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AYANAAYURVEDAby Dr Vijaya Dwarampudi
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37. miśrakādhyāyaḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতো মিশ্রকমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातो मिश्रकमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3-7) · Śloka 7

মাতুলুঙ্গ্যগ্নিমন্থৌ চ ভদ্রদারু মহৌষধম্ | অহিংস্রা চৈব রাস্না চ প্রলেপো বাতশোফজিত্ ||৩|| দূর্বা চ নলমূলং চ মধুকং চন্দনং তথা | শীতলাশ্চ গণাঃ সর্বে প্রলেপঃ পিত্তশোফহৃত্ ||৪|| আগন্তুজে রক্তজে চ হ্যেষ এব বিধিঃ স্মৃতঃ | বিধির্বিষঘ্নো বিষজে পিত্তঘ্নোঽপি হিতস্তথা ||৫|| অজগন্ধাঽশ্বগন্ধা চ কালা সরলযা সহ | একৈষিকাজশৃঙ্গী চ প্রলেপঃ শ্লেষ্মশোফহৃত্ ||৬|| এতে বর্গাস্ত্রযো লোধ্রং পথ্যা পিণ্ডীতকানি চ | অনন্তা চেতি লেপোঽযং সান্নিপাতিকশোফহৃত্ ||৭||

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मातुलुङ्ग्यग्निमन्थौ च भद्रदारु महौषधम् | अहिंस्रा चैव रास्ना च प्रलेपो वातशोफजित् ||३|| दूर्वा च नलमूलं च मधुकं चन्दनं तथा | शीतलाश्च गणाः सर्वे प्रलेपः पित्तशोफहृत् ||४|| आगन्तुजे रक्तजे च ह्येष एव विधिः स्मृतः | विधिर्विषघ्नो विषजे पित्तघ्नोऽपि हितस्तथा ||५|| अजगन्धाऽश्वगन्धा च काला सरलया सह | एकैषिकाजशृङ्गी च प्रलेपः श्लेष्मशोफहृत् ||६|| एते वर्गास्त्रयो लोध्रं पथ्या पिण्डीतकानि च | अनन्ता चेति लेपोऽयं सान्निपातिकशोफहृत् ||७||

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Adhikarana 3 (8) · Śloka 8

স্নিগ্ধাম্ললবণো বাতে কোষ্ণঃ, শীতঃ পযোযুতঃ | পিত্তে, চোষ্ণঃ কফে ক্ষারমূত্রাঢ্যস্তত্প্রশান্তযে ||৮||

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स्निग्धाम्ललवणो वाते कोष्णः, शीतः पयोयुतः | पित्ते, चोष्णः कफे क्षारमूत्राढ्यस्तत्प्रशान्तये ||८||

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Adhikarana 4 (9) · Śloka 9

শণমূলকশিগ্রূণাং ফলানি তিলসর্ষপাঃ | সক্তবঃ কিণ্বমতসী দ্রব্যাণ্যুষ্ণানি পাচনম্ ||৯||

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शणमूलकशिग्रूणां फलानि तिलसर्षपाः | सक्तवः किण्वमतसी द्रव्याण्युष्णानि पाचनम् ||९||

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Adhikarana 5 (10) · Śloka 10

চিরবিল্বোঽগ্নিকো দন্তী চিত্রকো হযমারকঃ | কপোতকঙ্কগৃধ্রাণাং পুরীষাণি চ দারণম্ | ক্ষারদ্রব্যাণি বা যানি ক্ষারো বা দারণং পরম্ ||১০||

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चिरबिल्वोऽग्निको दन्ती चित्रको हयमारकः | कपोतकङ्कगृध्राणां पुरीषाणि च दारणम् | क्षारद्रव्याणि वा यानि क्षारो वा दारणं परम् ||१०||

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Adhikarana 6 (11) · Śloka 11

দ্রব্যাণাং পিচ্ছিলানাং তু ত্বঙ্মূলানি প্রপীডনম্ | যবগোধূমমাষাণাং চূর্ণানি চ সমাসতঃ ||১১||

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द्रव्याणां पिच्छिलानां तु त्वङ्मूलानि प्रपीडनम् | यवगोधूममाषाणां चूर्णानि च समासतः ||११||

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Adhikarana 7 (12) · Śloka 12

শাঙ্খিন্যঙ্কোঠসুমনঃকরবীরসুবর্চলাঃ | শোধনানি কষাযাণি বর্গশ্চারগ্বধাদিকঃ ||১২||

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शाङ्खिन्यङ्कोठसुमनःकरवीरसुवर्चलाः | शोधनानि कषायाणि वर्गश्चारग्वधादिकः ||१२||

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Adhikarana 8 (13-14) · Śloka 15

অজগন্ধাঽজশৃঙ্গী চ গবাক্ষী লাঙ্গলাহ্বযা | পূতীকশ্চিত্রকঃ পাঠা বিডঙ্গৈলাহরেণবঃ ||১৩|| কটুত্রিকং যবক্ষারো লবণানি মনঃশিলা | কাসীসং ত্রিবৃতা দন্তী হরিতালং সুরাষ্ট্রজা ||১৪|| সংশোধনীনাং বর্তীনাং দ্রব্যাণ্যেতানি নির্দিশেত্ |১৫|

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अजगन्धाऽजशृङ्गी च गवाक्षी लाङ्गलाह्वया | पूतीकश्चित्रकः पाठा विडङ्गैलाहरेणवः ||१३|| कटुत्रिकं यवक्षारो लवणानि मनःशिला | कासीसं त्रिवृता दन्ती हरितालं सुराष्ट्रजा ||१४|| संशोधनीनां वर्तीनां द्रव्याण्येतानि निर्दिशेत् |१५|

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Adhikarana 9 (15) · Śloka 15

এতৈরেবৌষধৈঃ কুর্যাত্কল্কানপি চ শোধনান্ ||১৫||

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एतैरेवौषधैः कुर्यात्कल्कानपि च शोधनान् ||१५||

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Adhikarana 10 (16) · Śloka 17

অর্কোত্তমাং স্নুহীক্ষীরং পিষ্ট্বা ক্ষারোত্তমানি চ | জাতীমূলং হরিদ্রে দ্বে কাসীসং কটুরোহিণীম্ ||১৬|| পূর্বোদ্দিষ্টানি চান্যানি কুর্যাত্ সংশোধনং ঘৃতম্ |১৭|

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अर्कोत्तमां स्नुहीक्षीरं पिष्ट्वा क्षारोत्तमानि च | जातीमूलं हरिद्रे द्वे कासीसं कटुरोहिणीम् ||१६|| पूर्वोद्दिष्टानि चान्यानि कुर्यात् संशोधनं घृतम् |१७|

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Adhikarana 11 (17-18) · Śloka 18

মযূরকো রাজবৃক্ষো নিম্বঃ কোশাতকী তিলাঃ ||১৭|| বৃহতী কণ্টকারী চ হরিতালং মনঃশিলা | শোধনানি চ যোজ্যানি তৈলে দ্রব্যাণি শোধনে ||১৮||

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मयूरको राजवृक्षो निम्बः कोशातकी तिलाः ||१७|| बृहती कण्टकारी च हरितालं मनःशिला | शोधनानि च योज्यानि तैले द्रव्याणि शोधने ||१८||

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Adhikarana 12 (19) · Śloka 19

কাসীসে সৈন্ধবে কিণ্বে বচাযাং রজনীদ্বযে | শোধনাঙ্গেষু চান্যেষু চূর্ণং কুর্বীত শোধনম্ ||১৯||

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कासीसे सैन्धवे किण्वे वचायां रजनीद्वये | शोधनाङ्गेषु चान्येषु चूर्णं कुर्वीत शोधनम् ||१९||

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Adhikarana 13 (20) · Śloka 20

সালসারাদিসারেষু পটোলত্রিফলাসু চ | রসক্রিযা বিধাতব্যা শোধনী শোধনেষু চ ||২০||

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सालसारादिसारेषु पटोलत्रिफलासु च | रसक्रिया विधातव्या शोधनी शोधनेषु च ||२०||

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Adhikarana 14 (21) · Śloka 21

শ্রীবেষ্টকে সর্জরসে সরলে দেবদারুণি | সারেষ্বপি চ কুর্বীত মতিমান্ ব্রণধূপনম্ ||২১||

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श्रीवेष्टके सर्जरसे सरले देवदारुणि | सारेष्वपि च कुर्वीत मतिमान् व्रणधूपनम् ||२१||

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Adhikarana 15 (22-23) · Śloka 23

কষাযাণামনুষ্ণানাং বৃক্ষাণাং ত্বক্ষু সাধিতঃ | শৃতঃ শীতকষাযো বা রোপণার্থং প্রশস্যতে ||২২|| সোমামৃতাশ্বগন্ধাসু কাকোল্যাদৌ গণে তথা | ক্ষীরিপ্ররোহেষ্বপি চ বর্তযো রোপণাঃ স্মৃতাঃ ||২৩||

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कषायाणामनुष्णानां वृक्षाणां त्वक्षु साधितः | शृतः शीतकषायो वा रोपणार्थं प्रशस्यते ||२२|| सोमामृताश्वगन्धासु काकोल्यादौ गणे तथा | क्षीरिप्ररोहेष्वपि च वर्तयो रोपणाः स्मृताः ||२३||

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Adhikarana 16 (24) · Śloka 24

সমঙ্গা সোমসরলা সোমবল্কঃ সচন্দনঃ | কাকোল্যাদিশ্চ কল্কঃ স্যাত্ প্রশস্তো ব্রণরোপণে ||২৪||

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समङ्गा सोमसरला सोमवल्कः सचन्दनः | काकोल्यादिश्च कल्कः स्यात् प्रशस्तो व्रणरोपणे ||२४||

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Adhikarana 17 (25) · Śloka 25

পৃথক্পর্ণ্যাত্মগুপ্তা চ হরিদ্রে মালতী সিতা | কাকোল্যাদিশ্চ যোজ্যঃ স্যাদ্ভিষজা রোপণে ঘৃতে ||২৫||

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पृथक्पर्ण्यात्मगुप्ता च हरिद्रे मालती सिता | काकोल्यादिश्च योज्यः स्याद्भिषजा रोपणे घृते ||२५||

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Adhikarana 18 (26) · Śloka 26

কালানুসার্যাগুরুণী হরিদ্রে দেবদারু চ | প্রিযঙ্গবশ্চ রোধ্রং চ তৈলে যোজ্যানি রোপণে ||২৬||

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कालानुसार्यागुरुणी हरिद्रे देवदारु च | प्रियङ्गवश्च रोध्रं च तैले योज्यानि रोपणे ||२६||

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Adhikarana 19 (27-28) · Śloka 28

কঙ্গুকা ত্রিফলা রোধ্রং কাসীসং শ্রবণাহ্বযা | ধবাশ্বকর্ণযোস্ত্বক্ চ রোপণং চূর্ণমিষ্যতে ||২৭|| প্রিযঙ্গুকা সর্জরসঃ পুষ্পকাসীসমেব চ | ত্বক্চূর্ণং ধবজং চৈব রোপণার্থং প্রশস্যতে ||২৮||

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कङ्गुका त्रिफला रोध्रं कासीसं श्रवणाह्वया | धवाश्वकर्णयोस्त्वक् च रोपणं चूर्णमिष्यते ||२७|| प्रियङ्गुका सर्जरसः पुष्पकासीसमेव च | त्वक्चूर्णं धवजं चैव रोपणार्थं प्रशस्यते ||२८||

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Adhikarana 20 (29) · Śloka 29

ত্বক্ষু ন্যগ্রোধবর্গস্য ত্রিফলাযাস্তথৈব চ | রসক্রিযাং রোপণার্থে বিদধীত যথাক্রমম্ ||২৯||

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त्वक्षु न्यग्रोधवर्गस्य त्रिफलायास्तथैव च | रसक्रियां रोपणार्थे विदधीत यथाक्रमम् ||२९||

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Adhikarana 21 (30) · Śloka 30

অপামার্গোঽশ্বগন্ধা চ তালপত্রী সুবর্চলা | উত্সাদনে প্রশস্যন্তে কাকোল্যাদিশ্চ যো গণঃ ||৩০||

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अपामार्गोऽश्वगन्धा च तालपत्री सुवर्चला | उत्सादने प्रशस्यन्ते काकोल्यादिश्च यो गणः ||३०||

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Adhikarana 22 (31-32) · Śloka 32

কাসীসং সৈন্ধবং কিণ্বং কুরুবিন্দো মনঃশিলা | কুক্কুটাণ্ডকপালানি সুমনোমুকুলানি চ ||৩১|| ফলে শৈরীষকারঞ্জে ধাতুচূর্ণানি যানি চ | ব্রণেষূত্সন্নমাংসেষু প্রশস্তান্যবসাদনে ||৩২||

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कासीसं सैन्धवं किण्वं कुरुविन्दो मनःशिला | कुक्कुटाण्डकपालानि सुमनोमुकुलानि च ||३१|| फले शैरीषकारञ्जे धातुचूर्णानि यानि च | व्रणेषूत्सन्नमांसेषु प्रशस्तान्यवसादने ||३२||

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Adhikarana 23 (33) · Śloka 33

সমস্তং বর্গমর্ধং বা যথালাভমথাপি বা | প্রযুঞ্জীত ভিষক্ প্রাজ্ঞো যথোদ্দিষ্টেষু কর্মসু ||৩৩||

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समस्तं वर्गमर्धं वा यथालाभमथापि वा | प्रयुञ्जीत भिषक् प्राज्ञो यथोद्दिष्टेषु कर्मसु ||३३||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 37

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং সূত্রস্থানে মিশ্রকাধ্যাযো নাম সপ্তত্রিংশত্তমোঽধ্যাযঃ ||৩৭||

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इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने मिश्रकाध्यायो नाम सप्तत्रिंशत्तमोऽध्यायः ||३७||

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37. miśrakādhyāyaḥ — Sushruta Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi