Adhikarana 2 (1-2) · Śloka 2
অথাতো বেদোত্পত্তিমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातो वेदोत्पत्तिमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (1-2) · Śloka 2
অথাতো বেদোত্পত্তিমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातो वेदोत्पत्तिमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 3 (3) · Śloka 3
অথ খলু ভগবন্তমমরবরমৃষিগণপরিবৃতমাশ্রমস্থং কাশিরাজং দিবোদাসং ধন্বন্তরিমৌপধেনববৈতরণৌরভ্রপৌষ্কলাবতকরবীর্য(র)গোপুররক্ষিতসুশ্রুতপ্রভৃতয ঊচুঃ ||৩||
अथ खलु भगवन्तममरवरमृषिगणपरिवृतमाश्रमस्थं काशिराजं दिवोदासं धन्वन्तरिमौपधेनववैतरणौरभ्रपौष्कलावतकरवीर्य(र)गोपुररक्षितसुश्रुतप्रभृतय ऊचुः ||३||
Adhikarana 4 (4) · Śloka 4
ভগবন্! শারীরমানসাগন্তুভির্ব্যাধিভির্বিবিধবেদনাভিঘাতোপদ্রুতান্ সনাথানপ্যনাথবদ্বিচেষ্টমানান্ বিক্রোশতশ্চ মানবানভিসমীক্ষ্য মনসি নঃ পীডা ভবতি, তেষাং সুখৈষিণাং রোগোপশমার্থমাত্মনশ্চ প্রাণযাত্রার্থং প্রজাহিতহেতোরাযুর্বেদং শ্রোতুমিচ্ছাম ইহোপদিশ্যমানম্, অত্রাযত্তমৈহিকমামুষ্মিকং চ শ্রেযঃ; তদ্ভগবন্তমুপপন্নাঃ স্মঃ শিষ্যত্বেনেতি ||৪||
भगवन्! शारीरमानसागन्तुभिर्व्याधिभिर्विविधवेदनाभिघातोपद्रुतान् सनाथानप्यनाथवद्विचेष्टमानान् विक्रोशतश्च मानवानभिसमीक्ष्य मनसि नः पीडा भवति, तेषां सुखैषिणां रोगोपशमार्थमात्मनश्च प्राणयात्रार्थं प्रजाहितहेतोरायुर्वेदं श्रोतुमिच्छाम इहोपदिश्यमानम्, अत्रायत्तमैहिकमामुष्मिकं च श्रेयः; तद्भगवन्तमुपपन्नाः स्मः शिष्यत्वेनेति ||४||
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Adhikarana 5 (5) · Śloka 5
তানুবাচ ভগবান্- স্বাগতং বঃ; সর্ব এবামীমাংস্যা অধ্যাপ্যাশ্চ ভবন্তো বত্সাঃ ||৫||
तानुवाच भगवान्- स्वागतं वः; सर्व एवामीमांस्या अध्याप्याश्च भवन्तो वत्साः ||५||
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Adhikarana 6 (6) · Śloka 6
ইহ খল্বাযুর্বেদং নামোপাঙ্গমথর্ববেদস্যানুত্পাদ্যৈব প্রজাঃ শ্লোকশতসহস্রমধ্যাযসহস্রং চ কৃতবান্ স্বযম্ভূঃ, ততোঽল্পাযুষ্ট্বমল্পমেধস্ত্বং চালোক্য নরাণাং ভূযোঽষ্টধা প্রণীতবান্ ||৬||
इह खल्वायुर्वेदं नामोपाङ्गमथर्ववेदस्यानुत्पाद्यैव प्रजाः श्लोकशतसहस्रमध्यायसहस्रं च कृतवान् स्वयम्भूः, ततोऽल्पायुष्ट्वमल्पमेधस्त्वं चालोक्य नराणां भूयोऽष्टधा प्रणीतवान् ||६||
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Adhikarana 7 (7) · Śloka 7
তদ্যথা- শল্যং, শালাক্যং, কাযচিকিত্সা, ভূতবিদ্যা, কৌমারভৃত্যম্, অগদতন্ত্রং, রসাযনতন্ত্রং, বাজীকরণতন্ত্রমিতি ||৭||
तद्यथा- शल्यं, शालाक्यं, कायचिकित्सा, भूतविद्या, कौमारभृत्यम्, अगदतन्त्रं, रसायनतन्त्रं, वाजीकरणतन्त्रमिति ||७||
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Adhikarana 8 (8) · Śloka 8
অথাস্য প্রত্যঙ্গলক্ষণসমাসঃ |৮|
अथास्य प्रत्यङ्गलक्षणसमासः |८|
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Adhikarana 9 (8(1)) · Śloka 8
তত্র, শল্যং নাম বিবিধতৃণকাষ্ঠপাষাণপাংশুলোহলোষ্টাস্থিবালনখপূযাস্রাবদুষ্টব্রণান্তর্গর্ভশল্যোদ্ধরণার্থং , যন্ত্রশস্ত্রক্ষারাগ্নিপ্রণিধানব্রণবিনিশ্চযার্থং চ (১) |৮|
तत्र, शल्यं नाम विविधतृणकाष्ठपाषाणपांशुलोहलोष्टास्थिबालनखपूयास्रावदुष्टव्रणान्तर्गर्भशल्योद्धरणार्थं , यन्त्रशस्त्रक्षाराग्निप्रणिधानव्रणविनिश्चयार्थं च (१) |८|
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Adhikarana 10 (8(2)) · Śloka 8
শালাক্যং নামোর্ধ্বজত্রুগতানাং শ্রবণনযনবদনঘ্রাণাদিসংশ্রিতানাং ব্যাধীনামুপশমনার্থম্ (২) |৮|
शालाक्यं नामोर्ध्वजत्रुगतानां श्रवणनयनवदनघ्राणादिसंश्रितानां व्याधीनामुपशमनार्थम् (२) |८|
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Adhikarana 11 (8(3)) · Śloka 8
কাযচিকিত্সা নাম সর্বাঙ্গসংশ্রিতানাং ব্যাধীনাং জ্বররক্তপিত্তশোষোন্মাদাপস্মারকুষ্ঠমেহাতিসারাদীনামুপশমনার্থম্ (৩) |৮|
कायचिकित्सा नाम सर्वाङ्गसंश्रितानां व्याधीनां ज्वररक्तपित्तशोषोन्मादापस्मारकुष्ठमेहातिसारादीनामुपशमनार्थम् (३) |८|
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Adhikarana 12 (8(4)) · Śloka 8
ভূতবিদ্যা নাম দেবাসুরগন্ধর্বযক্ষরক্ষঃপিতৃপিশাচনাগগ্রহাদ্যুপসৃষ্টচেতসাং শান্তিকর্মবলিহরণাদিগ্রহোপশমনার্থম্ (৪) |৮|
भूतविद्या नाम देवासुरगन्धर्वयक्षरक्षःपितृपिशाचनागग्रहाद्युपसृष्टचेतसां शान्तिकर्मबलिहरणादिग्रहोपशमनार्थम् (४) |८|
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Adhikarana 13 (8(5)) · Śloka 8
কৌমারভৃত্যং নাম কুমারভরণধাত্রীক্ষীরদোষসংশোধনার্থং দুষ্টস্তন্যগ্রহসমুত্থানাং চ ব্যাধীনামুপশমনার্থম্ (৫) |৮|
कौमारभृत्यं नाम कुमारभरणधात्रीक्षीरदोषसंशोधनार्थं दुष्टस्तन्यग्रहसमुत्थानां च व्याधीनामुपशमनार्थम् (५) |८|
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Adhikarana 14 (8(6)) · Śloka 8
অগদতন্ত্রং নাম সর্পকীটলূতামূষকাদিদষ্টবিষব্যঞ্জনার্থং বিবিধবিষসংযোগোপশমনার্থং চ (৬) |৮|
अगदतन्त्रं नाम सर्पकीटलूतामूषकादिदष्टविषव्यञ्जनार्थं विविधविषसंयोगोपशमनार्थं च (६) |८|
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Adhikarana 15 (8(7)) · Śloka 8
রসাযনতন্ত্রং নাম বযঃস্থাপনমাযুর্মেধাবলকরং রোগাপহরণসমর্থং চ (৭) |৮|
रसायनतन्त्रं नाम वयःस्थापनमायुर्मेधाबलकरं रोगापहरणसमर्थं च (७) |८|
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Adhikarana 16 (8(8)) · Śloka 8
বাজীকরণতন্ত্রং নামাল্পদুষ্টক্ষীণবিশুষ্করেতসামাপ্যাযনপ্রসাদোপচযজনননিমিত্তং প্রহর্ষজননার্থং চ (৮) ||৮||
वाजीकरणतन्त्रं नामाल्पदुष्टक्षीणविशुष्करेतसामाप्यायनप्रसादोपचयजनननिमित्तं प्रहर्षजननार्थं च (८) ||८||
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Adhikarana 17 (9) · Śloka 9
এবমযমাযুর্বেদোঽষ্টাঙ্গ উপদিশ্যতে; অত্র কস্মৈ কিমুচ্যতামিতি ||৯||
एवमयमायुर्वेदोऽष्टाङ्ग उपदिश्यते; अत्र कस्मै किमुच्यतामिति ||९||
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Adhikarana 18 (10-11) · Śloka 11
ত ঊচুঃ- অস্মাকং সর্বেষামেব শল্যজ্ঞানং মূলং কৃত্বোপদিশতু ভগবানিতি ||১০|| স উবাচৈবমস্ত্বিতি ||১১||
त ऊचुः- अस्माकं सर्वेषामेव शल्यज्ञानं मूलं कृत्वोपदिशतु भगवानिति ||१०|| स उवाचैवमस्त्विति ||११||
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Adhikarana 19 (12-13) · Śloka 13
ত ঊচুর্ভূযোঽপি ভগবন্তম্- অস্মাকমেকমতীনাং মতমভিসমীক্ষ্য সুশ্রুতো ভগবন্তং প্রক্ষ্যতি, অস্মৈ চোপদিশ্যমানং বযমপ্যুধারযিষ্যামঃ ||১২|| স উবাচৈবমস্ত্বিতি ||১৩||
त ऊचुर्भूयोऽपि भगवन्तम्- अस्माकमेकमतीनां मतमभिसमीक्ष्य सुश्रुतो भगवन्तं प्रक्ष्यति, अस्मै चोपदिश्यमानं वयमप्युधारयिष्यामः ||१२|| स उवाचैवमस्त्विति ||१३||
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Adhikarana 20 (14) · Śloka 14
বত্স সুশ্রুত! ইহ খল্বাযুর্বেদপ্রযোজনং- ব্যাধ্যুপসৃষ্টানাং ব্যাধিপরিমোক্ষঃ, স্বস্থস্য রক্ষণং চ ||১৪||
वत्स सुश्रुत! इह खल्वायुर्वेदप्रयोजनं- व्याध्युपसृष्टानां व्याधिपरिमोक्षः, स्वस्थस्य रक्षणं च ||१४||
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Adhikarana 21 (15) · Śloka 15
‘আযুরস্মিন্ বিদ্যতে, অনেন বাঽঽযুর্বিন্দন্তি’ ইত্যাযুর্বেদঃ ||১৫||
‘आयुरस्मिन् विद्यते, अनेन वाऽऽयुर्विन्दन्ति’ इत्यायुर्वेदः ||१५||
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Adhikarana 22 (16) · Śloka 16
তস্যাঙ্গবরমাদ্যং প্রত্যক্ষাগমানুমানোপমানৈরবিরুদ্ধমুচ্যমানমুপধারয ||১৬||
तस्याङ्गवरमाद्यं प्रत्यक्षागमानुमानोपमानैरविरुद्धमुच्यमानमुपधारय ||१६||
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Adhikarana 23 (17) · Śloka 17
এতদ্ধ্যঙ্গং প্রথমং, প্রাগভিঘাতব্রণসংরোহাদ্যজ্ঞশিরঃসন্ধানাচ্চ | শ্রূযতে হি যথা- “রুদ্রেণ যজ্ঞস্য শিরশ্ছিন্নমিতি, ততো দেবা অশ্বিনাবভিগম্যোচুঃ- ভগবন্তৌ নঃ শ্রেষ্ঠতমৌ যুবাং ভবিষ্যথঃ, ভবদ্ভ্যাং যজ্ঞস্য শিরঃ সন্ধাতব্যমিতি | তাবূচতুরেবমস্ত্বিতি | অথ তযোরর্থে দেবা ইন্দ্রং যজ্ঞভাগেন প্রাসাদযন্ | তাভ্যাং যজ্ঞস্য শিরঃ সংহিতম্” ইতি ||১৭||
एतद्ध्यङ्गं प्रथमं, प्रागभिघातव्रणसंरोहाद्यज्ञशिरःसन्धानाच्च | श्रूयते हि यथा- “रुद्रेण यज्ञस्य शिरश्छिन्नमिति, ततो देवा अश्विनावभिगम्योचुः- भगवन्तौ नः श्रेष्ठतमौ युवां भविष्यथः, भवद्भ्यां यज्ञस्य शिरः सन्धातव्यमिति | तावूचतुरेवमस्त्विति | अथ तयोरर्थे देवा इन्द्रं यज्ञभागेन प्रासादयन् | ताभ्यां यज्ञस्य शिरः संहितम्” इति ||१७||
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Adhikarana 24 (18) · Śloka 18
অষ্টাস্বপি চাযুর্বেদতন্ত্রেষ্বেতদেবাধিকমভিমতম্, আশুক্রিযাকরণাদ্যন্ত্রশস্ত্রক্ষারাগ্নিপ্রণিধানাত্ সর্বতন্ত্রসামান্যাচ্চ ||১৮||
अष्टास्वपि चायुर्वेदतन्त्रेष्वेतदेवाधिकमभिमतम्, आशुक्रियाकरणाद्यन्त्रशस्त्रक्षाराग्निप्रणिधानात् सर्वतन्त्रसामान्याच्च ||१८||
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Adhikarana 25 (19) · Śloka 19
তদিদং শাশ্বতং পুণ্যং স্বর্গ্যং যশস্যমাযুষ্যং বৃত্তিকরং চেতি ||১৯||
तदिदं शाश्वतं पुण्यं स्वर्ग्यं यशस्यमायुष्यं वृत्तिकरं चेति ||१९||
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Adhikarana 26 (20) · Śloka 20
ব্রহ্মা প্রোবাচ ততঃ প্রজাপতিরধিজগে, তস্মাদশ্বিনৌ, অশ্বিভ্যামিন্দ্রঃ, ইন্দ্রাদহং, মযা ত্বিহ প্রদেযমর্থিভ্যঃ প্রজাহিতহেতোঃ ||২০||
ब्रह्मा प्रोवाच ततः प्रजापतिरधिजगे, तस्मादश्विनौ, अश्विभ्यामिन्द्रः, इन्द्रादहं, मया त्विह प्रदेयमर्थिभ्यः प्रजाहितहेतोः ||२०||
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Adhikarana 27 (21) · Śloka 21
ভবতি চাত্র- অহং হি ধন্বন্তরিরাদিদেবো জরারুজামৃত্যুহরোঽমরাণাম্ | শল্যাঙ্গমঙ্গৈরপরৈরুপেতং প্রাপ্তোঽস্মি গাং ভূয ইহোপদেষ্টুম্ ||২১||
भवति चात्र- अहं हि धन्वन्तरिरादिदेवो जरारुजामृत्युहरोऽमराणाम् | शल्याङ्गमङ्गैरपरैरुपेतं प्राप्तोऽस्मि गां भूय इहोपदेष्टुम् ||२१||
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Adhikarana 28 (22) · Śloka 22
অস্মিঞ্ছাস্ত্রে পঞ্চমহাভূতশরীরিসমবাযঃ পুরুষ ইত্যুচ্যতে | তস্মিন্ ক্রিযা, সোঽধিষ্ঠানং; কস্মাত্? লোকস্য দ্বৈবিধ্যাত ; লোকো হি দ্বিবিধঃ স্থাবরো জঙ্গমশ্চ; দ্বিবিধাত্মক এবাগ্নেযঃ, সৌম্যশ্চ, তদ্ভূযস্ত্বাত্; পঞ্চাত্মকো বা; তত্র চতুর্বিধো ভূতগ্রামঃ সংস্বেদজজরাযুজাণ্ডজোদ্ভিজ্জসঞ্জ্ঞঃ ; তত্র পুরুষঃ প্রধানং, তস্যোপকরণমন্যত্; তস্মাত্ পুরুষোঽধিষ্ঠানম্ ||২২||
अस्मिञ्छास्त्रे पञ्चमहाभूतशरीरिसमवायः पुरुष इत्युच्यते | तस्मिन् क्रिया, सोऽधिष्ठानं; कस्मात्? लोकस्य द्वैविध्यात ; लोको हि द्विविधः स्थावरो जङ्गमश्च; द्विविधात्मक एवाग्नेयः, सौम्यश्च, तद्भूयस्त्वात्; पञ्चात्मको वा; तत्र चतुर्विधो भूतग्रामः संस्वेदजजरायुजाण्डजोद्भिज्जसञ्ज्ञः ; तत्र पुरुषः प्रधानं, तस्योपकरणमन्यत्; तस्मात् पुरुषोऽधिष्ठानम् ||२२||
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Adhikarana 29 (23) · Śloka 23
তদ্দুঃখসংযোগা ব্যাধয উচ্যন্তে ||২৩||
तद्दुःखसंयोगा व्याधय उच्यन्ते ||२३||
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Adhikarana 30 (24) · Śloka 24
তে চতুর্বিধাঃ- আগন্তবঃ, শারীরাঃ, মানসাঃ, স্বাভাবিকাশ্চেতি ||২৪||
ते चतुर्विधाः- आगन्तवः, शारीराः, मानसाः, स्वाभाविकाश्चेति ||२४||
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Adhikarana 31 (25(1)) · Śloka 25
তেষামাগন্তবোঽভিঘাতনিমিত্তাঃ |২৫|
तेषामागन्तवोऽभिघातनिमित्ताः |२५|
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Adhikarana 32 (25(2)) · Śloka 25
শারীরাস্ত্বন্নপানমূলা বাতপিত্তকফশোণিতসন্নিপাতবৈষম্যনিমিত্তাঃ |২৫|
शारीरास्त्वन्नपानमूला वातपित्तकफशोणितसन्निपातवैषम्यनिमित्ताः |२५|
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Adhikarana 33 (25(3)) · Śloka 25
মানসাস্তু ক্রোধশোকভযহর্ষবিষাদের্ষ্যাভ্যসূযাদৈন্যমাত্সর্যকামলোভপ্রভৃতয ইচ্ছাদ্বেষভেদৈর্ভবন্তি |২৫|
मानसास्तु क्रोधशोकभयहर्षविषादेर्ष्याभ्यसूयादैन्यमात्सर्यकामलोभप्रभृतय इच्छाद्वेषभेदैर्भवन्ति |२५|
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Adhikarana 34 (25(4)) · Śloka 25
স্বাভাবিকাস্তু ক্ষুত্পিপাসাজরামৃত্যুনিদ্রাপ্রকৃ(ভৃ)তযঃ ||২৫||
स्वाभाविकास्तु क्षुत्पिपासाजरामृत्युनिद्राप्रकृ(भृ)तयः ||२५||
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Adhikarana 35 (26) · Śloka 26
ত এতে মনঃশরীরাধিষ্ঠানাঃ ||২৬||
त एते मनःशरीराधिष्ठानाः ||२६||
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Adhikarana 36 (27) · Śloka 27
তেষাং সংশোধনসংশমনাহারাচারাঃ সম্যক্প্রযুক্তা নিগ্রহহেতবঃ ||২৭||
तेषां संशोधनसंशमनाहाराचाराः सम्यक्प्रयुक्ता निग्रहहेतवः ||२७||
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Adhikarana 37 (28) · Śloka 28
প্রাণিনাং পুনর্মূলমাহারো বলবর্ণৌজসাং চ | স ষট্সু রসেষ্বাযত্তঃ; রসাঃ পুনর্দ্রব্যাশ্রযাঃ; দ্রব্যাণি পুনরোষধযঃ | তাস্তু দ্বিবিধাঃ- স্থাবরা জঙ্গমাশ্চ ||২৮||
प्राणिनां पुनर्मूलमाहारो बलवर्णौजसां च | स षट्सु रसेष्वायत्तः; रसाः पुनर्द्रव्याश्रयाः; द्रव्याणि पुनरोषधयः | तास्तु द्विविधाः- स्थावरा जङ्गमाश्च ||२८||
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Adhikarana 38 (29) · Śloka 29
তাসাং স্থাবরাশ্চতুর্বিধাঃ- বনস্পতযো, বৃক্ষা, বীরুধ, ওষধয ইতি | তাসু, অপুষ্পাঃ ফলবন্তো বনস্পতযঃ, পুষ্পফলবন্তো বৃক্ষাঃ, প্রতানবত্যঃ স্তম্বিন্যশ্চ বীরুধঃ, ফলপাকনিষ্ঠা ওষধয ইতি ||২৯||
तासां स्थावराश्चतुर्विधाः- वनस्पतयो, वृक्षा, वीरुध, ओषधय इति | तासु, अपुष्पाः फलवन्तो वनस्पतयः, पुष्पफलवन्तो वृक्षाः, प्रतानवत्यः स्तम्बिन्यश्च वीरुधः, फलपाकनिष्ठा ओषधय इति ||२९||
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Adhikarana 39 (30) · Śloka 30
জঙ্গমা খল্বপি চতুর্বিধাঃ- জরাযুজাণ্ডজস্বেদজোদ্ভিজ্জাঃ | তত্র পশুমনুষ্যব্যালাদযো জরাযুজাঃ, খগসর্পসরীসৃপপ্রভৃতযোঽণ্ডজাঃ, কৃমিকীটপিপীলিকাপ্রভৃতযঃ স্বেদজাঃ, ইন্দ্রগোপমণ্ডূকপ্রভৃতয উদ্ভিজ্জাঃ ||৩০||
जङ्गमा खल्वपि चतुर्विधाः- जरायुजाण्डजस्वेदजोद्भिज्जाः | तत्र पशुमनुष्यव्यालादयो जरायुजाः, खगसर्पसरीसृपप्रभृतयोऽण्डजाः, कृमिकीटपिपीलिकाप्रभृतयः स्वेदजाः, इन्द्रगोपमण्डूकप्रभृतय उद्भिज्जाः ||३०||
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Adhikarana 40 (31) · Śloka 31
তত্র স্থাবরেভ্যস্ত্বক্পত্রপুষ্পফলমূলকন্দনির্যাসস্বরসাদযঃ প্রযোজনবন্তঃ; জঙ্গমেভ্যশ্চর্মনখরোমরুধিরাদযঃ ||৩১||
तत्र स्थावरेभ्यस्त्वक्पत्रपुष्पफलमूलकन्दनिर्यासस्वरसादयः प्रयोजनवन्तः; जङ्गमेभ्यश्चर्मनखरोमरुधिरादयः ||३१||
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Adhikarana 41 (32) · Śloka 32
পার্থিবাঃ সুবর্ণরজতমণিমুক্তামনঃশিলামৃত্কপালাদযঃ ||৩২||
पार्थिवाः सुवर्णरजतमणिमुक्तामनःशिलामृत्कपालादयः ||३२||
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Adhikarana 42 (33) · Śloka 33
কালকৃতাঃপ্রবাতনিবাতাতপচ্ছাযাজ্যোত্স্নাতমঃশীতোষ্ণবর্ষাহোরাত্রপক্ষমাসর্ত্বযনাদযঃ সংবত্সরবিশেষাঃ ||৩৩||
कालकृताःप्रवातनिवातातपच्छायाज्योत्स्नातमःशीतोष्णवर्षाहोरात्रपक्षमासर्त्वयनादयः संवत्सरविशेषाः ||३३||
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Adhikarana 43 (34) · Śloka 34
ত এতে স্বভাবত এব দোষাণাং সঞ্চযপ্রকোপপ্রশমপ্রতীকারহেতবঃ প্রযোজনবন্তশ্চ ||৩৪||
त एते स्वभावत एव दोषाणां सञ्चयप्रकोपप्रशमप्रतीकारहेतवः प्रयोजनवन्तश्च ||३४||
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Adhikarana 44 (35) · Śloka 35
ভবন্তি চাত্র শ্লোকাঃ- শারীরাণাং বিকারাণামেষ বর্গশ্চতুর্বিধঃ | প্রকোপে প্রশমে চৈব হেতুরুক্তশ্চিকিত্সকৈঃ ||৩৫||
भवन्ति चात्र श्लोकाः- शारीराणां विकाराणामेष वर्गश्चतुर्विधः | प्रकोपे प्रशमे चैव हेतुरुक्तश्चिकित्सकैः ||३५||
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Adhikarana 45 (36-37) · Śloka 37
আগন্তবস্তু যে রোগাস্তে দ্বিধা নিপতন্তি হি | মনস্যন্যে শরীরেঽন্যে তেষাং তু দ্বিবিধা ক্রিযা ||৩৬|| শরীরপতিতানাং তু শারীরবদুপক্রমঃ | মানসানাং তু শব্দাদিরিষ্টো বর্গঃ সুখাবহঃ ||৩৭||
आगन्तवस्तु ये रोगास्ते द्विधा निपतन्ति हि | मनस्यन्ये शरीरेऽन्ये तेषां तु द्विविधा क्रिया ||३६|| शरीरपतितानां तु शारीरवदुपक्रमः | मानसानां तु शब्दादिरिष्टो वर्गः सुखावहः ||३७||
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Adhikarana 46 (38) · Śloka 38
এবমেতত্ পুরুষো ব্যাধিরৌষধং ক্রিযাকাল ইতি চতুষ্টযং সমাসেন ব্যাখ্যাতম্ | তত্র পুরুষগ্রহণাত্ তত্সম্ভবদ্রব্যসমূহো ভূতাদিরুক্তস্তদঙ্গপ্রত্যঙ্গবিকল্পাশ্চ ত্বঙ্মাংসাস্থিসিরাস্নাযুপ্রভৃতযঃ, ব্যাধিগ্রহণাদ্বাতপিত্তকফশোণিতসন্নিপাতবৈষম্যনিমিত্তাঃ সর্ব এব ব্যাধযো ব্যাখ্যাতাঃ, ঔষধগ্রহণাদ্দ্রব্যরসগুণবীর্যবিপাকানামাদেশঃ, ক্রিযাগ্রহণাত্ স্নেহাদীনি চ্ছেদ্যাদীনি চ কর্মাণি ব্যাখ্যাতানি, কালগ্রহণাত্ সর্বক্রিযাকালানামাদেশঃ ||৩৮||
एवमेतत् पुरुषो व्याधिरौषधं क्रियाकाल इति चतुष्टयं समासेन व्याख्यातम् | तत्र पुरुषग्रहणात् तत्सम्भवद्रव्यसमूहो भूतादिरुक्तस्तदङ्गप्रत्यङ्गविकल्पाश्च त्वङ्मांसास्थिसिरास्नायुप्रभृतयः, व्याधिग्रहणाद्वातपित्तकफशोणितसन्निपातवैषम्यनिमित्ताः सर्व एव व्याधयो व्याख्याताः, औषधग्रहणाद्द्रव्यरसगुणवीर्यविपाकानामादेशः, क्रियाग्रहणात् स्नेहादीनि च्छेद्यादीनि च कर्माणि व्याख्यातानि, कालग्रहणात् सर्वक्रियाकालानामादेशः ||३८||
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Adhikarana 47 (39) · Śloka 39
ভবতি চাত্র- বীজং চিকিত্সিতস্যৈতত্সমাসেন প্রকীর্তিতম্ | সবিংশমধ্যাযশতমস্য ব্যাখ্যা ভবিষ্যতি ||৩৯||
भवति चात्र- बीजं चिकित्सितस्यैतत्समासेन प्रकीर्तितम् | सविंशमध्यायशतमस्य व्याख्या भविष्यति ||३९||
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Adhikarana 48 (40) · Śloka 40
তচ্চ সবিংশমধ্যাযশতং পঞ্চসু স্থানেষু | তত্র সূত্রনিদানশারীরচিকিত্সিতকল্পেষ্বর্থবশাত্ সংবিভজ্যোত্তরে তন্ত্রে শেষানর্থান্ বক্ষ্যামঃ ||৪০||
तच्च सविंशमध्यायशतं पञ्चसु स्थानेषु | तत्र सूत्रनिदानशारीरचिकित्सितकल्पेष्वर्थवशात् संविभज्योत्तरे तन्त्रे शेषानर्थान् वक्ष्यामः ||४०||
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Adhikarana 49 (41) · Śloka 41
ভবতি চাত্র- স্বযম্ভুবা প্রোক্তমিদং সনাতনং পঠেদ্ধি যঃ কাশিপতিপ্রকাশিতম্ | স পুণ্যকর্মা ভুবি পূজিতো নৃপৈরসুক্ষযে শক্রসলোকতাং ব্রজেত্ ||৪১||
भवति चात्र- स्वयम्भुवा प्रोक्तमिदं सनातनं पठेद्धि यः काशिपतिप्रकाशितम् | स पुण्यकर्मा भुवि पूजितो नृपैरसुक्षये शक्रसलोकतां व्रजेत् ||४१||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 1
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং সূত্রস্থানে বেদোত্পত্তির্নাম প্রথমোঽধ্যাযঃ ||১||
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने वेदोत्पत्तिर्नाम प्रथमोऽध्यायः ||१||
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