्रमादाद्वा न बुध्यते| उत्पद्यमानं प्रथमं रोगं शत्रुमिवाबुधः||५७|| अणुर्हि प्रथमं भूत्वा रोगः पश्चाद्विवर्धते| स जातमूलो मुष्णाति बलमायुश्च दुर्मतेः||५८|| न मूढो लभते सञ्ज्ञां तावद्यावन्न पीड्यते| पीडितस्तु मतिं पश्चात् कुरुते व्याधिनिग्रहे||५९|| अथ पुत्रांश्च दारांश्च ज्ञातींश्चाहूय भाषते| सर्वस्वेनापि मे कश्चिद्भिषगानीयतामिति||६०|| तथाविधं च कः शक्तो दुर्बलं व्याधिपीडितम्| कृशं क्षीणेन्द्रियं दीनं परित्रातुं गतायुषम्||६१|| स त्रातारमनासाद्य बालस्त्यजति जीवितम्| गोधा लाङ्गूलबद्धेवाकृष्यमाणा बलीयसा||६२|| तस्मात् प्रागेव रोगेभ्यो रोगेषु तरुणेषु वा| भेषजैः प्रतिकुर्वीत य इच्छेत् सुखमात्मनः||६३||
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Adhikarana 48 (64-65) · Śloka 65
তত্র শ্লোকৌ- এষণাঃ সমুপস্তম্ভা বলং কারণমামযাঃ| তিস্রৈষণীযে মার্গাশ্চ ভিষজো ভেষজানি চ||৬৪|| ত্রিত্বেনাষ্টৌ সমুদ্দিষ্টাঃ কৃষ্ণাত্রেযেণ ধীমতা| ভাবা, ভাবেষ্বসক্তেন যেষু সর্বং প্রতিষ্ঠিতম্||৬৫||
तत्र श्लोकौ- एषणाः समुपस्तम्भा बलं कारणमामयाः| तिस्रैषणीये मार्गाश्च भिषजो भेषजानि च||६४|| त्रित्वेनाष्टौ समुद्दिष्टाः कृष्णात्रेयेण धीमता| भावा, भावेष्वसक्तेन येषु सर्वं प्रतिष्ठितम्||६५||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 11
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে শ্লোকস্থানে তিস্রৈষণীযো নামৈকাদশোঽধ্যাযঃ||১১||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते श्लोकस्थाने तिस्रैषणीयो नामैकादशोऽध्यायः||११||
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