Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতোঽধ্যযনসম্প্রদানীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातोऽध्ययनसम्प्रदानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতোঽধ্যযনসম্প্রদানীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातोऽध्ययनसम्प्रदानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
প্রাগভিহিতং সবিংশমধ্যাযশতং পঞ্চসু স্থানেষু | তত্র সূত্রস্থানমধ্যাযাঃ ষট্চত্বারিংশত্, ষোডশ নিদানানি, দশ শারীরাণি, চত্বারিংশচ্চিকিত্সিতানি, অষ্টৌ কল্পাঃ, তদুত্তরং ষট্ষষ্টিঃ ||৩||
प्रागभिहितं सविंशमध्यायशतं पञ्चसु स्थानेषु | तत्र सूत्रस्थानमध्यायाः षट्चत्वारिंशत्, षोडश निदानानि, दश शारीराणि, चत्वारिंशच्चिकित्सितानि, अष्टौ कल्पाः, तदुत्तरं षट्षष्टिः ||३||
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Adhikarana 3 (4-12) · Śloka 12
বেদোত্পত্তিঃ শিষ্যনযস্তথাঽধ্যযনদানিকঃ | প্রভাষণাগ্রহরণাবৃতুচর্যাঽথ যান্ত্রিকঃ ||৪|| শস্ত্রাবচারণং যোগ্যা বিশিখা ক্ষারকল্পনম্ | অগ্নিকর্ম জলৌকাখ্যো হ্যধ্যাযো রক্তবর্ণনম্ ||৫|| দোষধাতুমলাদ্যানাং বিজ্ঞানাধ্যায এব চ | কর্ণব্যধামপক্বৈষাবালেপো ব্রণ্যুপাসনম্ ||৬|| হিতাহিতো ব্রণপ্রশ্নো ব্রণাস্রাবশ্চ যঃ পৃথক্ | কৃত্যাকৃত্যবিধির্ব্যাধিসমুদ্দেশীয এব চ ||৭|| বিনিশ্চযঃ শস্ত্রবিধৌ প্রনষ্টজ্ঞানিকস্তথা | শল্যোদ্ধৃতির্ব্রণজ্ঞানং দূতস্বপ্ননিদর্শনম্ ||৮|| পঞ্চেন্দ্রিযং তথা ছাযা স্বভাবাদ্বৈকৃতং তথা | অবারণো যুক্তসেনীয আতুরক্রমভূমিকৌ ||৯|| মিশ্রকাখ্যো দ্রব্যগণঃ সংশুদ্ধৌ শমনে চ যঃ | দ্রব্যাদীনাং চ বিজ্ঞানং বিশেষো দ্রব্যগোঽপরঃ ||১০|| রসজ্ঞানং বমনার্থমধ্যাযো রেচনায চ | দ্রবদ্রব্যবিধিস্তদ্বদন্নপানবিধিস্তথা ||১১|| সূচনাত্ সূত্রণাচ্চৈব সবনাচ্চার্থসন্ততেঃ | ষট্চত্বারিংশদধ্যাযং সূত্রস্থানং প্রচক্ষতে ||১২||
वेदोत्पत्तिः शिष्यनयस्तथाऽध्ययनदानिकः | प्रभाषणाग्रहरणावृतुचर्याऽथ यान्त्रिकः ||४|| शस्त्रावचारणं योग्या विशिखा क्षारकल्पनम् | अग्निकर्म जलौकाख्यो ह्यध्यायो रक्तवर्णनम् ||५|| दोषधातुमलाद्यानां विज्ञानाध्याय एव च | कर्णव्यधामपक्वैषावालेपो व्रण्युपासनम् ||६|| हिताहितो व्रणप्रश्नो व्रणास्रावश्च यः पृथक् | कृत्याकृत्यविधिर्व्याधिसमुद्देशीय एव च ||७|| विनिश्चयः शस्त्रविधौ प्रनष्टज्ञानिकस्तथा | शल्योद्धृतिर्व्रणज्ञानं दूतस्वप्ननिदर्शनम् ||८|| पञ्चेन्द्रियं तथा छाया स्वभावाद्वैकृतं तथा | अवारणो युक्तसेनीय आतुरक्रमभूमिकौ ||९|| मिश्रकाख्यो द्रव्यगणः संशुद्धौ शमने च यः | द्रव्यादीनां च विज्ञानं विशेषो द्रव्यगोऽपरः ||१०|| रसज्ञानं वमनार्थमध्यायो रेचनाय च | द्रवद्रव्यविधिस्तद्वदन्नपानविधिस्तथा ||११|| सूचनात् सूत्रणाच्चैव सवनाच्चार्थसन्ततेः | षट्चत्वारिंशदध्यायं सूत्रस्थानं प्रचक्षते ||१२||
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Adhikarana 4 (13-14) · Śloka 14
বাতব্যাধিকমর্শাংসি সাশ্মরিশ্চ ভগন্দরঃ | কুষ্ঠমেহোদরং মূঢো বিদ্রধিঃ পরিসর্পণম্ ||১৩|| গ্রন্থিবৃদ্ধিক্ষুদ্রশূকভগ্নাশ্চ মুখরোগিকম্ | হেতুলক্ষণনির্দেশান্নিদানানীতি ষোডশ ||১৪||
वातव्याधिकमर्शांसि साश्मरिश्च भगन्दरः | कुष्ठमेहोदरं मूढो विद्रधिः परिसर्पणम् ||१३|| ग्रन्थिवृद्धिक्षुद्रशूकभग्नाश्च मुखरोगिकम् | हेतुलक्षणनिर्देशान्निदानानीति षोडश ||१४||
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Adhikarana 5 (15-17) · Śloka 17
ভূতচিন্তা রজঃশুদ্ধির্গর্ভাবক্রান্তিরেব চ | ব্যাকরণং চ গর্ভস্য শরীরস্য চ যত্স্মৃতম্ ||১৫|| প্রত্যেকং মর্মনির্দেশঃ সিরাবর্ণনমেব চ | সিরাব্যধো ধমনীনাং গর্ভিণ্যা ব্যাকৃতিস্তথা ||১৬|| নির্দিষ্টানি দশৈতানি শারীরাণি মহর্ষিণা | বিজ্ঞানার্থং শরীরস্য ভিষজাং যোগিনামপি ||১৭||
भूतचिन्ता रजःशुद्धिर्गर्भावक्रान्तिरेव च | व्याकरणं च गर्भस्य शरीरस्य च यत्स्मृतम् ||१५|| प्रत्येकं मर्मनिर्देशः सिरावर्णनमेव च | सिराव्यधो धमनीनां गर्भिण्या व्याकृतिस्तथा ||१६|| निर्दिष्टानि दशैतानि शारीराणि महर्षिणा | विज्ञानार्थं शरीरस्य भिषजां योगिनामपि ||१७||
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Adhikarana 6 (18-26) · Śloka 26
দ্বিব্রণীযো ব্রণঃ সদ্যো ভগ্নানাং বাতরোগিকম্ | মহাবাতিকমর্শাংসি সাশ্মরিশ্চ ভগন্দরঃ ||১৮|| কুষ্ঠানাং মহতাং চাপি মৈহিকং পৈডিকং তথা | মধুমেহচিকিত্সা চ তথা চোদরিণামপি ||১৯|| মূঢগর্ভচিকিত্সা চ বিদ্রধীনাং বিসর্পিণাম্ | গ্রন্থিবৃদ্ধ্যুপদংশানাং তথা চ ক্ষুদ্ররোগিণাম্ ||২০|| শূকদোষচিকিত্সা চ তথা চ মুখরোগিণাম্ | শোফস্যানাগতানাং চ নিষেধো মিশ্রকং তথা ||২১|| বাজীকরং চ যত্ ক্ষীণে সর্বাবাধশমোঽপি চ | মেধাযুষ্করণং চাপি স্বভাবব্যাধিবারণম্ ||২২|| নিবৃত্তসন্তাপকরং কীর্তিতং চ রসাযনম্ | স্নেহোপযৌগিকঃ স্বেদো বমনে সবিরেচনে ||২৩|| তযোর্ব্যাপচ্চিকিত্সা চ নেত্রবস্তিবিভাগিকঃ | নেত্রবস্তিবিপত্সিদ্ধিস্তথা চোত্তরবস্তিকঃ ||২৪|| নিরূহক্রমসঞ্জ্ঞশ্চ তথৈবাতুরসঞ্জ্ঞকঃ | ধূমনস্যবিধিশ্চান্ত্যশ্চত্বারিংশদিতি স্মৃতাঃ ||২৫|| প্রাযশ্চিত্তং প্রশমনং চিকিত্সা শান্তিকর্ম চ | পর্যাযাস্তস্য নির্দেশাচ্চিকিত্সাস্থানমুচ্যতে ||২৬||
द्विव्रणीयो व्रणः सद्यो भग्नानां वातरोगिकम् | महावातिकमर्शांसि साश्मरिश्च भगन्दरः ||१८|| कुष्ठानां महतां चापि मैहिकं पैडिकं तथा | मधुमेहचिकित्सा च तथा चोदरिणामपि ||१९|| मूढगर्भचिकित्सा च विद्रधीनां विसर्पिणाम् | ग्रन्थिवृद्ध्युपदंशानां तथा च क्षुद्ररोगिणाम् ||२०|| शूकदोषचिकित्सा च तथा च मुखरोगिणाम् | शोफस्यानागतानां च निषेधो मिश्रकं तथा ||२१|| वाजीकरं च यत् क्षीणे सर्वाबाधशमोऽपि च | मेधायुष्करणं चापि स्वभावव्याधिवारणम् ||२२|| निवृत्तसन्तापकरं कीर्तितं च रसायनम् | स्नेहोपयौगिकः स्वेदो वमने सविरेचने ||२३|| तयोर्व्यापच्चिकित्सा च नेत्रबस्तिविभागिकः | नेत्रबस्तिविपत्सिद्धिस्तथा चोत्तरबस्तिकः ||२४|| निरूहक्रमसञ्ज्ञश्च तथैवातुरसञ्ज्ञकः | धूमनस्यविधिश्चान्त्यश्चत्वारिंशदिति स्मृताः ||२५|| प्रायश्चित्तं प्रशमनं चिकित्सा शान्तिकर्म च | पर्यायास्तस्य निर्देशाच्चिकित्सास्थानमुच्यते ||२६||
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Adhikarana 7 (27-28) · Śloka 28
অন্নস্য রক্ষা বিজ্ঞানং স্থাবরস্যেতরস্য চ | সর্পদষ্টবিষজ্ঞানং তস্যৈব চ চিকিত্সিতম্ ||২৭|| দুন্দুভের্মূষিকাণাং চ কীটানাং কল্প এব চ | অষ্টৌ কল্পাঃ সমাখ্যাতা বিষভেষজকল্পনাত্ ||২৮||
अन्नस्य रक्षा विज्ञानं स्थावरस्येतरस्य च | सर्पदष्टविषज्ञानं तस्यैव च चिकित्सितम् ||२७|| दुन्दुभेर्मूषिकाणां च कीटानां कल्प एव च | अष्टौ कल्पाः समाख्याता विषभेषजकल्पनात् ||२८||
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Adhikarana 8 (29) · Śloka 29
অধ্যাযানাং শতং বিংশমেবমেতদুদীরিতম্ |২৯|
अध्यायानां शतं विंशमेवमेतदुदीरितम् |२९|
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Adhikarana 9 (29-34) · Śloka 35
অতঃ পরং স্বনাম্নৈব তন্ত্রমুত্তরমুচ্যতে ||২৯|| অধিকৃত্য কৃতং যস্মাত্তন্ত্রমেতদুপদ্রবান্ | ঔপদ্রবিক ইত্যেষ তস্যাগ্র্যত্বান্নিরুচ্যতে ||৩০|| সন্ধৌ বর্ত্মনি শুক্লে চ কৃষ্ণে সর্বত্র দৃষ্টিষু | সংবিজ্ঞানার্থমধ্যাযা গদানাং তু প্রতি প্রতি ||৩১|| চিকিত্সাপ্রবিভাগীযো বাতাভিষ্যন্দবারণঃ | পৈত্তস্য শ্লৈষ্মিকস্যাপি রৌধিরস্য তথৈব চ ||৩২|| লেখ্যভেদ্যনিষেধৌ চ ছেদ্যানাং বর্ত্মদৃষ্টিষু | ক্রিযাকল্পোঽভিঘাতশ্চ কর্ণোত্থাস্তচ্চিকিত্সিতম্ ||৩৩|| ঘ্রাণোত্থানাং চ বিজ্ঞানং তদ্গদপ্রতিষেধনম্ | প্রতিশ্যাযনিষেধশ্চ শিরোগদবিবেচনম্ ||৩৪|| চিকিত্সা তদ্গদানাং চ শালাক্যং তন্ত্রমুচ্যতে |৩৫|
अतः परं स्वनाम्नैव तन्त्रमुत्तरमुच्यते ||२९|| अधिकृत्य कृतं यस्मात्तन्त्रमेतदुपद्रवान् | औपद्रविक इत्येष तस्याग्र्यत्वान्निरुच्यते ||३०|| सन्धौ वर्त्मनि शुक्ले च कृष्णे सर्वत्र दृष्टिषु | संविज्ञानार्थमध्याया गदानां तु प्रति प्रति ||३१|| चिकित्साप्रविभागीयो वाताभिष्यन्दवारणः | पैत्तस्य श्लैष्मिकस्यापि रौधिरस्य तथैव च ||३२|| लेख्यभेद्यनिषेधौ च छेद्यानां वर्त्मदृष्टिषु | क्रियाकल्पोऽभिघातश्च कर्णोत्थास्तच्चिकित्सितम् ||३३|| घ्राणोत्थानां च विज्ञानं तद्गदप्रतिषेधनम् | प्रतिश्यायनिषेधश्च शिरोगदविवेचनम् ||३४|| चिकित्सा तद्गदानां च शालाक्यं तन्त्रमुच्यते |३५|
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Adhikarana 10 (35-37) · Śloka 37
নবগ্রহাকৃতিজ্ঞানং স্কন্দস্য চ নিষেধনম্ ||৩৫|| অপস্মারশকুন্যোশ্চ রেবত্যাশ্চ পুনঃ পৃথক্ | পূতনাযাস্তথাঽন্ধাযাঃ শীতপূতনমণ্ডিকা ||৩৬|| নৈগমেষচিকিত্সা চ গ্রহোত্পত্তিঃ সযোনিজা | কুমারতন্ত্রমিত্যেতচ্ছারীরেষু চ কীর্তিতম্ ||৩৭||
नवग्रहाकृतिज्ञानं स्कन्दस्य च निषेधनम् ||३५|| अपस्मारशकुन्योश्च रेवत्याश्च पुनः पृथक् | पूतनायास्तथाऽन्धायाः शीतपूतनमण्डिका ||३६|| नैगमेषचिकित्सा च ग्रहोत्पत्तिः सयोनिजा | कुमारतन्त्रमित्येतच्छारीरेषु च कीर्तितम् ||३७||
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Adhikarana 11 (38-40) · Śloka 40
জ্বরাতিসারশোষাণাং গুল্মহৃদ্রোগিণামপি | পাণ্ডূনাং রক্তপিত্তস্য মূর্চ্ছাযাঃ পানজাশ্চ যে ||৩৮|| তৃষ্ণাযাশ্ছর্দিহিক্কানাং নিষেধঃ শ্বাসকাসযোঃ | স্বরভেদচিকিত্সা চ কৃম্যুদাবর্তিনোঃ পৃথক্ ||৩৯|| বিসূচিকারোচকযোর্মূত্রাঘাতবিকৃচ্ছ্রযোঃ | ইতি কাযচিকিত্সাযাঃ শেষমত্র প্রকীর্তিতম্ ||৪০||
ज्वरातिसारशोषाणां गुल्महृद्रोगिणामपि | पाण्डूनां रक्तपित्तस्य मूर्च्छायाः पानजाश्च ये ||३८|| तृष्णायाश्छर्दिहिक्कानां निषेधः श्वासकासयोः | स्वरभेदचिकित्सा च कृम्युदावर्तिनोः पृथक् ||३९|| विसूचिकारोचकयोर्मूत्राघातविकृच्छ्रयोः | इति कायचिकित्सायाः शेषमत्र प्रकीर्तितम् ||४०||
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Adhikarana 12 (41) · Śloka 41
অমানুষনিষেধশ্চ তথাঽঽপস্মারিকোঽপরঃ | উন্মাদপ্রতিষেধশ্চ ভূতবিদ্যা নিরুচ্যতে ||৪১||
अमानुषनिषेधश्च तथाऽऽपस्मारिकोऽपरः | उन्मादप्रतिषेधश्च भूतविद्या निरुच्यते ||४१||
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Adhikarana 13 (42) · Śloka 42
রসভেদাঃ স্বস্থবৃত্তং যুক্তযস্তান্ত্রিকাশ্চ যাঃ | দোষভেদা ইতি জ্ঞেযা অধ্যাযাস্তন্ত্রভূষণাঃ ||৪২||
रसभेदाः स्वस्थवृत्तं युक्तयस्तान्त्रिकाश्च याः | दोषभेदा इति ज्ञेया अध्यायास्तन्त्रभूषणाः ||४२||
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Adhikarana 14 (43) · Śloka 43
শ্রেষ্ঠত্বাদুত্তরং হ্যেতত্তন্ত্রমাহুর্মহর্ষযঃ | বহ্বর্থসঙ্গ্রহাচ্ছ্রেষ্ঠমুত্তরং বাঽপি পশ্চিমম্ ||৪৩||
श्रेष्ठत्वादुत्तरं ह्येतत्तन्त्रमाहुर्महर्षयः | बह्वर्थसङ्ग्रहाच्छ्रेष्ठमुत्तरं वाऽपि पश्चिमम् ||४३||
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Adhikarana 15 (44-46) · Śloka 46
শালাক্যতন্ত্রং কৌমারং চিকিত্সা কাযিকী চ যা | ভূতবিদ্যেতি চত্বারি তন্ত্রে তূত্তরসঞ্জ্ঞিতে ||৪৪|| বাজীকরং চিকিত্সাসু রসাযনবিধিস্তথা | বিষতন্ত্রং পুনঃ কল্পাঃ শল্যজ্ঞানং সমন্ততঃ ||৪৫|| ইত্যষ্টাঙ্গমিদং তন্ত্রমাদিদেবপ্রকাশিতম্ | বিধিনাঽধীত্য যুঞ্জানা ভবন্তি প্রাণদা ভুবি ||৪৬||
शालाक्यतन्त्रं कौमारं चिकित्सा कायिकी च या | भूतविद्येति चत्वारि तन्त्रे तूत्तरसञ्ज्ञिते ||४४|| वाजीकरं चिकित्सासु रसायनविधिस्तथा | विषतन्त्रं पुनः कल्पाः शल्यज्ञानं समन्ततः ||४५|| इत्यष्टाङ्गमिदं तन्त्रमादिदेवप्रकाशितम् | विधिनाऽधीत्य युञ्जाना भवन्ति प्राणदा भुवि ||४६||
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Adhikarana 16 (47) · Śloka 47
এতদ্ধ্যবশ্যমধ্যেযম্, অধীত্য চ কর্মাপ্যবশ্যমুপাসিতব্যম্, উভযজ্ঞো হি ভিষগ্ রাজার্হো ভবতি ||৪৭||
एतद्ध्यवश्यमध्येयम्, अधीत्य च कर्माप्यवश्यमुपासितव्यम्, उभयज्ञो हि भिषग् राजार्हो भवति ||४७||
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Adhikarana 17 (48-50) · Śloka 50
ভবন্তি চাত্র- যস্তু কেবলশাস্ত্রজ্ঞঃ কর্মস্বপরিনিষ্ঠিতঃ | স মুহ্যত্যাতুরং প্রাপ্য প্রাপ্য ভীরুরিবাহবম্ ||৪৮|| যস্তু কর্মসু নিষ্ণাতো ধার্ষ্ট্যাচ্ছাস্ত্রবহিষ্কৃতঃ | স সত্সু পূজাং নাপ্নোতি বধং চর্চ্ছতি রাজতঃ ||৪৯|| উভাবেতাবনিপুণাবসমর্থৌ স্বকর্মণি | অর্ধবেদধরাবেতাবেকপক্ষাবিব দ্বিজৌ ||৫০||
भवन्ति चात्र- यस्तु केवलशास्त्रज्ञः कर्मस्वपरिनिष्ठितः | स मुह्यत्यातुरं प्राप्य प्राप्य भीरुरिवाहवम् ||४८|| यस्तु कर्मसु निष्णातो धार्ष्ट्याच्छास्त्रबहिष्कृतः | स सत्सु पूजां नाप्नोति वधं चर्च्छति राजतः ||४९|| उभावेतावनिपुणावसमर्थौ स्वकर्मणि | अर्धवेदधरावेतावेकपक्षाविव द्विजौ ||५०||
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Adhikarana 18 (51) · Śloka 51
ওষধ্যোঽমৃতকল্পাস্তু শস্ত্রাশনিবিষোপমাঃ | ভবন্ত্যজ্ঞৈরুপহৃতাস্তস্মাদেতান্ বিবর্জযেত্ ||৫১||
ओषध्योऽमृतकल्पास्तु शस्त्राशनिविषोपमाः | भवन्त्यज्ञैरुपहृतास्तस्मादेतान् विवर्जयेत् ||५१||
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Adhikarana 19 (52) · Śloka 52
স্নেহাদিষ্বনভিজ্ঞো যশ্ছেদ্যাদিষু চ কর্মসু | স নিহন্তি জনং লোভাত্ কুবৈদ্যো নৃপদোষতঃ ||৫২||
स्नेहादिष्वनभिज्ञो यश्छेद्यादिषु च कर्मसु | स निहन्ति जनं लोभात् कुवैद्यो नृपदोषतः ||५२||
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Adhikarana 20 (53) · Śloka 53
যস্তূভযজ্ঞো মতিমান্ স সমর্থোঽর্থসাধনে | আহবে কর্ম নির্বোঢুং দ্বিচক্রঃ স্যন্দনো যথা ||৫৩||
यस्तूभयज्ञो मतिमान् स समर्थोऽर्थसाधने | आहवे कर्म निर्वोढुं द्विचक्रः स्यन्दनो यथा ||५३||
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Adhikarana 21 (54) · Śloka 54
অথ বত্স! তদেতদধ্যেযং যথা তথোপধারয মযা প্রোচ্যমানং- অথ শুচযে কৃতোত্তরাসঙ্গাযাব্যাকুলাযোপস্থিতাযাধ্যযনকালে শিষ্যায যথাশক্তি গুরুরুপদিশেত্ পদং পাদং শ্লোকং বা; তে চ পদপাদশ্লোকা ভূযঃ ক্রমেণানুসন্ধেযাঃ, এবমেকৈকশো ঘটযেদাত্মনা চানুপঠেত্; অদ্রুতমবিলম্বিতমবিশঙ্কিতমননুনাসিকং সুব্যক্তাক্ষরমপীডিতবর্ণমক্ষিভ্রুবৌষ্ঠহস্তৈরনভিনীতং সুসংস্কৃতং নাত্যুচ্চৈর্নাতিনীচৈশ্চ স্বরৈঃ পঠেত্ | ন চান্তরেণ কশ্চিদ্ব্রজেত্ তযোরধীযানযোঃ ||৫৪||
अथ वत्स! तदेतदध्येयं यथा तथोपधारय मया प्रोच्यमानं- अथ शुचये कृतोत्तरासङ्गायाव्याकुलायोपस्थितायाध्ययनकाले शिष्याय यथाशक्ति गुरुरुपदिशेत् पदं पादं श्लोकं वा; ते च पदपादश्लोका भूयः क्रमेणानुसन्धेयाः, एवमेकैकशो घटयेदात्मना चानुपठेत्; अद्रुतमविलम्बितमविशङ्कितमननुनासिकं सुव्यक्ताक्षरमपीडितवर्णमक्षिभ्रुवौष्ठहस्तैरनभिनीतं सुसंस्कृतं नात्युच्चैर्नातिनीचैश्च स्वरैः पठेत् | न चान्तरेण कश्चिद्व्रजेत् तयोरधीयानयोः ||५४||
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Adhikarana 22 (55) · Śloka 55
ভবতশ্চাত্র | শুচির্গুরুপরো দক্ষস্তন্দ্রানিদ্রাবিবর্জিতঃ | পঠন্নেতেন বিধিনা শিষ্যঃ শাস্ত্রান্তমাপ্নুযাত্ ||৫৫||
भवतश्चात्र | शुचिर्गुरुपरो दक्षस्तन्द्रानिद्राविवर्जितः | पठन्नेतेन विधिना शिष्यः शास्त्रान्तमाप्नुयात् ||५५||
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Adhikarana 23 (56) · Śloka 56
বাক্সৌষ্ঠবেঽর্থবিজ্ঞানে প্রাগল্ভ্যে কর্মনৈপুণে | তদভ্যাসে চ সিদ্ধৌ চ যতেতাধ্যযনান্তগঃ ||৫৬||
वाक्सौष्ठवेऽर्थविज्ञाने प्रागल्भ्ये कर्मनैपुणे | तदभ्यासे च सिद्धौ च यतेताध्ययनान्तगः ||५६||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 3
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং সূত্রস্থানেঽধ্যযনসম্প্রদানীযো নাম তৃতীযোঽধ্যাযঃ ||৩||
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थानेऽध्ययनसम्प्रदानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः ||३||
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