Adhikarana visarpanidAnaM, sa~gkhyA, niruktishca (1-3) · Śloka 4
অথ বিসর্পনিদানম্ |
লবণাম্লকটূষ্ণাদিসংসেবাদোষকোপতঃ |
বিসর্পঃ সপ্তধা জ্ঞেযঃ সর্বতঃ পরিসর্পণাত্ ||১||
পৃথক্ ত্রযস্ত্রিভিশ্চৈকো বিসর্পা দ্বন্দ্বজাস্ত্রযঃ |
বাতিকঃ পৈত্তিকশ্চৈব কফজঃ সান্নিপাতিকঃ ||২||
চত্বার এতে বীসর্পা বক্ষ্যন্তে দ্বন্দ্বজাস্ত্রযঃ |
আগ্নেযো বাতপিত্তাভ্যাং গ্রন্থ্যাখ্যঃ কফবাতজঃ ||৩||
যস্তু কর্দমকো ঘোরঃ স পিত্তকফসম্ভবঃ |৪|
(চ. চি. অ. ২১) |
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अथ विसर्पनिदानम् |
लवणाम्लकटूष्णादिसंसेवादोषकोपतः |
विसर्पः सप्तधा ज्ञेयः सर्वतः परिसर्पणात् ||१||
पृथक् त्रयस्त्रिभिश्चैको विसर्पा द्वन्द्वजास्त्रयः |
वातिकः पैत्तिकश्चैव कफजः सान्निपातिकः ||२||
चत्वार एते वीसर्पा वक्ष्यन्ते द्वन्द्वजास्त्रयः |
आग्नेयो वातपित्ताभ्यां ग्रन्थ्याख्यः कफवातजः ||३||
यस्तु कर्दमको घोरः स पित्तकफसम्भवः |४|
(च. चि. अ. २१) |
Adhikarana visarpadoShadUShyasa~ggrahaH (4-7) · Śloka 7
রক্তং লসীকা ত্বঙ্মাংসং দূষ্যং দোষাস্ত্রযো মলাঃ ||৪||
বিসর্পাণাং সমুত্পত্তৌ বিজ্ঞেযাঃ সপ্ত ধাতবঃ |
(চ. চি. অ. ২১) তত্র বাতাত্ স বীসর্পো বাতজ্বরসমব্যথঃ ||৫||
শোথস্ফুরণনিস্তোদভেদাযাসার্তিহর্ষবান্ |
পিত্তাদ্দ্রুতগতিঃ পিত্তজ্বরলিঙ্গোঽতিলোহিতঃ ||৬||
কফাত্ কণ্ডূযুতঃ স্নিগ্ধঃ কফজ্বরসমানরুক্ |
(বা. নি. অ. ১৩) |
সন্নিপাতসমুত্থশ্চ সর্বলিঙ্গসমন্বিতঃ ||৭||
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रक्तं लसीका त्वङ्मांसं दूष्यं दोषास्त्रयो मलाः ||४||
विसर्पाणां समुत्पत्तौ विज्ञेयाः सप्त धातवः |
(च. चि. अ. २१) तत्र वातात् स वीसर्पो वातज्वरसमव्यथः ||५||
शोथस्फुरणनिस्तोदभेदायासार्तिहर्षवान् |
पित्ताद्द्रुतगतिः पित्तज्वरलिङ्गोऽतिलोहितः ||६||
कफात् कण्डूयुतः स्निग्धः कफज्वरसमानरुक् |
(वा. नि. अ. १३) |
सन्निपातसमुत्थश्च सर्वलिङ्गसमन्वितः ||७||
Adhikarana AgneyavisarpalakShaNam (8-13) · Śloka 13
বাতপিত্তাজ্জ্বরচ্ছর্দিমূর্ছাতীসারতৃড্ভ্রমৈঃ |
গ্রন্থিভেদাগ্নিসদনতমকারোচকৈর্যুতঃ ||৮||
করোতি সর্বমঙ্গং চ দীপ্তাঙ্গারাবকীর্ণবত্ |
যং যং দেশং বিসর্পশ্চ বিসর্পতি ভবেত্ স সঃ ||৯||
শান্তাঙ্গারাসিতো নীলো রক্তো বাঽঽশু চ চীযতে |
অগ্নিদগ্ধ ইব স্ফোটৈঃ শীঘ্রগত্বাদ্দ্রুতং স চ ||১০||
মর্মানুসারী বীসর্পঃ স্যাদ্বাতোঽতিবলস্ততঃ |
ব্যথতেঽঙ্গং হরেত্ সঞ্জ্ঞাং নিদ্রাং চ শ্বাসমীরযেত্ ||১১||
হিক্কাং চ স গতোঽবস্থামীদৃশীং লভতে ন না |
ক্বচিচ্ছর্মারতিগ্রস্তো ভূমিশয্যাসনাদিষু ||১২||
চেষ্টমানস্ততঃ ক্লিষ্টো মনোদেহপ্রমোহবান্ |
দুষ্প্রবোধোঽশ্নুতে নিদ্রাং সোঽগ্নিবীসর্প উচ্যতে ||১৩||
(বা. নি. অ. ১৩) |
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वातपित्ताज्ज्वरच्छर्दिमूर्छातीसारतृड्भ्रमैः |
ग्रन्थिभेदाग्निसदनतमकारोचकैर्युतः ||८||
करोति सर्वमङ्गं च दीप्ताङ्गारावकीर्णवत् |
यं यं देशं विसर्पश्च विसर्पति भवेत् स सः ||९||
शान्ताङ्गारासितो नीलो रक्तो वाऽऽशु च चीयते |
अग्निदग्ध इव स्फोटैः शीघ्रगत्वाद्द्रुतं स च ||१०||
मर्मानुसारी वीसर्पः स्याद्वातोऽतिबलस्ततः |
व्यथतेऽङ्गं हरेत् सञ्ज्ञां निद्रां च श्वासमीरयेत् ||११||
हिक्कां च स गतोऽवस्थामीदृशीं लभते न ना |
क्वचिच्छर्मारतिग्रस्तो भूमिशय्यासनादिषु ||१२||
चेष्टमानस्ततः क्लिष्टो मनोदेहप्रमोहवान् |
दुष्प्रबोधोऽश्नुते निद्रां सोऽग्निवीसर्प उच्यते ||१३||
(वा. नि. अ. १३) |
Adhikarana granthivisarpalakShaNam (14-16) · Śloka 17
কফেন রুদ্ধঃ পবনো ভিত্ত্বা তং বহুধা কফম্ |
রক্তং বা বৃদ্ধরক্তস্য ত্বক্সিরাস্নাযুমাংসগম্ ||১৪||
দূষযিত্বা তু দীর্ঘাণুবৃত্তস্থূলখরাত্মনাম্ |
গ্রন্থীনাং কুরুতে মালাং সরক্তাং তীব্ররুগ্জ্বরাম্ ||১৫||
শ্বাসকাসাতিসারাস্যশোষহিক্কাবমিভ্রমৈঃ |
মোহবৈবর্ণ্যমূর্ছাঙ্গভঙ্গাগ্নিসদনৈর্যুতাম্ ||১৬||
ইত্যযং গ্রন্থিবীসর্পঃ কফমারুতকোপজঃ |১৭|
(বা. নি. অ. ১৩) |
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कफेन रुद्धः पवनो भित्त्वा तं बहुधा कफम् |
रक्तं वा वृद्धरक्तस्य त्वक्सिरास्नायुमांसगम् ||१४||
दूषयित्वा तु दीर्घाणुवृत्तस्थूलखरात्मनाम् |
ग्रन्थीनां कुरुते मालां सरक्तां तीव्ररुग्ज्वराम् ||१५||
श्वासकासातिसारास्यशोषहिक्कावमिभ्रमैः |
मोहवैवर्ण्यमूर्छाङ्गभङ्गाग्निसदनैर्युताम् ||१६||
इत्ययं ग्रन्थिवीसर्पः कफमारुतकोपजः |१७|
(वा. नि. अ. १३) |
Adhikarana kardamavisarpalakShaNam (17-21) · Śloka 22
কফপিত্তাজ্জ্বরঃ স্তম্ভো নিদ্রা তন্দ্রা শিরোরুজা ||১৭||
অঙ্গাবসাদবিক্ষেপৌ প্রলেপারোচকভ্রমাঃ |
মূর্ছাগ্নিহানির্ভেদোঽস্থ্নাং পিপাসেন্দ্রিযগৌরবম্ ||১৮||
আমোপবেশনং লেপঃ স্রোতসাং স চ সর্পতি |
প্রাযেণামাশযং গৃহ্ণন্নেকদেশং ন চাতিরুক্ ||১৯||
পিডকৈরবকীর্ণোঽতিপীতলোহিতপাণ্ডুরৈঃ |
স্নিগ্ধোঽসিতো মেচকাভো মলিনঃ শোথবান্ গুরুঃ ||২০||
গম্ভীরপাকঃ প্রাজ্যোষ্মা স্পৃষ্টঃ ক্লিন্নোঽবদীর্যতে |
পঙ্কবচ্ছীর্ণমাংসশ্চ স্পষ্টস্নাযুসিরাগণঃ ||২১||
শবগন্ধী চ বীসর্পঃ কর্দমাখ্যমুশন্তি তম্ |২২|
(বা. নি. অ. ১৩) |
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कफपित्ताज्ज्वरः स्तम्भो निद्रा तन्द्रा शिरोरुजा ||१७||
अङ्गावसादविक्षेपौ प्रलेपारोचकभ्रमाः |
मूर्छाग्निहानिर्भेदोऽस्थ्नां पिपासेन्द्रियगौरवम् ||१८||
आमोपवेशनं लेपः स्रोतसां स च सर्पति |
प्रायेणामाशयं गृह्णन्नेकदेशं न चातिरुक् ||१९||
पिडकैरवकीर्णोऽतिपीतलोहितपाण्डुरैः |
स्निग्धोऽसितो मेचकाभो मलिनः शोथवान् गुरुः ||२०||
गम्भीरपाकः प्राज्योष्मा स्पृष्टः क्लिन्नोऽवदीर्यते |
पङ्कवच्छीर्णमांसश्च स्पष्टस्नायुसिरागणः ||२१||
शवगन्धी च वीसर्पः कर्दमाख्यमुशन्ति तम् |२२|
(वा. नि. अ. १३) |
Adhikarana kShatavisarpalakShaNam (22-24) · Śloka 24
বাহ্যহেতোঃ ক্ষতাত্ ক্রুদ্ধঃ সরক্তং পিত্তমীরযন্ ||২২||
বীসর্পং মারুতঃ কুর্যাত্ কুলত্থসদৃশৈশ্চিতম্ |
স্ফোটৈঃ শোথজ্বররুজাদাহাঢ্যং শ্যাবশোণিতম্ ||২৩||
(বা. নি. অ. ১৩) |
জ্বরাতিসারৌ বমথুস্ত্বঙ্মাংসদরণং ক্লমঃ |
অরোচকাবিপাকৌ চ বিসর্পাণামুপদ্রবাঃ ||২৪||
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बाह्यहेतोः क्षतात् क्रुद्धः सरक्तं पित्तमीरयन् ||२२||
वीसर्पं मारुतः कुर्यात् कुलत्थसदृशैश्चितम् |
स्फोटैः शोथज्वररुजादाहाढ्यं श्यावशोणितम् ||२३||
(वा. नि. अ. १३) |
ज्वरातिसारौ वमथुस्त्वङ्मांसदरणं क्लमः |
अरोचकाविपाकौ च विसर्पाणामुपद्रवाः ||२४||
Adhikarana visarpasya sAdhyAsAdhyavicAraH (25) · Śloka 25
সিধ্যন্তি বাতকফপিত্তকৃতা বিসর্পাঃ সর্বাত্মকঃ ক্ষতকৃতশ্চ ন সিদ্ধিমেতি |
পিত্তাত্মকোঽঞ্জনবপুশ্চ ভবেদসাধ্যঃ কৃচ্ছ্রাশ্চ মর্মসু ভবন্তি হি সর্ব এব ||২৫||
(সু. নি. অ. ১০) |
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सिध्यन्ति वातकफपित्तकृता विसर्पाः सर्वात्मकः क्षतकृतश्च न सिद्धिमेति |
पित्तात्मकोऽञ्जनवपुश्च भवेदसाध्यः कृच्छ्राश्च मर्मसु भवन्ति हि सर्व एव ||२५||
(सु. नि. अ. १०) |
Adhikarana puShpikA · Śloka 52
ইতি শ্রীমাধবকরবিরচিতে মাধবনিদানে বিসর্পনিদানং সমাপ্তম্ ||৫২||
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इति श्रीमाधवकरविरचिते माधवनिदाने विसर्पनिदानं समाप्तम् ||५२||