Adhikarana 1 (1-3) · Śloka 3
অথাতঃ শল্যাপনযনীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১||
যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
শল্যং দ্বিবিধমববদ্ধমনববদ্ধং চ ||৩||
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अथातः शल्यापनयनीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१||
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
शल्यं द्विविधमवबद्धमनवबद्धं च ||३||
Adhikarana 2 (4) · Śloka 4
তত্র সমাসেনানববদ্ধশল্যোদ্ধরণার্থং পঞ্চদশ হেতূন্ বক্ষ্যামঃ |
তদ্যথা- স্বভাবঃ, পাচনং, ভেদনং, দারণং, পীডনং, প্রমার্জনং, নির্ধ্মাপনং, বমনং, বিরেচনং, প্রক্ষালনং, প্রতিমর্শঃ, প্রবাহণম্, আচূষণম্, অযস্কান্তো, হর্ষশ্চেতি ||৪||
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तत्र समासेनानवबद्धशल्योद्धरणार्थं पञ्चदश हेतून् वक्ष्यामः |
तद्यथा- स्वभावः, पाचनं, भेदनं, दारणं, पीडनं, प्रमार्जनं, निर्ध्मापनं, वमनं, विरेचनं, प्रक्षालनं, प्रतिमर्शः, प्रवाहणम्, आचूषणम्, अयस्कान्तो, हर्षश्चेति ||४||
Adhikarana 3 (5) · Śloka 5
তত্রাশ্রুক্ষবথূদ্গারকাসমূত্রপুরীষানিলৈঃ স্বভাববলপ্রবৃত্তৈর্নযনাদিভ্যঃ পততি |
মাংসাবগাঢং শল্যমবিদহ্যমানং পাচযিত্বা প্রকোথাত্তস্য পূযশোণিতবেগাদ্গৌরবাদ্বা পততি |
পক্বমভিদ্যমানং ভেদযেদ্দারযেদ্বা |
ভিন্নমনিরস্যমানং পীডনীযৈঃ পীডযেত্ পাণিভির্বা |
অণূন্যক্ষশল্যানি পরিষেচনাধ্মাপনৈর্বালবস্ত্রপাণিভিঃ প্রমার্জযেত্ |
আহারশেষশ্লেষ্মহীনাণুশল্যানি শ্বসনোত্কাসনপ্রধমনৈর্নির্ধমেত্ |
অন্নশল্যানি বমনাঙ্গুলিপ্রতিমর্শপ্রভৃতিভিঃ |
বিরেচনৈঃ পক্বাশযগতানি |
ব্রণদোষাশযগতানি প্রক্ষালনৈঃ |
বাতমূত্রপুরীষগর্ভসঙ্গেষু প্রবাহণমুক্তম্ |
মারুতোদকসবিষরুধিরদুষ্টস্তন্যেষ্বাচূষণমাস্যেন বিষাণৈর্বা |
অনুলোমমনববদ্ধমকর্ণমনল্পব্রণমুখমযস্কান্তেন |
হৃদ্যবস্থিতমনেককারণোত্পন্নং শোকশল্যং হর্ষেণেতি ||৫||
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तत्राश्रुक्षवथूद्गारकासमूत्रपुरीषानिलैः स्वभावबलप्रवृत्तैर्नयनादिभ्यः पतति |
मांसावगाढं शल्यमविदह्यमानं पाचयित्वा प्रकोथात्तस्य पूयशोणितवेगाद्गौरवाद्वा पतति |
पक्वमभिद्यमानं भेदयेद्दारयेद्वा |
भिन्नमनिरस्यमानं पीडनीयैः पीडयेत् पाणिभिर्वा |
अणून्यक्षशल्यानि परिषेचनाध्मापनैर्बालवस्त्रपाणिभिः प्रमार्जयेत् |
आहारशेषश्लेष्महीनाणुशल्यानि श्वसनोत्कासनप्रधमनैर्निर्धमेत् |
अन्नशल्यानि वमनाङ्गुलिप्रतिमर्शप्रभृतिभिः |
विरेचनैः पक्वाशयगतानि |
व्रणदोषाशयगतानि प्रक्षालनैः |
वातमूत्रपुरीषगर्भसङ्गेषु प्रवाहणमुक्तम् |
मारुतोदकसविषरुधिरदुष्टस्तन्येष्वाचूषणमास्येन विषाणैर्वा |
अनुलोममनवबद्धमकर्णमनल्पव्रणमुखमयस्कान्तेन |
हृद्यवस्थितमनेककारणोत्पन्नं शोकशल्यं हर्षेणेति ||५||
Adhikarana 4 (6) · Śloka 6
সর্বশল্যানাং তু মহতামণূনাং বা দ্বাবেবাহরণহেতূ ভবতঃ- প্রতিলোমোঽনুলোমশ্চ ||৬||
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सर्वशल्यानां तु महतामणूनां वा द्वावेवाहरणहेतू भवतः- प्रतिलोमोऽनुलोमश्च ||६||
Adhikarana 5 (7) · Śloka 7
তত্র প্রতিলোমমর্বাচীনমানযেত্ , অনুলোমং পরাচীনম্ ||৭||
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तत्र प्रतिलोममर्वाचीनमानयेत् , अनुलोमं पराचीनम् ||७||
Adhikarana 6 (8) · Śloka 8
উত্তুণ্ডিতং ছিত্ত্বা নির্ঘাতযেচ্ছেদনীযমুখম্ ||৮||
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उत्तुण्डितं छित्त्वा निर्घातयेच्छेदनीयमुखम् ||८||
Adhikarana 7 (9) · Śloka 9
ছেদনীযমুখান্যপি কুক্ষিবক্ষঃকক্ষাবঙ্ক্ষণপর্শুকান্তরপতিতানি চ হস্তশক্যং যথামার্গেণ হস্তেনৈবাপহর্তুং প্রযতেত ||৯||
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छेदनीयमुखान्यपि कुक्षिवक्षःकक्षावङ्क्षणपर्शुकान्तरपतितानि च हस्तशक्यं यथामार्गेण हस्तेनैवापहर्तुं प्रयतेत ||९||
Adhikarana 8 (10) · Śloka 10
হস্তেনৈবাপহর্তুমশক্যং বিশস্য শস্ত্রেণ যন্ত্রেণাপহরেত্ ||১০||
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हस्तेनैवापहर्तुमशक्यं विशस्य शस्त्रेण यन्त्रेणापहरेत् ||१०||
Adhikarana 9 (11) · Śloka 11
ভবতি চাত্র- শীতলেন জলেনৈনং মূর্চ্ছন্তমবসেচযেত্ |
সংরক্ষেদস্য মর্মাণি মুহুরাশ্বাসযেচ্চ তম্ ||১১||
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भवति चात्र- शीतलेन जलेनैनं मूर्च्छन्तमवसेचयेत् |
संरक्षेदस्य मर्माणि मुहुराश्वासयेच्च तम् ||११||
Adhikarana 10 (12) · Śloka 12
ততঃ শল্যমুদ্ধৃত্য নির্লোহিতং ব্রণং কৃত্বা স্বেদার্হমগ্নিঘৃতপ্রভৃতিভিঃ সংস্বেদ্যাবদহ্য প্রদিহ্য সর্পির্মধুভ্যাং বদ্ধ্বাঽঽচারিকমুপদিশেত্ |
(সিরাস্নাযুবিলগ্নং শলাকাদিভির্বিমোচ্যাপনযেত্; শ্বযথুগ্রস্তবারঙ্গং সমবপীড্য শ্বযথুং; দুর্বলবারঙ্গং কুশাদিভির্বদ্ধ্বা|) ||১২||
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ततः शल्यमुद्धृत्य निर्लोहितं व्रणं कृत्वा स्वेदार्हमग्निघृतप्रभृतिभिः संस्वेद्यावदह्य प्रदिह्य सर्पिर्मधुभ्यां बद्ध्वाऽऽचारिकमुपदिशेत् |
(सिरास्नायुविलग्नं शलाकादिभिर्विमोच्यापनयेत्; श्वयथुग्रस्तवारङ्गं समवपीड्य श्वयथुं; दुर्बलवारङ्गं कुशादिभिर्बद्ध्वा|) ||१२||
Adhikarana 11 (13) · Śloka 13
হৃদযমভিতো বর্তমানং শল্যং শীতজলাদিভিরুদ্বেজিতস্যাপহরেদ্যথামার্গং; দুরুপহরমন্যতোঽপবাধ্যমানং পাটযিত্বোদ্ধরেত্ ||১৩||
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हृदयमभितो वर्तमानं शल्यं शीतजलादिभिरुद्वेजितस्यापहरेद्यथामार्गं; दुरुपहरमन्यतोऽपबाध्यमानं पाटयित्वोद्धरेत् ||१३||
Adhikarana 12 (14) · Śloka 14
অস্থিবিবরপ্রবিষ্টমস্থিবিদষ্টং বাঽবগৃহ্য পাদাভ্যাং যন্ত্রেণাপহরেত্, অশক্যমেবং বা বলবদ্ভিঃ সুপরিগৃহীতস্য যন্ত্রেণ গ্রাহযিত্বা শল্যবারঙ্গং প্রবিভুজ্য ধনুর্গুণৈর্বদ্ধ্বৈকতশ্চাস্য পঞ্চাঙ্গ্যামুপসংযতস্যাশ্বস্যবক্ত্রকবিকে বধ্নীযাত্, অথৈনং কশযা তাডযেদ্যথোন্নামযঞ্ শিরো বেগেন শল্যমুদ্ধরতি; দৃঢাং বা বৃক্ষশাখামবনম্য তস্যাং পূর্ববদ্বদ্ধ্বোদ্ধরেত্ ||১৪||
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अस्थिविवरप्रविष्टमस्थिविदष्टं वाऽवगृह्य पादाभ्यां यन्त्रेणापहरेत्, अशक्यमेवं वा बलवद्भिः सुपरिगृहीतस्य यन्त्रेण ग्राहयित्वा शल्यवारङ्गं प्रविभुज्य धनुर्गुणैर्बद्ध्वैकतश्चास्य पञ्चाङ्ग्यामुपसंयतस्याश्वस्यवक्त्रकविके बध्नीयात्, अथैनं कशया ताडयेद्यथोन्नामयञ् शिरो वेगेन शल्यमुद्धरति; दृढां वा वृक्षशाखामवनम्य तस्यां पूर्ववद्बद्ध्वोद्धरेत् ||१४||
Adhikarana 13 (15) · Śloka 15
অদেশোত্তুণ্ডিতমষ্ঠীলাশ্মমুদ্গরাণামন্যতমস্য প্রহারেণ বিচাল্য যথামার্গমেব যন্ত্রেণ ||১৫||
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अदेशोत्तुण्डितमष्ठीलाश्ममुद्गराणामन्यतमस्य प्रहारेण विचाल्य यथामार्गमेव यन्त्रेण ||१५||
Adhikarana 14 (16) · Śloka 16
বিমৃদিতকর্ণানি কর্ণবন্ত্যনাবাধকরদেশোত্তুণ্ডিতানি পুরস্তাদেব ||১৬||
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विमृदितकर्णानि कर्णवन्त्यनाबाधकरदेशोत्तुण्डितानि पुरस्तादेव ||१६||
Adhikarana 15 (17) · Śloka 17
জাতুষে কণ্ঠাসক্তে কণ্ঠে নাডীং প্রবেশ্যাগ্নিতপ্তাং চ শলাকাং, তযাঽবগৃহ্য শীতাভিরদ্ভিঃ পরিষিচ্য স্থিরীভূতং শল্যমুদ্ধরেত্ ||১৭||
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जातुषे कण्ठासक्ते कण्ठे नाडीं प्रवेश्याग्नितप्तां च शलाकां, तयाऽवगृह्य शीताभिरद्भिः परिषिच्य स्थिरीभूतं शल्यमुद्धरेत् ||१७||
Adhikarana 16 (18) · Śloka 18
অজাতুষং তু জতুমধূচ্ছিষ্টপ্রলিপ্তযা শলাকযা পূর্বকল্পেনেত্যেকে ||১৮||
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अजातुषं तु जतुमधूच्छिष्टप्रलिप्तया शलाकया पूर्वकल्पेनेत्येके ||१८||
Adhikarana 17 (19) · Śloka 19
অস্থিশল্যমন্যদ্বা তির্যক্কণ্ঠাসক্তমবেক্ষ্য কেশোণ্ডুকং দৃঢৈকদীর্ঘসূত্রবদ্ধং দ্রবভক্তোপহিতং পাযযেদাকণ্ঠাত্ পূর্ণকোষ্ঠং চ বামযেত্, বমতশ্চ শল্যৈকদেশসক্তং জ্ঞাত্বা সূত্রং সহসা ত্বাক্ষিপেত্; মৃদুনা বা দন্তধাবনকূর্চকেনাপহরেত্ প্রণুদেদ্বাঽন্তঃ |
ক্ষতকণ্ঠায চ মধুসর্পিষী লেঢুং প্রযচ্ছেত্ত্রিফলাচূর্ণং বা মধুশর্করামিশ্রম্ ||১৯||
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अस्थिशल्यमन्यद्वा तिर्यक्कण्ठासक्तमवेक्ष्य केशोण्डुकं दृढैकदीर्घसूत्रबद्धं द्रवभक्तोपहितं पाययेदाकण्ठात् पूर्णकोष्ठं च वामयेत्, वमतश्च शल्यैकदेशसक्तं ज्ञात्वा सूत्रं सहसा त्वाक्षिपेत्; मृदुना वा दन्तधावनकूर्चकेनापहरेत् प्रणुदेद्वाऽन्तः |
क्षतकण्ठाय च मधुसर्पिषी लेढुं प्रयच्छेत्त्रिफलाचूर्णं वा मधुशर्करामिश्रम् ||१९||
Adhikarana 18 (20) · Śloka 20
উদকপূর্ণোদরমবাক্শিরসমবপীডযেদ্ধুনীযাদ্বামযেদ্বা ভস্মরাশৌ বা নিখনেদামুখাত্ ||২০||
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उदकपूर्णोदरमवाक्शिरसमवपीडयेद्धुनीयाद्वामयेद्वा भस्मराशौ वा निखनेदामुखात् ||२०||
Adhikarana 19 (21) · Śloka 21
গ্রাসশল্যে তু কণ্ঠাসক্তে নিঃশঙ্কমনববুদ্ধং স্কন্ধে মুষ্টিনাঽভিহন্যাত্, স্নেহং মদ্যং পানীযং বা পাযযেত্ ||২১||
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ग्रासशल्ये तु कण्ठासक्ते निःशङ्कमनवबुद्धं स्कन्धे मुष्टिनाऽभिहन्यात्, स्नेहं मद्यं पानीयं वा पाययेत् ||२१||
Adhikarana 20 (22) · Śloka 22
বাহুরজ্জুলতাপাশৈঃ কণ্ঠপীডনাদ্বাযুঃ প্রকুপিতঃ শ্লেষ্মাণং কোপযিত্বা স্রোতো নিরুণদ্ধি, লালাস্রাবং ফেনাগমনং সঞ্জ্ঞানাশং চাপাদযতি; তমভ্যজ্য সংস্বেদ্য শিরোবিরেচনং তস্মৈ তীক্ষ্ণং বিদধ্যাদ্রসং চ বাতঘ্নং দদ্যাদিতি ||২২||
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बाहुरज्जुलतापाशैः कण्ठपीडनाद्वायुः प्रकुपितः श्लेष्माणं कोपयित्वा स्रोतो निरुणद्धि, लालास्रावं फेनागमनं सञ्ज्ञानाशं चापादयति; तमभ्यज्य संस्वेद्य शिरोविरेचनं तस्मै तीक्ष्णं विदध्याद्रसं च वातघ्नं दद्यादिति ||२२||
Adhikarana 21 (23-26) · Śloka 26
ভবন্তি চাত্র- শল্যাকৃতিবিশেষাংশ্চ স্থানান্যাবেক্ষ্য বুদ্ধিমান্ |
তথা যন্ত্রপৃথক্ত্বং চ সম্যক্ শল্যমথাহরেত্ ||২৩||
কর্ণবন্তি তু শল্যানি দুঃখাহার্যাণি যানি চ |
আদদীত ভিষক্ তস্মাত্তানি যুক্ত্যা সমাহিতঃ ||২৪||
এতৈরুপাযৈঃ শল্যং তু নৈব নির্যাত্যতে যদি |
মত্যা নিপুণযা বৈদ্যো যন্ত্রযোগৈশ্চ নির্হরেত্ ||২৫||
শোথপাকৌ রুজশ্চোগ্রাঃ কুর্যাচ্ছল্যমনাহৃতম্ |
বৈকল্যং মরণং চাপি তস্মাদ্যত্নাদ্বিনির্হরেত্ ||২৬||
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भवन्ति चात्र- शल्याकृतिविशेषांश्च स्थानान्यावेक्ष्य बुद्धिमान् |
तथा यन्त्रपृथक्त्वं च सम्यक् शल्यमथाहरेत् ||२३||
कर्णवन्ति तु शल्यानि दुःखाहार्याणि यानि च |
आददीत भिषक् तस्मात्तानि युक्त्या समाहितः ||२४||
एतैरुपायैः शल्यं तु नैव निर्यात्यते यदि |
मत्या निपुणया वैद्यो यन्त्रयोगैश्च निर्हरेत् ||२५||
शोथपाकौ रुजश्चोग्राः कुर्याच्छल्यमनाहृतम् |
वैकल्यं मरणं चापि तस्माद्यत्नाद्विनिर्हरेत् ||२६||
Adhikarana puShpikA · Śloka 27
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং সূত্রস্থানে শল্যাপনযনীযো নাম সপ্তবিংশতিতমোঽধ্যাযঃ ||২৭||
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इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने शल्यापनयनीयो नाम सप्तविंशतितमोऽध्यायः ||२७||