Adhikarana mUtrAghAtanidAnam (1) · Śloka 1
অথ মূত্রাঘাতনিদানম্ |
জাযন্তে কুপিতৈর্দোষৈর্মূত্রাঘাতাস্ত্রযোদশ |
প্রাযো মূত্রবিঘাতাদ্যৈর্বাতকুণ্ডলিকাদযঃ ||১||
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अथ मूत्राघातनिदानम् |
जायन्ते कुपितैर्दोषैर्मूत्राघातास्त्रयोदश |
प्रायो मूत्रविघाताद्यैर्वातकुण्डलिकादयः ||१||
Adhikarana vAtakuNDalikAlakShaNam (2-3) · Śloka 3
রৌক্ষ্যাদ্বেগবিঘাতাদ্বা বাযুর্বস্তৌ সবেদনঃ |
মূত্রমাবিশ্য চরতি বিগুণঃ কুণ্ডলীকৃতঃ ||২||
মূত্রমল্পাল্পমথবা সরুজং সম্প্রবর্ততে |
বাতকুণ্ডলিকাং তাং তু ব্যাধিং বিদ্যাত্ সুদারুণম্ ||৩||
(সু. উ. তং. অ. ৫৮) |
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रौक्ष्याद्वेगविघाताद्वा वायुर्बस्तौ सवेदनः |
मूत्रमाविश्य चरति विगुणः कुण्डलीकृतः ||२||
मूत्रमल्पाल्पमथवा सरुजं सम्प्रवर्तते |
वातकुण्डलिकां तां तु व्याधिं विद्यात् सुदारुणम् ||३||
(सु. उ. तं. अ. ५८) |
Adhikarana aShThIlAlakShaNam (4) · Śloka 4
আধ্মাপযন্ বস্তিগুদং রুদ্ধ্বা বাযুশ্চলোন্নতাম্ |
কুর্যাত্তীব্রার্তিমষ্ঠীলাং মূত্রবিণ্মার্গরোধিনীম্ ||৪||
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आध्मापयन् बस्तिगुदं रुद्ध्वा वायुश्चलोन्नताम् |
कुर्यात्तीव्रार्तिमष्ठीलां मूत्रविण्मार्गरोधिनीम् ||४||
Adhikarana vAtabastilakShaNam (5-6) · Śloka 6
বেগং বিধারযেদ্যস্তু মূত্রস্যাকুশলো নরঃ |
নিরুণদ্ধি মুখং তস্য বস্তের্বস্তিগতোঽনিলঃ ||৫||
মূত্রসঙ্গো ভবেত্তেন বস্তিকুক্ষিনিপীডিতঃ |
বাতবস্তিঃ স বিজ্ঞেযো ব্যাধিঃ কৃচ্ছ্রপ্রসাধনঃ ||৬||
(সু. উ. তং. অ. ৫৮) |
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वेगं विधारयेद्यस्तु मूत्रस्याकुशलो नरः |
निरुणद्धि मुखं तस्य बस्तेर्बस्तिगतोऽनिलः ||५||
मूत्रसङ्गो भवेत्तेन बस्तिकुक्षिनिपीडितः |
वातबस्तिः स विज्ञेयो व्याधिः कृच्छ्रप्रसाधनः ||६||
(सु. उ. तं. अ. ५८) |
Adhikarana mUtrAtItalakShaNam (7) · Śloka 7
চিরং ধারযতো মূত্রং ত্বরযা ন প্রবর্ততে |
মেহমানস্য মন্দং বা মূত্রাতীতঃ স উচ্যতে ||৭||
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चिरं धारयतो मूत्रं त्वरया न प्रवर्तते |
मेहमानस्य मन्दं वा मूत्रातीतः स उच्यते ||७||
Adhikarana mUtrajaTharalakShaNam (8-9) · Śloka 9
মূত্রস্য বেগেঽভিহতে তদুদাবর্তহেতুকঃ |
অপানঃ কুপিতো বাযুরুদরং পূরযেদ্ভৃশম্ ||৮||
নাভেরধস্তাদাধ্মানং জনযেত্তীব্রবেদনম্ |
তন্মূত্রজঠরং বিদ্যাদধোবস্তিনিরোধনম্ ||৯||
(সু. উ. তং. অ. ৫৮) |
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मूत्रस्य वेगेऽभिहते तदुदावर्तहेतुकः |
अपानः कुपितो वायुरुदरं पूरयेद्भृशम् ||८||
नाभेरधस्तादाध्मानं जनयेत्तीव्रवेदनम् |
तन्मूत्रजठरं विद्यादधोबस्तिनिरोधनम् ||९||
(सु. उ. तं. अ. ५८) |
Adhikarana mUtrotsa~ggalakShaNam (10-11) · Śloka 11
বস্তৌ বাঽপ্যথবা নালে মণৌ বা যস্য দেহিনঃ |
মূত্রং প্রবৃত্তং সজ্জেত সরক্তং বা প্রবাহতঃ ||১০||
স্রবেচ্ছনৈরল্পমল্পং সরুজং বাঽথ নীরুজম্ |
বিগুণানিলজো ব্যাধিঃ স মূত্রোত্সঙ্গসঞ্জ্ঞিতঃ ||১১||
(সু. উ. তং. অ. ৫৮) |
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बस्तौ वाऽप्यथवा नाले मणौ वा यस्य देहिनः |
मूत्रं प्रवृत्तं सज्जेत सरक्तं वा प्रवाहतः ||१०||
स्रवेच्छनैरल्पमल्पं सरुजं वाऽथ नीरुजम् |
विगुणानिलजो व्याधिः स मूत्रोत्सङ्गसञ्ज्ञितः ||११||
(सु. उ. तं. अ. ५८) |
Adhikarana mUtrakShayalakShaNam (12) · Śloka 12
রূক্ষস্য ক্লান্তদেহস্য বস্তিস্থৌ পিত্তমারুতৌ |
মূত্রক্ষযং সরুগ্দাহং জনযেতাং তদাহ্বযম্ ||১২||
(সু. উ. তং. অ. ৫৮) |
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रूक्षस्य क्लान्तदेहस्य बस्तिस्थौ पित्तमारुतौ |
मूत्रक्षयं सरुग्दाहं जनयेतां तदाह्वयम् ||१२||
(सु. उ. तं. अ. ५८) |
Adhikarana mUtragranthilakShaNam (13) · Śloka 13
অন্তর্বস্তিমুখে বৃত্তঃ স্থিরোঽল্পঃ সহসা ভবেত্ |
অশ্মরীতুল্যরুগ্গ্রন্থির্মূত্রগ্রন্থিঃ স উচ্যতে ||১৩||
(বা. নি. অ. ৯) |
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अन्तर्बस्तिमुखे वृत्तः स्थिरोऽल्पः सहसा भवेत् |
अश्मरीतुल्यरुग्ग्रन्थिर्मूत्रग्रन्थिः स उच्यते ||१३||
(वा. नि. अ. ९) |
Adhikarana mUtrashukralakShaNam (14) · Śloka 14
মূত্রিতস্য স্ত্রিযং যাতো বাযুনা শুক্রমুদ্ধতম্ |
স্থানাচ্চ্যুতং মূত্রযতঃ প্রাক্ পশ্চাদ্বা প্রবর্ততে ||১৪||
ভস্মোদকপ্রতীকাশং মূত্রশুক্রং তদুচ্যতে |
(বা. নি. অ. ৯) |
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मूत्रितस्य स्त्रियं यातो वायुना शुक्रमुद्धतम् |
स्थानाच्च्युतं मूत्रयतः प्राक् पश्चाद्वा प्रवर्तते ||१४||
भस्मोदकप्रतीकाशं मूत्रशुक्रं तदुच्यते |
(वा. नि. अ. ९) |
Adhikarana uShNavAtalakShaNam (15-16) · Śloka 16
ব্যাযামাধ্বাতপৈঃ পিত্তং বস্তিং প্রাপ্যানিলান্বিতম্ ||১৫||
বস্তিং মেঢ্রং গুদং চৈব প্রদহেত্ স্রাবযেদধঃ |
মূত্রং হারিদ্রমথবা সরক্তং রক্তমেব বা ||১৬||
কৃচ্ছ্রাত্ পুনঃ পুনর্জন্তোরুষ্ণবাতং ব্রুবন্তি তম্ |
(সু. উ. তং. অ. ৫৮) |
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व्यायामाध्वातपैः पित्तं बस्तिं प्राप्यानिलान्वितम् ||१५||
बस्तिं मेढ्रं गुदं चैव प्रदहेत् स्रावयेदधः |
मूत्रं हारिद्रमथवा सरक्तं रक्तमेव वा ||१६||
कृच्छ्रात् पुनः पुनर्जन्तोरुष्णवातं ब्रुवन्ति तम् |
(सु. उ. तं. अ. ५८) |
Adhikarana mUtrasAdalakShaNam (17-18) · Śloka 18
পিত্তং কফো দ্বাবপি বা সংহন্যেতেঽনিলেন চেত্ ||১৭||
কৃচ্ছ্রান্মূত্রং তদা পীতং শ্বেতং রক্তং ঘনং সৃজেত্ |
সদাহং রোচনাশঙ্খচূর্ণবর্ণং ভবেত্তু তত্ ||১৮||
শুষ্কং সমস্তবর্ণং বা মূত্রসাদং বদন্তি তম্ |
(বা. নি. অ. ৯) |
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पित्तं कफो द्वावपि वा संहन्येतेऽनिलेन चेत् ||१७||
कृच्छ्रान्मूत्रं तदा पीतं श्वेतं रक्तं घनं सृजेत् |
सदाहं रोचनाशङ्खचूर्णवर्णं भवेत्तु तत् ||१८||
शुष्कं समस्तवर्णं वा मूत्रसादं वदन्ति तम् |
(वा. नि. अ. ९) |
Adhikarana viDvighAtalakShaNam (19-20) · Śloka 20
রূক্ষদুর্বলযোর্বাতেনোদাবৃত্তং শকৃদ্যদা ||১৯||
মূত্রস্রোতোঽনুপদ্যেত বিট্সংসৃষ্টং তদা নরঃ |
বিড্গন্ধং মূত্রযেত্ কৃচ্ছ্রাদ্বিড্বিঘাতং বিনির্দিশেত্ ||২০||
(বা. নি. অ. ৯) |
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रूक्षदुर्बलयोर्वातेनोदावृत्तं शकृद्यदा ||१९||
मूत्रस्रोतोऽनुपद्येत विट्संसृष्टं तदा नरः |
विड्गन्धं मूत्रयेत् कृच्छ्राद्विड्विघातं विनिर्दिशेत् ||२०||
(वा. नि. अ. ९) |
Adhikarana bastikuNDalalakShaNam (21-22) · Śloka 24
দ্রুতাধ্বলঙ্ঘনাযাসৈরভিঘাতাত্ প্রপীডনাত্ |
স্বস্থানাদ্বস্তিরুদ্বৃত্তঃ স্থূলস্তিষ্ঠতি গর্ভবত্ ||২১||
শূলস্পন্দনদাহার্তো বিন্দুং বিন্দুং স্রবত্যপি |
পীডিতস্তু সৃজেদ্ধারাং সংস্তম্ভোদ্বেষ্টনার্তিমান্ ||২২||
বস্তিকুণ্ডলমাহুস্তং ঘোরং শস্ত্রবিষোপমম্ |
পবনপ্রবলং প্রাযো দুর্নিবারমবুদ্ধিভিঃ |২৪|
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द्रुताध्वलङ्घनायासैरभिघातात् प्रपीडनात् |
स्वस्थानाद्बस्तिरुद्वृत्तः स्थूलस्तिष्ठति गर्भवत् ||२१||
शूलस्पन्दनदाहार्तो बिन्दुं बिन्दुं स्रवत्यपि |
पीडितस्तु सृजेद्धारां संस्तम्भोद्वेष्टनार्तिमान् ||२२||
बस्तिकुण्डलमाहुस्तं घोरं शस्त्रविषोपमम् |
पवनप्रबलं प्रायो दुर्निवारमबुद्धिभिः |२४|
Adhikarana bastikuNDalasya doShAntarasaMsRuShTasya lakShaNam (23) · Śloka 24
তস্মিন্ পিত্তান্বিতে দাহঃ শূলং মূত্রবিবর্ণতা ||২৩||
শ্লেষ্মণা গৌরবং শোথঃ স্নিগ্ধং মূত্রং ঘনং সিতম্ |২৪|
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तस्मिन् पित्तान्विते दाहः शूलं मूत्रविवर्णता ||२३||
श्लेष्मणा गौरवं शोथः स्निग्धं मूत्रं घनं सितम् |२४|
Adhikarana bastikuNDalasya sAdhyAsAdhyavicAraH (24) · Śloka 25
শ্লেষ্মরুদ্ধবিলো বস্তিঃ পিত্তোদীর্ণো ন সিধ্যতি ||২৪||
অবিভ্রান্তবিলঃ সাধ্যো, ন তু যঃ কুণ্ডলীকৃতঃ |২৫|
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श्लेष्मरुद्धबिलो बस्तिः पित्तोदीर्णो न सिध्यति ||२४||
अविभ्रान्तबिलः साध्यो, न तु यः कुण्डलीकृतः |२५|
Adhikarana kuNDalIbhUtabasterlakShaNam (25) · Śloka 25
স্যাদ্বস্তৌ কুণ্ডলীভূতে তৃণ্মোহঃ শ্বাস এব চ ||২৫||
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स्याद्बस्तौ कुण्डलीभूते तृण्मोहः श्वास एव च ||२५||
Adhikarana puShpikA · Śloka 31
ইতি শ্রীমাধবকরবিরচিতে মাধবনিদানে মূত্রাঘাতনিদানং সমাপ্তম্ ||৩১||
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इति श्रीमाधवकरविरचिते माधवनिदाने मूत्राघातनिदानं समाप्तम् ||३१||