Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতোঽগ্রোপহরণীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातोऽग्रोपहरणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতোঽগ্রোপহরণীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातोऽग्रोपहरणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
ত্রিবিধং কর্ম- পূর্বকর্ম, প্রধানকর্ম, পশ্চাত্কর্মেতি; তদ্ব্যাধিং প্রত্যুপদেক্ষ্যামঃ ||৩||
त्रिविधं कर्म- पूर्वकर्म, प्रधानकर्म, पश्चात्कर्मेति; तद्व्याधिं प्रत्युपदेक्ष्यामः ||३||
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
অস্য তু শাস্ত্রস্য শস্ত্রকর্মপ্রাধান্যাচ্ছস্ত্রকর্মৈব তাবত্ পূর্বমুপদেক্ষ্যামস্তত্সম্ভারাংশ্চ ||৪||
अस्य तु शास्त्रस्य शस्त्रकर्मप्राधान्याच्छस्त्रकर्मैव तावत् पूर्वमुपदेक्ष्यामस्तत्सम्भारांश्च ||४||
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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5
তচ্চ শস্ত্রকর্মাঽষ্টবিধং; তদ্যথা- ছেদ্যং, ভেদ্যং, লেখ্যং, বেধ্যম্, এষ্যম্, আহার্যং, বিস্রাব্যং, সীব্যমিতি ||৫||
तच्च शस्त्रकर्माऽष्टविधं; तद्यथा- छेद्यं, भेद्यं, लेख्यं, वेध्यम्, एष्यम्, आहार्यं, विस्राव्यं, सीव्यमिति ||५||
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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6
অতোঽন্যতমং কর্ম চিকীর্ষতা বৈদ্যেন পূর্বমেবোপকল্পযিতব্যানি ভবন্তি, তদ্যথা- যন্ত্রশস্ত্রক্ষারাগ্নিশলাকাশৃঙ্গজলৌকালাবূজাম্ববৌষ্ঠপিচুপ্রোতসূত্রপত্রপট্টমধুঘৃতবসাপযস্তৈল- তর্পণকষাযালেপনকল্কব্যজনশীতোষ্ণোদককটাহাদীনি, পরিকর্মিণশ্চ স্নিগ্ধাঃ স্থিরা বলবন্তঃ ||৬||
अतोऽन्यतमं कर्म चिकीर्षता वैद्येन पूर्वमेवोपकल्पयितव्यानि भवन्ति, तद्यथा- यन्त्रशस्त्रक्षाराग्निशलाकाशृङ्गजलौकालाबूजाम्बवौष्ठपिचुप्रोतसूत्रपत्रपट्टमधुघृतवसापयस्तैल- तर्पणकषायालेपनकल्कव्यजनशीतोष्णोदककटाहादीनि, परिकर्मिणश्च स्निग्धाः स्थिरा बलवन्तः ||६||
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Adhikarana 6 (7) · Śloka 7
ততঃ প্রশস্তেষু তিথিকরণমুহূর্তনক্ষত্রেষু দধ্যক্ষতান্নপানরত্নৈরগ্নিং বিপ্রান্ ভিষজশ্চার্চযিত্বা, কৃতবলিমঙ্গলস্বস্তিবাচনং লঘুভুক্তবন্তং প্রাঙ্মুখমাতুরমুপবেশ্য , যন্ত্রযিত্বা , প্রত্যঙ্মুখো বৈদ্যো মর্মসিরাস্নাযুসন্ধ্যস্থিধমনীঃ পরিহরন্, অনুলোমং শস্ত্রং নিদধ্যাদাপূযদর্শনাত্ , সকৃদেবাপহরেচ্ছস্ত্রমাশু চ; মহত্স্বপি চ পাকেষু দ্ব্যঙ্গুলান্তরং ত্র্যঙ্গুলান্তরং বা শস্ত্রপদমুক্তম্ ||৭||
ततः प्रशस्तेषु तिथिकरणमुहूर्तनक्षत्रेषु दध्यक्षतान्नपानरत्नैरग्निं विप्रान् भिषजश्चार्चयित्वा, कृतबलिमङ्गलस्वस्तिवाचनं लघुभुक्तवन्तं प्राङ्मुखमातुरमुपवेश्य , यन्त्रयित्वा , प्रत्यङ्मुखो वैद्यो मर्मसिरास्नायुसन्ध्यस्थिधमनीः परिहरन्, अनुलोमं शस्त्रं निदध्यादापूयदर्शनात् , सकृदेवापहरेच्छस्त्रमाशु च; महत्स्वपि च पाकेषु द्व्यङ्गुलान्तरं त्र्यङ्गुलान्तरं वा शस्त्रपदमुक्तम् ||७||
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Adhikarana 7 (8) · Śloka 8
তত্রাযতো বিশালঃ সমঃ সুবিভক্তো নিরাশ্রয ইতি ব্রণগুণাঃ ||৮||
तत्रायतो विशालः समः सुविभक्तो निराश्रय इति व्रणगुणाः ||८||
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Adhikarana 8 (9) · Śloka 9
ভবতশ্চাত্র- আযতশ্চ বিশালশ্চ সুবিভক্তো নিরাশ্রযঃ | প্রাপ্তকালকৃতশ্চাপি ব্রণঃ কর্মণি শস্যতে ||৯||
भवतश्चात्र- आयतश्च विशालश्च सुविभक्तो निराश्रयः | प्राप्तकालकृतश्चापि व्रणः कर्मणि शस्यते ||९||
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Adhikarana 9 (10) · Śloka 10
শৌর্যমাশুক্রিযা শস্ত্রতৈক্ষ্ণ্যমস্বেদবেপথু | অসম্মোহশ্চ বৈদ্যস্য শস্ত্রকর্মণি শস্যতে ||১০||
शौर्यमाशुक्रिया शस्त्रतैक्ष्ण्यमस्वेदवेपथु | असम्मोहश्च वैद्यस्य शस्त्रकर्मणि शस्यते ||१०||
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Adhikarana 10 (11-12) · Śloka 12
একেন বা ব্রণেনাশুধ্যমানে নাঽন্তরা বুদ্ধ্যাঽবেক্ষ্যাপরান্ ব্রণান্ কুর্যাত্ ||১১|| ভবতি চাত্র- যতো যতো গতিং বিদ্যাদুত্সঙ্গো যত্র যত্র চ | তত্র তত্র ব্রণং কুর্যাদ্যথা দোষো ন তিষ্ঠতি ||১২||
एकेन वा व्रणेनाशुध्यमाने नाऽन्तरा बुद्ध्याऽवेक्ष्यापरान् व्रणान् कुर्यात् ||११|| भवति चात्र- यतो यतो गतिं विद्यादुत्सङ्गो यत्र यत्र च | तत्र तत्र व्रणं कुर्याद्यथा दोषो न तिष्ठति ||१२||
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Adhikarana 11 (13-15) · Śloka 15
তত্র ভ্রূগণ্ডশঙ্খললাটাক্ষিপুটৌষ্ঠদন্তবেষ্টকক্ষাকুক্ষিবঙ্ক্ষণেষু তির্যক্ ছেদ উক্তঃ ||১৩|| (চন্দ্রমণ্ডলবচ্ছেদান্ পাণিপাদেষু কারযেত্ | অর্ধচন্দ্রাকৃতীংশ্চাপি গুদে মেঢ্রে চ বুদ্ধিমান্) ||১৪|| অন্যথা তু সিরাস্নাযুচ্ছেদনম্, অতিমাত্রং বেদনা, চিরাদ্ব্রণসংরোহো, মাংসকন্দীপ্রাদুর্ভাবশ্চেতি ||১৫||
तत्र भ्रूगण्डशङ्खललाटाक्षिपुटौष्ठदन्तवेष्टकक्षाकुक्षिवङ्क्षणेषु तिर्यक् छेद उक्तः ||१३|| (चन्द्रमण्डलवच्छेदान् पाणिपादेषु कारयेत् | अर्धचन्द्राकृतींश्चापि गुदे मेढ्रे च बुद्धिमान्) ||१४|| अन्यथा तु सिरास्नायुच्छेदनम्, अतिमात्रं वेदना, चिराद्व्रणसंरोहो, मांसकन्दीप्रादुर्भावश्चेति ||१५||
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Adhikarana 12 (16) · Śloka 16
মূঢগর্ভোদরার্শোঽশ্মরীভগন্দরমুখরোগেষ্বভুক্তবতঃ কর্ম কুর্বীত ||১৬||
मूढगर्भोदरार्शोऽश्मरीभगन्दरमुखरोगेष्वभुक्तवतः कर्म कुर्वीत ||१६||
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Adhikarana 13 (17) · Śloka 17
ততঃ শস্ত্রমবচার্য,শীতাভিরদ্ভিরাতুরমাশ্বাস্য, সমন্তাত্ পরিপীড্যাঙ্গুল্যা, ব্রণমভিমৃদ্য(জ্য), প্রক্ষাল্য কষাযেণ প্রোতেনোদকমাদায , তিলকল্কমধুসর্পিঃপ্রগাঢামৌষধযুক্তাং নাতিস্নিগ্ধাং নাতিরূক্ষাং বর্তিং প্রণিদধ্যাত্; ততঃ কল্কেনাচ্ছাদ্য, ঘনাং কবলিকাং দত্ত্বা, বস্ত্রপট্টেন বধ্নীযাত্; বেদনারক্ষোঘ্নৈর্ধূপৈর্ধূপযেত্, রক্ষোঘ্নৈশ্চ মন্ত্রৈ রক্ষাং কুর্বীত ||১৭||
ततः शस्त्रमवचार्य,शीताभिरद्भिरातुरमाश्वास्य, समन्तात् परिपीड्याङ्गुल्या, व्रणमभिमृद्य(ज्य), प्रक्षाल्य कषायेण प्रोतेनोदकमादाय , तिलकल्कमधुसर्पिःप्रगाढामौषधयुक्तां नातिस्निग्धां नातिरूक्षां वर्तिं प्रणिदध्यात्; ततः कल्केनाच्छाद्य, घनां कवलिकां दत्त्वा, वस्त्रपट्टेन बध्नीयात्; वेदनारक्षोघ्नैर्धूपैर्धूपयेत्, रक्षोघ्नैश्च मन्त्रै रक्षां कुर्वीत ||१७||
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Adhikarana 14 (18) · Śloka 18
ততো গুগ্গুল্বগুরুসর্জরসবচাগৌরসর্ষপচূর্ণৈর্লবণনিম্বপত্রবিমিশ্রৈরাজ্যযুক্তৈর্ধূপযেত্ | আজ্যশেষেণ চাস্য প্রাণান্ সমালভেত ||১৮||
ततो गुग्गुल्वगुरुसर्जरसवचागौरसर्षपचूर्णैर्लवणनिम्बपत्रविमिश्रैराज्ययुक्तैर्धूपयेत् | आज्यशेषेण चास्य प्राणान् समालभेत ||१८||
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Adhikarana 15 (19-33) · Śloka 33
উদকুম্ভাচ্চাপো গৃহীত্বা প্রোক্ষযন্ রক্ষাকর্ম কুর্যাত্; তদ্বক্ষ্যামঃ- ||১৯|| কৃত্যানাং প্রতিঘাতার্থং তথা রক্ষোভযস্য চ | রক্ষাকর্ম করিষ্যামি ব্রহ্মা তদনুমন্যতাম্ ||২০|| নাগাঃ পিশাচা গন্ধর্বাঃ পিতরো যক্ষরাক্ষসাঃ | অভিদ্রবন্তি যে যে ত্বাং ব্রহ্মাদ্যা ঘ্নন্তু তান্ সদা ||২১|| পৃথিব্যামন্তরীক্ষে চ যে চরন্তি নিশাচরাঃ | দিক্ষু বাস্তুনিবাসাশ্চ পান্তু ত্বাং তে নমস্কৃতাঃ ||২২|| পান্তু ত্বাং মুনযো ব্রাহ্মযা দিব্যা রাজর্ষযস্তথা | পর্বতাশ্চৈব নদ্যশ্চ সর্বাঃ সর্বে চ সাগরাঃ ||২৩|| অগ্নী রক্ষতু তে জিহ্বাং প্রাণান্ বাযুস্তথৈব চ | সোমো ব্যানমপানং তে পর্জন্যঃ পরিরক্ষতু ||২৪|| উদানং বিদ্যুতঃ পান্তু সমানং স্তনযিত্নবঃ | বলমিন্দ্রো বলপতির্মনুর্মন্যে মতিং তথা ||২৫|| কামাংস্তে পান্তু গন্ধর্বাঃ সত্ত্বমিন্দ্রোঽভিরক্ষতু | প্রজ্ঞাং তে বরুণো রাজা সমুদ্রো নাভিমণ্ডলম্ ||২৬|| চক্ষুঃ সূর্যো দিশঃ শ্রোত্রে চন্দ্রমাঃ পাতু তে মনঃ | নক্ষত্রাণি সদা রূপং ছাযাং পান্তু নিশাস্তব ||২৭|| রেতস্ত্বাপ্যাযযন্ত্বাপো রোমাণ্যোষধযস্তথা | আকাশং খানি তে পান্তু দেহং তব বসুন্ধরা ||২৮|| বৈশ্বানরঃ শিরঃ পাতু বিষ্ণুস্তব পরাক্রমম্ | পৌরুষং পুরুষশ্রেষ্ঠো ব্রহ্মাঽঽত্মানং ধ্রুবো ভ্রুবৌ ||২৯|| এতা দেহে বিশেষেণ তব নিত্যা হি দেবতাঃ | এতাস্ত্বাং সততং পান্তু দীর্ঘমাযুরবাপ্নুহি ||৩০|| স্বস্তি তে ভগবান্ ব্রহ্মা স্বস্তি দেবাশ্চ কুর্বতাম্ | (স্বস্তি তে চন্দ্রসূর্যৌ চ স্বস্তি নারদপর্বতৌ) | স্বস্ত্যগ্নিশ্চৌব বাযুশ্চ স্বস্তি দেবাঃ সহেন্দ্রগাঃ ||৩১|| পিতামহকৃতা রক্ষা স্বস্ত্যাযুর্বর্ধতাং তব | ঈতযস্তে প্রশাম্যন্তু সদা ভব গতব্যথঃ ||৩২|| ইতি স্বাহা | এতৈর্বেদাত্মকৈর্মন্ত্রৈঃ কৃত্যাব্যাধিবিনাশনৈঃ | মযৈবং কৃতরক্ষস্ত্বং দীর্ঘমাযুরবাপ্নুহি ||৩৩||
उदकुम्भाच्चापो गृहीत्वा प्रोक्षयन् रक्षाकर्म कुर्यात्; तद्वक्ष्यामः- ||१९|| कृत्यानां प्रतिघातार्थं तथा रक्षोभयस्य च | रक्षाकर्म करिष्यामि ब्रह्मा तदनुमन्यताम् ||२०|| नागाः पिशाचा गन्धर्वाः पितरो यक्षराक्षसाः | अभिद्रवन्ति ये ये त्वां ब्रह्माद्या घ्नन्तु तान् सदा ||२१|| पृथिव्यामन्तरीक्षे च ये चरन्ति निशाचराः | दिक्षु वास्तुनिवासाश्च पान्तु त्वां ते नमस्कृताः ||२२|| पान्तु त्वां मुनयो ब्राह्मया दिव्या राजर्षयस्तथा | पर्वताश्चैव नद्यश्च सर्वाः सर्वे च सागराः ||२३|| अग्नी रक्षतु ते जिह्वां प्राणान् वायुस्तथैव च | सोमो व्यानमपानं ते पर्जन्यः परिरक्षतु ||२४|| उदानं विद्युतः पान्तु समानं स्तनयित्नवः | बलमिन्द्रो बलपतिर्मनुर्मन्ये मतिं तथा ||२५|| कामांस्ते पान्तु गन्धर्वाः सत्त्वमिन्द्रोऽभिरक्षतु | प्रज्ञां ते वरुणो राजा समुद्रो नाभिमण्डलम् ||२६|| चक्षुः सूर्यो दिशः श्रोत्रे चन्द्रमाः पातु ते मनः | नक्षत्राणि सदा रूपं छायां पान्तु निशास्तव ||२७|| रेतस्त्वाप्याययन्त्वापो रोमाण्योषधयस्तथा | आकाशं खानि ते पान्तु देहं तव वसुन्धरा ||२८|| वैश्वानरः शिरः पातु विष्णुस्तव पराक्रमम् | पौरुषं पुरुषश्रेष्ठो ब्रह्माऽऽत्मानं ध्रुवो भ्रुवौ ||२९|| एता देहे विशेषेण तव नित्या हि देवताः | एतास्त्वां सततं पान्तु दीर्घमायुरवाप्नुहि ||३०|| स्वस्ति ते भगवान् ब्रह्मा स्वस्ति देवाश्च कुर्वताम् | (स्वस्ति ते चन्द्रसूर्यौ च स्वस्ति नारदपर्वतौ) | स्वस्त्यग्निश्चौव वायुश्च स्वस्ति देवाः सहेन्द्रगाः ||३१|| पितामहकृता रक्षा स्वस्त्यायुर्वर्धतां तव | ईतयस्ते प्रशाम्यन्तु सदा भव गतव्यथः ||३२|| इति स्वाहा | एतैर्वेदात्मकैर्मन्त्रैः कृत्याव्याधिविनाशनैः | मयैवं कृतरक्षस्त्वं दीर्घमायुरवाप्नुहि ||३३||
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Adhikarana 16 (34) · Śloka 34
ততঃ কৃতরক্ষমাতুরমাগারং প্রবেশ্য, আচারিকমাদিশেত্ ||৩৪||
ततः कृतरक्षमातुरमागारं प्रवेश्य, आचारिकमादिशेत् ||३४||
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Adhikarana 17 (35) · Śloka 35
ততস্তৃতীযেঽহনি বিমুচ্যৈবমেব বধ্নীযাদ্বস্ত্রপট্টেন; ন চৈনং ত্বরমাণোঽপরেদ্যুর্মোক্ষযেত্ ||৩৫||
ततस्तृतीयेऽहनि विमुच्यैवमेव बध्नीयाद्वस्त्रपट्टेन; न चैनं त्वरमाणोऽपरेद्युर्मोक्षयेत् ||३५||
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Adhikarana 18 (36) · Śloka 36
দ্বিতীযদিবসপরিমোক্ষণাদ্বিগ্রথিতো ব্রণশ্চিরাদুপসংরোহতি, তীব্ররুজশ্চ ভবতি ||৩৬||
द्वितीयदिवसपरिमोक्षणाद्विग्रथितो व्रणश्चिरादुपसंरोहति, तीव्ररुजश्च भवति ||३६||
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Adhikarana 19 (37) · Śloka 37
অত ঊর্ধ্বং দোষকালবলাদীনবেক্ষ্য কষাযালেপনবন্ধাহারাচারান্ বিদধ্যাত্ ||৩৭||
अत ऊर्ध्वं दोषकालबलादीनवेक्ष्य कषायालेपनबन्धाहाराचारान् विदध्यात् ||३७||
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Adhikarana 20 (38) · Śloka 38
ন চৈনং ত্বরমাণঃ সান্তর্দোষং রোপযেত্; স হ্যল্পেনাপ্যপচারেণাভ্যন্তরমুত্সঙ্গং কৃত্বা ভূযোঽপি বিকরোতি ||৩৮||
न चैनं त्वरमाणः सान्तर्दोषं रोपयेत्; स ह्यल्पेनाप्यपचारेणाभ्यन्तरमुत्सङ्गं कृत्वा भूयोऽपि विकरोति ||३८||
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Adhikarana 21 (39) · Śloka 39
ভবন্তি চাত্র- তস্মাদন্তর্বহিশ্চৈব সুশুদ্ধং রোপযেদ্ব্রণম্ | রূঢেঽপ্যজীর্ণব্যাযামব্যবাযাদীন্ বিবর্জযেত্ | হর্ষং ক্রোধং ভযং চাপি যাবত্ স্থৈর্যোপসম্ভবাত্ ||৩৯||
भवन्ति चात्र- तस्मादन्तर्बहिश्चैव सुशुद्धं रोपयेद्व्रणम् | रूढेऽप्यजीर्णव्यायामव्यवायादीन् विवर्जयेत् | हर्षं क्रोधं भयं चापि यावत् स्थैर्योपसम्भवात् ||३९||
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Adhikarana 22 (40) · Śloka 40
হেমন্তে শিশিরে চৈব বসন্তে চাপি মোক্ষযেত্ | ত্র্যহাদ্দ্ব্যহাচ্ছরদ্গ্রীষ্মবর্ষাস্বপি চ বুদ্ধিমান্ ||৪০||
हेमन्ते शिशिरे चैव वसन्ते चापि मोक्षयेत् | त्र्यहाद्द्व्यहाच्छरद्ग्रीष्मवर्षास्वपि च बुद्धिमान् ||४०||
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Adhikarana 23 (41) · Śloka 41
অতিপাতিষু রোগেষু নেচ্ছেদ্বিধিমিমং ভিষক্ | প্রদীপ্তাগারবচ্ছীঘ্রং তত্র কুর্যাত্ প্রতিক্রিযাম্ ||৪১||
अतिपातिषु रोगेषु नेच्छेद्विधिमिमं भिषक् | प्रदीप्तागारवच्छीघ्रं तत्र कुर्यात् प्रतिक्रियाम् ||४१||
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Adhikarana 24 (42) · Śloka 42
যা বেদনা শস্ত্রনিপাতজাতা তীব্রা শরীরং প্রদুনোতি জন্তোঃ | ধৃতেন সা শান্তিমুপৈতি সিক্তা কোষ্ণেন যষ্টীমধুকান্বিতেনা ||৪২||
या वेदना शस्त्रनिपातजाता तीव्रा शरीरं प्रदुनोति जन्तोः | धृतेन सा शान्तिमुपैति सिक्ता कोष्णेन यष्टीमधुकान्वितेना ||४२||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 5
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং সূত্রস্থানেঽগ্রোপহরণীযো নাম পঞ্চমোঽধ্যাযঃ ||৫||
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थानेऽग्रोपहरणीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः ||५||
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