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34. yuktasēnīyādhyāyaḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতো যুক্তসেনীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातो युक्तसेनीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3-4) · Śloka 4

নৃপতের্যুক্তসেনস্য পরানভিজিগীষতঃ | ভিষজা রক্ষণং কার্যং যথা তদুপদেক্ষ্যতে ||৩|| বিজিগীষুঃ সহামাত্যৈর্যাত্রাযুক্তঃ প্রযত্নতঃ | রক্ষিতব্যো বিশেষেণ বিষাদেব নরাধিপঃ ||৪||

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नृपतेर्युक्तसेनस्य परानभिजिगीषतः | भिषजा रक्षणं कार्यं यथा तदुपदेक्ष्यते ||३|| विजिगीषुः सहामात्यैर्यात्रायुक्तः प्रयत्नतः | रक्षितव्यो विशेषेण विषादेव नराधिपः ||४||

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Adhikarana 3 (5) · Śloka 5

পন্থানমুদকং ছাযাং ভক্তং যবসমিন্ধনম্ | দূষযন্ত্যরযস্তচ্চ জানীযাচ্ছোধযেত্তথা ||৫||

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पन्थानमुदकं छायां भक्तं यवसमिन्धनम् | दूषयन्त्यरयस्तच्च जानीयाच्छोधयेत्तथा ||५||

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Adhikarana 4 (6) · Śloka 6

তস্য লিঙ্গং চিকিত্সা চ কল্পস্থানে প্রবক্ষ্যতে |৬|

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तस्य लिङ्गं चिकित्सा च कल्पस्थाने प्रवक्ष्यते |६|

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Adhikarana 5 (6) · Śloka 7

একোত্তরং মৃত্যুশতমথর্বাণঃ প্রচক্ষতে ||৬|| তত্রৈকঃ কালসংযুক্তঃ শেষা আগন্তবঃ স্মৃতাঃ |৭|

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एकोत्तरं मृत्युशतमथर्वाणः प्रचक्षते ||६|| तत्रैकः कालसंयुक्तः शेषा आगन्तवः स्मृताः |७|

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Adhikarana 6 (7) · Śloka 8

দোষাগন্তুজমৃত্যুভ্যো রসমন্ত্রবিশারদৌ ||৭|| রক্ষেতাং নৃপতিং নিত্যং যত্তৌ বৈদ্যপুরোহিতৌ |৮|

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दोषागन्तुजमृत्युभ्यो रसमन्त्रविशारदौ ||७|| रक्षेतां नृपतिं नित्यं यत्तौ वैद्यपुरोहितौ |८|

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Adhikarana 7 (8) · Śloka 9

ব্রহ্মা বেদাঙ্গমষ্টাঙ্গমাযুর্বেদমভাষত ||৮|| পুরোহিতমতে তস্মাদ্বর্তেত ভিষগাত্মবান্ |৯|

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ब्रह्मा वेदाङ्गमष्टाङ्गमायुर्वेदमभाषत ||८|| पुरोहितमते तस्माद्वर्तेत भिषगात्मवान् |९|

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Adhikarana 8 (9) · Śloka 10

সঙ্করঃ সর্ববর্ণানাং প্রণাশো ধর্মকর্মণাম্ ||৯|| প্রজানামপি চোচ্ছিত্তির্নৃপব্যসনহেতুতঃ |১০|

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सङ्करः सर्ववर्णानां प्रणाशो धर्मकर्मणाम् ||९|| प्रजानामपि चोच्छित्तिर्नृपव्यसनहेतुतः |१०|

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Adhikarana 9 (10-11) · Śloka 12

পুরুষাণাং নৃপাণাং চ কেবলং তুল্যমূর্তিতা ||১০|| আজ্ঞা ত্যাগঃ ক্ষমা ধৈর্যং বিক্রমশ্চাপ্যমানুষঃ | তস্মাদ্দেবমিবাভীক্ষ্ণং বাঙ্মনঃকর্মভিঃ শুভৈঃ ||১১|| চিন্তযেন্নৃপতিং বৈদ্যঃ শ্রেযাংসীচ্ছন্ বিচক্ষণঃ |১২|

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पुरुषाणां नृपाणां च केवलं तुल्यमूर्तिता ||१०|| आज्ञा त्यागः क्षमा धैर्यं विक्रमश्चाप्यमानुषः | तस्माद्देवमिवाभीक्ष्णं वाङ्मनःकर्मभिः शुभैः ||११|| चिन्तयेन्नृपतिं वैद्यः श्रेयांसीच्छन् विचक्षणः |१२|

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Adhikarana 10 (12-14) · Śloka 15

স্কন্ধাবারে চ মহতি রাজগেহাদনন্তরম্ ||১২|| ভবেত্সন্নিহিতো বৈদ্যঃ সর্বোপকরণান্বিতঃ | তত্রস্থমেনং ধ্বজবদ্যশঃখ্যাতিসমুচ্ছ্রিতম্ ||১৩|| উপসর্পন্ত্যমোহেন বিষশল্যামযার্দিতাঃ | স্বতন্ত্রকুশলোঽন্যেষু শাস্ত্রার্থেষ্ববহিষ্কৃতঃ ||১৪|| বৈদ্যো ধ্বজ ইবাভাতি নৃপতদ্বিদ্যপূজিতঃ |১৫|

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स्कन्धावारे च महति राजगेहादनन्तरम् ||१२|| भवेत्सन्निहितो वैद्यः सर्वोपकरणान्वितः | तत्रस्थमेनं ध्वजवद्यशःख्यातिसमुच्छ्रितम् ||१३|| उपसर्पन्त्यमोहेन विषशल्यामयार्दिताः | स्वतन्त्रकुशलोऽन्येषु शास्त्रार्थेष्वबहिष्कृतः ||१४|| वैद्यो ध्वज इवाभाति नृपतद्विद्यपूजितः |१५|

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Adhikarana 11 (15-16) · Śloka 17

বৈদ্যো ব্যাধ্যুপসৃষ্টশ্চ ভেষজং পরিচারকঃ ||১৫|| এতে পাদাশ্চিকিত্সাযাঃ কর্মসাধনহেতবঃ | গুণবদ্ভিস্ত্রিভিঃ পাদৈশ্চতুর্থো গুণবান্ ভিষক্ ||১৬|| ব্যাধিমল্পেন কালেন মহান্তমপি সাধযেত্ |১৭|

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वैद्यो व्याध्युपसृष्टश्च भेषजं परिचारकः ||१५|| एते पादाश्चिकित्सायाः कर्मसाधनहेतवः | गुणवद्भिस्त्रिभिः पादैश्चतुर्थो गुणवान् भिषक् ||१६|| व्याधिमल्पेन कालेन महान्तमपि साधयेत् |१७|

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Adhikarana 12 (17) · Śloka 18

বৈদ্যহীনাস্ত্রযঃ পাদা গুণবন্তোঽপ্যপার্থকাঃ ||১৭|| উদ্গাতৃহোতৃব্রহ্মাণো যথাঽধ্বর্যুং বিনাঽধ্বরে |১৮|

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वैद्यहीनास्त्रयः पादा गुणवन्तोऽप्यपार्थकाः ||१७|| उद्गातृहोतृब्रह्माणो यथाऽध्वर्युं विनाऽध्वरे |१८|

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Adhikarana 13 (18) · Śloka 19

বৈদ্যস্তু গুণবানেকস্তারযেদাতুরাং সদা ||১৮|| প্লবং প্রতিতরৈর্হীনং কর্ণধার ইবাম্ভসি |১৯|

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वैद्यस्तु गुणवानेकस्तारयेदातुरां सदा ||१८|| प्लवं प्रतितरैर्हीनं कर्णधार इवाम्भसि |१९|

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Adhikarana 14 (19-20) · Śloka 21

তত্ত্বাধিগতশাস্ত্রার্থো দৃষ্টকর্মা স্বযঙ্কৃতী ||১৯|| লঘুহস্তঃ শুচিঃ শূরঃ সজ্জোপস্করভেষজঃ | প্রত্যুত্পন্নমতির্ধীমান্ ব্যবসাযী বিশারদঃ ||২০|| সত্যধর্মপরো যশ্চ স ভিষক্ পাদ উচ্যতে |২১|

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तत्त्वाधिगतशास्त्रार्थो दृष्टकर्मा स्वयङ्कृती ||१९|| लघुहस्तः शुचिः शूरः सज्जोपस्करभेषजः | प्रत्युत्पन्नमतिर्धीमान् व्यवसायी विशारदः ||२०|| सत्यधर्मपरो यश्च स भिषक् पाद उच्यते |२१|

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Adhikarana 15 (21) · Śloka 22

আযুষ্মান্ সত্ত্ববান্ সাধ্যো দ্রব্যবানাত্মবানপি ||২১|| আস্তিকো বৈদ্যবাক্যস্থো ব্যাধিতঃ পাদ উচ্যতে |২২|

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आयुष्मान् सत्त्ववान् साध्यो द्रव्यवानात्मवानपि ||२१|| आस्तिको वैद्यवाक्यस्थो व्याधितः पाद उच्यते |२२|

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Adhikarana 16 (22-23) · Śloka 23

প্রশস্তদেশসম্ভূতং প্রশস্তেঽহনি চোদ্ধৃতম্ ||২২|| যুক্তমাত্রং মনস্কান্তং গন্ধবর্ণরসান্বিতম্ | দোষঘ্নমগ্লানিকরমবিকারি বিপর্যযে | সমীক্ষ্য দত্তং কালে চ ভেষজং পাদ উচ্যতে ||২৩||

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प्रशस्तदेशसम्भूतं प्रशस्तेऽहनि चोद्धृतम् ||२२|| युक्तमात्रं मनस्कान्तं गन्धवर्णरसान्वितम् | दोषघ्नमग्लानिकरमविकारि विपर्यये | समीक्ष्य दत्तं काले च भेषजं पाद उच्यते ||२३||

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Adhikarana 17 (24) · Śloka 24

স্নিগ্ধোঽজুগুপ্সুর্বলবান্ যুক্তো ব্যাধিতরক্ষণে | বৈদ্যবাক্যকৃদশ্রান্তঃ পাদঃ পরিচরঃ স্মৃতঃ ||২৪||

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स्निग्धोऽजुगुप्सुर्बलवान् युक्तो व्याधितरक्षणे | वैद्यवाक्यकृदश्रान्तः पादः परिचरः स्मृतः ||२४||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 34

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং সূত্রস্থানে যুক্তসেনীযো নাম চতুস্ত্রিংশত্তমোঽধ্যাযঃ ||৩৪||

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इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने युक्तसेनीयो नाम चतुस्त्रिंशत्तमोऽध्यायः ||३४||

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34. yuktasēnīyādhyāyaḥ — Sushruta Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi