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AYANAAYURVEDAby Dr Vijaya Dwarampudi
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8. bhagandaracikitsitam

Adhikarana 1 (1-3) · Śloka 3

অথাতো ভগন্দরাণাং চিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২|| পঞ্চ ভগন্দরা ব্যাখ্যাতাঃ , তেষ্বসাধ্যঃ শম্বূকাবর্তঃ শল্যনিমিত্তশ্চ; শেষাঃ কৃচ্ছ্রসাধ্যাঃ ||৩||

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अथातो भगन्दराणां चिकित्सितं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२|| पञ्च भगन्दरा व्याख्याताः , तेष्वसाध्यः शम्बूकावर्तः शल्यनिमित्तश्च; शेषाः कृच्छ्रसाध्याः ||३||

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Adhikarana 2 (4) · Śloka 4

তত্র ভগন্দরপিডকোপদ্রুতমাতুরমপতর্পণাদিবিরেচনান্তেনৈকাদশবিধেনোপক্রমেণোপক্রমেতাপক্বপিডকং, পক্বেষু চোপস্নিগ্ধমবগাহস্বিন্নং শয্যাযাং সন্নিবেশ্যার্শসমিব যন্ত্রযিত্বা, ভগন্দরং সমীক্ষ্য পরাচীনমবাচীনং বা, ততঃ প্রণিধাযৈষণীমুন্নম্য সাশযমুদ্ধরেচ্ছস্ত্রেণ; অন্তর্মুখে চৈবং সম্যগ্যন্ত্রং প্রণিধায প্রবাহমাণস্য ভগন্দরমুখমাসাদ্যৈষণীং দত্ত্বা শস্ত্রং পাতযেত্; আসাদ্য বাঽগ্নিং ক্ষারং চেতি; এতত্ সামান্যং সর্বেষু ||৪||

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तत्र भगन्दरपिडकोपद्रुतमातुरमपतर्पणादिविरेचनान्तेनैकादशविधेनोपक्रमेणोपक्रमेतापक्वपिडकं, पक्वेषु चोपस्निग्धमवगाहस्विन्नं शय्यायां सन्निवेश्यार्शसमिव यन्त्रयित्वा, भगन्दरं समीक्ष्य पराचीनमवाचीनं वा, ततः प्रणिधायैषणीमुन्नम्य साशयमुद्धरेच्छस्त्रेण; अन्तर्मुखे चैवं सम्यग्यन्त्रं प्रणिधाय प्रवाहमाणस्य भगन्दरमुखमासाद्यैषणीं दत्त्वा शस्त्रं पातयेत्; आसाद्य वाऽग्निं क्षारं चेति; एतत् सामान्यं सर्वेषु ||४||

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Adhikarana 3 (5) · Śloka 5

বিশেষতস্তু- নাড্যন্তরে ব্রণান্ কুর্যাদ্ভিষক্ তু শতপোনকে | ততস্তেষূপরূঢেষু শেষা নাডীরুপাচরেত্ ||৫||

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विशेषतस्तु- नाड्यन्तरे व्रणान् कुर्याद्भिषक् तु शतपोनके | ततस्तेषूपरूढेषु शेषा नाडीरुपाचरेत् ||५||

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Adhikarana 4 (6-8) · Śloka 9

গতযোঽন্যোন্যসম্বদ্ধা বাহ্যাশ্ছেদ্যাস্ত্বনেকধা | নাডীরনভিসম্বদ্ধা যশ্ছিনত্ত্যেকধা ভিষক্ ||৬|| স কুর্যাদ্বিবৃতং জন্তোর্ব্রণং গুদবিদারণম্ | তস্য তদ্বিবৃতং মার্গং বিণ্মূত্রমনুগচ্ছতি ||৭|| আটোপং গুদশূলং চ করোতি পবনো ভৃশম্ | তত্রাধিগততন্ত্রোঽপি ভিষঙ্মুহ্যেদসংশযম্ ||৮|| তস্মান্ন বিবৃতঃ কার্যো ব্রণস্তু শতপোনকে |৯|

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गतयोऽन्योन्यसम्बद्धा बाह्याश्छेद्यास्त्वनेकधा | नाडीरनभिसम्बद्धा यश्छिनत्त्येकधा भिषक् ||६|| स कुर्याद्विवृतं जन्तोर्व्रणं गुदविदारणम् | तस्य तद्विवृतं मार्गं विण्मूत्रमनुगच्छति ||७|| आटोपं गुदशूलं च करोति पवनो भृशम् | तत्राधिगततन्त्रोऽपि भिषङ्मुह्येदसंशयम् ||८|| तस्मान्न विवृतः कार्यो व्रणस्तु शतपोनके |९|

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Adhikarana 5 (9-11) · Śloka 11

ব্যাধৌ তত্র বহুচ্ছিদ্রে ভিষজা বৈ বিজানতা ||৯|| অর্ধলাঙ্গলকশ্ছেদঃ কার্যো লাঙ্গলকোঽপি বা | সর্বতোভদ্রকো বাঽপি কার্যো গোতীর্থকোঽপি বা ||১০|| সর্বতঃ স্রাবমার্গাংস্তু দহেদ্বৈদ্যস্তথাঽগ্নিনা | সুকুমারস্য ভীরোর্হি দুষ্করঃ শতপোনকঃ ||১১||

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व्याधौ तत्र बहुच्छिद्रे भिषजा वै विजानता ||९|| अर्धलाङ्गलकश्छेदः कार्यो लाङ्गलकोऽपि वा | सर्वतोभद्रको वाऽपि कार्यो गोतीर्थकोऽपि वा ||१०|| सर्वतः स्रावमार्गांस्तु दहेद्वैद्यस्तथाऽग्निना | सुकुमारस्य भीरोर्हि दुष्करः शतपोनकः ||११||

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Adhikarana 6 (12-19) · Śloka 20

রুজাস্রাবাপহং তত্র স্বেদমাশু প্রযোজযেত্ | স্বেদদ্রব্যৈর্যথোদ্দিষ্টৈঃ কৃশরাপাযসাদিভিঃ ||১২|| গ্রাম্যানূপৌদকৈর্মাংসৈর্লাবাদ্যৈর্বাঽপি বিষ্কিরৈঃ | বৃক্ষাদনীমথৈরণ্ডং বিল্বাদিং চ গণং তথা ||১৩|| কষাযং সুকৃতং কৃত্বা স্নেহকুম্ভে নিষেচযেত্ | নাডীস্বেদেন তেনাস্য তং ব্রণং স্বেদযেদ্ভিষক্ ||১৪|| তিলৈরণ্ডাতসীমাষযবগোধূমসর্ষপান্ | লবণান্যম্লবর্গং চ স্থাল্যামেবোপসাধযেত্ ||১৫|| আতুরং স্বেদযেত্তেন তথা সিধ্যতি কুর্বতঃ | স্বিন্নং চ পাযযেদেনং কুষ্ঠং চ লবণানি চ ||১৬|| বচাহিঙ্গ্বজমোদং চ সমভাগানি সর্পিষা | মার্দ্বীকেনাথবাঽম্লেন সুরাসৌবীরকেণ বা ||১৭|| ততো মধুকতৈলেন তস্য সিঞ্চেদ্ভিষগ্ব্রণম্ | পরিষিঞ্চেদ্গুদং চাস্য তৈলৈর্বাতরুজাপহৈঃ ||১৮|| বিধিনাঽনেন বিণ্মূত্রং স্বমার্গমধিগচ্ছতি | অন্যে চোপদ্রবাস্তীব্রাঃ সিধ্যন্ত্যত্র ন সংশযঃ ||১৯|| শতপোনক আখ্যাত... |২০|

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रुजास्रावापहं तत्र स्वेदमाशु प्रयोजयेत् | स्वेदद्रव्यैर्यथोद्दिष्टैः कृशरापायसादिभिः ||१२|| ग्राम्यानूपौदकैर्मांसैर्लावाद्यैर्वाऽपि विष्किरैः | वृक्षादनीमथैरण्डं बिल्वादिं च गणं तथा ||१३|| कषायं सुकृतं कृत्वा स्नेहकुम्भे निषेचयेत् | नाडीस्वेदेन तेनास्य तं व्रणं स्वेदयेद्भिषक् ||१४|| तिलैरण्डातसीमाषयवगोधूमसर्षपान् | लवणान्यम्लवर्गं च स्थाल्यामेवोपसाधयेत् ||१५|| आतुरं स्वेदयेत्तेन तथा सिध्यति कुर्वतः | स्विन्नं च पाययेदेनं कुष्ठं च लवणानि च ||१६|| वचाहिङ्ग्वजमोदं च समभागानि सर्पिषा | मार्द्वीकेनाथवाऽम्लेन सुरासौवीरकेण वा ||१७|| ततो मधुकतैलेन तस्य सिञ्चेद्भिषग्व्रणम् | परिषिञ्चेद्गुदं चास्य तैलैर्वातरुजापहैः ||१८|| विधिनाऽनेन विण्मूत्रं स्वमार्गमधिगच्छति | अन्ये चोपद्रवास्तीव्राः सिध्यन्त्यत्र न संशयः ||१९|| शतपोनक आख्यात... |२०|

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Adhikarana 7 (20-22) · Śloka 23

...উষ্ট্রগ্রীবে ক্রিযাং শৃণু | অথোষ্ট্রগ্রীবমেষিত্বা ছিত্ত্বা ক্ষারং নিপাতযেত্ ||২০|| পূতিমাংসব্যপোহার্থমগ্নিরত্র ন পূজিতঃ | অথৈনং ঘৃতসংসৃষ্টৈস্তিলৈঃ পিষ্টৈঃ প্রলেপযেত্ ||২১|| বন্ধং ততোঽনুকুর্বীত পরিষেকং তু সর্পিষা | তৃতীযে দিবসে মুক্ত্বা যথাস্বং শোধযেদ্ভিষক্ ||২২|| ততঃ শুদ্ধং বিদিত্বা চ রোপযেত্তু যথাক্রমম্ |২৩|

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...उष्ट्रग्रीवे क्रियां शृणु | अथोष्ट्रग्रीवमेषित्वा छित्त्वा क्षारं निपातयेत् ||२०|| पूतिमांसव्यपोहार्थमग्निरत्र न पूजितः | अथैनं घृतसंसृष्टैस्तिलैः पिष्टैः प्रलेपयेत् ||२१|| बन्धं ततोऽनुकुर्वीत परिषेकं तु सर्पिषा | तृतीये दिवसे मुक्त्वा यथास्वं शोधयेद्भिषक् ||२२|| ततः शुद्धं विदित्वा च रोपयेत्तु यथाक्रमम् |२३|

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Adhikarana 8 (23-27) · Śloka 28

উত্কৃত্যাস্রাবমার্গংস্তু পরিস্রাবিণি বুদ্ধিমান্ ||২৩|| ক্ষারেণ বা স্রাবগতিং দহেদ্ধুতবহেন বা | সুখোষ্ণেনাণুতৈলেন সেচযেদ্গুদমণ্ডলম্ ||২৪|| উপনাহাঃ প্রদেহাশ্চ মূত্রক্ষারসমন্বিতাঃ | বামনীযৌষধৈঃ কার্যাঃ পরিষেকাশ্চ মাত্রযা ||২৫|| মৃদুভূতং বিদিত্বৈনমল্পস্রাবরুগন্বিতম্ | গতিমন্বিষ্য শস্ত্রেণ ছিন্দ্যাত্ খর্জূরপত্রকম্ ||২৬|| চন্দ্রার্ধং চন্দ্রচক্রং চ সূচীমুখমবাঙ্মুখম্ | ছিত্ত্বাঽগ্নিনা দহেত্ সম্যগেবং ক্ষারেণ বা পুনঃ ||২৭|| ততঃ সংশোধনৈরেব মৃদুপূর্বৈর্বিশোধযেত্ |২৮|

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उत्कृत्यास्रावमार्गंस्तु परिस्राविणि बुद्धिमान् ||२३|| क्षारेण वा स्रावगतिं दहेद्धुतवहेन वा | सुखोष्णेनाणुतैलेन सेचयेद्गुदमण्डलम् ||२४|| उपनाहाः प्रदेहाश्च मूत्रक्षारसमन्विताः | वामनीयौषधैः कार्याः परिषेकाश्च मात्रया ||२५|| मृदुभूतं विदित्वैनमल्पस्रावरुगन्वितम् | गतिमन्विष्य शस्त्रेण छिन्द्यात् खर्जूरपत्रकम् ||२६|| चन्द्रार्धं चन्द्रचक्रं च सूचीमुखमवाङ्मुखम् | छित्त्वाऽग्निना दहेत् सम्यगेवं क्षारेण वा पुनः ||२७|| ततः संशोधनैरेव मृदुपूर्वैर्विशोधयेत् |२८|

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Adhikarana 9 (28-29) · Śloka 29

বহিরন্তর্মুখশ্চাপি শিশোর্যস্য ভগন্দরঃ ||২৮|| তস্যাহিতং বিরেকাগ্নিশস্ত্রক্ষারাবচারণম্ | যদ্যন্মৃদু চ তীক্ষ্ণং চ তত্তত্তস্যাবচারযেত্ ||২৯||

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बहिरन्तर्मुखश्चापि शिशोर्यस्य भगन्दरः ||२८|| तस्याहितं विरेकाग्निशस्त्रक्षारावचारणम् | यद्यन्मृदु च तीक्ष्णं च तत्तत्तस्यावचारयेत् ||२९||

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Adhikarana 10 (30) · Śloka 31

আরগ্বধনিশাকালাচূর্ণং মধুঘৃতাপ্লুতম্ | অগ্রবর্তিপ্রণিহিতং ব্রণানাং শোধনং হিতম্ ||৩০|| যোগোঽযং নাশযত্যাশু গতিং মেঘমিবানিলঃ |৩১|

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आरग्वधनिशाकालाचूर्णं मधुघृताप्लुतम् | अग्रवर्तिप्रणिहितं व्रणानां शोधनं हितम् ||३०|| योगोऽयं नाशयत्याशु गतिं मेघमिवानिलः |३१|

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Adhikarana 11 (31-32) · Śloka 33

আগন্তুজে ভিষঙ্নাডীং শস্ত্রেণোত্কৃত্য যত্নতঃ ||৩১|| জম্ব্বোষ্ঠেনাগ্নিবর্ণেন তপ্তযা বা শলাকযা | দহেদ্যথোক্তং মতিমাংস্তং ব্রণং সুসমাহিতঃ ||৩২|| কৃমিঘ্নং চ বিধিং কুর্যাচ্ছল্যানযনমেব চ |৩৩|

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आगन्तुजे भिषङ्नाडीं शस्त्रेणोत्कृत्य यत्नतः ||३१|| जम्ब्वोष्ठेनाग्निवर्णेन तप्तया वा शलाकया | दहेद्यथोक्तं मतिमांस्तं व्रणं सुसमाहितः ||३२|| कृमिघ्नं च विधिं कुर्याच्छल्यानयनमेव च |३३|

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Adhikarana 12 (33) · Śloka 33

প্রত্যাখ্যাযৈষ চারভ্যো বর্জ্যশ্চাপি ত্রিদোষজঃ ||৩৩||

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प्रत्याख्यायैष चारभ्यो वर्ज्यश्चापि त्रिदोषजः ||३३||

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Adhikarana 13 (34-36) · Śloka 36

এতত্ কর্ম সমাখ্যাতং সর্বেষামনুপূর্বশঃ | এষাং তু শস্ত্রপতনাদ্বেদনা যত্র জাযতে ||৩৪|| তত্রাণুতৈলেনোষ্ণেন পরিষেকঃ প্রশস্যতে | বাতঘ্নৌষধসম্পূর্ণাং স্থালীং ছিদ্রশরাবিকাম্ ||৩৫|| স্নেহাভ্যক্তগুদস্তপ্তামধ্যাসীত সবাষ্পিকাম্ | নাড্যা বাঽস্যাহরেত্ স্বেদং শযানস্য রুজাপহম্ | উষ্ণোদকেঽবগাহ্যো বা তথা শাম্যতি বেদনা ||৩৬||

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एतत् कर्म समाख्यातं सर्वेषामनुपूर्वशः | एषां तु शस्त्रपतनाद्वेदना यत्र जायते ||३४|| तत्राणुतैलेनोष्णेन परिषेकः प्रशस्यते | वातघ्नौषधसम्पूर्णां स्थालीं छिद्रशराविकाम् ||३५|| स्नेहाभ्यक्तगुदस्तप्तामध्यासीत सबाष्पिकाम् | नाड्या वाऽस्याहरेत् स्वेदं शयानस्य रुजापहम् | उष्णोदकेऽवगाह्यो वा तथा शाम्यति वेदना ||३६||

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Adhikarana 14 (37) · Śloka 37

কদলীমৃগলোপাকপ্রিযকাজিনসম্ভৃতান্ | কারযেদুপনাহাংশ্চ সাল্বণাদীন্ বিচক্ষণঃ ||৩৭||

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कदलीमृगलोपाकप्रियकाजिनसम्भृतान् | कारयेदुपनाहांश्च साल्वणादीन् विचक्षणः ||३७||

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Adhikarana 15 (38) · Śloka 38

কটুত্রিকং বচাহিঙ্গুলবণান্যথ দীপ্যকম্ | পাযযেচ্চাম্লকৌলত্থসুরাসৌবীরকাদিভিঃ ||৩৮||

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कटुत्रिकं वचाहिङ्गुलवणान्यथ दीप्यकम् | पाययेच्चाम्लकौलत्थसुरासौवीरकादिभिः ||३८||

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Adhikarana 16 (39) · Śloka 40

জ্যোতিষ্মতীলাঙ্গলকীশ্যামাদন্তীত্রিবৃত্তিলাঃ | কুষ্ঠং শতাহ্বা গোলোমী তিল্বকো গিরিকর্ণিকা ||৩৯|| কাসীসং কাঞ্চনক্ষীর্যৌ বর্গঃ শোধন ইষ্যতে |৪০|

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ज्योतिष्मतीलाङ्गलकीश्यामादन्तीत्रिवृत्तिलाः | कुष्ठं शताह्वा गोलोमी तिल्वको गिरिकर्णिका ||३९|| कासीसं काञ्चनक्षीर्यौ वर्गः शोधन इष्यते |४०|

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Adhikarana 17 (40) · Śloka 41

ত্রিবৃত্তিলা নাগদন্তী মঞ্জিষ্ঠা পযসা সহ ||৪০|| উত্সাদনং ভবেদেতত্ সৈন্ধবক্ষৌদ্রসংযুতম্ |৪১|

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त्रिवृत्तिला नागदन्ती मञ्जिष्ठा पयसा सह ||४०|| उत्सादनं भवेदेतत् सैन्धवक्षौद्रसंयुतम् |४१|

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Adhikarana 18 (41-42) · Śloka 43

রসাঞ্জনং হরিদ্রে দ্বে মঞ্জিষ্ঠানিম্বপল্লবাঃ ||৪১|| ত্রিবৃত্তেজোবতীদন্তীকল্কো নাডীব্রণাপহঃ | কুষ্ঠং ত্রিবৃত্তিলা দন্তী মাগধ্যঃ সৈন্ধবং মধু ||৪২|| রজনী ত্রিফলা তুত্থং হিতং স্যাদ্ব্রণশোধনম্ |৪৩|

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रसाञ्जनं हरिद्रे द्वे मञ्जिष्ठानिम्बपल्लवाः ||४१|| त्रिवृत्तेजोवतीदन्तीकल्को नाडीव्रणापहः | कुष्ठं त्रिवृत्तिला दन्ती मागध्यः सैन्धवं मधु ||४२|| रजनी त्रिफला तुत्थं हितं स्याद्व्रणशोधनम् |४३|

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Adhikarana 19 (43-46) · Śloka 46

মাগধ্যো মধুকং রোধ্রং কুষ্ঠমেলা হরেণবঃ ||৪৩|| সমঙ্গা ধাতকী চৈব সারিবা রজনীদ্বযম্ | প্রিযঙ্গবঃ সর্জরসঃ পদ্মকং পদ্মকেসরম্ ||৪৪|| সুধা বচা লাঙ্গলকী মধূচ্ছিষ্টং সসৈন্ধবম্ | এতত্ সম্ভৃত্য সম্ভারং তৈলং ধীরো বিপাচযেত্ ||৪৫|| এতদ্বৈ গণ্ডমালাসু মণ্ডলেষ্বথ মেহিষু | রোপণার্থং হিতং তৈলং ভগন্দরবিনাশনম্ ||৪৬||

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मागध्यो मधुकं रोध्रं कुष्ठमेला हरेणवः ||४३|| समङ्गा धातकी चैव सारिवा रजनीद्वयम् | प्रियङ्गवः सर्जरसः पद्मकं पद्मकेसरम् ||४४|| सुधा वचा लाङ्गलकी मधूच्छिष्टं ससैन्धवम् | एतत् सम्भृत्य सम्भारं तैलं धीरो विपाचयेत् ||४५|| एतद्वै गण्डमालासु मण्डलेष्वथ मेहिषु | रोपणार्थं हितं तैलं भगन्दरविनाशनम् ||४६||

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Adhikarana 20 (47) · Śloka 47

ন্যগ্রোধাদিগণশ্চৈব হিতঃ শোধনরোপণে | তৈলং ঘৃতং বা তত্পক্বং ভগন্দরবিনাশনম্ ||৪৭||

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न्यग्रोधादिगणश्चैव हितः शोधनरोपणे | तैलं घृतं वा तत्पक्वं भगन्दरविनाशनम् ||४७||

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Adhikarana 21 (48-49) · Śloka 49

ত্রিবৃদ্দন্তীহরিদ্রার্কমূলং লোহাশ্বমারকৌ | বিডঙ্গসারং ত্রিফলা স্নুহ্যর্কপযসী মধু ||৪৮|| মধূচ্ছিষ্টসমাযুক্তৈস্তৈলমেতৈর্বিপাচযেত্ | ভগন্দরবিনাশার্থমেতদ্যোজ্যং বিশেষতঃ ||৪৯||

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त्रिवृद्दन्तीहरिद्रार्कमूलं लोहाश्वमारकौ | विडङ्गसारं त्रिफला स्नुह्यर्कपयसी मधु ||४८|| मधूच्छिष्टसमायुक्तैस्तैलमेतैर्विपाचयेत् | भगन्दरविनाशार्थमेतद्योज्यं विशेषतः ||४९||

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Adhikarana 22 (50-52) · Śloka 52

চিত্রকার্কৌ ত্রিবৃত্পাঠে মলপূং হযমারকম্ | সুধাং বচাং লাঙ্গলকীং সপ্তপর্ণং সুবর্চিকাম্ ||৫০|| জ্যোতিষ্মতীং চ সম্ভৃত্য তৈলং ধীরো বিপাচযেত্ | এতদ্ধি স্যন্দনং তৈলং ভৃশং দদ্যাদ্ভগন্দরে ||৫১|| শোধনং রোপণং চৈব সবর্ণকরণং তথা | দ্বিব্রণীযমবেক্ষেত ব্রণাবস্থাসু বুদ্ধিমান্ ||৫২||

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चित्रकार्कौ त्रिवृत्पाठे मलपूं हयमारकम् | सुधां वचां लाङ्गलकीं सप्तपर्णं सुवर्चिकाम् ||५०|| ज्योतिष्मतीं च सम्भृत्य तैलं धीरो विपाचयेत् | एतद्धि स्यन्दनं तैलं भृशं दद्याद्भगन्दरे ||५१|| शोधनं रोपणं चैव सवर्णकरणं तथा | द्विव्रणीयमवेक्षेत व्रणावस्थासु बुद्धिमान् ||५२||

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Adhikarana 23 (53) · Śloka 53

ছিদ্রাদূর্ধ্বং হরেদোষ্ঠমর্শোযন্ত্রস্য যন্ত্রবিত্ | ততো ভগন্দরে দদ্যাদেতদর্ধেন্দুসন্নিভম্ ||৫৩||

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छिद्रादूर्ध्वं हरेदोष्ठमर्शोयन्त्रस्य यन्त्रवित् | ततो भगन्दरे दद्यादेतदर्धेन्दुसन्निभम् ||५३||

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Adhikarana 24 (54) · Śloka 54

ব্যাযামং মৈথুনং কোপং পৃষ্ঠযানং গুরূণি চ | সংবত্সরং পরিহরেদুপরূঢব্রণো নরঃ ||৫৪||

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व्यायामं मैथुनं कोपं पृष्ठयानं गुरूणि च | संवत्सरं परिहरेदुपरूढव्रणो नरः ||५४||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 8

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং চিকিত্সাস্থানে ভগন্দরচিকিত্সিতং নামাষ্টমোঽধ্যাযঃ ||৮||

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इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने भगन्दरचिकित्सितं नामाष्टमोऽध्यायः ||८||

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