Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো মহাচতুষ্পাদমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथातो महाचतुष्पादमध्यायं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো মহাচতুষ্পাদমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातो महाचतुष्पादमध्यायं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
চতুষ্পাদং ষোডশকলং ভেষজমিতি ভিষজো ভাষন্তে, যদুক্তং পূর্বাধ্যাযে ষোডশগুণমিতি, তদ্ভেষজং যুক্তিযুক্তমলমারোগ্যাযেতি ভগবান্ পুনর্বসুরাত্রেযঃ||৩||
चतुष्पादं षोडशकलं भेषजमिति भिषजो भाषन्ते, यदुक्तं पूर्वाध्याये षोडशगुणमिति, तद्भेषजं युक्तियुक्तमलमारोग्यायेति भगवान् पुनर्वसुरात्रेयः||३||
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
নেতি মৈত্রেযঃ, কিং কারণং? দৃশ্যন্তে হ্যাতুরাঃ কেচিদুপকরণবন্তশ্চ পরিচারকসম্পন্নাশ্চাত্মবন্তশ্চ কুশলৈশ্চ ভিষগ্ভিরনুষ্ঠিতাঃ সমুত্তিষ্ঠমানাঃ, তথাযুক্তাশ্চাপরে ম্রিযমাণাঃ; তস্মাদ্ভেষজমকিঞ্চিত্করং ভবতি, তদ্যথা- শ্বভ্রে সরসি চ প্রসিক্তমল্পমুদকং, নদ্যাং বা স্যন্দমানাযাং পাংসুধানে বা পাংসুমুষ্টিঃ প্রকীর্ণ ইতি; তথাঽপরে দৃশ্যন্তেঽনুপকরণাশ্চাপরিচারকাশ্চানাত্মবন্তশ্চাকুশলৈশ্চ ভিষগ্ভিরনুষ্ঠিতাঃ সমুত্তিষ্ঠমানাঃ, তথাযুক্তা ম্রিযমাণাশ্চাপরে| যতশ্চ প্রতিকুর্বন্ সিধ্যতি, প্রতিকুর্বন্ ম্রিযতে; অপ্রতিকুর্বন্ সিধ্যতি, অপ্রতিকুর্বন্ ম্রিযতে; ততশ্চিন্ত্যতে ভেষজমভেষজেনাবিশিষ্টমিতি ||৪||
नेति मैत्रेयः, किं कारणं? दृश्यन्ते ह्यातुराः केचिदुपकरणवन्तश्च परिचारकसम्पन्नाश्चात्मवन्तश्च कुशलैश्च भिषग्भिरनुष्ठिताः समुत्तिष्ठमानाः, तथायुक्ताश्चापरे म्रियमाणाः; तस्माद्भेषजमकिञ्चित्करं भवति, तद्यथा- श्वभ्रे सरसि च प्रसिक्तमल्पमुदकं, नद्यां वा स्यन्दमानायां पांसुधाने वा पांसुमुष्टिः प्रकीर्ण इति; तथाऽपरे दृश्यन्तेऽनुपकरणाश्चापरिचारकाश्चानात्मवन्तश्चाकुशलैश्च भिषग्भिरनुष्ठिताः समुत्तिष्ठमानाः, तथायुक्ता म्रियमाणाश्चापरे| यतश्च प्रतिकुर्वन् सिध्यति, प्रतिकुर्वन् म्रियते; अप्रतिकुर्वन् सिध्यति, अप्रतिकुर्वन् म्रियते; ततश्चिन्त्यते भेषजमभेषजेनाविशिष्टमिति ||४||
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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5
মৈত্রেয ! মিথ্যা চিন্ত্যত ইত্যাত্রেযঃ; কিং কারণং, যে হ্যাতুরাঃ ষোডশগুণসমুদিতেনানেন ভেষজেনোপপদ্যমানা ম্রিযন্ত ইত্যুক্তং তদনুপপন্নং, ন হি ভেষজসাধ্যানাং ব্যাধীনাং ভেষজমকারণং ভবতি; যে পুনরাতুরাঃ কেবলাদ্ভেষজাদৃতে সমুত্তিষ্ঠন্তে, ন তেষাং সম্পূর্ণভেষজোপপাদনায সমুত্থানবিশেষো নাস্তি; যথা হি পতিতং পুরুষং সমর্থমুত্থানাযোত্থাপযন্ পুরুষো বলমস্যোপাদধ্যাত্, স ক্ষিপ্রতরমপরিক্লিষ্ট এবোত্তিষ্ঠেত্, তদ্বত্ সম্পূর্ণভেষজোপলম্ভাদাতুরাঃ; যে চাতুরাঃ কেবলাদ্ভেষজাদপি ম্রিযন্তে, ন চ সর্ব এব তে ভেষজোপপন্নাঃ সমুত্তিষ্ঠেরন্, নহি সর্বে ব্যাধযো ভবন্ত্যুপাযসাধ্যাঃ, ন চোপাযসাধ্যানাং ব্যাধীনামনুপাযেন সিদ্ধিরস্তি, ন চাসাধ্যানাং ব্যাধীনাং ভেষজসমুদাযোঽযমস্তি , ন হ্যলং জ্ঞানবান্ ভিষঙ্মুমূর্ষুমাতুরমুত্থাপযিতুং; পরীক্ষ্যকারিণো হি কুশলা ভবন্তি, যথা হি যোগজ্ঞোঽভ্যাসনিত্য ইষ্বাসো ধনুরাদাযেষুমস্যন্নাতিবিপ্রকৃষ্টে মহতি কাযে নাপরাধবান্ ভবতি, সম্পাদযতি চেষ্টকার্যং, তথা ভিষক্ স্বগুণসম্পন্ন উপকরণবান্ বীক্ষ্য কর্মারভমাণঃ সাধ্যরোগমনপরাধঃ সম্পাদযত্যেবাতুরমারোগ্যেণ; তস্মান্ন ভেষজমভেষজেনাবিশিষ্টং ভবতি||৫||
मैत्रेय ! मिथ्या चिन्त्यत इत्यात्रेयः; किं कारणं, ये ह्यातुराः षोडशगुणसमुदितेनानेन भेषजेनोपपद्यमाना म्रियन्त इत्युक्तं तदनुपपन्नं, न हि भेषजसाध्यानां व्याधीनां भेषजमकारणं भवति; ये पुनरातुराः केवलाद्भेषजादृते समुत्तिष्ठन्ते, न तेषां सम्पूर्णभेषजोपपादनाय समुत्थानविशेषो नास्ति; यथा हि पतितं पुरुषं समर्थमुत्थानायोत्थापयन् पुरुषो बलमस्योपादध्यात्, स क्षिप्रतरमपरिक्लिष्ट एवोत्तिष्ठेत्, तद्वत् सम्पूर्णभेषजोपलम्भादातुराः; ये चातुराः केवलाद्भेषजादपि म्रियन्ते, न च सर्व एव ते भेषजोपपन्नाः समुत्तिष्ठेरन्, नहि सर्वे व्याधयो भवन्त्युपायसाध्याः, न चोपायसाध्यानां व्याधीनामनुपायेन सिद्धिरस्ति, न चासाध्यानां व्याधीनां भेषजसमुदायोऽयमस्ति , न ह्यलं ज्ञानवान् भिषङ्मुमूर्षुमातुरमुत्थापयितुं; परीक्ष्यकारिणो हि कुशला भवन्ति, यथा हि योगज्ञोऽभ्यासनित्य इष्वासो धनुरादायेषुमस्यन्नातिविप्रकृष्टे महति काये नापराधवान् भवति, सम्पादयति चेष्टकार्यं, तथा भिषक् स्वगुणसम्पन्न उपकरणवान् वीक्ष्य कर्मारभमाणः साध्यरोगमनपराधः सम्पादयत्येवातुरमारोग्येण; तस्मान्न भेषजमभेषजेनाविशिष्टं भवति||५||
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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6
ইদং চ নঃ প্রত্যক্ষং- যদনাতুরেণ ভেষজেনাতুরং চিকিত্সামঃ , ক্ষামমক্ষামেণ, কৃশং চ দুর্বলমাপ্যাযযামঃ, স্থূলং মেদস্বিনমপতর্পযামঃ, শীতেনোষ্ণাভিভূতমুপচরামঃ, শীতাভিভূতমুষ্ণেন, ন্যূনান্ ধাতূন্ পূরযামঃ, ব্যতিরিক্তান্ হ্রাসযামঃ, ব্যাধীন্ মূলবিপর্যযেণোপচরন্তঃ সম্যক্ প্রকৃতৌ স্থাপযামঃ; তেষাং নস্তথা কুর্বতামযং ভেষজসমুদাযঃ কান্ততমো ভবতি||৬||
इदं च नः प्रत्यक्षं- यदनातुरेण भेषजेनातुरं चिकित्सामः , क्षाममक्षामेण, कृशं च दुर्बलमाप्याययामः, स्थूलं मेदस्विनमपतर्पयामः, शीतेनोष्णाभिभूतमुपचरामः, शीताभिभूतमुष्णेन, न्यूनान् धातून् पूरयामः, व्यतिरिक्तान् ह्रासयामः, व्याधीन् मूलविपर्ययेणोपचरन्तः सम्यक् प्रकृतौ स्थापयामः; तेषां नस्तथा कुर्वतामयं भेषजसमुदायः कान्ततमो भवति||६||
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Adhikarana 6 (7-8) · Śloka 8
ভবন্তি চাত্র- সাধ্যাসাধ্যবিভাগজ্ঞো জ্ঞানপূর্বং চিকিত্সকঃ| কালে চারভতে কর্ম যত্তত্ সাধযতি ধ্রুবম্||৭|| অর্থবিদ্যাযশোহানিমুপক্রোশমসঙ্গ্রহম্ | প্রাপ্নুযান্নিযতং বৈদ্যো যোঽসাধ্যং সমুপাচরেত্||৮||
भवन्ति चात्र- साध्यासाध्यविभागज्ञो ज्ञानपूर्वं चिकित्सकः| काले चारभते कर्म यत्तत् साधयति ध्रुवम्||७|| अर्थविद्यायशोहानिमुपक्रोशमसङ्ग्रहम् | प्राप्नुयान्नियतं वैद्यो योऽसाध्यं समुपाचरेत्||८||
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Adhikarana 7 (9-10) · Śloka 10
সুখসাধ্যং মতং সাধ্যং কৃচ্ছ্রসাধ্যমথাপি চ| দ্বিবিধং চাপ্যসাধ্যং স্যাদ্যাপ্যং যচ্চানুপক্রমম্ ||৯|| সাধ্যানাং ত্রিবিধশ্চাল্পমধ্যমোত্কৃষ্টতাং প্রতি| বিকল্পো, ন ত্বসাধ্যানাং নিযতানাং বিকল্পনা||১০||
सुखसाध्यं मतं साध्यं कृच्छ्रसाध्यमथापि च| द्विविधं चाप्यसाध्यं स्याद्याप्यं यच्चानुपक्रमम् ||९|| साध्यानां त्रिविधश्चाल्पमध्यमोत्कृष्टतां प्रति| विकल्पो, न त्वसाध्यानां नियतानां विकल्पना||१०||
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Adhikarana 8 (11-13) · Śloka 13
হেতবঃ পূর্বরূপাণি রূপাণ্যল্পানি যস্য চ| ন চ তুল্যগুণো দূষ্যো ন দোষঃ প্রকৃতির্ভবেত্||১১|| ন চ কালগুণস্তুল্যো ন দেশো দুরুপক্রমঃ| গতিরেকা নবত্বং চ রোগস্যোপদ্রবো ন চ||১২|| দোষশ্চৈকঃ সমুত্পত্তৌ দেহঃ সর্বৌষধক্ষমঃ| চতুষ্পাদোপপত্তিশ্চ সুখসাধ্যস্য লক্ষণম্||১৩||
हेतवः पूर्वरूपाणि रूपाण्यल्पानि यस्य च| न च तुल्यगुणो दूष्यो न दोषः प्रकृतिर्भवेत्||११|| न च कालगुणस्तुल्यो न देशो दुरुपक्रमः| गतिरेका नवत्वं च रोगस्योपद्रवो न च||१२|| दोषश्चैकः समुत्पत्तौ देहः सर्वौषधक्षमः| चतुष्पादोपपत्तिश्च सुखसाध्यस्य लक्षणम्||१३||
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Adhikarana 9 (14-16) · Śloka 16
নিমিত্তপূর্বরূপাণাং রূপাণাং মধ্যমে বলে| কালপ্রকৃতিদূষ্যাণাং সামান্যেঽন্যতমস্য চ||১৪|| গর্ভিণীবৃদ্ধবালানাং নাত্যুপদ্রবপীডিতম্| শস্ত্রক্ষারাগ্নিকৃত্যানামনবং কৃচ্ছ্রদেশজম্||১৫|| বিদ্যাদেকপথং রোগং নাতিপূর্ণচতুষ্পদম্| দ্বিপথং নাতিকালং বা কৃচ্ছ্রসাধ্যং দ্বিদোষজম্||১৬||
निमित्तपूर्वरूपाणां रूपाणां मध्यमे बले| कालप्रकृतिदूष्याणां सामान्येऽन्यतमस्य च||१४|| गर्भिणीवृद्धबालानां नात्युपद्रवपीडितम्| शस्त्रक्षाराग्निकृत्यानामनवं कृच्छ्रदेशजम्||१५|| विद्यादेकपथं रोगं नातिपूर्णचतुष्पदम्| द्विपथं नातिकालं वा कृच्छ्रसाध्यं द्विदोषजम्||१६||
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Adhikarana 10 (17-18) · Śloka 19
শেষত্বাদাযুষো যাপ্যমসাধ্যং পথ্যসেবযা| লব্ধাল্পসুখমল্পেন হেতুনাঽঽশুপ্রবর্তকম্||১৭|| গম্ভীরং বহুধাতুস্থং মর্মসন্ধিসমাশ্রিতম্| নিত্যানুশাযিনং রোগং দীর্ঘকালমবস্থিতম্||১৮|| বিদ্যাদ্দ্বিদোষজং,...|১৯|
शेषत्वादायुषो याप्यमसाध्यं पथ्यसेवया| लब्धाल्पसुखमल्पेन हेतुनाऽऽशुप्रवर्तकम्||१७|| गम्भीरं बहुधातुस्थं मर्मसन्धिसमाश्रितम्| नित्यानुशायिनं रोगं दीर्घकालमवस्थितम्||१८|| विद्याद्द्विदोषजं,...|१९|
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Adhikarana 11 (19-20) · Śloka 20
...তদ্বত্ প্রত্যাখ্যেযং ত্রিদোষজম্| ক্রিযাপথমতিক্রান্তং সর্বমার্গানুসারিণম্||১৯|| ঔত্সুক্যারতিসম্মোহকরমিন্দ্রিযনাশনম্| দুর্বলস্য সুসংবৃদ্ধং ব্যাধিং সারিষ্টমেব চ||২০||
...तद्वत् प्रत्याख्येयं त्रिदोषजम्| क्रियापथमतिक्रान्तं सर्वमार्गानुसारिणम्||१९|| औत्सुक्यारतिसम्मोहकरमिन्द्रियनाशनम्| दुर्बलस्य सुसंवृद्धं व्याधिं सारिष्टमेव च||२०||
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Adhikarana 12 (21-22) · Śloka 22
ভিষজা প্রাক্ পরীক্ষ্যৈবং বিকারাণাং স্বলক্ষণম্| পশ্চাত্কর্মসমারম্ভঃ কার্যঃ সাধ্যেষু ধীমতা||২১|| সাধ্যাসাধ্যবিভাগজ্ঞো যঃ সম্যক্প্রতিপত্তিমান্| ন স মৈত্রেযতুল্যানাং মিথ্যাবুদ্ধিং প্রকল্পযেত্||২২||
भिषजा प्राक् परीक्ष्यैवं विकाराणां स्वलक्षणम्| पश्चात्कर्मसमारम्भः कार्यः साध्येषु धीमता||२१|| साध्यासाध्यविभागज्ञो यः सम्यक्प्रतिपत्तिमान्| न स मैत्रेयतुल्यानां मिथ्याबुद्धिं प्रकल्पयेत्||२२||
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Adhikarana 13 (23-24) · Śloka 24
তত্র শ্লোকৌ- ইহৌষধং পাদগুণাঃ প্রভবো ভেষজাশ্রযঃ| আত্রেযমৈত্রেযমতী মতিদ্বৈবিধ্যনিশ্চযঃ||২৩|| চতুর্বিধবিকল্পাশ্চ ব্যাধযঃ স্বস্বলক্ষণাঃ| উক্তা মহাচতুষ্পাদে যেষ্বাযত্তং ভিষগ্জিতম্||২৪||
तत्र श्लोकौ- इहौषधं पादगुणाः प्रभवो भेषजाश्रयः| आत्रेयमैत्रेयमती मतिद्वैविध्यनिश्चयः||२३|| चतुर्विधविकल्पाश्च व्याधयः स्वस्वलक्षणाः| उक्ता महाचतुष्पादे येष्वायत्तं भिषग्जितम्||२४||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 10
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে শ্লোকস্থানে মহাচতুষ্পাদো নাম দশমোঽধ্যাযঃ||১০||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते श्लोकस्थाने महाचतुष्पादो नाम दशमोऽध्यायः||१०||
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