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AYANAAYURVEDAby Dr Vijaya Dwarampudi
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35. āturōpakramaṇīyādhyāyaḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাত আতুরোপক্রমণীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथात आतुरोपक्रमणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

আতুরমুপক্রমমাণেন ভিষজাঽঽযুরাদাবেব পরীক্ষিতব্যং ; সত্যাযুষি ব্যাধ্যৃত্বগ্নিবযোদেহবলসত্ত্বসাত্ম্যপ্রকৃতিভেষজদেশান্ পরীক্ষেত ||৩||

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आतुरमुपक्रममाणेन भिषजाऽऽयुरादावेव परीक्षितव्यं ; सत्यायुषि व्याध्यृत्वग्निवयोदेहबलसत्त्वसात्म्यप्रकृतिभेषजदेशान् परीक्षेत ||३||

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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4

তত্র মহাপাণিপাদপার্শ্বপৃষ্ঠস্তনাগ্রদশনবদনস্কন্ধললাটং দীর্ঘাঙ্গুলিপর্বোচ্ছ্বাসপ্রেক্ষণবাহুং, বিস্তীর্ণভ্রূস্তনান্তরোরস্কং হ্রস্বজঙ্ঘামেঢ্রগ্রীবং, গম্ভীরসত্ত্বস্বরনাভিম্ , অনুচ্চৈর্বদ্ধস্তনম্, উপচিতমহারোমশকর্ণং, পশ্চান্মস্তিষ্কং, স্নাতানুলিপ্তং মূর্ধানুপূর্ব্যা বিশুষ্যমাণশরীরং পশ্চাচ্চ বিশুষ্যমাণহৃদযং পুরুষং জানীযাদ্দীর্ঘাযুঃ খল্বযমিতি | তমেকান্তেনোপক্রমেত্ | এভির্লক্ষণৈর্বিপরীতৈরল্পাযুঃ; মিশ্রৈর্মধ্যমাযুরিতি ||৪||

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तत्र महापाणिपादपार्श्वपृष्ठस्तनाग्रदशनवदनस्कन्धललाटं दीर्घाङ्गुलिपर्वोच्छ्वासप्रेक्षणबाहुं, विस्तीर्णभ्रूस्तनान्तरोरस्कं ह्रस्वजङ्घामेढ्रग्रीवं, गम्भीरसत्त्वस्वरनाभिम् , अनुच्चैर्बद्धस्तनम्, उपचितमहारोमशकर्णं, पश्चान्मस्तिष्कं, स्नातानुलिप्तं मूर्धानुपूर्व्या विशुष्यमाणशरीरं पश्चाच्च विशुष्यमाणहृदयं पुरुषं जानीयाद्दीर्घायुः खल्वयमिति | तमेकान्तेनोपक्रमेत् | एभिर्लक्षणैर्विपरीतैरल्पायुः; मिश्रैर्मध्यमायुरिति ||४||

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Adhikarana 4 (5-6) · Śloka 6

ভবন্তি চাত্র | গূঢসন্ধিসিরাস্নাযুঃ সংহতাঙ্গঃ স্থিরেন্দ্রিযঃ | উত্তরোত্তরসুক্ষেত্রো যঃ স দীর্ঘাযুরুচ্যতে ||৫|| গর্ভাত্ প্রভৃত্যরোগো যঃ শনৈঃ সমুপচীযতে | শরীরজ্ঞানবিজ্ঞানৈঃ স দীর্ঘাযুঃ সমাসতঃ ||৬||

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भवन्ति चात्र | गूढसन्धिसिरास्नायुः संहताङ्गः स्थिरेन्द्रियः | उत्तरोत्तरसुक्षेत्रो यः स दीर्घायुरुच्यते ||५|| गर्भात् प्रभृत्यरोगो यः शनैः समुपचीयते | शरीरज्ञानविज्ञानैः स दीर्घायुः समासतः ||६||

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Adhikarana 5 (7-8) · Śloka 9

মধ্যমস্যাযুষো জ্ঞানমত ঊর্ধ্বং নিবোধ মে | অধস্তাদক্ষযোর্যস্য লেখাঃ স্যুর্ব্যক্তমাযতাঃ ||৭|| দ্বে বা তিস্রোঽধিকা বাঽপি পাদৌ কর্ণৌ চ মাংসলৌ | নাসাগ্রমূর্ধ্বং চ ভবেদূর্ধ্বং লেখাশ্চ পৃষ্ঠতঃ ||৮|| যস্য স্যুস্তস্য পরমমাযুর্ভবতি সপ্ততিঃ |৯|

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मध्यमस्यायुषो ज्ञानमत ऊर्ध्वं निबोध मे | अधस्तादक्षयोर्यस्य लेखाः स्युर्व्यक्तमायताः ||७|| द्वे वा तिस्रोऽधिका वाऽपि पादौ कर्णौ च मांसलौ | नासाग्रमूर्ध्वं च भवेदूर्ध्वं लेखाश्च पृष्ठतः ||८|| यस्य स्युस्तस्य परममायुर्भवति सप्ततिः |९|

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Adhikarana 6 (9-11) · Śloka 11

জঘন্যস্যাযুষো জ্ঞানমত ঊর্ধ্বং নিবোধ মে ||৯|| হস্বানি যস্য পর্বাণি সুমহচ্চাপি মেহনম্ | তথোরস্যবলীঢানি ন চ স্যাত্পৃষ্ঠমাযতম্ ||১০|| ঊর্ধ্বং চ শ্রবণৌ স্থানান্নাসা চোচ্চা শরীরিণঃ | হসতো জল্পতো বাঽপি দন্তমাংসং প্রদৃশ্যতে | প্রেক্ষতে যশ্চ বিভ্রান্তং স জীবেত্পঞ্চবিংশতিম্ ||১১||

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जघन्यस्यायुषो ज्ञानमत ऊर्ध्वं निबोध मे ||९|| हस्वानि यस्य पर्वाणि सुमहच्चापि मेहनम् | तथोरस्यवलीढानि न च स्यात्पृष्ठमायतम् ||१०|| ऊर्ध्वं च श्रवणौ स्थानान्नासा चोच्चा शरीरिणः | हसतो जल्पतो वाऽपि दन्तमांसं प्रदृश्यते | प्रेक्षते यश्च विभ्रान्तं स जीवेत्पञ्चविंशतिम् ||११||

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Adhikarana 7 (12) · Śloka 12

অথ পুনরাযুষো বিজ্ঞানার্থমঙ্গপ্রত্যঙ্গপ্রমাণসারানুপদেক্ষ্যামঃ | তত্রাঙ্গান্যন্তরাধিসক্থিবাহুশিরাংসি, তদবযবাঃ প্রত্যঙ্গানীতি | তত্র, স্বৈরঙ্গুলৈঃ পাদাঙ্গুষ্ঠপ্রদেশিন্যৌ দ্ব্যঙ্গুলাযতে ; প্রদেশিন্যাস্তু মধ্যমানামিকাকনিষ্ঠিকা যথোত্তরং পঞ্চমভাগহীনাঃ; চতুরঙ্গুলাযতে পঞ্চাঙ্গুলবিস্তৃতে প্রপদপাদতলে; পঞ্চচতুরঙ্গুলাযতবিস্তৃতা পার্ষ্ণিঃ; চতুর্দশাঙ্গুলাযতঃ পাদঃ; চতুর্দশাঙ্গুলপরিণাহানি পাদগুল্ফজঙ্ঘাজানুমধ্যানি; অষ্টাদশাঙ্গুলা জঙ্ঘা, জানূপরিষ্টাচ্চ দ্বাত্রিংশদঙ্গুলম্, এতে পঞ্চাশত্; জঙ্ঘাযামসমাবূরূ; দ্ব্যঙ্গুলানি বৃষণচিবুকদশননাসাপুটভাগকর্ণমূলভ্রূনযনান্তরাণি; চতুরঙ্গুলানি মেহনবদনান্তরনাসাকর্ণললাটগ্রীবোচ্ছ্রাযদৃষ্ট্যন্তরাণি; দ্বাদশাঙ্গুলানি ভগবিস্তারমেহননাভিহৃদযগ্রীবাস্তনান্তরমুখাযামমণিবন্ধপ্রকোষ্ঠস্থৌল্যানি; ইন্দ্রবস্তিপরিণাহাংসপীঠকূর্পরান্তরাযামঃ ষোডশাঙ্গুলঃ; চতুর্বিংশত্যঙ্গুলো হস্তঃ; দ্বাত্রিংশদঙ্গুলপরিমাণৌ ভুজৌ; দ্বাত্রিংশত্পরিণাহাবূরূ; মণিবন্ধকূর্পরান্তরং ষোডশাঙ্গুলং; তলং ষট্চতুরঙ্গুলাযামবিস্তারম্; অঙ্গুষ্ঠমূলপ্রদেশিনীশ্রবণাপাঙ্গান্তরমধ্যমাঙ্গুল্যৌ পঞ্চাঙ্গুলে; অর্ধপঞ্চাঙ্গুলে প্রদেশিন্যনামিকে; সার্ধত্র্যঙ্গুলৌ কনিষ্ঠাঙ্গুষ্ঠৌ; চতুর্বিংশতিবিস্তারপরিণাহং মুখগ্রীবং; ত্রিভাগাঙ্গুলবিস্তারা নাসাপুটমর্যাদা; নযনত্রিভাগপরিণাহা তারকা; নবমস্তারকাংশো দৃষ্টিঃ; কেশান্তমস্তকান্তরমেকাদশাঙ্গুলং; মস্তকাদবটুকেশান্তো দশাঙ্গুলঃ; কর্ণাবট্বন্তরং চতুর্দশাঙ্গুলং; পুরুষোরঃপ্রমাণবিস্তীর্ণা স্ত্রীশ্রোণিঃ; অষ্টাদশাঙ্গুলবিস্তারমুরঃ; তত্প্রমাণা পুরুষস্য কটী; সবিংশমঙ্গুলশতং পুরুষাযাম ইতি ||১২||

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अथ पुनरायुषो विज्ञानार्थमङ्गप्रत्यङ्गप्रमाणसारानुपदेक्ष्यामः | तत्राङ्गान्यन्तराधिसक्थिबाहुशिरांसि, तदवयवाः प्रत्यङ्गानीति | तत्र, स्वैरङ्गुलैः पादाङ्गुष्ठप्रदेशिन्यौ द्व्यङ्गुलायते ; प्रदेशिन्यास्तु मध्यमानामिकाकनिष्ठिका यथोत्तरं पञ्चमभागहीनाः; चतुरङ्गुलायते पञ्चाङ्गुलविस्तृते प्रपदपादतले; पञ्चचतुरङ्गुलायतविस्तृता पार्ष्णिः; चतुर्दशाङ्गुलायतः पादः; चतुर्दशाङ्गुलपरिणाहानि पादगुल्फजङ्घाजानुमध्यानि; अष्टादशाङ्गुला जङ्घा, जानूपरिष्टाच्च द्वात्रिंशदङ्गुलम्, एते पञ्चाशत्; जङ्घायामसमावूरू; द्व्यङ्गुलानि वृषणचिबुकदशननासापुटभागकर्णमूलभ्रूनयनान्तराणि; चतुरङ्गुलानि मेहनवदनान्तरनासाकर्णललाटग्रीवोच्छ्रायदृष्ट्यन्तराणि; द्वादशाङ्गुलानि भगविस्तारमेहननाभिहृदयग्रीवास्तनान्तरमुखायाममणिबन्धप्रकोष्ठस्थौल्यानि; इन्द्रबस्तिपरिणाहांसपीठकूर्परान्तरायामः षोडशाङ्गुलः; चतुर्विंशत्यङ्गुलो हस्तः; द्वात्रिंशदङ्गुलपरिमाणौ भुजौ; द्वात्रिंशत्परिणाहावूरू; मणिबन्धकूर्परान्तरं षोडशाङ्गुलं; तलं षट्चतुरङ्गुलायामविस्तारम्; अङ्गुष्ठमूलप्रदेशिनीश्रवणापाङ्गान्तरमध्यमाङ्गुल्यौ पञ्चाङ्गुले; अर्धपञ्चाङ्गुले प्रदेशिन्यनामिके; सार्धत्र्यङ्गुलौ कनिष्ठाङ्गुष्ठौ; चतुर्विंशतिविस्तारपरिणाहं मुखग्रीवं; त्रिभागाङ्गुलविस्तारा नासापुटमर्यादा; नयनत्रिभागपरिणाहा तारका; नवमस्तारकांशो दृष्टिः; केशान्तमस्तकान्तरमेकादशाङ्गुलं; मस्तकादवटुकेशान्तो दशाङ्गुलः; कर्णावट्वन्तरं चतुर्दशाङ्गुलं; पुरुषोरःप्रमाणविस्तीर्णा स्त्रीश्रोणिः; अष्टादशाङ्गुलविस्तारमुरः; तत्प्रमाणा पुरुषस्य कटी; सविंशमङ्गुलशतं पुरुषायाम इति ||१२||

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Adhikarana 8 (13) · Śloka 13

ভবন্তি চাত্র শ্লোকাঃ | পঞ্চবিংশে ততো বর্ষে পুমান্ নারী তু ষোডশে | সমত্বাগতবীর্যৌ তৌ জানীযাত্ কুশলো ভিষক্ ||১৩||

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भवन्ति चात्र श्लोकाः | पञ्चविंशे ततो वर्षे पुमान् नारी तु षोडशे | समत्वागतवीर्यौ तौ जानीयात् कुशलो भिषक् ||१३||

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Adhikarana 9 (14) · Śloka 14

দেহঃ স্বৈরঙ্গুলৈরেষ যথাবদনুকীর্তিতঃ |১৪|

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देहः स्वैरङ्गुलैरेष यथावदनुकीर्तितः |१४|

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Adhikarana 10 (14-15) · Śloka 15

যুক্তঃ প্রমাণেনানেন পুমান্ বা যদি বাঽঙ্গনা ||১৪|| দীর্ঘমাযুরবাপ্নোতি বিত্তং চ মহদৃচ্ছতি | মধ্যমং মধ্যমৈরাযুর্বিত্তং হীনৈস্তথাঽবরম্ ||১৫||

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युक्तः प्रमाणेनानेन पुमान् वा यदि वाऽङ्गना ||१४|| दीर्घमायुरवाप्नोति वित्तं च महदृच्छति | मध्यमं मध्यमैरायुर्वित्तं हीनैस्तथाऽवरम् ||१५||

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Adhikarana 11 (16) · Śloka 16

অথ সারান্ বক্ষ্যামঃ- স্মৃতিভক্তিপ্রজ্ঞাশৌচশৌর্যোপেতং কল্যাণাভিনিবেশং সত্ত্বসারং বিদ্যাত্; স্নিগ্ধসংহতশ্বেতাস্থিদন্তনখং বহুলকামপ্রজং শুক্রেণ; অকৃশমুত্তমবলং স্নিগ্ধগম্ভীরস্বরং সৌভাগ্যোপপন্নং মহানেত্রং চ মজ্জ্ঞা; মহাশিরঃস্কন্ধং দৃঢদন্তহন্বস্থিনখমস্থিভিঃ; স্নিগ্ধমূত্রস্বেদস্বরং বৃহচ্ছরীরমাযাসাসহিষ্ণুং মেদসা; অচ্ছিদ্রগাত্রং গূঢাস্থিসন্ধিং মাংসোপচিতং চ মাংসেন; স্নিগ্ধতাম্রনখনযনতালুজিহ্বৌষ্ঠপাণিপাদতলং রক্তেন; সুপ্রসন্নমৃদুত্বগ্রোমাণং ত্বক্সারং বিদ্যাদিতি | এষাং পূর্বং পূর্বং প্রধানমাযুঃসৌভাগ্যযোরিতি ||১৬||

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अथ सारान् वक्ष्यामः- स्मृतिभक्तिप्रज्ञाशौचशौर्योपेतं कल्याणाभिनिवेशं सत्त्वसारं विद्यात्; स्निग्धसंहतश्वेतास्थिदन्तनखं बहुलकामप्रजं शुक्रेण; अकृशमुत्तमबलं स्निग्धगम्भीरस्वरं सौभाग्योपपन्नं महानेत्रं च मज्ज्ञा; महाशिरःस्कन्धं दृढदन्तहन्वस्थिनखमस्थिभिः; स्निग्धमूत्रस्वेदस्वरं बृहच्छरीरमायासासहिष्णुं मेदसा; अच्छिद्रगात्रं गूढास्थिसन्धिं मांसोपचितं च मांसेन; स्निग्धताम्रनखनयनतालुजिह्वौष्ठपाणिपादतलं रक्तेन; सुप्रसन्नमृदुत्वग्रोमाणं त्वक्सारं विद्यादिति | एषां पूर्वं पूर्वं प्रधानमायुःसौभाग्ययोरिति ||१६||

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Adhikarana 12 (17) · Śloka 17

বিশেষতোঽঙ্গপ্রত্যঙ্গপ্রমাণাদথ সারতঃ | পরীক্ষ্যাযুঃ সুনিপুণো ভিষক্ সিধ্যতি কর্মসু ||১৭||

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विशेषतोऽङ्गप्रत्यङ्गप्रमाणादथ सारतः | परीक्ष्यायुः सुनिपुणो भिषक् सिध्यति कर्मसु ||१७||

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Adhikarana 13 (18) · Śloka 18

ব্যাধিবিশেষাস্তু প্রাগভিহিতাঃ; সর্ব এবৈতে ত্রিবিধাঃ- সাধ্যা, যাপ্যাঃ, প্রত্যাখ্যেযাশ্চ | তত্রৈতান্ ভূযস্ত্রিধা পরীক্ষেত- কিমযমৌপসর্গিকঃ, প্রাক্কেবলঃ, অন্যলক্ষণ ইতি | তত্র, ঔপসর্গিকো নাম যঃ পূর্বোত্পন্নং ব্যাধিং জঘন্যকালজাতো ব্যাধিরুপসৃজতি, স তন্মূল এবোপদ্রবসঞ্জ্ঞঃ; প্রাক্কেবলো নাম যঃ প্রাগেবোত্পন্নো ব্যাধিরপূর্বরূপোঽনুপদ্রবশ্চ; অন্যলক্ষণো নাম যো ভবিষ্যদ্ব্যাধিখ্যাপকঃ, স পূর্বরূপসঞ্জ্ঞঃ | তত্র, সোপদ্রবমন্যোন্যাবিরোধেনোপক্রমেত, বলবন্তমুপদ্রবং বা; প্রাক্কেবলং যথাস্বং প্রতিকুর্বীত; অন্যলক্ষণে ত্বাদিব্যাধৌ প্রযতেত ||১৮||

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व्याधिविशेषास्तु प्रागभिहिताः; सर्व एवैते त्रिविधाः- साध्या, याप्याः, प्रत्याख्येयाश्च | तत्रैतान् भूयस्त्रिधा परीक्षेत- किमयमौपसर्गिकः, प्राक्केवलः, अन्यलक्षण इति | तत्र, औपसर्गिको नाम यः पूर्वोत्पन्नं व्याधिं जघन्यकालजातो व्याधिरुपसृजति, स तन्मूल एवोपद्रवसञ्ज्ञः; प्राक्केवलो नाम यः प्रागेवोत्पन्नो व्याधिरपूर्वरूपोऽनुपद्रवश्च; अन्यलक्षणो नाम यो भविष्यद्व्याधिख्यापकः, स पूर्वरूपसञ्ज्ञः | तत्र, सोपद्रवमन्योन्याविरोधेनोपक्रमेत, बलवन्तमुपद्रवं वा; प्राक्केवलं यथास्वं प्रतिकुर्वीत; अन्यलक्षणे त्वादिव्याधौ प्रयतेत ||१८||

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Adhikarana 14 (19) · Śloka 19

ভবতি চাত্র | নাস্তি রোগো বিনা দোষৈর্যস্মাত্তস্মাদ্বিচক্ষণঃ | অনুক্তমপি দোষাণাং লিঙ্গৈর্ব্যাধিমুপাচরেত্ ||১৯||

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भवति चात्र | नास्ति रोगो विना दोषैर्यस्मात्तस्माद्विचक्षणः | अनुक्तमपि दोषाणां लिङ्गैर्व्याधिमुपाचरेत् ||१९||

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Adhikarana 15 (20) · Śloka 20

প্রাগভিহিতা ঋতবঃ ||২০||

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प्रागभिहिता ऋतवः ||२०||

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Adhikarana 16 (21) · Śloka 21

শীতে শীতপ্রতীকারমুষ্ণে চোষ্ণনিবারণম্ | কৃত্বা কুর্যাত্ ক্রিযাং প্রাপ্তাং ক্রিযাকালং ন হাপযেত্ ||২১||

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शीते शीतप्रतीकारमुष्णे चोष्णनिवारणम् | कृत्वा कुर्यात् क्रियां प्राप्तां क्रियाकालं न हापयेत् ||२१||

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Adhikarana 17 (22) · Śloka 22

অপ্রাপ্তে বা ক্রিযাকালে প্রাপ্তে বা ন কৃতা ক্রিযা | ক্রিযা হীনাঽতিরিক্তা বা সাধ্যেষ্বপি ন সিধ্যতি ||২২||

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अप्राप्ते वा क्रियाकाले प्राप्ते वा न कृता क्रिया | क्रिया हीनाऽतिरिक्ता वा साध्येष्वपि न सिध्यति ||२२||

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Adhikarana 18 (23) · Śloka 23

যা হ্যুদীর্ণং শমযতি নান্যং ব্যাধিং করোতি চ | সা ক্রিযা, ন তু যা ব্যাধিং হরত্যন্যমুদীরযেত্ ||২৩||

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या ह्युदीर्णं शमयति नान्यं व्याधिं करोति च | सा क्रिया, न तु या व्याधिं हरत्यन्यमुदीरयेत् ||२३||

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Adhikarana 19 (24) · Śloka 24

প্রাগভিহিতোঽগ্নিরন্নস্য পাচকঃ | স চতুর্বিধো ভবতি- দোষানভিপন্ন একঃ, বিক্রিযামাপন্নস্ত্রিবিধো ভবতি- বিষমো বাতেন, তীক্ষ্ণঃ পিত্তেন, মন্দঃ শ্লেষ্মণা, চতুর্থঃ সমঃ সর্বসাম্যাদিতি | তত্র, যো যথাকালমুপযুক্তমন্নং সম্যক্ পচতি স সমঃ, সমৈর্দোষৈঃ; যঃ কদাচিত্ সম্যক্ পচতি, কদাচিদাধ্মানশূলোদাবর্তাতিসারজঠরগৌরবান্ত্রকূজনপ্রবাহণানি কৃত্বা, স বিষমঃ; যঃ প্রভূতমপ্যুপযুক্তমন্নমাশু পচতি স তীক্ষ্ণঃ, স এবাভিবর্ধমানোঽত্যগ্নিরিত্যাভাষ্যতে, স মুহুর্মুহুঃ প্রভূতমপ্যুপযুক্তমন্নমাশুতরং পচতি, পাকান্তে চ গলতাল্বোষ্ঠশোষদাহসন্তাপাঞ্জনযতি; যস্ত্বল্পমপ্যুপযুক্তমুদরশিরোগৌরবকাসশ্বাসপ্রসেকচ্ছর্দিগাত্রসদনানি কৃত্বা মহতা কালেন পচতি, স মন্দঃ ||২৪||

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प्रागभिहितोऽग्निरन्नस्य पाचकः | स चतुर्विधो भवति- दोषानभिपन्न एकः, विक्रियामापन्नस्त्रिविधो भवति- विषमो वातेन, तीक्ष्णः पित्तेन, मन्दः श्लेष्मणा, चतुर्थः समः सर्वसाम्यादिति | तत्र, यो यथाकालमुपयुक्तमन्नं सम्यक् पचति स समः, समैर्दोषैः; यः कदाचित् सम्यक् पचति, कदाचिदाध्मानशूलोदावर्तातिसारजठरगौरवान्त्रकूजनप्रवाहणानि कृत्वा, स विषमः; यः प्रभूतमप्युपयुक्तमन्नमाशु पचति स तीक्ष्णः, स एवाभिवर्धमानोऽत्यग्निरित्याभाष्यते, स मुहुर्मुहुः प्रभूतमप्युपयुक्तमन्नमाशुतरं पचति, पाकान्ते च गलताल्वोष्ठशोषदाहसन्तापाञ्जनयति; यस्त्वल्पमप्युपयुक्तमुदरशिरोगौरवकासश्वासप्रसेकच्छर्दिगात्रसदनानि कृत्वा महता कालेन पचति, स मन्दः ||२४||

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Adhikarana 20 (25) · Śloka 25

বিষমো বাতজান্ রোগাংস্তীক্ষ্ণঃ পিত্তনিমিত্তজান্ | করোত্যগ্নিস্তথা মন্দো বিকারান্ কফসম্ভবান্ ||২৫||

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विषमो वातजान् रोगांस्तीक्ष्णः पित्तनिमित्तजान् | करोत्यग्निस्तथा मन्दो विकारान् कफसम्भवान् ||२५||

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Adhikarana 21 (26) · Śloka 26

তত্র, সমে পরিরক্ষণং কুর্বীত; বিষমে স্নিগ্ধাম্ললবণৈঃ ক্রিযাবিশেষৈঃ প্রতিকুর্বীত; তীক্ষ্ণে মধুরস্নিগ্ধশীতৈর্বিরেকৈশ্চ; এবমেবাত্যগ্নৌ, বিশেষেণ মাহিষৈশ্চ ক্ষীরদধিসর্পির্ভিঃ; মন্দে কটুতিক্তকষাযৈর্বমনৈশ্চ ||২৬||

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तत्र, समे परिरक्षणं कुर्वीत; विषमे स्निग्धाम्ललवणैः क्रियाविशेषैः प्रतिकुर्वीत; तीक्ष्णे मधुरस्निग्धशीतैर्विरेकैश्च; एवमेवात्यग्नौ, विशेषेण माहिषैश्च क्षीरदधिसर्पिर्भिः; मन्दे कटुतिक्तकषायैर्वमनैश्च ||२६||

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Adhikarana 22 (27) · Śloka 27

জাঠরো ভগবানগ্নিরীশ্বরোঽন্নস্য পাচকঃ | সৌক্ষ্ম্যাদ্রসানাদদানো বিবেক্তুং নৈব শক্যতে ||২৭||

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जाठरो भगवानग्निरीश्वरोऽन्नस्य पाचकः | सौक्ष्म्याद्रसानाददानो विवेक्तुं नैव शक्यते ||२७||

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Adhikarana 23 (28) · Śloka 28

প্রাণাপানসমানৈস্তু সর্বতঃ পবনৈস্ত্রিভিঃ | ধ্মাযতে পাল্যতে চাপি স্বাং স্বাং গতিমবস্থিতৈঃ ||২৮||

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प्राणापानसमानैस्तु सर्वतः पवनैस्त्रिभिः | ध्मायते पाल्यते चापि स्वां स्वां गतिमवस्थितैः ||२८||

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Adhikarana 24 (29) · Śloka 29

বযস্তু ত্রিবিধং- বাল্যং, মধ্যং, বৃদ্ধমিতি | তত্রোনষোডশবর্ষীযা বালাঃ | তে ত্রিবিধাঃ- ক্ষীরপাঃ, ক্ষীরান্নাদা, অন্নাদা ইতি | তেষু সংবত্সরপরাঃ ক্ষীরপাঃ, দ্বিসংবত্সরপরাঃ ক্ষীরান্নাদাঃ, পরতোঽন্নাদা ইতি | ষোডশসপ্তত্যোরন্তরে মধ্যং বযঃ | তস্য বিকল্পো- বৃদ্ধিঃ, যৌবনং, সম্পূর্ণতা, পরিহাণিরিতি | তত্র, আবিংশতের্বৃদ্ধিঃ, আত্রিংশতো যৌবনম্, আচত্বারিংশতঃ সর্বধাত্বিন্দ্রিযবলবীর্যসম্পূর্ণতা, অত ঊর্ধ্বমীষত্পরিহাণির্যাবত্ সপ্ততিরিতি | সপ্ততেরূর্ধ্বং ক্ষীযমাণধাত্বিন্দ্রিযবলবীর্যোত্সাহমহন্যহনি বলীপলিতখালিত্যজুষ্টং কাসশ্বাসপ্রভৃতিভিরুপদ্রবৈরভিভূযমানং সর্বক্রিযাস্বসমর্থং জীর্ণাগারমিবাভিবৃষ্টমবসীদন্তং বৃদ্ধমাচক্ষতে ||২৯||

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वयस्तु त्रिविधं- बाल्यं, मध्यं, वृद्धमिति | तत्रोनषोडशवर्षीया बालाः | ते त्रिविधाः- क्षीरपाः, क्षीरान्नादा, अन्नादा इति | तेषु संवत्सरपराः क्षीरपाः, द्विसंवत्सरपराः क्षीरान्नादाः, परतोऽन्नादा इति | षोडशसप्तत्योरन्तरे मध्यं वयः | तस्य विकल्पो- वृद्धिः, यौवनं, सम्पूर्णता, परिहाणिरिति | तत्र, आविंशतेर्वृद्धिः, आत्रिंशतो यौवनम्, आचत्वारिंशतः सर्वधात्विन्द्रियबलवीर्यसम्पूर्णता, अत ऊर्ध्वमीषत्परिहाणिर्यावत् सप्ततिरिति | सप्ततेरूर्ध्वं क्षीयमाणधात्विन्द्रियबलवीर्योत्साहमहन्यहनि वलीपलितखालित्यजुष्टं कासश्वासप्रभृतिभिरुपद्रवैरभिभूयमानं सर्वक्रियास्वसमर्थं जीर्णागारमिवाभिवृष्टमवसीदन्तं वृद्धमाचक्षते ||२९||

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Adhikarana 25 (30) · Śloka 30

তত্রোত্তরোত্তরাসু বযোবস্থাসূত্তরোত্তরা ভেষজমাত্রাবিশেষা ভবন্তি, ঋতে চ পরিহাণেঃ; তত্রাদ্যাপেক্ষযা প্রতিকুর্বীত ||৩০||

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तत्रोत्तरोत्तरासु वयोवस्थासूत्तरोत्तरा भेषजमात्राविशेषा भवन्ति, ऋते च परिहाणेः; तत्राद्यापेक्षया प्रतिकुर्वीत ||३०||

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Adhikarana 26 (31) · Śloka 31

ভবন্তি চাত্র- বালে বিবর্ধতে শ্লেষ্মা মধ্যমে পিত্তমেব তু | ভূযিষ্ঠং বর্ধতে বাযুর্বৃদ্ধে তদ্বীক্ষ্য যোজযেত্ ||৩১||

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भवन्ति चात्र- बाले विवर्धते श्लेष्मा मध्यमे पित्तमेव तु | भूयिष्ठं वर्धते वायुर्वृद्धे तद्वीक्ष्य योजयेत् ||३१||

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Adhikarana 27 (32) · Śloka 32

অগ্নিক্ষারবিরেকৈস্তু বালবৃদ্ধৌ বিবর্জযেত্ | তত্সাধ্যেষু বিকারেষু মৃদ্বীং কুর্যাত্ ক্রিযাং শনৈঃ ||৩২||

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अग्निक्षारविरेकैस्तु बालवृद्धौ विवर्जयेत् | तत्साध्येषु विकारेषु मृद्वीं कुर्यात् क्रियां शनैः ||३२||

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Adhikarana 28 (33) · Śloka 33

দেহঃ স্থূলঃ, কৃশো, মধ্য, ইতি প্রাগুপদিষ্টঃ ||৩৩||

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देहः स्थूलः, कृशो, मध्य, इति प्रागुपदिष्टः ||३३||

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Adhikarana 29 (34) · Śloka 34

কর্শযেদ্বৃংহযেচ্চাপি সদা স্থূলকৃশৌ নরৌ | রক্ষণং চৈব মধ্যস্য কুর্বীত সততং ভিষক্ ||৩৪||

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कर्शयेद्बृंहयेच्चापि सदा स्थूलकृशौ नरौ | रक्षणं चैव मध्यस्य कुर्वीत सततं भिषक् ||३४||

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Adhikarana 30 (35) · Śloka 35

বলমভিহিতগুণং; দৌর্বল্যং তু স্বভাবদোষজরাদিভিরবেক্ষিতব্যম্ | যস্মাদ্বলবতঃ সর্বক্রিযাপ্রবৃত্তিস্তস্মাদ্বলমেব প্রধানমধিকরণানাম্ ||৩৫||

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बलमभिहितगुणं; दौर्बल्यं तु स्वभावदोषजरादिभिरवेक्षितव्यम् | यस्माद्बलवतः सर्वक्रियाप्रवृत्तिस्तस्माद्बलमेव प्रधानमधिकरणानाम् ||३५||

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Adhikarana 31 (36) · Śloka 36

কেচিত্ কৃশাঃ প্রাণবন্তঃ স্থূলাশ্চাল্পবলা নরাঃ | তস্মাত্ স্থিরত্বং ব্যাযামৈর্বলং বৈদ্যঃ প্রতর্কযেত্ ||৩৬||

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केचित् कृशाः प्राणवन्तः स्थूलाश्चाल्पबला नराः | तस्मात् स्थिरत्वं व्यायामैर्बलं वैद्यः प्रतर्कयेत् ||३६||

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Adhikarana 32 (37-38) · Śloka 38

সত্ত্বং তু ব্যসনাভ্যুদযক্রিযাদিস্থানেষ্ববিক্লবকরম্ ||৩৭|| সত্ত্ববান্ সহতে সর্বং সংস্তভ্যাত্মানমাত্মনা | রাজসঃ স্তভ্যমানোঽন্যৈঃ সহতে নৈব তামসঃ ||৩৮||

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सत्त्वं तु व्यसनाभ्युदयक्रियादिस्थानेष्वविक्लवकरम् ||३७|| सत्त्ववान् सहते सर्वं संस्तभ्यात्मानमात्मना | राजसः स्तभ्यमानोऽन्यैः सहते नैव तामसः ||३८||

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Adhikarana 33 (39-40) · Śloka 40

সাত্ম্যানি তু দেশকালজাত্যৃতুরোগব্যাযামোদকদিবাস্বপ্নরসপ্রভৃতীনি প্রকৃতিবিরুদ্ধান্যপি যান্যবাধকরাণি ভবন্তি ||৩৯|| যো রসঃ কল্পতে যস্য সুখাযৈব নিষেবিতঃ | ব্যাযামজাতমন্যদ্বা তত্ সাত্ম্যমিতি নির্দিশেত্ ||৪০||

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सात्म्यानि तु देशकालजात्यृतुरोगव्यायामोदकदिवास्वप्नरसप्रभृतीनि प्रकृतिविरुद्धान्यपि यान्यबाधकराणि भवन्ति ||३९|| यो रसः कल्पते यस्य सुखायैव निषेवितः | व्यायामजातमन्यद्वा तत् सात्म्यमिति निर्दिशेत् ||४०||

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Adhikarana 34 (41) · Śloka 41

প্রকৃতিং ভেষজং চোপরিষ্টাদ্বক্ষ্যামঃ ||৪১||

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प्रकृतिं भेषजं चोपरिष्टाद्वक्ष्यामः ||४१||

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Adhikarana 35 (42) · Śloka 42

দেশস্ত্বানূপো জাঙ্গলঃ সাধারণ ইতি | তত্র, বহূদকনিম্নোন্নতনদীবর্ষগহনো মৃদুশীতানিলো বহুমহাপর্বতবৃক্ষো মৃদুসুকুমারোপচিতশরীরমনুষ্যপ্রাযঃ কফবাতরোগভূযিষ্ঠশ্চানূপঃ; আকাশসমঃ প্রবিরলাল্পকণ্টকিবৃক্ষপ্রাযোঽল্পবর্ষপ্রস্রবণোদপানোদকপ্রায উষ্ণদারুণবাতঃ প্রবিরলাল্পশৈলঃ স্থিরকৃশশরীরমনুষ্যপ্রাযো বাতপিত্তরোগভূযিষ্ঠশ্চ জাঙ্গলঃ; উভযদেশলক্ষণঃ সাধারণ ইতি ||৪২||

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देशस्त्वानूपो जाङ्गलः साधारण इति | तत्र, बहूदकनिम्नोन्नतनदीवर्षगहनो मृदुशीतानिलो बहुमहापर्वतवृक्षो मृदुसुकुमारोपचितशरीरमनुष्यप्रायः कफवातरोगभूयिष्ठश्चानूपः; आकाशसमः प्रविरलाल्पकण्टकिवृक्षप्रायोऽल्पवर्षप्रस्रवणोदपानोदकप्राय उष्णदारुणवातः प्रविरलाल्पशैलः स्थिरकृशशरीरमनुष्यप्रायो वातपित्तरोगभूयिष्ठश्च जाङ्गलः; उभयदेशलक्षणः साधारण इति ||४२||

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Adhikarana 36 (43) · Śloka 43

ভবন্তি চাত্র- সমাঃ সাধারণে যস্মাচ্ছীতবর্ষোষ্মমারুতাঃ | দোষাণাং সমতা জন্তোস্তস্মাত্সাধারণো মতঃ ||৪৩||

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भवन्ति चात्र- समाः साधारणे यस्माच्छीतवर्षोष्ममारुताः | दोषाणां समता जन्तोस्तस्मात्साधारणो मतः ||४३||

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Adhikarana 37 (44-45) · Śloka 45

ন তথা বলবন্তঃ স্যুর্জলজা বা স্থলাহৃতাঃ | স্বদেশে নিচিতা দোষা অন্যস্মিন্ কোপমাগতাঃ ||৪৪|| উচিতে বর্তমানস্য নাস্তি দেশকৃতং ভযম্ | আহারস্বপ্নচেষ্টাদৌ তদ্দেশস্য গুণে সতি ||৪৫||

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न तथा बलवन्तः स्युर्जलजा वा स्थलाहृताः | स्वदेशे निचिता दोषा अन्यस्मिन् कोपमागताः ||४४|| उचिते वर्तमानस्य नास्ति देशकृतं भयम् | आहारस्वप्नचेष्टादौ तद्देशस्य गुणे सति ||४५||

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Adhikarana 38 (46-47) · Śloka 47

দেশপ্রকৃতিসাত্ম্যর্তুবিপরীতোঽচিরোত্থিতঃ | সম্পত্তৌ ভিষগাদীনাং বলসত্ত্বাযুষাং তথা ||৪৬|| কেবলঃ সমদেহাগ্নেঃ সুখসাধ্যতমো গদঃ | অতোঽন্যথা ত্বসাধ্যঃ স্যাত্কৃচ্ছ্রো ব্যামিশ্রলক্ষণঃ ||৪৭||

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देशप्रकृतिसात्म्यर्तुविपरीतोऽचिरोत्थितः | सम्पत्तौ भिषगादीनां बलसत्त्वायुषां तथा ||४६|| केवलः समदेहाग्नेः सुखसाध्यतमो गदः | अतोऽन्यथा त्वसाध्यः स्यात्कृच्छ्रो व्यामिश्रलक्षणः ||४७||

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Adhikarana 39 (48) · Śloka 48

ক্রিযাযাস্তু গুণালাভে ক্রিযামন্যাং প্রযোজযেত্ | পূর্বস্যাং শান্তবেগাযাং ন ক্রিযাসঙ্করো হিতঃ ||৪৮||

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क्रियायास्तु गुणालाभे क्रियामन्यां प्रयोजयेत् | पूर्वस्यां शान्तवेगायां न क्रियासङ्करो हितः ||४८||

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Adhikarana 40 (49) · Śloka 49

গুণালাভেঽপি সপদি যদি সৈব ক্রিযা হিতা | কর্তব্যৈব তদা ব্যাধিঃ কৃচ্ছ্রসাধ্যতমো যদি ||৪৯||

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गुणालाभेऽपि सपदि यदि सैव क्रिया हिता | कर्तव्यैव तदा व्याधिः कृच्छ्रसाध्यतमो यदि ||४९||

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Adhikarana 41 (50) · Śloka 50

য এবমেনং বিধিমেকরূপং বিভর্তি কালাদিবশেন ধীমান্ | স মৃত্যুপাশাঞ্জগতো গদৌঘাঞ্ছিনত্তি ভৈষজ্যপরশ্বধেন ||৫০||

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य एवमेनं विधिमेकरूपं बिभर्ति कालादिवशेन धीमान् | स मृत्युपाशाञ्जगतो गदौघाञ्छिनत्ति भैषज्यपरश्वधेन ||५०||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 35

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং সূত্রস্থানে আতুরোপক্রমণীযো নাম পঞ্চত্রিংশোঽধ্যাযঃ ||৩৫||

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इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने आतुरोपक्रमणीयो नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ||३५||

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