Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো ব্রণপ্রশ্নমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातो व्रणप्रश्नमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো ব্রণপ্রশ্নমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातो व्रणप्रश्नमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
বাতপিত্তশ্লেষ্মাণ এব দেহসম্ভবহেতবঃ | তৈরেবাব্যাপন্নৈরধোমধ্যোর্ধ্বসন্নিবিষ্টৈঃ শরীরমিদং ধার্যতেঽগারমিব স্থূণাভিস্তিসৃভিঃ অতশ্চ ত্রিস্থূণমাহুরেকে | ত এব চ ব্যাপন্নাঃ প্রলযহেতবঃ | তদেভিরেব শোণিতচতুর্থৈঃ সম্ভবস্থিতিপ্রলযেষ্বপ্যবিরহিতং শরীরং ভবতি ||৩||
वातपित्तश्लेष्माण एव देहसम्भवहेतवः | तैरेवाव्यापन्नैरधोमध्योर्ध्वसन्निविष्टैः शरीरमिदं धार्यतेऽगारमिव स्थूणाभिस्तिसृभिः अतश्च त्रिस्थूणमाहुरेके | त एव च व्यापन्नाः प्रलयहेतवः | तदेभिरेव शोणितचतुर्थैः सम्भवस्थितिप्रलयेष्वप्यविरहितं शरीरं भवति ||३||
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
ভবতি চাত্র- নর্তে দেহঃ কফাদস্তি ন পিত্তান্ন চ মারুতাত্ | শোণিতাদপি বা নিত্যং দেহ এতৈস্তু ধার্যতে ||৪||
भवति चात्र- नर्ते देहः कफादस्ति न पित्तान्न च मारुतात् | शोणितादपि वा नित्यं देह एतैस्तु धार्यते ||४||
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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5
তত্র ‘বা’ গতিগন্ধনযোঃ, ইতি ধাতুঃ, ‘তপ’ সন্তাপে, ‘শ্লিষ’ আলিঙ্গনে, এতেষাং কৃদ্বিহিতৈঃ প্রত্যযৈর্বাতঃ পিত্তং শ্লেষ্মেতি চ রূপাণি ভবন্তি ||৫||
तत्र ‘वा’ गतिगन्धनयोः, इति धातुः, ‘तप’ सन्तापे, ‘श्लिष’ आलिङ्गने, एतेषां कृद्विहितैः प्रत्ययैर्वातः पित्तं श्लेष्मेति च रूपाणि भवन्ति ||५||
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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6
দোষস্থানান্যত ঊর্ধ্বং বক্ষ্যামঃ- তত্র সমাসেন বাতঃ শ্রোণিগুদসংশ্রযঃ; তদুপর্যধো নাভেঃ পক্বাশযঃ, পক্বামাশযমধ্যং পিত্তস্য; আমাশযঃ শ্লেষ্মণঃ ||৬||
दोषस्थानान्यत ऊर्ध्वं वक्ष्यामः- तत्र समासेन वातः श्रोणिगुदसंश्रयः; तदुपर्यधो नाभेः पक्वाशयः, पक्वामाशयमध्यं पित्तस्य; आमाशयः श्लेष्मणः ||६||
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Adhikarana 6 (7) · Śloka 7
অতঃ পরং পঞ্চধা বিভজ্যন্তে | তত্র বাতস্য বাতব্যাধৌ বক্ষ্যামঃ; পিত্তস্য যকৃত্প্লীহানৌ হৃদযং দৃষ্টিস্ত্বক্ পূর্বোক্তং চ; শ্লেষ্মণ উরঃ শিরঃ কণ্ঠো জিহ্বামূলং সন্ধয ইতি পূর্বোক্তং চ; এতানি খলু দোষাণাং স্থানান্যব্যাপন্নানাম্ ||৭||
अतः परं पञ्चधा विभज्यन्ते | तत्र वातस्य वातव्याधौ वक्ष्यामः; पित्तस्य यकृत्प्लीहानौ हृदयं दृष्टिस्त्वक् पूर्वोक्तं च; श्लेष्मण उरः शिरः कण्ठो जिह्वामूलं सन्धय इति पूर्वोक्तं च; एतानि खलु दोषाणां स्थानान्यव्यापन्नानाम् ||७||
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Adhikarana 7 (8) · Śloka 8
ভবতি চাত্র- বিসর্গোদানবিক্ষেপৈঃ সোমসূর্যানিলা যথা | ধারযন্তি জগদ্দেহং কফপিত্তানিলাস্তথা ||৮||
भवति चात्र- विसर्गोदानविक्षेपैः सोमसूर्यानिला यथा | धारयन्ति जगद्देहं कफपित्तानिलास्तथा ||८||
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Adhikarana 8 (9) · Śloka 9
তত্র জিজ্ঞাস্যং কিং পিত্তব্যতিরেকাদন্যোঽগ্নিঃ? আহোস্বিত্ পিত্তমেবাগ্নিরিতি? | অত্রোচ্যতে- ন খলু পিত্তব্যতিরেকাদন্যোঽগ্নিরুপলভ্যতে, আগ্নেযত্বাত্ পিত্তে দহনপচনাদিষ্বভিপ্রবর্তমানেঽগ্নিবদুপচারঃ ক্রিযতেঽন্তরগ্নিরিতি; ক্ষীণে হ্যগ্নিগুণে তত্সমানদ্রব্যোপযোগাত্ , অতিবৃদ্ধে শীতক্রিযোপযোগাত্ , আগমাচ্চ পশ্যামো ন খলু পিত্তব্যতিরেকাদন্যোঽগ্নিরিতি ||৯||
तत्र जिज्ञास्यं किं पित्तव्यतिरेकादन्योऽग्निः? आहोस्वित् पित्तमेवाग्निरिति? | अत्रोच्यते- न खलु पित्तव्यतिरेकादन्योऽग्निरुपलभ्यते, आग्नेयत्वात् पित्ते दहनपचनादिष्वभिप्रवर्तमानेऽग्निवदुपचारः क्रियतेऽन्तरग्निरिति; क्षीणे ह्यग्निगुणे तत्समानद्रव्योपयोगात् , अतिवृद्धे शीतक्रियोपयोगात् , आगमाच्च पश्यामो न खलु पित्तव्यतिरेकादन्योऽग्निरिति ||९||
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Adhikarana 9 (10) · Śloka 10
তচ্চাদৃষ্টহেতুকেন বিশেষেণ পক্বামাশযমধ্যস্থং পিত্তং চতুর্বিধমন্নপানং পচতি, বিবেচযতি চ দোষরসমূত্রপুরীষাণি; তত্রস্থমেব চাত্মশক্ত্যা শেষাণাং পিত্তস্থানানাং শরীরস্য চাগ্নিকর্মণাঽনুগ্রহং করোতি, তস্মিন্ পিত্তে পাচকোঽগ্নিরিতি সঞ্জ্ঞা; যত্তু যকৃত্প্লীহ্নোঃ পিত্তং তস্মিন্ রঞ্জকোঽগ্নিরিতি সঞ্জ্ঞা, স রসস্য রাগকৃদুক্তঃ; যত্ পিত্তং হৃদযস্থং তস্মিন্ সাধকোঽগ্নিরিতি সঞ্জ্ঞা, সোঽভিপ্রার্থিতমনোরথসাধনকৃদুক্তঃ; যদ্দৃষ্ট্যাং পিত্তং তস্মিন্নালোচকোঽগ্নিরিতি সঞ্জ্ঞা, স রূপগ্রহণাঽধিকৃতঃ; যত্তু ত্বচি পিত্তং তস্মিন্ ভ্রাজকোঽগ্নিরিতি সঞ্জ্ঞা, সোঽভ্যঙ্গপরিষেকাবগাহালেপনাদীনাং ক্রিযাদ্রব্যাণাং পক্তা ছাযানাং চ প্রকাশকঃ ||১০||
तच्चादृष्टहेतुकेन विशेषेण पक्वामाशयमध्यस्थं पित्तं चतुर्विधमन्नपानं पचति, विवेचयति च दोषरसमूत्रपुरीषाणि; तत्रस्थमेव चात्मशक्त्या शेषाणां पित्तस्थानानां शरीरस्य चाग्निकर्मणाऽनुग्रहं करोति, तस्मिन् पित्ते पाचकोऽग्निरिति सञ्ज्ञा; यत्तु यकृत्प्लीह्नोः पित्तं तस्मिन् रञ्जकोऽग्निरिति सञ्ज्ञा, स रसस्य रागकृदुक्तः; यत् पित्तं हृदयस्थं तस्मिन् साधकोऽग्निरिति सञ्ज्ञा, सोऽभिप्रार्थितमनोरथसाधनकृदुक्तः; यद्दृष्ट्यां पित्तं तस्मिन्नालोचकोऽग्निरिति सञ्ज्ञा, स रूपग्रहणाऽधिकृतः; यत्तु त्वचि पित्तं तस्मिन् भ्राजकोऽग्निरिति सञ्ज्ञा, सोऽभ्यङ्गपरिषेकावगाहालेपनादीनां क्रियाद्रव्याणां पक्ता छायानां च प्रकाशकः ||१०||
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Adhikarana 10 (11) · Śloka 11
ভবতি চাত্র- পিত্তং তীক্ষ্ণং দ্রবং পূতি নীলং পীতং তথৈব চ | উষ্ণং কটুরসং চৈব বিদগ্ধং চাম্লমেব চ ||১১||
भवति चात्र- पित्तं तीक्ष्णं द्रवं पूति नीलं पीतं तथैव च | उष्णं कटुरसं चैव विदग्धं चाम्लमेव च ||११||
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Adhikarana 11 (12) · Śloka 12
অত ঊর্ধ্বং শ্লেষ্মস্থানান্যনুব্যাখ্যাস্যামঃ | তত্র, আমাশযঃ পিত্তাশযস্যোপরিষ্টাত্ তত্প্রত্যনীকত্বাদূর্ধ্বগতিত্বাত্তেজসঃ, চন্দ্র ইব আদিত্যস্য , চতুর্বিধস্যাহারস্যাধারঃ; স চ তত্রৌদকৈর্গুণৈরাহারঃ প্রক্লিন্নো ভিন্নসঙ্ঘাতঃ সুখজরো ভবতি ||১২||
अत ऊर्ध्वं श्लेष्मस्थानान्यनुव्याख्यास्यामः | तत्र, आमाशयः पित्ताशयस्योपरिष्टात् तत्प्रत्यनीकत्वादूर्ध्वगतित्वात्तेजसः, चन्द्र इव आदित्यस्य , चतुर्विधस्याहारस्याधारः; स च तत्रौदकैर्गुणैराहारः प्रक्लिन्नो भिन्नसङ्घातः सुखजरो भवति ||१२||
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Adhikarana 12 (13) · Śloka 13
মাধুর্যাত্ পিচ্ছিলত্বাচ্চ প্রক্লেদিত্বাত্তথৈব চ | আমাশযে সম্ভবতি শ্লেষ্মা মধুরশীতলঃ ||১৩||
माधुर्यात् पिच्छिलत्वाच्च प्रक्लेदित्वात्तथैव च | आमाशये सम्भवति श्लेष्मा मधुरशीतलः ||१३||
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Adhikarana 13 (14) · Śloka 14
স তত্রস্থ এব স্বশক্ত্যা শেষাণাং শ্লেষ্মস্থানানাং শরীরস্য চোদককর্মণাঽনুগ্রহং করোতি; উরঃস্থস্ত্রিকসন্ধারণমাত্মবীর্যেণান্নরসসহিতেন হৃদযাবলম্বনং করোতি; জিহ্বামূলকণ্ঠস্থো জিহ্বেন্দ্রিযস্য সৌম্যত্বাত্ সম্যগ্রসজ্ঞানে বর্ততে; শিরঃস্থঃ স্নেহসন্তর্পণাধিকৃতত্বাদিন্দ্রিযাণামাত্মবীর্যেণানুগ্রহং করোত্; সন্ধিস্থঃ শ্লেষ্মা সর্বসন্ধিসংশ্লেষাত্ সর্বসন্ধ্যনুগ্রহং করোতি ||১৪||
स तत्रस्थ एव स्वशक्त्या शेषाणां श्लेष्मस्थानानां शरीरस्य चोदककर्मणाऽनुग्रहं करोति; उरःस्थस्त्रिकसन्धारणमात्मवीर्येणान्नरससहितेन हृदयावलम्बनं करोति; जिह्वामूलकण्ठस्थो जिह्वेन्द्रियस्य सौम्यत्वात् सम्यग्रसज्ञाने वर्तते; शिरःस्थः स्नेहसन्तर्पणाधिकृतत्वादिन्द्रियाणामात्मवीर्येणानुग्रहं करोत्; सन्धिस्थः श्लेष्मा सर्वसन्धिसंश्लेषात् सर्वसन्ध्यनुग्रहं करोति ||१४||
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Adhikarana 14 (15) · Śloka 15
ভবতি চাত্র- শ্লেষ্মা শ্বেতো গুরুঃ স্নিগ্ধঃ পিচ্ছিলঃ শীত এব চ | মধুরস্ত্ববিদগ্ধঃ স্যাদ্বিদগ্ধো লবণ স্মৃতঃ ||১৫||
भवति चात्र- श्लेष्मा श्वेतो गुरुः स्निग्धः पिच्छिलः शीत एव च | मधुरस्त्वविदग्धः स्याद्विदग्धो लवण स्मृतः ||१५||
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Adhikarana 15 (16) · Śloka 16
শোণিতস্য স্থানং যকৃত্প্লীহানৌ, তচ্চ প্রাগভিহিতং; তত্রস্থমেব শেষাণাং শোণিতস্থানানামনুগ্রহং করোতি ||১৬||
शोणितस्य स्थानं यकृत्प्लीहानौ, तच्च प्रागभिहितं; तत्रस्थमेव शेषाणां शोणितस्थानानामनुग्रहं करोति ||१६||
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Adhikarana 16 (17) · Śloka 17
ভবতি চাত্র- অনুষ্ণশীতং মধুরং স্নিগ্ধং রক্তং চ বর্ণতঃ | শোণিতং গুরু বিস্রং স্যাদ্বিদাহশ্চাস্য পিত্তবত্ ||১৭||
भवति चात्र- अनुष्णशीतं मधुरं स्निग्धं रक्तं च वर्णतः | शोणितं गुरु विस्रं स्याद्विदाहश्चास्य पित्तवत् ||१७||
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Adhikarana 17 (18) · Śloka 18
এতানি খলু দোষস্থানানি; এষু সঞ্চীযন্তে দোষাঃ | প্রাক্ সঞ্চযহেতুরুক্তঃ | তত্র সঞ্চিতানাং খলু দোষাণাং স্তব্ধপূর্ণকোষ্ঠতা পীতাবভাসতা মন্দোষ্মতা চাঙ্গানাং গৌরবমালস্যং চযকারণবিদ্বেষশ্চেতি লিঙ্গানি ভবন্তি | তত্র প্রথমঃ ক্রিযাকালঃ ||১৮||
एतानि खलु दोषस्थानानि; एषु सञ्चीयन्ते दोषाः | प्राक् सञ्चयहेतुरुक्तः | तत्र सञ्चितानां खलु दोषाणां स्तब्धपूर्णकोष्ठता पीतावभासता मन्दोष्मता चाङ्गानां गौरवमालस्यं चयकारणविद्वेषश्चेति लिङ्गानि भवन्ति | तत्र प्रथमः क्रियाकालः ||१८||
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Adhikarana 18 (19) · Śloka 19
অত ঊর্ধ্বং প্রকোপণানি বক্ষ্যামঃ | তত্র বলবদ্বিগ্রহাতিব্যাযামব্যবাযাধ্যযনপ্রপতনপ্রধাবনপ্রপীডনাভিঘাতলঙ্ঘনপ্লবনতরণরাত্রিজাগরণভারহরণ- গজতুরগরথপদাতিচর্যাকটুকষাযতিক্তরূক্ষলঘুশীতবীর্যশুষ্কশাকবল্লূরবরকোদ্দালককোরদূষশ্যামাকনীবার- মুদ্গমসূরাঢকীহরেণুকলাযনিষ্পাবানশনবিষমাশনাধ্যশনবাতমূত্রপুরীষশুক্রচ্ছর্দিক্ষবথূদ্গারবাষ্পবেগবিঘাতাদিভির্বিশেষৈর্বাযুঃ প্রকোপমাপদ্যতে ||১৯||
अत ऊर्ध्वं प्रकोपणानि वक्ष्यामः | तत्र बलवद्विग्रहातिव्यायामव्यवायाध्ययनप्रपतनप्रधावनप्रपीडनाभिघातलङ्घनप्लवनतरणरात्रिजागरणभारहरण- गजतुरगरथपदातिचर्याकटुकषायतिक्तरूक्षलघुशीतवीर्यशुष्कशाकवल्लूरवरकोद्दालककोरदूषश्यामाकनीवार- मुद्गमसूराढकीहरेणुकलायनिष्पावानशनविषमाशनाध्यशनवातमूत्रपुरीषशुक्रच्छर्दिक्षवथूद्गारबाष्पवेगविघातादिभिर्विशेषैर्वायुः प्रकोपमापद्यते ||१९||
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Adhikarana 19 (20) · Śloka 20
স শীতাভ্রপ্রবাতেষু ঘর্মান্তে চ বিশেষতঃ | প্রত্যূষস্যপরাহ্ণে তু জীর্ণেঽন্নে চ প্রকুপ্যতি ||২০||
स शीताभ्रप्रवातेषु घर्मान्ते च विशेषतः | प्रत्यूषस्यपराह्णे तु जीर्णेऽन्ने च प्रकुप्यति ||२०||
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Adhikarana 20 (21) · Śloka 21
ক্রোধশোকভযাযাসোপবাসবিদগ্ধমৈথুনোপগমনকট্বম্ললবণ- তীক্ষ্ণোষ্ণলঘুবিদাহিতিলতৈলপিণ্যাককুলত্থসর্ষপাতসীহরিতকশাক- গোধামত্স্যাজাবিকমাংসদধিতক্রকূর্চিকামস্তুসৌবীরকসুরাবিকারাম্লফলকট্বরপ্রভৃতিভিঃ পিত্তং প্রকোপমাপদ্যতে ||২১||
क्रोधशोकभयायासोपवासविदग्धमैथुनोपगमनकट्वम्ललवण- तीक्ष्णोष्णलघुविदाहितिलतैलपिण्याककुलत्थसर्षपातसीहरितकशाक- गोधामत्स्याजाविकमांसदधितक्रकूर्चिकामस्तुसौवीरकसुराविकाराम्लफलकट्वरप्रभृतिभिः पित्तं प्रकोपमापद्यते ||२१||
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Adhikarana 21 (22) · Śloka 22
তদুষ্ণৈরুষ্ণকালে চ ঘনান্তে চ বিশেষতঃ | মধ্যাহ্নে চার্ধরাত্রে চ জীর্যত্যন্নে চ কুপ্যতি ||২২||
तदुष्णैरुष्णकाले च घनान्ते च विशेषतः | मध्याह्ने चार्धरात्रे च जीर्यत्यन्ने च कुप्यति ||२२||
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Adhikarana 22 (23) · Śloka 23
দিবাস্বপ্নাব্যাযামালস্যমধুরাম্ললবণশীতস্নিগ্ধগুরুপিচ্ছিলাভিষ্যন্দিহাযনকযবকনৈষধেত্কট- মাষমহামাষগোধূমতিলপিষ্টবিকৃতিদধিদুগ্ধকৃশরাপাযসেক্ষুবিকারানূপৌদকমাংসবসাবিসমৃণাল- কসেরুকশৃঙ্গাটকমধুরবল্লীফলসমশনাধ্যশনপ্রভৃতিভিঃ শ্লেষ্মা প্রকোপমাপদ্যতে ||২৩||
दिवास्वप्नाव्यायामालस्यमधुराम्ललवणशीतस्निग्धगुरुपिच्छिलाभिष्यन्दिहायनकयवकनैषधेत्कट- माषमहामाषगोधूमतिलपिष्टविकृतिदधिदुग्धकृशरापायसेक्षुविकारानूपौदकमांसवसाबिसमृणाल- कसेरुकशृङ्गाटकमधुरवल्लीफलसमशनाध्यशनप्रभृतिभिः श्लेष्मा प्रकोपमापद्यते ||२३||
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Adhikarana 23 (24) · Śloka 24
স শীতৈঃ শীতকালে চ বসন্তে চ বিশেষতঃ | পূর্বাহ্ণে চ প্রদোষে চ ভুক্তমাত্রে প্রকুপ্যতি ||২৪||
स शीतैः शीतकाले च वसन्ते च विशेषतः | पूर्वाह्णे च प्रदोषे च भुक्तमात्रे प्रकुप्यति ||२४||
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Adhikarana 24 (25) · Śloka 25
পিত্তপ্রকোপণৈরেব চাভীক্ষ্ণং দ্রবস্নিগ্ধগুরুভিরাহারৈর্দিবাস্বপ্নক্রোধানলাতপশ্রমাভিঘাতাজীর্ণবিরুদ্ধাধ্যশনাদিভির্বিশেষৈরসৃক্ প্রকোপমাপদ্যতে ||২৫||
पित्तप्रकोपणैरेव चाभीक्ष्णं द्रवस्निग्धगुरुभिराहारैर्दिवास्वप्नक्रोधानलातपश्रमाभिघाताजीर्णविरुद्धाध्यशनादिभिर्विशेषैरसृक् प्रकोपमापद्यते ||२५||
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Adhikarana 25 (26) · Śloka 26
যস্মাদ্রক্তং বিনা দোষৈর্ন কদাচিত্ প্রকুপ্যতি | তস্মাত্তস্য যথাদোষং কালং বিদ্যত্ প্রকোপণে ||২৬||
यस्माद्रक्तं विना दोषैर्न कदाचित् प्रकुप्यति | तस्मात्तस्य यथादोषं कालं विद्यत् प्रकोपणे ||२६||
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Adhikarana 26 (27) · Śloka 27
তেষাং প্রকোপাত্ কোষ্ঠতোদসঞ্চরণাম্লীকাপিপাসাপরিদাহান্নদ্বেষহৃদযোত্ক্লেদাশ্চ জাযন্তে | তত্র দ্বিতীযঃ ক্রিযাকালঃ ||২৭||
तेषां प्रकोपात् कोष्ठतोदसञ्चरणाम्लीकापिपासापरिदाहान्नद्वेषहृदयोत्क्लेदाश्च जायन्ते | तत्र द्वितीयः क्रियाकालः ||२७||
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Adhikarana 27 (28) · Śloka 28
অত ঊর্ধ্বং প্রসরং বক্ষ্যামঃ- তেষামেভিরাতঙ্কবিশেষৈঃ প্রকুপিতানাং কিণ্বোদকপিষ্টসমবায ইবোদ্রিক্তানাং প্রসরো ভবতি | তেষাং বাযুর্গতিমত্ত্বাত্ প্রসরণহেতুঃ সত্যপ্যচৈতন্যে | স হি রজোভূযিষ্ঠঃ; রজশ্চ প্রবর্তকং সর্বভাবানাম্ | যথা- মহানুদকসঞ্চযোঽতিবৃদ্ধঃ সেতুমবদার্যাপরেণোদকেন ব্যামিশ্রঃ সর্বতঃ প্রধাবতি, এবং দোষাঃ কদাচিদেকশো দ্বিশঃ সমস্তাঃ শোণিতসহিতা বাঽনেকধা প্রসরন্তি | তদ্যথা- বাতঃ, পিত্তং, শ্লেষ্মা, শোণিতং, বাতপিত্তে, বাতশ্লেষ্মাণৌ, পিত্তশ্লেষ্মাণৌ, বাতশোণিতে, পিত্তশোণিতে, শ্লেষ্মশোণিতে, বাতপিত্তশোণিতানি, বাতশ্লেষ্মশোণিতানি, পিত্তশ্লেষ্মশোণিতানি, বাতপিত্তকফাঃ, বাতপিত্তকফশোণিতানীতি; এবং পঞ্চদশধা প্রসরন্তি ||২৮||
अत ऊर्ध्वं प्रसरं वक्ष्यामः- तेषामेभिरातङ्कविशेषैः प्रकुपितानां किण्वोदकपिष्टसमवाय इवोद्रिक्तानां प्रसरो भवति | तेषां वायुर्गतिमत्त्वात् प्रसरणहेतुः सत्यप्यचैतन्ये | स हि रजोभूयिष्ठः; रजश्च प्रवर्तकं सर्वभावानाम् | यथा- महानुदकसञ्चयोऽतिवृद्धः सेतुमवदार्यापरेणोदकेन व्यामिश्रः सर्वतः प्रधावति, एवं दोषाः कदाचिदेकशो द्विशः समस्ताः शोणितसहिता वाऽनेकधा प्रसरन्ति | तद्यथा- वातः, पित्तं, श्लेष्मा, शोणितं, वातपित्ते, वातश्लेष्माणौ, पित्तश्लेष्माणौ, वातशोणिते, पित्तशोणिते, श्लेष्मशोणिते, वातपित्तशोणितानि, वातश्लेष्मशोणितानि, पित्तश्लेष्मशोणितानि, वातपित्तकफाः, वातपित्तकफशोणितानीति; एवं पञ्चदशधा प्रसरन्ति ||२८||
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Adhikarana 28 (29-30) · Śloka 30
কৃত্স্নেঽর্ধেঽবযবে বাঽপি যত্রাঙ্গে কুপিতো ভৃশম্ | দোষো বিকারং নভসি মেঘবত্তত্র বর্ষতি ||২৯|| নাত্যর্থং কুপিতশ্চাপি লীনো মার্গেষু তিষ্ঠতি | নিষ্প্রত্যনীকঃ কালেন হেতুমাসাদ্য কুপ্যতি ||৩০||
कृत्स्नेऽर्धेऽवयवे वाऽपि यत्राङ्गे कुपितो भृशम् | दोषो विकारं नभसि मेघवत्तत्र वर्षति ||२९|| नात्यर्थं कुपितश्चापि लीनो मार्गेषु तिष्ठति | निष्प्रत्यनीकः कालेन हेतुमासाद्य कुप्यति ||३०||
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Adhikarana 29 (31) · Śloka 31
তত্র বাযোঃ পিত্তস্থানগতস্য পিত্তবত্ প্রতীকারঃ, পিত্তস্য চ কফস্থানগতস্য কফবত্, কফস্য চ বাতস্থানগতস্য বাতবত্ ; এষ ক্রিযাবিভাগঃ ||৩১||
तत्र वायोः पित्तस्थानगतस्य पित्तवत् प्रतीकारः, पित्तस्य च कफस्थानगतस्य कफवत्, कफस्य च वातस्थानगतस्य वातवत् ; एष क्रियाविभागः ||३१||
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Adhikarana 30 (32) · Śloka 32
এবং প্রকুপিতানাং প্রসরতাং বাযোর্বিমার্গগমনাটোপৌ, ওষচোষপরিদাহধূমাযনানি পিত্তস্য, অরোচকাবিপাকাঙ্গসাদাশ্ছর্দিশ্চেতি শ্লেষ্মণো লিঙ্গানি ভবন্তি; তত্র তৃতীযঃ ক্রিযাকালঃ ||৩২||
एवं प्रकुपितानां प्रसरतां वायोर्विमार्गगमनाटोपौ, ओषचोषपरिदाहधूमायनानि पित्तस्य, अरोचकाविपाकाङ्गसादाश्छर्दिश्चेति श्लेष्मणो लिङ्गानि भवन्ति; तत्र तृतीयः क्रियाकालः ||३२||
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Adhikarana 31 (33) · Śloka 33
অত ঊর্ধ্বং স্থানসংশ্রযং বক্ষ্যামঃ | এবং প্রকুপিতাতাংস্তাঞ্ শরীরপ্রদেশানাগম্য তাংস্তান্ ব্যাধীন্ জনযন্তি | তে যদোদরসন্নিবেশং কুর্বন্তি তদা গুল্ম বিদ্রধ্যুদরাগ্নিসঙ্গানাহবিসূচিকাতিসারপ্রভৃতীঞ্জনযন্তি; বস্তিগতাঃ প্রমেহাশ্মরীমূত্রাঘাতমূত্রদোষপ্রভৃতীন্; মেঢ্রগতা নিরুদ্ধপ্রকশোপদংশশূকদোষপ্রভৃতীন্; গুদগতা ভগন্দরার্শঃপ্রভৃতীন্; বৃষণগতা বৃদ্ধীঃ; ঊর্ধ্বজত্রুগতাস্তূর্ধ্বজান্; ত্বঙ্মংসশোণিতস্থাঃ ক্ষুদ্ররোগান্ কুষ্ঠানি বিসর্পাংশ্চ; মেদোগতা গ্রন্থ্যপচ্যর্বুদগলগণ্ডালজীপ্রভৃতীন্; অস্থিগতা বিদ্রধ্যনুশযীপ্রভৃতীন্; পাদগতাঃ শ্লীপদবাতশোণিতবাতকণ্টকপ্রভৃতীন্; সর্বাঙ্গগতা জ্বরসর্বাঙ্গরোগপ্রভৃতীন্; তেষামেবমভিসন্নিবিষ্টানাং পূর্বরূপপ্রাদুর্ভাবঃ ; তং প্রতিরোগং বক্ষ্যামঃ | তত্র পূর্বরূপগতেষু চতুর্থঃ ক্রিযাকালঃ ||৩৩||
अत ऊर्ध्वं स्थानसंश्रयं वक्ष्यामः | एवं प्रकुपितातांस्ताञ् शरीरप्रदेशानागम्य तांस्तान् व्याधीन् जनयन्ति | ते यदोदरसन्निवेशं कुर्वन्ति तदा गुल्म विद्रध्युदराग्निसङ्गानाहविसूचिकातिसारप्रभृतीञ्जनयन्ति; बस्तिगताः प्रमेहाश्मरीमूत्राघातमूत्रदोषप्रभृतीन्; मेढ्रगता निरुद्धप्रकशोपदंशशूकदोषप्रभृतीन्; गुदगता भगन्दरार्शःप्रभृतीन्; वृषणगता वृद्धीः; ऊर्ध्वजत्रुगतास्तूर्ध्वजान्; त्वङ्मंसशोणितस्थाः क्षुद्ररोगान् कुष्ठानि विसर्पांश्च; मेदोगता ग्रन्थ्यपच्यर्बुदगलगण्डालजीप्रभृतीन्; अस्थिगता विद्रध्यनुशयीप्रभृतीन्; पादगताः श्लीपदवातशोणितवातकण्टकप्रभृतीन्; सर्वाङ्गगता ज्वरसर्वाङ्गरोगप्रभृतीन्; तेषामेवमभिसन्निविष्टानां पूर्वरूपप्रादुर्भावः ; तं प्रतिरोगं वक्ष्यामः | तत्र पूर्वरूपगतेषु चतुर्थः क्रियाकालः ||३३||
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Adhikarana 32 (34) · Śloka 34
অত ঊর্ধ্বং ব্যাধের্দর্শনং বক্ষ্যামঃ- শোফার্বুদগ্রন্থিবিদ্রধিবিসর্পপ্রভৃতীনাং প্রব্যক্তলক্ষণতা জ্বরাতীসারপ্রভৃতীনাং চ | তত্র পঞ্চমঃ ক্রিযাকালঃ ||৩৪||
अत ऊर्ध्वं व्याधेर्दर्शनं वक्ष्यामः- शोफार्बुदग्रन्थिविद्रधिविसर्पप्रभृतीनां प्रव्यक्तलक्षणता ज्वरातीसारप्रभृतीनां च | तत्र पञ्चमः क्रियाकालः ||३४||
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Adhikarana 33 (35) · Śloka 35
অত ঊর্ধ্বমেতেষামবদীর্ণানাং ব্রণভাবমাপন্নানাং ষষ্ঠঃ ক্রিযাকালঃ, জ্বরাতিসারপ্রভৃতীনাং চ দীর্ঘকালানুবন্ধঃ | তত্রাপ্রতিক্রিযমাণেঽসাধ্যতামুপযান্তি ||৩৫||
अत ऊर्ध्वमेतेषामवदीर्णानां व्रणभावमापन्नानां षष्ठः क्रियाकालः, ज्वरातिसारप्रभृतीनां च दीर्घकालानुबन्धः | तत्राप्रतिक्रियमाणेऽसाध्यतामुपयान्ति ||३५||
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Adhikarana 34 (36) · Śloka 36
ভবন্তি চাত্র- সঞ্চযং চ প্রকোপং চ প্রসরং স্থানসংশ্রযম্ | ব্যক্তিং ভেদং চ যো বেত্তি দোষাণাং স ভবেদ্ভিষক্ ||৩৬||
भवन्ति चात्र- सञ्चयं च प्रकोपं च प्रसरं स्थानसंश्रयम् | व्यक्तिं भेदं च यो वेत्ति दोषाणां स भवेद्भिषक् ||३६||
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Adhikarana 35 (37) · Śloka 37
সঞ্চযেঽপহৃতা দোষা লভন্তে নোত্তরা গতীঃ | তে তূত্তরাসু গতিষু ভবন্তি বলবত্তরাঃ ||৩৭||
सञ्चयेऽपहृता दोषा लभन्ते नोत्तरा गतीः | ते तूत्तरासु गतिषु भवन्ति बलवत्तराः ||३७||
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Adhikarana 36 (38) · Śloka 38
সর্বৈর্ভাবৈস্ত্রিভির্বাঽপি দ্বাভ্যামেকেন বা পুনঃ | সংসর্গে কুপিতঃ ক্রুদ্ধং দোষং দোষোঽনুধাবতি ||৩৮||
सर्वैर्भावैस्त्रिभिर्वाऽपि द्वाभ्यामेकेन वा पुनः | संसर्गे कुपितः क्रुद्धं दोषं दोषोऽनुधावति ||३८||
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Adhikarana 37 (39) · Śloka 39
সংসর্গে যো গরীযান্ স্যাদুপক্রম্যঃ স বৈ ভবেত্ | শেষদোষাবিরোধেন সন্নিপাতে তথৈব চ ||৩৯||
संसर्गे यो गरीयान् स्यादुपक्रम्यः स वै भवेत् | शेषदोषाविरोधेन सन्निपाते तथैव च ||३९||
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Adhikarana 38 (40) · Śloka 40
বৃণোতি যস্মাদ্রূঢেঽপি ব্রণবস্তু ন নশ্যতি | আদেহধারণাত্তস্মাদ্ব্রণ ইত্যুচ্যতে বুধৈঃ ||৪০||
वृणोति यस्माद्रूढेऽपि व्रणवस्तु न नश्यति | आदेहधारणात्तस्माद्व्रण इत्युच्यते बुधैः ||४०||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 21
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং সূত্রস্থানে ব্রণপ্রশ্নাধ্যাযো নামৈকবিংশোধ্যাযঃ ||২১||
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने व्रणप्रश्नाध्यायो नामैकविंशोध्यायः ||२१||
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