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38. nirūhakramacikitsitam

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতো নিরূহক্রমচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातो निरूहक्रमचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3-6) · Śloka 6

অথানুবাসিতমাস্থাপযেত্; স্বভ্যক্তস্বিন্নশরীরমুত্সৃষ্টবহির্বেগমবাতে শুচৌ বেশ্মনি মধ্যাহ্নে প্রততাযাং শয্যাযামধঃসুপরিগ্রহাযাং শ্রোণিপ্রদেশপ্রতিব্যূঢাযামনুপধানাযাং বামপার্শ্বশাযিনমাকুঞ্চিতদক্ষিণসক্থিমিতরপ্রসারিতসক্থিং সুমনসং জীর্ণান্নং বাগ্যতং সুনিষণ্ণদেহং বিদিত্বা, ততো বামপাদস্যোপরি নেত্রং কৃত্বেতরপাদাঙ্গুষ্ঠাঙ্গুলিভ্যাং কর্ণিকামুপরি নিষ্পীড্য, সব্যপাণিকনিষ্ঠিকানামিকাভ্যাং বস্তের্মুখার্ধং সঙ্কোচ্য, মধ্যমাপ্রদেশিন্যঙ্গুষ্ঠৈরর্ধং তু বিবৃতাস্যং কৃত্বা, বস্তাবৌষধং প্রক্ষিপ্য, দক্ষিণহস্তাঙ্গুষ্ঠেন প্রদেশিনীমধ্যমাভ্যাং চানুসিক্তমনাযতমবুদ্বুদমসঙ্কুচিতমবাতমৌষধাসন্নমুপসঙ্গৃহ্য , পুনরুপরি তদিতরেণ গৃহীত্বা দক্ষিণেনাবসিঞ্চেত্, ততঃ সূত্রেণৈবৌষধান্তে দ্বিস্ত্রির্বাঽঽবেষ্ট্য বধ্নীযাত্, অথ দক্ষিণেনোত্তানেন পাণিনা বস্তিং গৃহীত্বা বামহস্তমধ্যমাঙ্গুলিপ্রদেশিনীভ্যাং নেত্রমুপসঙ্গৃহ্যাঙ্গুষ্ঠেন নেত্রদ্বারং পিধায, ঘৃতাভ্যক্তাগ্রনেত্রং ঘৃতাক্তমুপাদায প্রযচ্ছেদনুপৃষ্ঠবংশং সমমুন্মুখমাকর্ণিকং নেত্রং প্রণিধত্স্বেতি ব্রূযাত্ ||৩|| বস্তিং সব্যে করে কৃত্বা দক্ষিণেনাবপীডযেত্ | একেনৈবাবপীডেন ন দ্রুতং ন বিলম্বিতম্ ||৪|| ততো নেত্রমপনীয ত্রিংশন্মাত্রাঃ পীডনকালাদুপেক্ষ্যোত্তিষ্ঠেত্যাতুরং ব্রূযাত্ | অথাতুরমুপবেশযেদুত্কুটুকং বস্ত্যাগমনার্থম্ | নিরূহপ্রত্যাগমনকালস্তু মুহূর্তো ভবতি ||৫|| অনেন বিধিনা বস্তিং দদ্যাদ্বস্তিবিশারদঃ | দ্বিতীযং বা তৃতীযং বা চতুর্থং বা যথার্থতঃ ||৬||

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अथानुवासितमास्थापयेत्; स्वभ्यक्तस्विन्नशरीरमुत्सृष्टबहिर्वेगमवाते शुचौ वेश्मनि मध्याह्ने प्रततायां शय्यायामधःसुपरिग्रहायां श्रोणिप्रदेशप्रतिव्यूढायामनुपधानायां वामपार्श्वशायिनमाकुञ्चितदक्षिणसक्थिमितरप्रसारितसक्थिं सुमनसं जीर्णान्नं वाग्यतं सुनिषण्णदेहं विदित्वा, ततो वामपादस्योपरि नेत्रं कृत्वेतरपादाङ्गुष्ठाङ्गुलिभ्यां कर्णिकामुपरि निष्पीड्य, सव्यपाणिकनिष्ठिकानामिकाभ्यां बस्तेर्मुखार्धं सङ्कोच्य, मध्यमाप्रदेशिन्यङ्गुष्ठैरर्धं तु विवृतास्यं कृत्वा, बस्तावौषधं प्रक्षिप्य, दक्षिणहस्ताङ्गुष्ठेन प्रदेशिनीमध्यमाभ्यां चानुसिक्तमनायतमबुद्बुदमसङ्कुचितमवातमौषधासन्नमुपसङ्गृह्य , पुनरुपरि तदितरेण गृहीत्वा दक्षिणेनावसिञ्चेत्, ततः सूत्रेणैवौषधान्ते द्विस्त्रिर्वाऽऽवेष्ट्य बध्नीयात्, अथ दक्षिणेनोत्तानेन पाणिना बस्तिं गृहीत्वा वामहस्तमध्यमाङ्गुलिप्रदेशिनीभ्यां नेत्रमुपसङ्गृह्याङ्गुष्ठेन नेत्रद्वारं पिधाय, घृताभ्यक्ताग्रनेत्रं घृताक्तमुपादाय प्रयच्छेदनुपृष्ठवंशं सममुन्मुखमाकर्णिकं नेत्रं प्रणिधत्स्वेति ब्रूयात् ||३|| बस्तिं सव्ये करे कृत्वा दक्षिणेनावपीडयेत् | एकेनैवावपीडेन न द्रुतं न विलम्बितम् ||४|| ततो नेत्रमपनीय त्रिंशन्मात्राः पीडनकालादुपेक्ष्योत्तिष्ठेत्यातुरं ब्रूयात् | अथातुरमुपवेशयेदुत्कुटुकं बस्त्यागमनार्थम् | निरूहप्रत्यागमनकालस्तु मुहूर्तो भवति ||५|| अनेन विधिना बस्तिं दद्याद्बस्तिविशारदः | द्वितीयं वा तृतीयं वा चतुर्थं वा यथार्थतः ||६||

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Adhikarana 3 (7) · Śloka 7

সম্যঙ্নিরূঢলিঙ্গে তু প্রাপ্তে বস্তিং নিবারযেত্ |৭|

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सम्यङ्निरूढलिङ्गे तु प्राप्ते बस्तिं निवारयेत् |७|

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Adhikarana 4 (7) · Śloka 8

বিশেষাত্ সুকুমারাণাং হীন এব ক্রমো হিতঃ ||৭|| অপি হীনক্রমং কুর্যান্ন তু কুর্যাদতিক্রমম্ |৮|

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विशेषात् सुकुमाराणां हीन एव क्रमो हितः ||७|| अपि हीनक्रमं कुर्यान्न तु कुर्यादतिक्रमम् |८|

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Adhikarana 5 (8) · Śloka 9

যস্য স্যাদ্বস্তিরল্পোঽল্পবেগো হীনমলানিলঃ ||৮|| দুর্নিরূঢঃ স বিজ্ঞেযো মূত্রার্ত্যরুচিজাড্যবান্ |৯|

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यस्य स्याद्बस्तिरल्पोऽल्पवेगो हीनमलानिलः ||८|| दुर्निरूढः स विज्ञेयो मूत्रार्त्यरुचिजाड्यवान् |९|

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Adhikarana 6 (9) · Śloka 10

যান্যেব প্রাঙ্মযোক্তানি লিঙ্গান্যতিবিরেচিতে ||৯|| তান্যেবাতিনিরূঢেঽপি বিজ্ঞেযানি বিপশ্চিতা |১০|

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यान्येव प्राङ्मयोक्तानि लिङ्गान्यतिविरेचिते ||९|| तान्येवातिनिरूढेऽपि विज्ञेयानि विपश्चिता |१०|

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Adhikarana 7 (10) · Śloka 11

যস্য ক্রমেণ গচ্ছন্তি বিট্পিত্তকফবাযবঃ ||১০|| লাঘবং চোপজাযেত সুনিরূঢং তমাদিশেত্ |১১|

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यस्य क्रमेण गच्छन्ति विट्पित्तकफवायवः ||१०|| लाघवं चोपजायेत सुनिरूढं तमादिशेत् |११|

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Adhikarana 8 (11-13) · Śloka 14

সুনিরূঢং ততো জন্তুং স্নাতবন্তং তু ভোজযেত্ ||১১|| পিত্তশ্লেষ্মানিলাবিষ্টং ক্ষীরযূষরসৈঃ ক্রমাত্ | সর্বং বা জাঙ্গলরসৈর্ভোজযেদবিকারিভিঃ ||১২|| ত্রিভাগহীনমর্ধং বা হীনমাত্রমথাপি বা | যথাগ্নিদোষং মাত্রেযং ভোজনস্য বিধীযতে ||১৩|| অনন্তরং ততো যুঞ্জ্যাদ্যথাস্বং স্নেহবস্তিনা |১৪|

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सुनिरूढं ततो जन्तुं स्नातवन्तं तु भोजयेत् ||११|| पित्तश्लेष्मानिलाविष्टं क्षीरयूषरसैः क्रमात् | सर्वं वा जाङ्गलरसैर्भोजयेदविकारिभिः ||१२|| त्रिभागहीनमर्धं वा हीनमात्रमथापि वा | यथाग्निदोषं मात्रेयं भोजनस्य विधीयते ||१३|| अनन्तरं ततो युञ्ज्याद्यथास्वं स्नेहबस्तिना |१४|

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Adhikarana 9 (14) · Śloka 15

বিবিক্ততা মনস্তুষ্টিঃ স্নিগ্ধতা ব্যাধিনিগ্রহঃ ||১৪|| আস্থাপনস্নেহবস্ত্যোঃ সম্যগ্দানে তু লক্ষণম্ |১৫|

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विविक्तता मनस्तुष्टिः स्निग्धता व्याधिनिग्रहः ||१४|| आस्थापनस्नेहबस्त्योः सम्यग्दाने तु लक्षणम् |१५|

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Adhikarana 10 (15) · Śloka 16

তদহস্তস্য পবনাদ্ভযং বলবদিষ্যতে ||১৫|| রসৌদনস্তেন শস্তস্তদহশ্চানুবাসনম্ |১৬|

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तदहस्तस्य पवनाद्भयं बलवदिष्यते ||१५|| रसौदनस्तेन शस्तस्तदहश्चानुवासनम् |१६|

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Adhikarana 11 (16) · Śloka 17

পশ্চাদগ্নিবলং মত্বা পবনস্য চ চেষ্টিতম্ ||১৬|| অন্নোপস্তম্ভিতে কোষ্ঠে স্নেহবস্তির্বিধীযতে |১৭|

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पश्चादग्निबलं मत्वा पवनस्य च चेष्टितम् ||१६|| अन्नोपस्तम्भिते कोष्ठे स्नेहबस्तिर्विधीयते |१७|

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Adhikarana 12 (17) · Śloka 18

অনাযান্তং মুহূর্তাত্তু নিরূহং শোধনৈর্হরেত্ ||১৭|| তীক্ষ্ণৈর্নিরূহৈর্মতিমান্ ক্ষারমূত্রাম্লসংযুতৈঃ |১৮|

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अनायान्तं मुहूर्तात्तु निरूहं शोधनैर्हरेत् ||१७|| तीक्ष्णैर्निरूहैर्मतिमान् क्षारमूत्राम्लसंयुतैः |१८|

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Adhikarana 13 (18) · Śloka 19

বিগুণানিলবিষ্টব্ধং চিরং তিষ্ঠন্নিরূহণম্ ||১৮|| শূলারতিজ্বরানাহান্মরণং বা প্রবর্তযেত্ |১৯|

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विगुणानिलविष्टब्धं चिरं तिष्ठन्निरूहणम् ||१८|| शूलारतिज्वरानाहान्मरणं वा प्रवर्तयेत् |१९|

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Adhikarana 14 (19-20) · Śloka 20

ন তু ভুক্তবতো দেযমাস্থাপনমিতি স্থিতিঃ ||১৯|| বিসূচিকাং বা জনযেচ্ছর্দিং বাঽপি সুদারুণাম্ | কোপযেত্ সর্বদোষান্ বা তস্মাদ্দদ্যাদভোজিনে ||২০||

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न तु भुक्तवतो देयमास्थापनमिति स्थितिः ||१९|| विसूचिकां वा जनयेच्छर्दिं वाऽपि सुदारुणाम् | कोपयेत् सर्वदोषान् वा तस्माद्दद्यादभोजिने ||२०||

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Adhikarana 15 (21-22) · Śloka 22

জীর্ণান্নস্যাশযে দোষাঃ পুংসঃ প্রব্যক্তিমাগতাঃ | নিঃশেষাঃ সুখমাযান্তি ভোজনেনাপ্রপীডিতাঃ ||২১|| নবাঽঽস্থাপনবিক্ষিপ্তমন্নমগ্নিঃ প্রধাবতি | তস্মাদাস্থাপনং দেযং নিরাহারায জানতা ||২২||

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जीर्णान्नस्याशये दोषाः पुंसः प्रव्यक्तिमागताः | निःशेषाः सुखमायान्ति भोजनेनाप्रपीडिताः ||२१|| नवाऽऽस्थापनविक्षिप्तमन्नमग्निः प्रधावति | तस्मादास्थापनं देयं निराहाराय जानता ||२२||

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Adhikarana 16 (23) · Śloka 23

আবস্থিকং ক্রমং চাপি বুদ্ধ্বা কার্যং নিরূহণম্ | মলেঽপকৃষ্টে দোষাণাং বলবত্ত্বং ন বিদ্যতে ||২৩||

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आवस्थिकं क्रमं चापि बुद्ध्वा कार्यं निरूहणम् | मलेऽपकृष्टे दोषाणां बलवत्त्वं न विद्यते ||२३||

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Adhikarana 17 (24-28) · Śloka 28

ক্ষীরাণ্যম্লানি মূত্রাণি স্নেহাঃ ক্বাথা রসাস্তথা | লবণানি ফলং ক্ষৌদ্রং শতাহ্বা সর্ষপং বচা ||২৪|| এলা ত্রিকটুকং রাস্না সরলো দেবদারু চ | রজনী মধুকং হিঙ্গু কুষ্ঠং সংশোধনানি চ ||২৫|| কটুকা শর্করা মুস্তমুশীরং চন্দনং শটী | মঞ্জিষ্ঠা মদনং চণ্ডা ত্রাযমাণা রসাঞ্জনম্ ||২৬|| বিল্বমধ্যং যবানী চ ফলিনী শক্রজা যবাঃ | কাকোলী ক্ষীরকাকোলী জীবকর্ষভকাবুভৌ ||২৭|| তথা মেদা মহামেদা ঋদ্ধির্বৃদ্ধির্মধূলিকা | নিরূহেষু যথালাভমেষ বর্গো বিধীযতে ||২৮||

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क्षीराण्यम्लानि मूत्राणि स्नेहाः क्वाथा रसास्तथा | लवणानि फलं क्षौद्रं शताह्वा सर्षपं वचा ||२४|| एला त्रिकटुकं रास्ना सरलो देवदारु च | रजनी मधुकं हिङ्गु कुष्ठं संशोधनानि च ||२५|| कटुका शर्करा मुस्तमुशीरं चन्दनं शटी | मञ्जिष्ठा मदनं चण्डा त्रायमाणा रसाञ्जनम् ||२६|| बिल्वमध्यं यवानी च फलिनी शक्रजा यवाः | काकोली क्षीरकाकोली जीवकर्षभकावुभौ ||२७|| तथा मेदा महामेदा ऋद्धिर्वृद्धिर्मधूलिका | निरूहेषु यथालाभमेष वर्गो विधीयते ||२८||

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Adhikarana 18 (29) · Śloka 31

স্বস্থে ক্বাথস্য চত্বারো ভাগাঃ স্নেহস্য পঞ্চমঃ | ক্রুদ্ধেঽনিলে চতুর্থস্তু ষষ্ঠঃ পিত্তে কফেঽষ্টমঃ ||২৯|| সর্বেষু চাষ্টমো ভাগঃ কল্কানাং লবণং পুনঃ | ক্ষৌদ্রং মূত্রং ফলং ক্ষীরমম্লং মাংসরসং তথা ||৩০|| যুক্ত্যা প্রকল্পযেদ্ধীমান্ নিরূহে ... |৩১|

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स्वस्थे क्वाथस्य चत्वारो भागाः स्नेहस्य पञ्चमः | क्रुद्धेऽनिले चतुर्थस्तु षष्ठः पित्ते कफेऽष्टमः ||२९|| सर्वेषु चाष्टमो भागः कल्कानां लवणं पुनः | क्षौद्रं मूत्रं फलं क्षीरमम्लं मांसरसं तथा ||३०|| युक्त्या प्रकल्पयेद्धीमान् निरूहे ... |३१|

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Adhikarana 19 (30-32) · Śloka 32

... কল্পনা ত্বিযম্ ||৩১|| কল্কস্নেহকষাযাণামবিবেকাদ্ভিষগ্বরৈঃ | বস্তেঃ সুকল্পনা প্রোক্তা তস্য দানং যথার্থকৃত্ ||৩২||

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... कल्पना त्वियम् ||३१|| कल्कस्नेहकषायाणामविवेकाद्भिषग्वरैः | बस्तेः सुकल्पना प्रोक्ता तस्य दानं यथार्थकृत् ||३२||

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Adhikarana 20 (33-36) · Śloka 36

দত্ত্বাঽঽদৌ সৈন্ধবস্যাক্ষং মধুনঃ প্রসৃতদ্বযম্ | পাত্রে তলেন মথ্নীযাত্তদ্বত্ স্নেহং শনৈঃ শনৈঃ ||৩৩|| সম্যক্ সুমথিতে দদ্যাত্ ফলকল্কমতঃ পরম্ | ততো যথোচিতান্ কল্কান্ ভাগৈঃ স্বৈঃ শ্লক্ষ্ণপেষিতান্ ||৩৪|| গম্ভীরে ভাজনেঽন্যস্মিন্মথ্নীযাত্তং খজেন চ | যথা বা সাধু মন্যেত ন সান্দ্রো ন তনুঃ সমঃ ||৩৫|| রসক্ষীরাম্লমূত্রাণাং দোষাবস্থামবেক্ষ্য তু | কষাযপ্রসৃতান্ পঞ্চ সুপূতাংস্তত্র দাপযেত্ ||৩৬||

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दत्त्वाऽऽदौ सैन्धवस्याक्षं मधुनः प्रसृतद्वयम् | पात्रे तलेन मथ्नीयात्तद्वत् स्नेहं शनैः शनैः ||३३|| सम्यक् सुमथिते दद्यात् फलकल्कमतः परम् | ततो यथोचितान् कल्कान् भागैः स्वैः श्लक्ष्णपेषितान् ||३४|| गम्भीरे भाजनेऽन्यस्मिन्मथ्नीयात्तं खजेन च | यथा वा साधु मन्येत न सान्द्रो न तनुः समः ||३५|| रसक्षीराम्लमूत्राणां दोषावस्थामवेक्ष्य तु | कषायप्रसृतान् पञ्च सुपूतांस्तत्र दापयेत् ||३६||

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Adhikarana 21 (37-41) · Śloka 41

অত ঊর্ধ্বং দ্বাদশপ্রসৃতান্ বক্ষ্যামঃ | দত্ত্বাঽঽদৌ সৈন্ধবস্যাক্ষং মধুনঃ প্রসৃতিদ্বযম্ | বিনির্মথ্য ততো দদ্যাত্ স্নেহস্য প্রসৃতিত্রযম্ ||৩৭|| একীভূতে ততঃ স্নেহে কল্কস্য প্রসৃতিং ক্ষিপেত্ | সম্মূর্চ্ছিতে কষাযং তু চতুঃপ্রসৃতিসম্মিতম্ ||৩৮|| বিতরেচ্চ তদাবাপমন্তে দ্বিপ্রসৃতোন্মিতম্ | এবং প্রকল্পিতো বস্তির্দ্বাদশপ্রসৃতো ভবেত্ ||৩৯|| জ্যেষ্ঠাযাঃ খলু মাত্রাযাঃ প্রমাণমিদমীরিতম্ | অপহ্রাসে ভিষক্কুর্যাত্তদ্বত্ প্রসৃতিহাপনম্ ||৪০|| যথাবযো নিরূহাণাং কল্পনেযমুদাহৃতা | সৈন্ধবাদিদ্রবান্তানাং সিদ্ধিকামৈর্ভিষগ্বরৈঃ ||৪১||

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अत ऊर्ध्वं द्वादशप्रसृतान् वक्ष्यामः | दत्त्वाऽऽदौ सैन्धवस्याक्षं मधुनः प्रसृतिद्वयम् | विनिर्मथ्य ततो दद्यात् स्नेहस्य प्रसृतित्रयम् ||३७|| एकीभूते ततः स्नेहे कल्कस्य प्रसृतिं क्षिपेत् | सम्मूर्च्छिते कषायं तु चतुःप्रसृतिसम्मितम् ||३८|| वितरेच्च तदावापमन्ते द्विप्रसृतोन्मितम् | एवं प्रकल्पितो बस्तिर्द्वादशप्रसृतो भवेत् ||३९|| ज्येष्ठायाः खलु मात्रायाः प्रमाणमिदमीरितम् | अपह्रासे भिषक्कुर्यात्तद्वत् प्रसृतिहापनम् ||४०|| यथावयो निरूहाणां कल्पनेयमुदाहृता | सैन्धवादिद्रवान्तानां सिद्धिकामैर्भिषग्वरैः ||४१||

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Adhikarana 22 (42) · Śloka 42

অত ঊর্ধ্বং প্রবক্ষ্যন্তে বস্তযোঽত্র বিভাগশঃ | যথাদোষং প্রযুক্তা যে হন্যুর্নানাবিধান্ গদান্ ||৪২||

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अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यन्ते बस्तयोऽत्र विभागशः | यथादोषं प्रयुक्ता ये हन्युर्नानाविधान् गदान् ||४२||

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Adhikarana 23 (43-46) · Śloka 46

শম্পাকোরুবুবর্ষাভূবাজিগন্ধানিশাচ্ছদৈঃ | পঞ্চমূলীবলারাস্নাগুডূচীসুরদারুভিঃ ||৪৩|| ক্বথিতৈঃ পালিকৈরেভির্মদনাষ্টকসংযুতৈঃ | কল্কৈর্মাগধিকাম্ভোদহপুষামিসিসৈন্ধবৈঃ ||৪৪|| বত্সাহ্বযপ্রিযঙ্গূগ্রাযষ্ট্যাহ্বযরসাঞ্জনৈঃ | দদ্যাদাস্থাপনং কোষ্ণং ক্ষৌদ্রাদ্যৈরভিসংস্কৃতম্ ||৪৫|| পৃষ্ঠোরুত্রিকশূলাশ্মবিণ্মূত্রানিলসঙ্গিনাম্ | গ্রহণীমারুতার্শোঘ্নং রক্তমাংসবলপ্রদম্ ||৪৬||

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शम्पाकोरुबुवर्षाभूवाजिगन्धानिशाच्छदैः | पञ्चमूलीबलारास्नागुडूचीसुरदारुभिः ||४३|| क्वथितैः पालिकैरेभिर्मदनाष्टकसंयुतैः | कल्कैर्मागधिकाम्भोदहपुषामिसिसैन्धवैः ||४४|| वत्साह्वयप्रियङ्गूग्रायष्ट्याह्वयरसाञ्जनैः | दद्यादास्थापनं कोष्णं क्षौद्राद्यैरभिसंस्कृतम् ||४५|| पृष्ठोरुत्रिकशूलाश्मविण्मूत्रानिलसङ्गिनाम् | ग्रहणीमारुतार्शोघ्नं रक्तमांसबलप्रदम् ||४६||

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Adhikarana 24 (47-50) · Śloka 50

গুডূচীত্রিফলারাস্নাদশমূলবলাপলৈঃ | ক্বথিতৈঃ শ্লক্ষ্ণপিষ্টৈস্তু প্রিযঙ্গুঘনসৈন্ধবৈঃ ||৪৭|| শতপুষ্পাবচাকৃষ্ণাযবানীকুষ্ঠবিল্বজৈঃ | সগুডৈরক্ষমাত্রৈস্তু মদনার্ধপলান্বিতৈঃ ||৪৮|| ক্ষৌদ্রতৈলঘৃতক্ষীরশুক্তকাঞ্জিকমস্তুভিঃ | সমালোড্য চ মূত্রেণ দদ্যাদাস্থাপনং পরম্ ||৪৯|| তেজোবর্ণবলোত্সাহবীর্যাগ্নিপ্রাণবর্ধনম্ | সর্বমারুতরোগঘ্নং বযঃস্থাপনমুত্তমম্ ||৫০||

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गुडूचीत्रिफलारास्नादशमूलबलापलैः | क्वथितैः श्लक्ष्णपिष्टैस्तु प्रियङ्गुघनसैन्धवैः ||४७|| शतपुष्पावचाकृष्णायवानीकुष्ठबिल्वजैः | सगुडैरक्षमात्रैस्तु मदनार्धपलान्वितैः ||४८|| क्षौद्रतैलघृतक्षीरशुक्तकाञ्जिकमस्तुभिः | समालोड्य च मूत्रेण दद्यादास्थापनं परम् ||४९|| तेजोवर्णबलोत्साहवीर्याग्निप्राणवर्धनम् | सर्वमारुतरोगघ्नं वयःस्थापनमुत्तमम् ||५०||

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Adhikarana 25 (51-54) · Śloka 54

কুশাদিপঞ্চমূলাব্দত্রিফলোত্পলবাসকৈঃ | সারিবোশীরমঞ্জিষ্ঠারাস্নারেণুপরূষকৈঃ ||৫১|| পালিকৈঃ ক্বথিতৈঃ সম্যগ্ দ্রব্যৈরেভিশ্চ পেষিতৈঃ | শৃঙ্গাটকাত্মগুপ্তেভকেসরাগুরুচন্দনৈঃ ||৫২|| বিদারীমিসিমঞ্জিষ্ঠাশ্যামেন্দ্রযবসিন্ধুজৈঃ | ফলপদ্মকযষ্ঠ্যাহ্বৈঃ ক্ষৌদ্রক্ষীরঘৃতাপ্লুতৈঃ ||৫৩|| দত্তমাস্থাপনং শীতমম্লহীনৈস্তথা দ্রবৈঃ | দাহাসৃগ্দরপিত্তাসৃক্পিত্তগুল্মজ্বরাঞ্জযেত্ ||৫৪||

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कुशादिपञ्चमूलाब्दत्रिफलोत्पलवासकैः | सारिवोशीरमञ्जिष्ठारास्नारेणुपरूषकैः ||५१|| पालिकैः क्वथितैः सम्यग् द्रव्यैरेभिश्च पेषितैः | शृङ्गाटकात्मगुप्तेभकेसरागुरुचन्दनैः ||५२|| विदारीमिसिमञ्जिष्ठाश्यामेन्द्रयवसिन्धुजैः | फलपद्मकयष्ठ्याह्वैः क्षौद्रक्षीरघृताप्लुतैः ||५३|| दत्तमास्थापनं शीतमम्लहीनैस्तथा द्रवैः | दाहासृग्दरपित्तासृक्पित्तगुल्मज्वराञ्जयेत् ||५४||

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Adhikarana 26 (55-59) · Śloka 59

রোধ্রচন্দনমঞ্জিষ্ঠারাস্নানন্তাবলর্ধিভিঃ | সারিবাবৃষকাশ্মর্যমেদামধুকপদ্মকৈঃ ||৫৫|| স্থিরাদিতৃণমূলৈশ্চ ক্বাথঃ কর্ষত্রযোন্মিতৈঃ | পিষ্টৈর্জীবককাকোলীযুগর্ধিমধুকোত্পলৈঃ ||৫৬|| প্রপৌণ্ডরীকজীবন্তীমেদারেণুপরূষকৈঃ | অভীরুমিসিসিন্ধূত্থবত্সকোশীরপদ্মকৈঃ ||৫৭|| কসেরুশর্করাযুক্তৈঃ সর্পির্মধুপযঃপ্লুতৈঃ | দ্রবৈস্তীক্ষ্ণাম্লবর্জ্যৈশ্চ দত্তো বস্তিঃ সুশীতলঃ ||৫৮|| গুল্মাসৃগ্দরহৃত্পাণ্ডুরোগান্ সবিষমজ্বরান্ | অসৃক্পিত্তাতিসারৌ চ হন্যাত্পিত্তকৃতান্ গদান্ ||৫৯||

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रोध्रचन्दनमञ्जिष्ठारास्नानन्ताबलर्धिभिः | सारिवावृषकाश्मर्यमेदामधुकपद्मकैः ||५५|| स्थिरादितृणमूलैश्च क्वाथः कर्षत्रयोन्मितैः | पिष्टैर्जीवककाकोलीयुगर्धिमधुकोत्पलैः ||५६|| प्रपौण्डरीकजीवन्तीमेदारेणुपरूषकैः | अभीरुमिसिसिन्धूत्थवत्सकोशीरपद्मकैः ||५७|| कसेरुशर्करायुक्तैः सर्पिर्मधुपयःप्लुतैः | द्रवैस्तीक्ष्णाम्लवर्ज्यैश्च दत्तो बस्तिः सुशीतलः ||५८|| गुल्मासृग्दरहृत्पाण्डुरोगान् सविषमज्वरान् | असृक्पित्तातिसारौ च हन्यात्पित्तकृतान् गदान् ||५९||

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Adhikarana 27 (60-63) · Śloka 63

ভদ্রানিম্বকুলত্থার্ককোশাতক্যমৃতামরৈঃ | সারিবাবৃহতীপাঠামূর্বারগ্বধবত্সকৈঃ ||৬০|| ক্বাথঃ, কল্কস্তু কর্তব্যো বচামদনসর্ষপৈঃ | সৈন্ধবামরকুষ্ঠৈলাপিপ্পলীবিল্বনাগরৈঃ ||৬১|| কটুতৈলমধুক্ষারমূত্রতৈলাম্লসংযুতৈঃ | কার্যমাস্থাপনং তূর্ণং কামলাপাণ্ডুমেহিনাম্ ||৬২|| মেদস্বিনামনগ্নীনাং কফরোগাশনদ্বিষাম্ | গলগণ্ডগরগ্লানিশ্লীপদোদররোগিণাম্ ||৬৩||

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भद्रानिम्बकुलत्थार्ककोशातक्यमृतामरैः | सारिवाबृहतीपाठामूर्वारग्वधवत्सकैः ||६०|| क्वाथः, कल्कस्तु कर्तव्यो वचामदनसर्षपैः | सैन्धवामरकुष्ठैलापिप्पलीबिल्वनागरैः ||६१|| कटुतैलमधुक्षारमूत्रतैलाम्लसंयुतैः | कार्यमास्थापनं तूर्णं कामलापाण्डुमेहिनाम् ||६२|| मेदस्विनामनग्नीनां कफरोगाशनद्विषाम् | गलगण्डगरग्लानिश्लीपदोदररोगिणाम् ||६३||

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Adhikarana 28 (64-66) · Śloka 66

দশমূলীনিশাবিল্বপটোলত্রিফলামরৈঃ | ক্বথিতৈঃ কল্কপিষ্টৈস্তু মুস্তসৈন্ধবদারুভিঃ ||৬৪|| পাঠামাগধিকেন্দ্রাহ্বৈস্তৈলক্ষারমধুপ্লুতৈঃ | কুর্যাদাস্থাপনং সম্যঙ্মূত্রাম্লফলযোজিতৈঃ ||৬৫|| কফপাণ্ডুগদালস্যমূত্রমারুতসঙ্গিনাম্ | আমাটোপাপচীশ্লেষ্মগুল্মক্রিমিবিকারিণাম্ ||৬৬||

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दशमूलीनिशाबिल्वपटोलत्रिफलामरैः | क्वथितैः कल्कपिष्टैस्तु मुस्तसैन्धवदारुभिः ||६४|| पाठामागधिकेन्द्राह्वैस्तैलक्षारमधुप्लुतैः | कुर्यादास्थापनं सम्यङ्मूत्राम्लफलयोजितैः ||६५|| कफपाण्डुगदालस्यमूत्रमारुतसङ्गिनाम् | आमाटोपापचीश्लेष्मगुल्मक्रिमिविकारिणाम् ||६६||

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Adhikarana 29 (67-70) · Śloka 70

বৃষাশ্মভেদবর্ষাভূধান্যগন্ধর্বহস্তকৈঃ | দশমূলবলামূর্বাযবকোলনিশাচ্ছদৈঃ ||৬৭|| কুলত্থবিল্বভূনিম্বৈঃ ক্বথিতৈঃ পলসম্মিতৈঃ | কল্কৈর্মদনযষ্ট্যাহ্বষড্গ্রন্থামরসর্ষপৈঃ ||৬৮|| পিপ্পলীমূলসিন্ধূত্থযবানীমিসিবত্সকৈঃ | ক্ষৌদ্রেক্ষুক্ষীরগোমূত্রসর্পিস্তৈলরসাপ্লুতৈঃ ||৬৯|| তূর্ণমাস্থাপনং কার্যং সংসৃষ্টবহুরোগিণাম্ | গৃধ্রসীশর্করাষ্ঠীলাতূনীগুল্মগদাপহম্ ||৭০||

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वृषाश्मभेदवर्षाभूधान्यगन्धर्वहस्तकैः | दशमूलबलामूर्वायवकोलनिशाच्छदैः ||६७|| कुलत्थबिल्वभूनिम्बैः क्वथितैः पलसम्मितैः | कल्कैर्मदनयष्ट्याह्वषड्ग्रन्थामरसर्षपैः ||६८|| पिप्पलीमूलसिन्धूत्थयवानीमिसिवत्सकैः | क्षौद्रेक्षुक्षीरगोमूत्रसर्पिस्तैलरसाप्लुतैः ||६९|| तूर्णमास्थापनं कार्यं संसृष्टबहुरोगिणाम् | गृध्रसीशर्कराष्ठीलातूनीगुल्मगदापहम् ||७०||

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Adhikarana 30 (71- 76) · Śloka 76

রাস্নারগ্বধবর্ষাভূকটুকোশীরবারিদৈঃ | ত্রাযমাণামৃতারক্তাপঞ্চমূলীবিভীতকৈঃ ||৭১|| সবলৈঃ পালিকৈঃ ক্বাথঃ কল্কস্তু মদনান্বিতৈঃ | যষ্ট্যাহ্বমিসিসিন্ধূত্থফলিনীন্দ্রযবাহ্বযৈঃ ||৭২|| রসাঞ্জনরসক্ষৌদ্রদ্রাক্ষাসৌবীরসংযুতৈঃ | যুক্তো বস্তিঃ সুখোষ্ণোঽযং মাংসশুক্রবলৌজসাম্ ||৭৩|| আযুষোঽগ্নেশ্চ সংস্কর্তা হন্তি চাশু গদানিমান্ | গুল্মাসৃগ্দরবীসর্পমূত্রকৃচ্ছ্রক্ষতক্ষযান্ ||৭৪|| বিষমজ্বরমর্শাংসি গ্রহণীং বাতকুণ্ডলীম্ | জানুজঙ্ঘাশিরোবস্তিগ্রহোদাবর্তমারুতান্ ||৭৫|| বাতাসৃক্শর্করাষ্ঠীলাকুক্ষিশূলোদরারুচীঃ | রক্তপিত্তকফোন্মাদপ্রমেহাধ্মানহৃদ্গ্রহান্ ||৭৬||

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रास्नारग्वधवर्षाभूकटुकोशीरवारिदैः | त्रायमाणामृतारक्तापञ्चमूलीबिभीतकैः ||७१|| सबलैः पालिकैः क्वाथः कल्कस्तु मदनान्वितैः | यष्ट्याह्वमिसिसिन्धूत्थफलिनीन्द्रयवाह्वयैः ||७२|| रसाञ्जनरसक्षौद्रद्राक्षासौवीरसंयुतैः | युक्तो बस्तिः सुखोष्णोऽयं मांसशुक्रबलौजसाम् ||७३|| आयुषोऽग्नेश्च संस्कर्ता हन्ति चाशु गदानिमान् | गुल्मासृग्दरवीसर्पमूत्रकृच्छ्रक्षतक्षयान् ||७४|| विषमज्वरमर्शांसि ग्रहणीं वातकुण्डलीम् | जानुजङ्घाशिरोबस्तिग्रहोदावर्तमारुतान् ||७५|| वातासृक्शर्कराष्ठीलाकुक्षिशूलोदरारुचीः | रक्तपित्तकफोन्मादप्रमेहाध्मानहृद्ग्रहान् ||७६||

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Adhikarana 31 (77) · Śloka 77

বাতঘ্নৌষধনিষ্ক্বাথাঃ সৈন্ধবত্রিবৃতাযুতাঃ | সাম্লাঃ সুখোষ্ণা যোজ্যাঃ স্যুর্বস্তযঃ কুপিতেঽনিলে ||৭৭||

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वातघ्नौषधनिष्क्वाथाः सैन्धवत्रिवृतायुताः | साम्लाः सुखोष्णा योज्याः स्युर्बस्तयः कुपितेऽनिले ||७७||

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Adhikarana 32 (78) · Śloka 78

ন্যগ্রোধাদিগণক্বাথাঃ কাকোল্যাদিসমাযুতাঃ | বিধেযা বস্তযঃ পিত্তে সসর্পিষ্কাঃ সশর্করাঃ ||৭৮||

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न्यग्रोधादिगणक्वाथाः काकोल्यादिसमायुताः | विधेया बस्तयः पित्ते ससर्पिष्काः सशर्कराः ||७८||

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Adhikarana 33 (79) · Śloka 79

আরগ্বধাদিনিষ্ক্বাথাঃ পিপ্পল্যাদিসমাযুতাঃ | সক্ষৌদ্রমূত্রা দেযাঃ স্যুর্বস্তযঃ কুপিতে কফে ||৭৯||

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आरग्वधादिनिष्क्वाथाः पिप्पल्यादिसमायुताः | सक्षौद्रमूत्रा देयाः स्युर्बस्तयः कुपिते कफे ||७९||

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Adhikarana 34 (80) · Śloka 80

শর্করেক্ষুরসক্ষীরঘৃতযুক্তাঃ সুশীতলাঃ | ক্ষীরবৃক্ষকষাযাঢ্যা বস্তযঃ শোণিতে হিতাঃ ||৮০||

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शर्करेक्षुरसक्षीरघृतयुक्ताः सुशीतलाः | क्षीरवृक्षकषायाढ्या बस्तयः शोणिते हिताः ||८०||

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Adhikarana 35 (81) · Śloka 81

শোধনদ্রব্যনিষ্ক্বাথাস্তত্কল্কস্নেহসৈন্ধবৈঃ | যুক্তাঃ খজেন মথিতবস্তযঃ শোধনাঃ স্মৃতাঃ ||৮১||

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शोधनद्रव्यनिष्क्वाथास्तत्कल्कस्नेहसैन्धवैः | युक्ताः खजेन मथितबस्तयः शोधनाः स्मृताः ||८१||

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Adhikarana 36 (82) · Śloka 82

ত্রিফলাক্বাথগোমূত্রক্ষৌদ্রক্ষারসমাযুতাঃ | ঊষকাদিপ্রতীবাপা বস্তযো লেখনাঃ স্মৃতাঃ ||৮২||

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त्रिफलाक्वाथगोमूत्रक्षौद्रक्षारसमायुताः | ऊषकादिप्रतीवापा बस्तयो लेखनाः स्मृताः ||८२||

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Adhikarana 37 (83) · Śloka 83

বৃংহণদ্রব্যনিষ্ক্বাথাঃ কল্কৈর্মধুরকৈর্যুতাঃ | সর্পির্মাংসরসোপেতা বস্তযো বৃংহণাঃ স্মৃতাঃ ||৮৩||

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बृंहणद्रव्यनिष्क्वाथाः कल्कैर्मधुरकैर्युताः | सर्पिर्मांसरसोपेता बस्तयो बृंहणाः स्मृताः ||८३||

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Adhikarana 38 (84) · Śloka 84

চটকাণ্ডোচ্চটাক্বাথাঃ সক্ষীরঘৃতশর্করাঃ | আত্মগুপ্তাফলাবাপাঃ স্মৃতা বাজীকরা নৃণাম্ ||৮৪||

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चटकाण्डोच्चटाक्वाथाः सक्षीरघृतशर्कराः | आत्मगुप्ताफलावापाः स्मृता वाजीकरा नृणाम् ||८४||

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Adhikarana 39 (85-86) · Śloka 86

বদর্যৈরাবতীশেলুশাল্মলীধন্বনাঙ্কুরাঃ | ক্ষীরসিদ্ধাঃ ক্ষৌদ্রযুতাঃ সাস্রাঃ পিচ্ছিলসঞ্জ্ঞিতাঃ ||৮৫|| বারাহমাহিষৌরভ্রবৈডালৈণেযকৌক্কুটম্ | সদ্যস্কমসৃগাজং বা দেযং পিচ্ছিলবস্তিষু ||৮৬||

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बदर्यैरावतीशेलुशाल्मलीधन्वनाङ्कुराः | क्षीरसिद्धाः क्षौद्रयुताः सास्राः पिच्छिलसञ्ज्ञिताः ||८५|| वाराहमाहिषौरभ्रबैडालैणेयकौक्कुटम् | सद्यस्कमसृगाजं वा देयं पिच्छिलबस्तिषु ||८६||

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Adhikarana 40 (87) · Śloka 87

প্রিযঙ্গ্বাদিগণক্বাথা অম্বষ্ঠাদ্যেন সংযুতাঃ | সক্ষৌদ্রাঃ সঘৃতাশ্চৈব গ্রাহিণো বস্তযঃ স্মৃতাঃ ||৮৭||

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प्रियङ्ग्वादिगणक्वाथा अम्बष्ठाद्येन संयुताः | सक्षौद्राः सघृताश्चैव ग्राहिणो बस्तयः स्मृताः ||८७||

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Adhikarana 41 (88) · Śloka 88

এতেষ্বেব চ যোগেষু স্নেহাঃ সিদ্ধাঃ পৃথক্ পৃথক্ | সমস্তেষ্বথবা সম্যগ্বিধেযাঃ স্নেহবস্তযঃ ||৮৮||

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एतेष्वेव च योगेषु स्नेहाः सिद्धाः पृथक् पृथक् | समस्तेष्वथवा सम्यग्विधेयाः स्नेहबस्तयः ||८८||

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Adhikarana 42 (89) · Śloka 89

বন্ধ্যানাং শতপাকেন শোধিতানাং যথাক্রমম্ | বলাতৈলেন দেযাঃ স্যুর্বস্তযস্ত্রৈবৃতেন চ ||৮৯||

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वन्ध्यानां शतपाकेन शोधितानां यथाक्रमम् | बलातैलेन देयाः स्युर्बस्तयस्त्रैवृतेन च ||८९||

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Adhikarana 43 (90) · Śloka 90

নরস্যোত্তমসত্ত্বস্য তীক্ষ্ণং বস্তিং নিধাপযেত্ | মধ্যমং মধ্যসত্ত্বস্য বিপরীতস্য বৈ মৃদুম্ ||৯০||

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नरस्योत्तमसत्त्वस्य तीक्ष्णं बस्तिं निधापयेत् | मध्यमं मध्यसत्त्वस्य विपरीतस्य वै मृदुम् ||९०||

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Adhikarana 44 (91) · Śloka 91

এবং কালং বলং দোষং বিকারং চ বিকারবিত্ | বস্তিদ্রব্যবলং চৈব বীক্ষ্য বস্তীন্ প্রযোজযেত্ ||৯১||

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एवं कालं बलं दोषं विकारं च विकारवित् | बस्तिद्रव्यबलं चैव वीक्ष्य बस्तीन् प्रयोजयेत् ||९१||

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Adhikarana 45 (92) · Śloka 92

দদ্যাদুত্ক্লেশনং পূর্বং মধ্যে দোষহরং পুনঃ | পশ্চাত্ সংশমনীযং চ দদ্যাদ্বস্তিং বিচক্ষণঃ ||৯২||

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दद्यादुत्क्लेशनं पूर्वं मध्ये दोषहरं पुनः | पश्चात् संशमनीयं च दद्याद्बस्तिं विचक्षणः ||९२||

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Adhikarana 46 (93-95) · Śloka 95

এরণ্ডবীজং মধুকং পিপ্পলী সৈন্ধবং বচা | হপুষাফলকল্কশ্চ বস্তিরুত্ক্লেশনঃ স্মৃতঃ ||৯৩|| শতাহ্বা মধুকং বীজং কৌটজং ফলমেব চ | সকাঞ্জিকঃ সগোমূত্রো বস্তির্দোষহরঃ স্মৃতঃ ||৯৪|| প্রিযঙ্গুর্মধুকং মুস্তা তথৈব চ রসাঞ্জনম্ | সক্ষীরঃ শস্যতে বস্তির্দোষাণাং শমনঃ পরঃ ||৯৫||

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एरण्डबीजं मधुकं पिप्पली सैन्धवं वचा | हपुषाफलकल्कश्च बस्तिरुत्क्लेशनः स्मृतः ||९३|| शताह्वा मधुकं बीजं कौटजं फलमेव च | सकाञ्जिकः सगोमूत्रो बस्तिर्दोषहरः स्मृतः ||९४|| प्रियङ्गुर्मधुकं मुस्ता तथैव च रसाञ्जनम् | सक्षीरः शस्यते बस्तिर्दोषाणां शमनः परः ||९५||

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Adhikarana 47 (96-99) · Śloka 99

নৃপাণাং তত্সমানানাং তথা সুমহতামপি | নারীণাং সুকুমারাণাং শিশুস্থবিরযোরপি ||৯৬|| দোষনির্হরণার্থায বলবর্ণোদযায চ | সমাসেনোপদেক্ষ্যামি বিধানং মাধুতৈলিকম্ ||৯৭|| যানস্ত্রীভোজ্যপানেষু নিযমশ্চাত্র নোচ্যতে | ফলং চ বিপুলং দৃষ্টং ব্যাপদাং চাপ্যসম্ভবঃ ||৯৮|| যোজ্যস্ত্বতঃ সুখেনৈব নিরূহক্রমমিচ্ছতা | যদেচ্ছতি তদৈবৈষ প্রযোক্তব্যো বিপশ্চিতা ||৯৯||

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नृपाणां तत्समानानां तथा सुमहतामपि | नारीणां सुकुमाराणां शिशुस्थविरयोरपि ||९६|| दोषनिर्हरणार्थाय बलवर्णोदयाय च | समासेनोपदेक्ष्यामि विधानं माधुतैलिकम् ||९७|| यानस्त्रीभोज्यपानेषु नियमश्चात्र नोच्यते | फलं च विपुलं दृष्टं व्यापदां चाप्यसम्भवः ||९८|| योज्यस्त्वतः सुखेनैव निरूहक्रममिच्छता | यदेच्छति तदैवैष प्रयोक्तव्यो विपश्चिता ||९९||

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Adhikarana 48 (100-101) · Śloka 101

মধুতৈলে সমে স্যাতাং ক্বাথশ্চৈরণ্ডমূলজঃ | পলার্ধং শতপুষ্পাযাস্ততোঽর্ধং সৈন্ধবস্য চ ||১০০|| ফলেনৈকেন সংযুক্তঃ খজেন চ বিলোডিতঃ | দেযঃ সুখোষ্ণো ভিষজা মাধুতৈলিকসঞ্জ্ঞিতঃ ||১০১||

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मधुतैले समे स्यातां क्वाथश्चैरण्डमूलजः | पलार्धं शतपुष्पायास्ततोऽर्धं सैन्धवस्य च ||१००|| फलेनैकेन संयुक्तः खजेन च विलोडितः | देयः सुखोष्णो भिषजा माधुतैलिकसञ्ज्ञितः ||१०१||

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Adhikarana 49 (102) · Śloka 102

বচামধুকতৈলং চ ক্বাথঃ সরসসৈন্ধবঃ | পিপ্পলীফলসংযুক্তো বস্তির্যুক্তরথঃ স্মৃতঃ ||১০২||

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वचामधुकतैलं च क्वाथः सरससैन्धवः | पिप्पलीफलसंयुक्तो बस्तिर्युक्तरथः स्मृतः ||१०२||

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Adhikarana 50 (103) · Śloka 103

সুরদারু বরা রাস্না শতপুষ্পা বচা মধু | হিঙ্গুসৈন্ধবসংযুক্তো বস্তির্দোষহরঃ স্মৃতঃ ||১০৩||

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सुरदारु वरा रास्ना शतपुष्पा वचा मधु | हिङ्गुसैन्धवसंयुक्तो बस्तिर्दोषहरः स्मृतः ||१०३||

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Adhikarana 51 (104) · Śloka 104

পঞ্চমূলীকষাযং চ তৈলং মাগধিকা মধু | বস্তিরেষ বিধাতব্যঃ সশতাহ্বঃ সসৈন্ধবঃ ||১০৪||

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पञ्चमूलीकषायं च तैलं मागधिका मधु | बस्तिरेष विधातव्यः सशताह्वः ससैन्धवः ||१०४||

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Adhikarana 52 (105) · Śloka 105

যবকোলকুলত্থানাং ক্বাথো মাগধিকা মধু | সসৈন্ধবঃ সযষ্ট্যাহ্বঃ সিদ্ধবস্তিরিতি স্মৃতঃ ||১০৫||

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यवकोलकुलत्थानां क्वाथो मागधिका मधु | ससैन्धवः सयष्ट्याह्वः सिद्धबस्तिरिति स्मृतः ||१०५||

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Adhikarana 53 (103-111) · Śloka 111

মুস্তাপাঠামৃতাতিক্তাবলারাস্নাপুনর্নবাঃ | মঞ্জিষ্ঠারগ্বধোশীরত্রাযমাণাখ্যগোক্ষুরান্ ||১০৬|| পালিকান্ পঞ্চমূলাল্পসহিতান্মদনাষ্টকম্ | জলাঢকে পচেত্ ক্বাথং পাদশেষং পুনঃ পচেত্ ||১০৭|| ক্ষীরার্ধাঢকসংযুক্তমাক্ষীরাত্ সুপরিস্রুতম্ | পাদেন জাঙ্গলরসস্তথা মধুঘৃতং সমম্ ||১০৮|| শতাহ্বাফলিনীযষ্টীবত্সকৈঃ সরসাঞ্জনৈঃ | কার্ষিকৈঃ সৈন্ধবোন্মিশ্রৈঃ কল্কৈর্বস্তিঃ প্রযোজিতঃ ||১০৯|| বাতাসৃঙ্মেহশোফার্শোগুল্মমূত্রবিবন্ধনুত্ | বিসর্পজ্বরবিড্ভঙ্গরক্তপিত্তবিনাশনঃ ||১১০|| বল্যঃ সঞ্জীবনো বৃষ্যশ্চক্ষুষ্যঃ শূলনাশনঃ | যাপনানামযং রাজা বস্তির্মুস্তাদিকো মতঃ ||১১১||

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मुस्तापाठामृतातिक्ताबलारास्नापुनर्नवाः | मञ्जिष्ठारग्वधोशीरत्रायमाणाख्यगोक्षुरान् ||१०६|| पालिकान् पञ्चमूलाल्पसहितान्मदनाष्टकम् | जलाढके पचेत् क्वाथं पादशेषं पुनः पचेत् ||१०७|| क्षीरार्धाढकसंयुक्तमाक्षीरात् सुपरिस्रुतम् | पादेन जाङ्गलरसस्तथा मधुघृतं समम् ||१०८|| शताह्वाफलिनीयष्टीवत्सकैः सरसाञ्जनैः | कार्षिकैः सैन्धवोन्मिश्रैः कल्कैर्बस्तिः प्रयोजितः ||१०९|| वातासृङ्मेहशोफार्शोगुल्ममूत्रविबन्धनुत् | विसर्पज्वरविड्भङ्गरक्तपित्तविनाशनः ||११०|| बल्यः सञ्जीवनो वृष्यश्चक्षुष्यः शूलनाशनः | यापनानामयं राजा बस्तिर्मुस्तादिको मतः ||१११||

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Adhikarana 54 (112) · Śloka 112

অবেক্ষ্য ভেষজং বুদ্ধ্যা বিকারং চ বিকারবিত্ | বীজেনানেন শাস্ত্রজ্ঞঃ কুর্যাদ্বস্তিশতান্যপি ||১১২||

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अवेक्ष्य भेषजं बुद्ध्या विकारं च विकारवित् | बीजेनानेन शास्त्रज्ञः कुर्याद्बस्तिशतान्यपि ||११२||

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Adhikarana 55 (113) · Śloka 113

অজীর্ণে ন প্রযুঞ্জীত দিবাস্বপ্নং চ বর্জযত্ | আহারাচারিকং শেষমন্যত্ কামং সমাচরেত্ ||১১৩||

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अजीर्णे न प्रयुञ्जीत दिवास्वप्नं च वर्जयत् | आहाराचारिकं शेषमन्यत् कामं समाचरेत् ||११३||

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Adhikarana 56 (114-117) · Śloka 117

যস্মান্মধু চ তৈলং চ প্রাধান্যেন প্রদীযতে | মাধুতৈলিক ইত্যেবং ভিষগ্ভির্বস্তিরুচ্যতে ||১১৪|| রথেষ্বপি চ যুক্তেষু হস্ত্যশ্বে চাপি কল্পিতে | যস্মান্ন প্রতিষিদ্ধোঽযমতো যুক্তরথঃ স্মৃতঃ ||১১৫|| বলোপচযবর্ণানাং যস্মাদ্ ব্যাধিশতস্য চ | ভবত্যেতেন সিদ্ধিস্তু সিদ্ধবস্তিরতো মতঃ ||১১৬|| সুখিনামল্পদোষাণাং নিত্যং স্নিগ্ধাশ্চ যে নরাঃ | মৃদুকোষ্ঠাশ্চ যে তেষাং বিধেযা মাধুতৈলিকাঃ ||১১৭||

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यस्मान्मधु च तैलं च प्राधान्येन प्रदीयते | माधुतैलिक इत्येवं भिषग्भिर्बस्तिरुच्यते ||११४|| रथेष्वपि च युक्तेषु हस्त्यश्वे चापि कल्पिते | यस्मान्न प्रतिषिद्धोऽयमतो युक्तरथः स्मृतः ||११५|| बलोपचयवर्णानां यस्माद् व्याधिशतस्य च | भवत्येतेन सिद्धिस्तु सिद्धबस्तिरतो मतः ||११६|| सुखिनामल्पदोषाणां नित्यं स्निग्धाश्च ये नराः | मृदुकोष्ठाश्च ये तेषां विधेया माधुतैलिकाः ||११७||

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Adhikarana 57 (118) · Śloka 118

মৃদুত্বাত্ পাদহীনত্বাদকৃত্স্নবিধিসেবনাত্ | একবস্তিপ্রদানাচ্চ সিদ্ধবস্তিষ্বযন্ত্রণা ||১১৮||

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मृदुत्वात् पादहीनत्वादकृत्स्नविधिसेवनात् | एकबस्तिप्रदानाच्च सिद्धबस्तिष्वयन्त्रणा ||११८||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 38

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং চিকিত্সাস্থানে নিরূহক্রমচিকিত্সিতং নামাষ্টত্রিংশোঽধ্যাযঃ ||৩৮||

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इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने निरूहक्रमचिकित्सितं नामाष्टत्रिंशोऽध्यायः ||३८||

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38. nirūhakramacikitsitam — Sushruta Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi