Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো বাতব্যাধিনিদানং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातो वातव्याधिनिदानं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো বাতব্যাধিনিদানং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातो वातव्याधिनिदानं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3-4) · Śloka 4
ধন্বন্তরিং ধর্মভৃতাং বরিষ্ঠমমৃতোদ্ভবম্ | চরণাবুপসঙ্গৃহ্য সুশ্রুতঃ পরিপৃচ্ছতি ||৩|| বাযোঃ প্রকৃতিভূতস্য ব্যাপন্নস্য চ কোপনৈঃ | স্থানং কর্ম চ রোগাংশ্চ বদ মে বদতাং বর ||৪||
धन्वन्तरिं धर्मभृतां वरिष्ठममृतोद्भवम् | चरणावुपसङ्गृह्य सुश्रुतः परिपृच्छति ||३|| वायोः प्रकृतिभूतस्य व्यापन्नस्य च कोपनैः | स्थानं कर्म च रोगांश्च वद मे वदतां वर ||४||
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Adhikarana 3 (5-8) · Śloka 9
তস্য তদ্বচনং শ্রুত্বা প্রাব্রবীদ্ভিষজাং বরঃ | স্বযম্ভূরেষ ভগবান্ বাযুরিত্যভিশব্দিতঃ ||৫|| স্বাতন্ত্র্যান্নিত্যভাবাচ্চ সর্বগত্বাত্তথৈব চ | সর্বেষামেব সর্বাত্মা সর্বলোকনমস্কৃতঃ ||৬|| স্থিত্যুত্পত্তিবিনাশেষু ভূতানামেষ কারণম্ | অব্যক্তো ব্যক্তকর্মা চ রূক্ষঃ শীতো লঘুঃ খরঃ ||৭|| তির্যগ্গো দ্বিগুণশ্চৈব রজোবহুল এব চ | অচিন্ত্যবীর্যো দোষাণাং নেতা রোগসমূহরাট্ ||৮|| আশুকারী মুহুশ্চারী পক্বাধানগুদালযঃ |৯|
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा प्राब्रवीद्भिषजां वरः | स्वयम्भूरेष भगवान् वायुरित्यभिशब्दितः ||५|| स्वातन्त्र्यान्नित्यभावाच्च सर्वगत्वात्तथैव च | सर्वेषामेव सर्वात्मा सर्वलोकनमस्कृतः ||६|| स्थित्युत्पत्तिविनाशेषु भूतानामेष कारणम् | अव्यक्तो व्यक्तकर्मा च रूक्षः शीतो लघुः खरः ||७|| तिर्यग्गो द्विगुणश्चैव रजोबहुल एव च | अचिन्त्यवीर्यो दोषाणां नेता रोगसमूहराट् ||८|| आशुकारी मुहुश्चारी पक्वाधानगुदालयः |९|
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Adhikarana 4 (9-10) · Śloka 10
দেহে বিচরতস্তস্য লক্ষণানি নিবোধ মে ||৯|| দোষধাত্বগ্নিসমতাং সম্প্রাপ্তিং বিষযেষু চ | ক্রিযাণামানুলোম্যং চ করোত্যকুপিতোঽনিলঃ ||১০|| (ইন্দ্রিযার্থোপসম্প্রাপ্তিং দোষধাত্বগ্ন্যবৈকৃতম্| ক্রিযাণামানুলোম্যং চ কুর্যাদ্বাযুরদূষিতঃ ||১০||) |
देहे विचरतस्तस्य लक्षणानि निबोध मे ||९|| दोषधात्वग्निसमतां सम्प्राप्तिं विषयेषु च | क्रियाणामानुलोम्यं च करोत्यकुपितोऽनिलः ||१०|| (इन्द्रियार्थोपसम्प्राप्तिं दोषधात्वग्न्यवैकृतम्| क्रियाणामानुलोम्यं च कुर्याद्वायुरदूषितः ||१०||) |
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Adhikarana 5 (11) · Śloka 11
যথাঽগ্নিঃ পঞ্চধা ভিন্নো নামস্থানক্রিযামযৈঃ | ভিন্নোঽনিলস্তস্থা হ্যেকো নামস্থানক্রিযামযৈঃ ||১১||
यथाऽग्निः पञ्चधा भिन्नो नामस्थानक्रियामयैः | भिन्नोऽनिलस्तस्था ह्येको नामस्थानक्रियामयैः ||११||
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Adhikarana 6 (12) · Śloka 12
প্রাণোদানৌ সমানশ্চ ব্যানশ্চাপান এব চ | স্থানস্থা মারুতাঃ পঞ্চ যাপযন্তি শরীরিণম্ ||১২||
प्राणोदानौ समानश्च व्यानश्चापान एव च | स्थानस्था मारुताः पञ्च यापयन्ति शरीरिणम् ||१२||
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Adhikarana 7 (13) · Śloka 14
যো বাযুর্বক্ত্রসঞ্চারী স প্রাণো নাম দেহধৃক্ | সোঽন্নং প্রবেশযত্যন্তঃ প্রাণাংশ্চাপ্যবলম্বতে ||১৩|| প্রাযশঃ কুরুতে দুষ্টো হিক্কাশ্বাসাদিকান্ গদান্ |১৪|
यो वायुर्वक्त्रसञ्चारी स प्राणो नाम देहधृक् | सोऽन्नं प्रवेशयत्यन्तः प्राणांश्चाप्यवलम्बते ||१३|| प्रायशः कुरुते दुष्टो हिक्काश्वासादिकान् गदान् |१४|
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Adhikarana 8 (14-15) · Śloka 15
উদানো নাম যস্তূর্ধ্বমুপৈতি পবনোত্তমঃ ||১৪|| তেন ভাষিতগীতাদিবিশেষোঽভিপ্রবর্ততে | ঊর্ধ্বজত্রুগতান্ রোগান্ করোতি চ বিশেষতঃ ||১৫||
उदानो नाम यस्तूर्ध्वमुपैति पवनोत्तमः ||१४|| तेन भाषितगीतादिविशेषोऽभिप्रवर्तते | ऊर्ध्वजत्रुगतान् रोगान् करोति च विशेषतः ||१५||
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Adhikarana 9 (16) · Śloka 17
আমপক্বাশযচরঃ সমানো বহ্নিসঙ্গতঃ | সোঽন্নং পচতি তজ্জাংশ্চ বিশেষান্বিবিনক্তি হি ||১৬|| গুল্মাগ্নিসাদাতীসারপ্রভৃতীন্ কুরুতে গদান্ |১৭|
आमपक्वाशयचरः समानो वह्निसङ्गतः | सोऽन्नं पचति तज्जांश्च विशेषान्विविनक्ति हि ||१६|| गुल्माग्निसादातीसारप्रभृतीन् कुरुते गदान् |१७|
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Adhikarana 10 (17-18) · Śloka 18
কৃত্স্নদেহচরো ব্যানো রসসংবহনোদ্যতঃ ||১৭|| স্বেদাসৃক্স্রাবণশ্চাপি পঞ্চধা চেষ্টযত্যপি | ক্রুদ্ধশ্চ কুরুতে রোগান্ প্রাযশঃ সর্বদেহগান্ ||১৮||
कृत्स्नदेहचरो व्यानो रससंवहनोद्यतः ||१७|| स्वेदासृक्स्रावणश्चापि पञ्चधा चेष्टयत्यपि | क्रुद्धश्च कुरुते रोगान् प्रायशः सर्वदेहगान् ||१८||
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Adhikarana 11 (19) · Śloka 20
পক্বাধানালযোঽপানঃ কালে কর্ষতি চাপ্যধঃ | সমীরণঃ শকৃন্মূত্রং শুক্রগর্ভার্তবানি চ ||১৯|| ক্রুদ্ধশ্চ কুরুতে রোগান্ ঘোরান্ বস্তিগুদাশ্রযান্ |২০|
पक्वाधानालयोऽपानः काले कर्षति चाप्यधः | समीरणः शकृन्मूत्रं शुक्रगर्भार्तवानि च ||१९|| क्रुद्धश्च कुरुते रोगान् घोरान् बस्तिगुदाश्रयान् |२०|
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Adhikarana 12 (20) · Śloka 20
শুক্রদোষপ্রমেহাস্তু ব্যানাপানপ্রকোপজাঃ ||২০||
शुक्रदोषप्रमेहास्तु व्यानापानप्रकोपजाः ||२०||
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Adhikarana 13 (21) · Śloka 21
যুগপত্ কুপিতাশ্চাপি দেহং ভিন্দ্যুরসংশযম্ |২১|
युगपत् कुपिताश्चापि देहं भिन्द्युरसंशयम् |२१|
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Adhikarana 14 (21-24) · Śloka 24
অত ঊর্ধ্বং প্রবক্ষ্যামি নানাস্থানান্তরাশ্রিতঃ ||২১|| বহুশঃ কুপিতো বাযুর্বিকারান্ কুরুতে হি যান্ | বাযুরামাশযে ক্রুদ্ধশ্ছর্দ্যাদীন্ কুরুতে গদান্ ||২২|| মোহং মূর্চ্ছাং পিপাসাং চ হৃদ্গ্রহং পার্শ্ববেদনাম্ | পক্বাশযস্থোঽন্ত্রকূজং শূলং নাভৌ করোতি চ ||২৩|| কৃচ্ছ্রমূত্রপুরীষত্বমানাহং ত্রিকবেদনাম্ | শ্রোত্রাদিষ্বিন্দ্রিযবধং কুর্যাত্ ক্রুদ্ধঃ সমীরণঃ ||২৪||
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि नानास्थानान्तराश्रितः ||२१|| बहुशः कुपितो वायुर्विकारान् कुरुते हि यान् | वायुरामाशये क्रुद्धश्छर्द्यादीन् कुरुते गदान् ||२२|| मोहं मूर्च्छां पिपासां च हृद्ग्रहं पार्श्ववेदनाम् | पक्वाशयस्थोऽन्त्रकूजं शूलं नाभौ करोति च ||२३|| कृच्छ्रमूत्रपुरीषत्वमानाहं त्रिकवेदनाम् | श्रोत्रादिष्विन्द्रियवधं कुर्यात् क्रुद्धः समीरणः ||२४||
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Adhikarana 15 (25-29) · Śloka 29
বৈবর্ণ্যং স্ফুরণং রৌক্ষ্যং সুপ্তিং চুমুচুমাযনম্ | ত্বক্স্থো নিস্তোদনং কুর্যাত্ ত্বগ্ভেদং পরিপোটনম্ ||২৫|| ব্রণাংশ্চ রক্তগো, গ্রন্থীন্ সশূলান্ মাংসসংশ্রিতঃ | তথা মেদঃশ্রিতঃ কুর্যাদ্গ্রন্থীন্মন্দরুজোঽব্রণান্ ||২৬|| কুর্যাত্ সিরাগতঃ শূলং সিরাকুঞ্চনপূরণম্ | স্নাযুপ্রাপ্তঃ স্তম্ভকম্পৌ শূলমাক্ষেপণং তথা ||২৭|| হন্তি সন্ধিগতঃ সন্ধীন্ শূলশোফৌ করোতি চ | অস্থিশোষং প্রভেদং চ কুর্যাচ্ছূলং চ তচ্ছ্রিতঃ ||২৮|| তথা মজ্জগতে রুক্ চ ন কদাচিত্ প্রশাম্যতি | অপ্রবৃত্তিঃ প্রবৃত্তির্বা বিকৃতা শুক্রগেঽনিলে ||২৯||
वैवर्ण्यं स्फुरणं रौक्ष्यं सुप्तिं चुमुचुमायनम् | त्वक्स्थो निस्तोदनं कुर्यात् त्वग्भेदं परिपोटनम् ||२५|| व्रणांश्च रक्तगो, ग्रन्थीन् सशूलान् मांससंश्रितः | तथा मेदःश्रितः कुर्याद्ग्रन्थीन्मन्दरुजोऽव्रणान् ||२६|| कुर्यात् सिरागतः शूलं सिराकुञ्चनपूरणम् | स्नायुप्राप्तः स्तम्भकम्पौ शूलमाक्षेपणं तथा ||२७|| हन्ति सन्धिगतः सन्धीन् शूलशोफौ करोति च | अस्थिशोषं प्रभेदं च कुर्याच्छूलं च तच्छ्रितः ||२८|| तथा मज्जगते रुक् च न कदाचित् प्रशाम्यति | अप्रवृत्तिः प्रवृत्तिर्वा विकृता शुक्रगेऽनिले ||२९||
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Adhikarana 16 (30) · Śloka 30
হস্তপাদশিরোধাতূংস্তথা সঞ্চরতি ক্রমাত্ | ব্যাপ্নুযাদ্বাঽখিলং দেহং বাযুঃ সর্বগতো নৃণাম্ ||৩০||
हस्तपादशिरोधातूंस्तथा सञ्चरति क्रमात् | व्याप्नुयाद्वाऽखिलं देहं वायुः सर्वगतो नृणाम् ||३०||
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Adhikarana 17 (31) · Śloka 31
স্তম্ভনাক্ষেপণস্বাপশোফশূলানি সর্বগঃ |৩১|
स्तम्भनाक्षेपणस्वापशोफशूलानि सर्वगः |३१|
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Adhikarana 18 (31) · Śloka 31
স্থানেষূক্তেষু সম্মিশ্রঃ সম্মিশ্রাঃ কুরুতে রুজঃ ||৩১||
स्थानेषूक्तेषु सम्मिश्रः सम्मिश्राः कुरुते रुजः ||३१||
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Adhikarana 19 (32) · Śloka 32
কুর্যাদবযবপ্রাপ্তো মারুতস্ত্বমিতান্ গদান্ |৩২|
कुर्यादवयवप्राप्तो मारुतस्त्वमितान् गदान् |३२|
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Adhikarana 20 (32-39) · Śloka 39
দাহসন্তাপমূর্চ্ছাঃ স্যুর্বাযৌ পিত্তসমন্বিতে ||৩২|| শৈত্যশোফগুরুত্বানি তস্মিন্নেব কফাবৃতে | সূচীভিরিব নিস্তোদঃ স্পর্শদ্বেষঃ প্রসুপ্ততা ||৩৩|| শেষাঃ পিত্তবিকারাঃ স্যুর্মারুতে শোণিতান্বিতে | প্রাণে পিত্তাবৃতে ছর্দির্দাহশ্চৈবোপজাযতে ||৩৪|| দৌর্বল্যং সদনং তন্দ্রা বৈবর্ণ্যং চ কফাবৃতে | উদানে পিত্তসংযুক্তে মূর্চ্ছাদাহভ্রমক্লমাঃ ||৩৫|| অস্বেদহর্ষৌ মন্দোঽগ্নিঃ শীতস্তম্ভৌ কফাবৃতে | সমানে পিত্তসংযুক্তে স্বেদদাহৌষ্ণ্যমূর্চ্ছনম্ ||৩৬|| কফাধিকং চ বিণ্মূত্রং রোমহর্ষঃ কফাবৃতে | অপানে পিত্তসংযুক্তে দাহৌষ্ণ্যে স্যাদসৃগ্দরঃ ||৩৭|| অধঃকাযগুরুত্বং চ তস্মিন্নেব কফাবৃতে | ব্যানে পিত্তাবৃতে দাহো গাত্রবিক্ষেপণং ক্লমঃ ||৩৮|| গুরূণি সর্বগাত্রাণি স্তম্ভনং চাস্থিপর্বণাম্ | লিঙ্গং কফাবৃতে ব্যানে চেষ্টাস্তম্ভস্তথৈব চ ||৩৯||
दाहसन्तापमूर्च्छाः स्युर्वायौ पित्तसमन्विते ||३२|| शैत्यशोफगुरुत्वानि तस्मिन्नेव कफावृते | सूचीभिरिव निस्तोदः स्पर्शद्वेषः प्रसुप्तता ||३३|| शेषाः पित्तविकाराः स्युर्मारुते शोणितान्विते | प्राणे पित्तावृते छर्दिर्दाहश्चैवोपजायते ||३४|| दौर्बल्यं सदनं तन्द्रा वैवर्ण्यं च कफावृते | उदाने पित्तसंयुक्ते मूर्च्छादाहभ्रमक्लमाः ||३५|| अस्वेदहर्षौ मन्दोऽग्निः शीतस्तम्भौ कफावृते | समाने पित्तसंयुक्ते स्वेददाहौष्ण्यमूर्च्छनम् ||३६|| कफाधिकं च विण्मूत्रं रोमहर्षः कफावृते | अपाने पित्तसंयुक्ते दाहौष्ण्ये स्यादसृग्दरः ||३७|| अधःकायगुरुत्वं च तस्मिन्नेव कफावृते | व्याने पित्तावृते दाहो गात्रविक्षेपणं क्लमः ||३८|| गुरूणि सर्वगात्राणि स्तम्भनं चास्थिपर्वणाम् | लिङ्गं कफावृते व्याने चेष्टास्तम्भस्तथैव च ||३९||
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Adhikarana 21 (40-41) · Śloka 41
(প্রাযশঃ সুকুমারাণাং মিথ্যাঽঽহারবিহারিণাম্ | রোগাধ্বপ্রমদামদ্যব্যাযামৈশ্চাতিপীডনাত্ ||৪০|| ঋতুসাত্ম্যবিপর্যাসাত্ স্নেহাদীনাং চ বিভ্রমাত্ | অব্যবাযে তথা স্থূলে বাতরক্তং প্রকুপ্যতি ) ||৪১||
(प्रायशः सुकुमाराणां मिथ्याऽऽहारविहारिणाम् | रोगाध्वप्रमदामद्यव्यायामैश्चातिपीडनात् ||४०|| ऋतुसात्म्यविपर्यासात् स्नेहादीनां च विभ्रमात् | अव्यवाये तथा स्थूले वातरक्तं प्रकुप्यति ) ||४१||
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Adhikarana 22 (42-44) · Śloka 44
হস্ত্যশ্বোষ্ট্রৈর্গচ্ছতোঽন্যৈশ্চ বাযুঃ কোপং যাতঃ কারণৈ সেবিতৈঃ স্বৈঃ | তীক্ষ্ণোষ্ণাম্লক্ষারশাকাদিভোজ্যৈঃ সন্তাপাদ্যৈর্ভূযসা সেবিতৈশ্চ ||৪২|| ক্ষিপ্রং রক্তং দুষ্টিমাযাতি তচ্চ বাযোর্মার্গং সংরুণদ্ধ্যাশু যাতঃ | ক্রুদ্ধোঽত্যর্থং মার্গরোধাত্ স বাযুরত্যুদ্রিক্তং দূষযেদ্রক্তমাশু ||৪৩|| তত্ সম্পৃক্তং বাযুনা দূষিতেন তত্প্রাবল্যাদুচ্যতে বাতরক্তম্ | তদ্বত্ পিত্তং দূষিতেনাসৃজাঽঽক্তং শ্লেষ্মা দুষ্টো দূষিতেনাসৃজাঽঽক্তঃ ||৪৪||
हस्त्यश्वोष्ट्रैर्गच्छतोऽन्यैश्च वायुः कोपं यातः कारणै सेवितैः स्वैः | तीक्ष्णोष्णाम्लक्षारशाकादिभोज्यैः सन्तापाद्यैर्भूयसा सेवितैश्च ||४२|| क्षिप्रं रक्तं दुष्टिमायाति तच्च वायोर्मार्गं संरुणद्ध्याशु यातः | क्रुद्धोऽत्यर्थं मार्गरोधात् स वायुरत्युद्रिक्तं दूषयेद्रक्तमाशु ||४३|| तत् सम्पृक्तं वायुना दूषितेन तत्प्राबल्यादुच्यते वातरक्तम् | तद्वत् पित्तं दूषितेनासृजाऽऽक्तं श्लेष्मा दुष्टो दूषितेनासृजाऽऽक्तः ||४४||
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Adhikarana 23 (45-46) · Śloka 46
স্পর্শোদ্বিগ্নৌ তোদভেদপ্রশোষস্বাপোপেতৌ বাতরক্তেন পাদৌ | পিত্তাসৃগ্ভ্যামুগ্রদাহৌ ভবেতামত্যর্থোষ্ণৌ রক্তশোফৌ মৃদূ চ ||৪৫|| কণ্ডূমন্তৌ শ্বেতশীতৌ সশোফৌ পীনস্তব্ধৌ শ্লেষ্মদুষ্টে তু রক্তে | সর্বৈর্দুষ্টে শোণিতে চাপি দোষাঃ স্বং স্বং রূপং পাদযোর্দর্শযন্তি ||৪৬||
स्पर्शोद्विग्नौ तोदभेदप्रशोषस्वापोपेतौ वातरक्तेन पादौ | पित्तासृग्भ्यामुग्रदाहौ भवेतामत्यर्थोष्णौ रक्तशोफौ मृदू च ||४५|| कण्डूमन्तौ श्वेतशीतौ सशोफौ पीनस्तब्धौ श्लेष्मदुष्टे तु रक्ते | सर्वैर्दुष्टे शोणिते चापि दोषाः स्वं स्वं रूपं पादयोर्दर्शयन्ति ||४६||
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Adhikarana 24 (47) · Śloka 47
প্রাগ্রূপে শিথিলৌ স্বিন্নৌ শীতলৌ সবিপর্যযৌ | বৈবর্ণ্যতোদসুপ্তত্বগুরুত্বৌষসমন্বিতৌ ||৪৭||
प्राग्रूपे शिथिलौ स्विन्नौ शीतलौ सविपर्ययौ | वैवर्ण्यतोदसुप्तत्वगुरुत्वौषसमन्वितौ ||४७||
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Adhikarana 25 (48) · Śloka 48
পাদযোর্মূলমাস্থায কদাচিদ্ধস্তযোরপি | আখোর্বিষমিব ক্রুদ্ধং তদ্দেহমনুসর্পতি ||৪৮||
पादयोर्मूलमास्थाय कदाचिद्धस्तयोरपि | आखोर्विषमिव क्रुद्धं तद्देहमनुसर्पति ||४८||
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Adhikarana 26 (49) · Śloka 50
আজানুস্ফুটিতং যচ্চ প্রভিন্নং প্রস্রুতং চ যত্ | উপদ্রবৈশ্চ যজ্জুষ্টং প্রাণমাংসক্ষযাদিভিঃ ||৪৯|| শোণিতং তদসাধ্যং স্যাদ্যাপ্যং সংবত্সরোত্থিতম্ |৫০|
आजानुस्फुटितं यच्च प्रभिन्नं प्रस्रुतं च यत् | उपद्रवैश्च यज्जुष्टं प्राणमांसक्षयादिभिः ||४९|| शोणितं तदसाध्यं स्याद्याप्यं संवत्सरोत्थितम् |५०|
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Adhikarana 27 (50-51) · Śloka 51
যদা তু ধমনীঃ সর্বাঃ কুপিতোঽভ্যেতি মারুতঃ ||৫০|| তদাক্ষিপত্যাশু মুহুর্মুহুর্দেহং মুহুশ্চরঃ | মুহুর্মুহুস্তদাক্ষেপাদাক্ষেপক ইতি স্মৃতঃ ||৫১||
यदा तु धमनीः सर्वाः कुपितोऽभ्येति मारुतः ||५०|| तदाक्षिपत्याशु मुहुर्मुहुर्देहं मुहुश्चरः | मुहुर्मुहुस्तदाक्षेपादाक्षेपक इति स्मृतः ||५१||
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Adhikarana 28 (52-58) · Śloka 58
সোঽপতানকসঞ্জ্ঞো যঃ পাতযত্যন্তরাঽন্তরা | কফান্বিতো ভৃশং বাযুস্তাস্বেব যদি তিষ্ঠতি ||৫২|| স দণ্ডবত্ স্তম্ভযতি কৃচ্ছ্রো দণ্ডাপতানকঃ | হনুগ্রহস্তদাঽত্যর্থং সোঽন্নং কৃচ্ছ্রান্নিষেবতে ||৫৩|| ধনুস্তুল্যং নমেদ্যস্তু স ধনুঃস্তম্ভসঞ্জ্ঞকঃ | অঙ্গুলীগুল্ফজঠরহৃদ্বক্ষোগলসংশ্রিতঃ ||৫৪|| স্নাযুপ্রতানমনিলো যদাঽঽক্ষিপতি বেগবান্ | বিষ্টব্ধাক্ষঃ স্তব্ধহনুর্ভগ্নপার্শ্বঃ কফং বমন্ ||৫৫|| অভ্যন্তরং ধনুরিব যদা নমতি মানবঃ | তদাঽস্যাভ্যন্তরাযামং কুরুতে মারুতো বলী ||৫৬|| বাহ্যস্নাযুপ্রতানস্থো বাহ্যাযামং করোতি চ | তমসাধ্যং বুধাঃ প্রাহুর্বক্ষঃকট্যূরুভঞ্জনম্ ||৫৭|| কফপিত্তান্বিতো বাযুর্বাযুরেব চ কেবলঃ | কুর্যাদাক্ষেপকং ত্বন্যং চতুর্থমভিঘাতজম্ ||৫৮||
सोऽपतानकसञ्ज्ञो यः पातयत्यन्तराऽन्तरा | कफान्वितो भृशं वायुस्तास्वेव यदि तिष्ठति ||५२|| स दण्डवत् स्तम्भयति कृच्छ्रो दण्डापतानकः | हनुग्रहस्तदाऽत्यर्थं सोऽन्नं कृच्छ्रान्निषेवते ||५३|| धनुस्तुल्यं नमेद्यस्तु स धनुःस्तम्भसञ्ज्ञकः | अङ्गुलीगुल्फजठरहृद्वक्षोगलसंश्रितः ||५४|| स्नायुप्रतानमनिलो यदाऽऽक्षिपति वेगवान् | विष्टब्धाक्षः स्तब्धहनुर्भग्नपार्श्वः कफं वमन् ||५५|| अभ्यन्तरं धनुरिव यदा नमति मानवः | तदाऽस्याभ्यन्तरायामं कुरुते मारुतो बली ||५६|| बाह्यस्नायुप्रतानस्थो बाह्यायामं करोति च | तमसाध्यं बुधाः प्राहुर्वक्षःकट्यूरुभञ्जनम् ||५७|| कफपित्तान्वितो वायुर्वायुरेव च केवलः | कुर्यादाक्षेपकं त्वन्यं चतुर्थमभिघातजम् ||५८||
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Adhikarana 29 (59) · Śloka 59
গর্ভপাতনিমিত্তশ্চ শোণিতাতিস্রবাচ্চ যঃ | অভিঘাতনিমিত্তশ্চ ন সিধ্যত্যপতানকঃ ||৫৯||
गर्भपातनिमित्तश्च शोणितातिस्रवाच्च यः | अभिघातनिमित्तश्च न सिध्यत्यपतानकः ||५९||
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Adhikarana 30 (60-62) · Śloka 62
অধোগমাঃ সতির্যগ্গা ধমনীরূর্ধ্বদেহগাঃ | যদা প্রকুপিতোঽত্যর্থং মাতরিশ্বা প্রপদ্যতে ||৬০|| তদাঽন্যতরপক্ষস্য সন্ধিবন্ধান্ বিমোক্ষযন্ | হন্তি পক্ষং তমাহুর্হি পক্ষাঘাতং ভিষগ্বরাঃ ||৬১|| যস্য কৃত্স্নং শরীরার্ধমকর্মণ্যমচেতনম্ | ততঃ পতত্যসূন্ বাঽপি ত্যজত্যনিলপীডিতঃ ||৬২||
अधोगमाः सतिर्यग्गा धमनीरूर्ध्वदेहगाः | यदा प्रकुपितोऽत्यर्थं मातरिश्वा प्रपद्यते ||६०|| तदाऽन्यतरपक्षस्य सन्धिबन्धान् विमोक्षयन् | हन्ति पक्षं तमाहुर्हि पक्षाघातं भिषग्वराः ||६१|| यस्य कृत्स्नं शरीरार्धमकर्मण्यमचेतनम् | ततः पतत्यसून् वाऽपि त्यजत्यनिलपीडितः ||६२||
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Adhikarana 31 (63) · Śloka 63
শুদ্ধবাতহতং পক্ষং কৃচ্ছ্রসাধ্যতমং বিদুঃ | সাধ্যমন্যেন সংসৃষ্টমসাধ্যং ক্ষযহেতুকম্ ||৬৩||
शुद्धवातहतं पक्षं कृच्छ्रसाध्यतमं विदुः | साध्यमन्येन संसृष्टमसाध्यं क्षयहेतुकम् ||६३||
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Adhikarana 32 (64-66) · Śloka 66
বাযুরূর্ধ্বং ব্রজেত্ স্থানাত্ কুপিতো হৃদযং শিরঃ | শঙ্খৌ চ পীডযত্যঙ্গান্যাক্ষিপেন্নমযেচ্চ সঃ ||৬৪|| নিমীলিতাক্ষো নিশ্চেষ্টঃ স্তব্ধাক্ষো বাঽপি কূজতি | নিরুচ্ছ্বাসোঽথবা কৃচ্ছ্রাদুচ্ছ্বস্যান্নষ্টচেতনঃ ||৬৫|| স্বস্থঃ স্যাদ্ধৃদযে মুক্তে হ্যাবৃতে তু প্রমুহ্যতি | কফান্বিতেন বাতেন জ্ঞেয এষোঽপতন্ত্রকঃ ||৬৬||
वायुरूर्ध्वं व्रजेत् स्थानात् कुपितो हृदयं शिरः | शङ्खौ च पीडयत्यङ्गान्याक्षिपेन्नमयेच्च सः ||६४|| निमीलिताक्षो निश्चेष्टः स्तब्धाक्षो वाऽपि कूजति | निरुच्छ्वासोऽथवा कृच्छ्रादुच्छ्वस्यान्नष्टचेतनः ||६५|| स्वस्थः स्याद्धृदये मुक्ते ह्यावृते तु प्रमुह्यति | कफान्वितेन वातेन ज्ञेय एषोऽपतन्त्रकः ||६६||
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Adhikarana 33 (67) · Śloka 67
দিবাস্বপ্নাসনস্থানবিবৃতাধ্বনিরীক্ষণৈঃ | মন্যাস্তম্ভং প্রকুরুতে স এব শ্লেষ্মণাঽঽবৃতঃ ||৬৭||
दिवास्वप्नासनस्थानविवृताध्वनिरीक्षणैः | मन्यास्तम्भं प्रकुरुते स एव श्लेष्मणाऽऽवृतः ||६७||
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Adhikarana 34 (68-72) · Śloka 72
(গর্ভিণীসূতিকাবালবৃদ্ধক্ষীণেষ্বসৃক্ক্ষযে |) উচ্চৈর্ব্যাহরতোঽত্যর্থং খাদতঃ কঠিনানি বা | হসতো জৃম্ভতো ভারাদ্বিষমাচ্ছযনাদপি ||৬৮|| শিরোনাসৌষ্ঠচিবুকললাটেক্ষণসন্ধিগঃ | অর্দযিত্বাঽনিলো বক্ত্রমর্দিতং জনযত্যতঃ ||৬৯|| বক্রীভবতি বক্ত্রার্ধং গ্রীবা চাপ্যপবর্ততে | শিরশ্চলতি বাক্সঙ্গো নেত্রাদীনাং চ বৈকৃতম্ ||৭০|| গ্রীবাচিবুকদন্তানাং তস্মিন্ পার্শ্বে তু বেদনা | যস্যাগ্রজো রোমহর্ষো বেপথুর্নেত্রমাবিলম্ ||৭১|| বাযুরূর্ধ্বং ত্বচি স্বাপস্তোদো মন্যাহনুগ্রহঃ | তমর্দিতমিতি প্রাহুর্ব্যাধিং ব্যাধিবিশারদাঃ ||৭২||
(गर्भिणीसूतिकाबालवृद्धक्षीणेष्वसृक्क्षये |) उच्चैर्व्याहरतोऽत्यर्थं खादतः कठिनानि वा | हसतो जृम्भतो भाराद्विषमाच्छयनादपि ||६८|| शिरोनासौष्ठचिबुकललाटेक्षणसन्धिगः | अर्दयित्वाऽनिलो वक्त्रमर्दितं जनयत्यतः ||६९|| वक्रीभवति वक्त्रार्धं ग्रीवा चाप्यपवर्तते | शिरश्चलति वाक्सङ्गो नेत्रादीनां च वैकृतम् ||७०|| ग्रीवाचिबुकदन्तानां तस्मिन् पार्श्वे तु वेदना | यस्याग्रजो रोमहर्षो वेपथुर्नेत्रमाविलम् ||७१|| वायुरूर्ध्वं त्वचि स्वापस्तोदो मन्याहनुग्रहः | तमर्दितमिति प्राहुर्व्याधिं व्याधिविशारदाः ||७२||
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Adhikarana 35 (73) · Śloka 73
ক্ষীণস্যানিমিষাক্ষস্য প্রসক্তং সক্তভাষিণঃ | ন সিধ্যত্যর্দিতং বাঢং ত্রিবর্ষং বেপনস্য চ ||৭৩||
क्षीणस्यानिमिषाक्षस्य प्रसक्तं सक्तभाषिणः | न सिध्यत्यर्दितं बाढं त्रिवर्षं वेपनस्य च ||७३||
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Adhikarana 36 (74) · Śloka 74
পার্ষ্ণিপ্রত্যঙ্গুলীনাং তু কণ্ডরা যাঽনিলার্দিতা | সক্থ্নঃ ক্ষেপং নিগৃহ্ণীযাদ্গৃধ্রসীতি হি সা স্মৃতা ||৭৪||
पार्ष्णिप्रत्यङ्गुलीनां तु कण्डरा याऽनिलार्दिता | सक्थ्नः क्षेपं निगृह्णीयाद्गृध्रसीति हि सा स्मृता ||७४||
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Adhikarana 37 (75) · Śloka 75
তলপ্রত্যঙ্গুলীনাং তু কণ্ডরা বাহুপৃষ্ঠতঃ | বাহ্বোঃ কর্মক্ষযকরী বিশ্বাচীতি হি সা স্মৃতা ||৭৫||
तलप्रत्यङ्गुलीनां तु कण्डरा बाहुपृष्ठतः | बाह्वोः कर्मक्षयकरी विश्वाचीति हि सा स्मृता ||७५||
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Adhikarana 38 (76) · Śloka 76
বাতশোণিতজঃ শোফো জানুমধ্যে মহারুজঃ | শিরঃ ক্রোষ্টুকপূর্বং তু স্থূলঃ ক্রোষ্টুকমূর্ধবত্ ||৭৬||
वातशोणितजः शोफो जानुमध्ये महारुजः | शिरः क्रोष्टुकपूर्वं तु स्थूलः क्रोष्टुकमूर्धवत् ||७६||
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Adhikarana 39 (77) · Śloka 77
বাযুঃ কট্যাং স্থিতঃ সক্থ্নঃ কণ্ডরামাক্ষিপেদ্যদা | খঞ্জস্তদা ভবেজ্জন্তুঃ, পঙ্গুঃ সক্থ্নোর্দ্বযোর্বধাত্ ||৭৭||
वायुः कट्यां स्थितः सक्थ्नः कण्डरामाक्षिपेद्यदा | खञ्जस्तदा भवेज्जन्तुः, पङ्गुः सक्थ्नोर्द्वयोर्वधात् ||७७||
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Adhikarana 40 (78) · Śloka 78
প্রক্রামন্ বেপতে যস্তু খঞ্জন্নিব চ গচ্ছতি | কলাযখঞ্জং তং বিদ্যান্মুক্তসন্ধিপ্রবন্ধনম্ ||৭৮||
प्रक्रामन् वेपते यस्तु खञ्जन्निव च गच्छति | कलायखञ्जं तं विद्यान्मुक्तसन्धिप्रबन्धनम् ||७८||
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Adhikarana 41 (79) · Śloka 79
ন্যস্তে তু বিষমং(মে) পাদে রুজঃ কুর্যাত্ সমীরণঃ | বাতকণ্টক ইত্যেষ বিজ্ঞেযঃ খডু(ল)কাশ্রিতঃ ||৭৯||
न्यस्ते तु विषमं(मे) पादे रुजः कुर्यात् समीरणः | वातकण्टक इत्येष विज्ञेयः खडु(ल)काश्रितः ||७९||
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Adhikarana 42 (80) · Śloka 80
পাদযোঃ কুরুতে দাহং পিত্তাসৃক্সহিতোঽনিলঃ | বিশেষতশ্চঙ্ক্রমণাত্ পাদদাহং তমাদিশেত্ ||৮০||
पादयोः कुरुते दाहं पित्तासृक्सहितोऽनिलः | विशेषतश्चङ्क्रमणात् पाददाहं तमादिशेत् ||८०||
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Adhikarana 43 (81) · Śloka 81
হৃষ্যতশ্চরণৌ যস্য ভবতশ্চ প্রসুপ্তবত্ | পাদহর্ষঃ স বিজ্ঞেযঃ কফবাতপ্রকোপজঃ ||৮১||
हृष्यतश्चरणौ यस्य भवतश्च प्रसुप्तवत् | पादहर्षः स विज्ञेयः कफवातप्रकोपजः ||८१||
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Adhikarana 44 (82) · Śloka 82
অংসদেশস্থিতো বাযুঃ শোষযিত্বাংঽসবন্ধনম্ | সিরাশ্চাকুঞ্চ্য তত্রস্থো জনযত্যববাহুকম্ ||৮২||
अंसदेशस्थितो वायुः शोषयित्वांऽसबन्धनम् | सिराश्चाकुञ्च्य तत्रस्थो जनयत्यवबाहुकम् ||८२||
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Adhikarana 45 (83) · Śloka 83
যদা শব্দবহং স্রোতো বাযুরাবৃত্য তিষ্ঠতি | শুদ্ধঃ শ্লেষ্মান্বিতো বাঽপি বাধির্যং তেন জাযতে ||৮৩||
यदा शब्दवहं स्रोतो वायुरावृत्य तिष्ठति | शुद्धः श्लेष्मान्वितो वाऽपि बाधिर्यं तेन जायते ||८३||
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Adhikarana 46 (84) · Śloka 84
হনুশঙ্খশিরোগ্রীবং যস্য ভিন্দন্নিবানিলঃ | কর্ণযোঃ কুরুতে শূলং কর্ণশূলং তদুচ্যতে ||৮৪||
हनुशङ्खशिरोग्रीवं यस्य भिन्दन्निवानिलः | कर्णयोः कुरुते शूलं कर्णशूलं तदुच्यते ||८४||
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Adhikarana 47 (85) · Śloka 85
আবৃত্য সকফো বাযুর্ধমনীঃ শব্দবাহিনীঃ | নরান্ করোত্যক্রিযকান্মূকমিন্মিণগদ্গদান্ ||৮৫||
आवृत्य सकफो वायुर्धमनीः शब्दवाहिनीः | नरान् करोत्यक्रियकान्मूकमिन्मिणगद्गदान् ||८५||
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Adhikarana 48 (86-87) · Śloka 87
অধো যা বেদনা যাতি বর্চোমূত্রাশযোত্থিতা | ভিন্দতীব গুদোপস্থং সা তূনীত্যভিধীযতে ||৮৬|| গুদোপস্থোত্থিতা সৈব প্রতিলোমবিসর্পিণী | বেগৈঃ পক্বাশযং যাতি প্রতিতূনীতি সা স্মৃতা ||৮৭||
अधो या वेदना याति वर्चोमूत्राशयोत्थिता | भिन्दतीव गुदोपस्थं सा तूनीत्यभिधीयते ||८६|| गुदोपस्थोत्थिता सैव प्रतिलोमविसर्पिणी | वेगैः पक्वाशयं याति प्रतितूनीति सा स्मृता ||८७||
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Adhikarana 49 (88) · Śloka 88
সাটোপমত্যুগ্ররুজমাধ্মাতমুদরং ভৃশম্ | আধ্মানমিতি জানীযাদ্ঘোরং বাতনিরোধজম্ ||৮৮||
साटोपमत्युग्ररुजमाध्मातमुदरं भृशम् | आध्मानमिति जानीयाद्घोरं वातनिरोधजम् ||८८||
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Adhikarana 50 (89) · Śloka 89
বিমুক্তপার্শ্বহৃদযং তদেবামাশযোত্থিতম্ | প্রত্যাধ্মানং বিজানীযাত্ কফব্যাকুলিতানিলম্ ||৮৯||
विमुक्तपार्श्वहृदयं तदेवामाशयोत्थितम् | प्रत्याध्मानं विजानीयात् कफव्याकुलितानिलम् ||८९||
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Adhikarana 51 (90-91) · Śloka 91
অষ্ঠীলাবদ্ঘনং গ্রন্থিমূর্ধ্বমাযতমুন্নতম্ | বাতাষ্ঠীলাং বিজানীযাদ্বহির্মার্গাবরোধিনীম্ ||৯০|| এনামেব রুজাযুক্তাং বাতবিণ্মূত্ররোধিনীম্ | প্রত্যষ্ঠীলামিতি বদেজ্জঠরে তির্যগুত্থিতাম্ ||৯১||
अष्ठीलावद्घनं ग्रन्थिमूर्ध्वमायतमुन्नतम् | वाताष्ठीलां विजानीयाद्बहिर्मार्गावरोधिनीम् ||९०|| एनामेव रुजायुक्तां वातविण्मूत्ररोधिनीम् | प्रत्यष्ठीलामिति वदेज्जठरे तिर्यगुत्थिताम् ||९१||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 1
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং নিদানস্থানে বাতব্যাধিনিদানং নাম প্রথমোঽধ্যাযঃ ||১||
इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने वातव्याधिनिदानं नाम प्रथमोऽध्यायः ||१||
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