Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো ভূমিপ্রবিভাগীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
View original
अथातो भूमिप्रविभागीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো ভূমিপ্রবিভাগীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातो भूमिप्रविभागीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
শ্বভ্রশর্করাশ্মবিষমবল্মীকশ্মশানাঘাতনদেবতাযতনসিকতাভিরনুপহতামনূষরামভঙ্গুরামদূরোদকাং স্নিগ্ধাং প্ররোহবতীং মৃদ্বীং স্থিরাং সমাং কৃষ্ণাং গৌরীং লোহিতাং বা ভূমিমৌষধগ্রহণায পরীক্ষেত | তস্যাং জাতমপি কৃমিবিষশস্ত্রাতপপবনদহনতোযসম্বাধমার্গৈরনুপহতমেকরসং পুষ্টং পৃথ্ববগাঢমূলমুদীচ্যাং চৌষধমাদদীতেত্যেষ ভূমিপরীক্ষাবিশেষঃ সামান্যঃ ||৩||
श्वभ्रशर्कराश्मविषमवल्मीकश्मशानाघातनदेवतायतनसिकताभिरनुपहतामनूषरामभङ्गुरामदूरोदकां स्निग्धां प्ररोहवतीं मृद्वीं स्थिरां समां कृष्णां गौरीं लोहितां वा भूमिमौषधग्रहणाय परीक्षेत | तस्यां जातमपि कृमिविषशस्त्रातपपवनदहनतोयसम्बाधमार्गैरनुपहतमेकरसं पुष्टं पृथ्ववगाढमूलमुदीच्यां चौषधमाददीतेत्येष भूमिपरीक्षाविशेषः सामान्यः ||३||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
বিশেষতস্তু তত্র, অশ্মবতী স্থিরা গুর্বী শ্যামা কৃষ্ণা বা স্থূলবৃক্ষশস্যপ্রাযা স্বগুণভূযিষ্ঠা; স্নিগ্ধা শীতলাঽঽসন্নোদকা স্নিগ্ধশস্যতৃণকোমলবৃক্ষপ্রাযা শুক্লাঽম্বুগুণভূযিষ্ঠা; নানাবর্ণা লঘ্বশ্মবতী প্রবিরলাল্পপাণ্ডুবৃক্ষপ্ররোহাঽগ্নিগুণভূযিষ্ঠা; রূক্ষা ভস্মরাসভবর্ণা তনুবৃক্ষাল্পরসকোটরবৃক্ষপ্রাযাঽনিলগুণভূযিষ্ঠা; মৃদ্বী সমা শ্বভ্রবত্যব্যক্তরসজলা সর্বতোঽসারবৃক্ষা মহাপর্বতবৃক্ষপ্রাযা শ্যামা চাকাশগুণভূযিষ্ঠা ||৪||
विशेषतस्तु तत्र, अश्मवती स्थिरा गुर्वी श्यामा कृष्णा वा स्थूलवृक्षशस्यप्राया स्वगुणभूयिष्ठा; स्निग्धा शीतलाऽऽसन्नोदका स्निग्धशस्यतृणकोमलवृक्षप्राया शुक्लाऽम्बुगुणभूयिष्ठा; नानावर्णा लघ्वश्मवती प्रविरलाल्पपाण्डुवृक्षप्ररोहाऽग्निगुणभूयिष्ठा; रूक्षा भस्मरासभवर्णा तनुवृक्षाल्परसकोटरवृक्षप्रायाऽनिलगुणभूयिष्ठा; मृद्वी समा श्वभ्रवत्यव्यक्तरसजला सर्वतोऽसारवृक्षा महापर्वतवृक्षप्राया श्यामा चाकाशगुणभूयिष्ठा ||४||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 4 (5) · Śloka 5
অত্র কেচিদাহুরাচার্যাঃ- প্রাবৃড্বর্ষাশরদ্ধেমন্তবসন্তগ্রীষ্মেষু যথাসঙ্খ্যং মূলপত্রত্বক্ক্ষীরসারফলান্যাদদীতেতি; তত্তু ন সম্যক্, সৌম্যাগ্নেযত্বাজ্জগতঃ | সৌম্যান্যৌষধানি সৌম্যেষ্বৃতুষ্বাদদীত, আগ্নেযান্যাগ্নেযেষু; এবমব্যাপন্নগুণানি ভবন্তি | সৌম্যান্যৌষধ্মনি সৌম্যেষ্বৃতুষু গৃহীতানি সোমগুণভূযিষ্ঠাযাং ভূমৌ জাতান্যতিমধুরস্নিগ্ধশীতানি জাযন্তে | এতেন শেষং ব্যাখ্যাতম্ ||৫||
अत्र केचिदाहुराचार्याः- प्रावृड्वर्षाशरद्धेमन्तवसन्तग्रीष्मेषु यथासङ्ख्यं मूलपत्रत्वक्क्षीरसारफलान्याददीतेति; तत्तु न सम्यक्, सौम्याग्नेयत्वाज्जगतः | सौम्यान्यौषधानि सौम्येष्वृतुष्वाददीत, आग्नेयान्याग्नेयेषु; एवमव्यापन्नगुणानि भवन्ति | सौम्यान्यौषध्मनि सौम्येष्वृतुषु गृहीतानि सोमगुणभूयिष्ठायां भूमौ जातान्यतिमधुरस्निग्धशीतानि जायन्ते | एतेन शेषं व्याख्यातम् ||५||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 5 (6) · Śloka 6
তত্র পৃথিব্যম্বুগুণভূযিষ্ঠাযাং ভূমৌ জাতানি বিরেচনদ্রব্যাণ্যাদদীত , অগ্ন্যাকাশমারুতগুণভূযিষ্ঠাযাং বমনদ্রব্যাণি, উভযগুণভূযিষ্ঠাযামুভযতোভাগানি, আকাশগুণভূযিষ্ঠাযাং সংশমনানি, এবং বলবত্তরাণি ভবন্তি ||৬||
तत्र पृथिव्यम्बुगुणभूयिष्ठायां भूमौ जातानि विरेचनद्रव्याण्याददीत , अग्न्याकाशमारुतगुणभूयिष्ठायां वमनद्रव्याणि, उभयगुणभूयिष्ठायामुभयतोभागानि, आकाशगुणभूयिष्ठायां संशमनानि, एवं बलवत्तराणि भवन्ति ||६||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 6 (7-9) · Śloka 9
সর্বাণ্যেব চাভিনবানি, অন্যত্র মধুঘৃতগুডপিপ্পলীবিডঙ্গেভ্যঃ ||৭|| বিডঙ্গং পিপ্পলী ক্ষৌদ্রং সর্পিশ্চাপ্যনবং হিতম্ | শেষমন্যত্বভিনবং গৃহ্ণীযাদ্দোষবর্জিতম্ ||৮|| (সর্বাণ্যেব সক্ষীরাণি বীর্যবন্তি;) তেষামসম্পত্তাবতিক্রান্তসংবত্সরাণ্যাদদীতেতি ||৯||
सर्वाण्येव चाभिनवानि, अन्यत्र मधुघृतगुडपिप्पलीविडङ्गेभ्यः ||७|| विडङ्गं पिप्पली क्षौद्रं सर्पिश्चाप्यनवं हितम् | शेषमन्यत्वभिनवं गृह्णीयाद्दोषवर्जितम् ||८|| (सर्वाण्येव सक्षीराणि वीर्यवन्ति;) तेषामसम्पत्तावतिक्रान्तसंवत्सराण्याददीतेति ||९||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 7 (10) · Śloka 10
ভবন্তি চাত্র- গোপালাস্তাপসা ব্যাধা যে চান্যে বনচারিণঃ | মূলাহারাশ্চ যে তেভ্যো ভেষজব্যক্তিরিষ্যতে ||১০||
भवन्ति चात्र- गोपालास्तापसा व्याधा ये चान्ये वनचारिणः | मूलाहाराश्च ये तेभ्यो भेषजव्यक्तिरिष्यते ||१०||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 8 (11) · Śloka 11
সর্বাবযবসাধ্যেষু পলাশলবণাদিষু | ব্যবস্থিতো ন কালোঽস্তি তত্র সর্বো বিধীযতে ||১১||
सर्वावयवसाध्येषु पलाशलवणादिषु | व्यवस्थितो न कालोऽस्ति तत्र सर्वो विधीयते ||११||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 9 (12) · Śloka 12
গন্ধবর্ণরসোপেতা ষড্বিধা ভূমিরিষ্যতে | তস্মাদ্ভূমিস্বভাবেন বীজিনঃ ষড্রসাযুতাঃ ||১২||
गन्धवर्णरसोपेता षड्विधा भूमिरिष्यते | तस्माद्भूमिस्वभावेन बीजिनः षड्रसायुताः ||१२||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 10 (13) · Śloka 13
অব্যক্তঃ কিল তোযস্য রসো নিশ্চযনিশ্চিতঃ | রসঃ স এব চাব্যক্তো ব্যক্তো ভূমিরসাদ্ভবেত্ ||১৩||
अव्यक्तः किल तोयस्य रसो निश्चयनिश्चितः | रसः स एव चाव्यक्तो व्यक्तो भूमिरसाद्भवेत् ||१३||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 11 (14) · Śloka 14
সর্বলক্ষণসম্পন্না ভূমিঃ সাধারণা স্মৃতা | দ্রব্যাণি যত্র তত্রৈব তদ্গুণানি বিশেষতঃ ||১৪||
सर्वलक्षणसम्पन्ना भूमिः साधारणा स्मृता | द्रव्याणि यत्र तत्रैव तद्गुणानि विशेषतः ||१४||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 12 (15) · Śloka 15
বিগন্ধেনাপরামৃষ্টমবিপন্নং রসাদিভিঃ | নবং দ্রব্যং পুরাণং বা গ্রাহ্যমেবং বিনির্দিশেত্ ||১৫||
विगन्धेनापरामृष्टमविपन्नं रसादिभिः | नवं द्रव्यं पुराणं वा ग्राह्यमेवं विनिर्दिशेत् ||१५||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 13 (16) · Śloka 16
জঙ্গমানাং বযঃস্থানাং রক্তরোমনখাদিকম্ | ক্ষীরমূত্রপুরীষাণি জীর্ণাহারেষু সংহরেত্ ||১৬||
जङ्गमानां वयःस्थानां रक्तरोमनखादिकम् | क्षीरमूत्रपुरीषाणि जीर्णाहारेषु संहरेत् ||१६||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 14 (17) · Śloka 17
প্লোতমৃদ্ভাণ্ডফলকশঙ্কুবিন্যস্তভেষজম্ | প্রশস্তাযাং দিশি শুচৌ ভেষজাগারমিষ্যতে ||১৭||
प्लोतमृद्भाण्डफलकशङ्कुविन्यस्तभेषजम् | प्रशस्तायां दिशि शुचौ भेषजागारमिष्यते ||१७||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana puShpikA · Śloka 36
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং সূত্রস্থানে ভূমিপ্রবিভাগীযো নাম ষট্ত্রিংশোঽধ্যাযঃ ||৩৬||
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने भूमिप्रविभागीयो नाम षट्त्रिंशोऽध्यायः ||३६||
🔊 Audio coming soon