Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো হিতাহিতীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातो हिताहितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো হিতাহিতীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातो हिताहितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
যদ্বাযোঃ পথ্যং তত্ পিত্তস্যাপথ্যমিত্যনেন হেতুনা ন কিঞ্চিদ্দ্রব্যমেকান্তেন হিতমহিতং বাঽস্তীতি কেচিদাচার্যা ব্রুবতে | তত্তু ন সম্যক্; ইহ খলু যস্মাদ্দ্রব্যাণি স্বভাবতঃ সংযোগতশ্চৈকান্তহিতান্যেকান্তাহিতানি হিতাহিতানি চ ভবন্তি ||৩||
यद्वायोः पथ्यं तत् पित्तस्यापथ्यमित्यनेन हेतुना न किञ्चिद्द्रव्यमेकान्तेन हितमहितं वाऽस्तीति केचिदाचार्या ब्रुवते | तत्तु न सम्यक्; इह खलु यस्माद्द्रव्याणि स्वभावतः संयोगतश्चैकान्तहितान्येकान्ताहितानि हिताहितानि च भवन्ति ||३||
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
তত্র ,একান্তহিতানি জাতিসাত্ম্যাত্ সলিলঘৃতদুগ্ধৌদনপ্রভৃতীনি; একান্তাহিতানি তু দহনপচনমারণাদিষু প্রবৃত্তান্যনলক্ষারবিষাদীনি, সংযোগাদপরাণি বিষতুল্যানি ভবন্তি; হিতাহিতানি তু যদ্বাযোঃ পথ্যং তত্ পিত্তস্যাপথ্যমিতি ||৪||
तत्र ,एकान्तहितानि जातिसात्म्यात् सलिलघृतदुग्धौदनप्रभृतीनि; एकान्ताहितानि तु दहनपचनमारणादिषु प्रवृत्तान्यनलक्षारविषादीनि, संयोगादपराणि विषतुल्यानि भवन्ति; हिताहितानि तु यद्वायोः पथ्यं तत् पित्तस्यापथ्यमिति ||४||
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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5
অতঃ সর্বপ্রাণিনামযমাহারার্থং বর্গ উপদিশ্যতে; তদ্যথা- রক্তশালিষষ্টিককঙ্গুক্রমুকুন্দকপাণ্ডুকপীতকপ্রমোদককালকাসনকপুষ্পককর্দমকশকুনাহৃতসুগন্ধককলম- নীবারকোদ্রবোদ্দালকশ্যামাকগোধূমযববৈণবৈণহরিণকুরঙ্গমৃগমাতৃকাশ্বদংষ্ট্রাকরালক্রকরকপোতলাবতিত্তিরিকপিঞ্জলবর্তীরবর্তিকা মুদ্গবনমুদ্গমকুষ্ঠকলাযমসূরমঙ্গল্যচণকহরেণ্বাঢকীসতীনাশ্চিল্লিবাস্তুকসুনিষণ্ণকজীবন্তীতণ্ডুলীযকমণ্ডূকপর্ণ্যঃ, গব্যং ঘৃতং, সৈন্ধবং, দাডিমামলকমিত্যেষ বর্গঃ সর্বপ্রাণিনাং সামান্যতঃ পথ্যতমঃ ||৫||
अतः सर्वप्राणिनामयमाहारार्थं वर्ग उपदिश्यते; तद्यथा- रक्तशालिषष्टिककङ्गुक्रमुकुन्दकपाण्डुकपीतकप्रमोदककालकासनकपुष्पककर्दमकशकुनाहृतसुगन्धककलम- नीवारकोद्रवोद्दालकश्यामाकगोधूमयववैणवैणहरिणकुरङ्गमृगमातृकाश्वदंष्ट्राकरालक्रकरकपोतलावतित्तिरिकपिञ्जलवर्तीरवर्तिका मुद्गवनमुद्गमकुष्ठकलायमसूरमङ्गल्यचणकहरेण्वाढकीसतीनाश्चिल्लिवास्तुकसुनिषण्णकजीवन्तीतण्डुलीयकमण्डूकपर्ण्यः, गव्यं घृतं, सैन्धवं, दाडिमामलकमित्येष वर्गः सर्वप्राणिनां सामान्यतः पथ्यतमः ||५||
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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6
তথা ব্রহ্মচর্যনিবাতশযনোষ্ণোদকস্নাননিশাস্বপ্নব্যাযামাশ্চৈকান্ততঃ পথ্যতমাঃ ||৬||
तथा ब्रह्मचर्यनिवातशयनोष्णोदकस्नाननिशास्वप्नव्यायामाश्चैकान्ततः पथ्यतमाः ||६||
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Adhikarana 6 (7) · Śloka 7
একান্তহিতান্যেকান্তাহিতানি তু প্রাগুপদিষ্টানি, হিতাহিতানি তু যদ্বাযোঃ পথ্যং তত্ পিত্তস্যাপথ্যমিতি ||৭||
एकान्तहितान्येकान्ताहितानि तु प्रागुपदिष्टानि, हिताहितानि तु यद्वायोः पथ्यं तत् पित्तस्यापथ्यमिति ||७||
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Adhikarana 7 (8) · Śloka 8
সংযোগতস্ত্বপরাণি বিষতুল্যানি ভবন্তি | তদ্যথা- বল্লীফলকবককরীরাম্লফললবণকুলত্থপিণ্যাকদধিতৈলবিরোহিপিষ্টশুষ্কশাকাজাবিকমাংসমদ্যজাম্ববচিলিচিমমত্স্যগোধাবরাহাংশ্চ নৈকধ্যমশ্নীযাত্ পযসা ||৮||
संयोगतस्त्वपराणि विषतुल्यानि भवन्ति | तद्यथा- वल्लीफलकवककरीराम्लफललवणकुलत्थपिण्याकदधितैलविरोहिपिष्टशुष्कशाकाजाविकमांसमद्यजाम्बवचिलिचिममत्स्यगोधावराहांश्च नैकध्यमश्नीयात् पयसा ||८||
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Adhikarana 8 (9) · Śloka 9
রোগং সাত্ম্যং চ দেশং চ কালং দেহং চ বুদ্ধিমান্ | অবেক্ষ্যাগ্ন্যাদিকান্ ভাবান্ রোগবৃত্তেঃ প্রযোজযেত্ ||৯||
रोगं सात्म्यं च देशं च कालं देहं च बुद्धिमान् | अवेक्ष्याग्न्यादिकान् भावान् रोगवृत्तेः प्रयोजयेत् ||९||
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Adhikarana 9 (10-12) · Śloka 12
অবস্থান্তরবাহুল্যাদ্রোগাদীনাং ব্যবস্থিতম্ | দ্রব্যং নেচ্ছন্তি ভিষজ ইচ্ছন্তি স্বস্থরক্ষণে ||১০|| দ্বযোরন্যতরাদানে বদন্তি বিষদুগ্ধযোঃ | দুগ্ধস্যৈকান্তহিততাং বিষমেকান্ততোঽহিতম্ ||১১|| এবং যুক্তরসেষ্বেষু দ্রব্যেষু সলিলাদিষু | একান্তহিততাং বিদ্ধি বত্স সুশ্রুত নান্যথা ||১২||
अवस्थान्तरबाहुल्याद्रोगादीनां व्यवस्थितम् | द्रव्यं नेच्छन्ति भिषज इच्छन्ति स्वस्थरक्षणे ||१०|| द्वयोरन्यतरादाने वदन्ति विषदुग्धयोः | दुग्धस्यैकान्तहिततां विषमेकान्ततोऽहितम् ||११|| एवं युक्तरसेष्वेषु द्रव्येषु सलिलादिषु | एकान्तहिततां विद्धि वत्स सुश्रुत नान्यथा ||१२||
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Adhikarana 10 (13) · Śloka 13
অতোঽন্যান্যপি সংযোগাদহিতানি বক্ষ্যামঃ- নববিরূঢধান্যৈর্বসামধুপযোগুডমাষৈর্বা গ্রাম্যানূপৌদকপিশিতাদীনি নাভ্যবহরেত্; ন পযোমধুভ্যাং রোহিণীশাকং জাতুকশাকং বাঽশ্নীযাত্, বলাকাং বারুণীকুল্মাষাভ্যাং, কাকমাচীং পিপ্পলীমরিচাভ্যাং; নাডীভঙ্গশাককুক্কুটদধীনি চ নৈকধ্যং; মধু চোষ্ণোদকানুপানং; পিত্তেন চামমাংসানি; সুরাকৃশরাপাযসাংশ্চ নৈকধ্যং; সৌবীরকেণ সহ তিলশষ্কুলীং; মত্স্যৈঃ সহেক্ষুবিকারান্; গুডেন কাকমাচীং, মধুনা মূলকং, গুডেন বারাহং মধুনা চ সহ বিরুদ্ধং; ক্ষীরেণ মূলকম্, আম্রজাম্ববশ্বাবিচ্ছূকরগোধাশ্চ; সর্বাংশ্চ মত্স্যান্ পযসা, বিশেষেণ চিলিচিমং; কদলীফলং তালফলেন পযসা দধ্না তক্রেণ বা; লকুচফলং পযসা দধ্না মাষসূপেন বা, প্রাক্ পযসঃ পযসোঽন্তে বা ||১৩||
अतोऽन्यान्यपि संयोगादहितानि वक्ष्यामः- नवविरूढधान्यैर्वसामधुपयोगुडमाषैर्वा ग्राम्यानूपौदकपिशितादीनि नाभ्यवहरेत्; न पयोमधुभ्यां रोहिणीशाकं जातुकशाकं वाऽश्नीयात्, बलाकां वारुणीकुल्माषाभ्यां, काकमाचीं पिप्पलीमरिचाभ्यां; नाडीभङ्गशाककुक्कुटदधीनि च नैकध्यं; मधु चोष्णोदकानुपानं; पित्तेन चाममांसानि; सुराकृशरापायसांश्च नैकध्यं; सौवीरकेण सह तिलशष्कुलीं; मत्स्यैः सहेक्षुविकारान्; गुडेन काकमाचीं, मधुना मूलकं, गुडेन वाराहं मधुना च सह विरुद्धं; क्षीरेण मूलकम्, आम्रजाम्बवश्वाविच्छूकरगोधाश्च; सर्वांश्च मत्स्यान् पयसा, विशेषेण चिलिचिमं; कदलीफलं तालफलेन पयसा दध्ना तक्रेण वा; लकुचफलं पयसा दध्ना माषसूपेन वा, प्राक् पयसः पयसोऽन्ते वा ||१३||
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Adhikarana 11 (14) · Śloka 14
অতঃ কর্মবিরুদ্ধান্ বক্ষ্যামঃ- কপোতান্ সর্ষপতৈলভৃষ্টান্নাদ্যাত্; কপিঞ্জলমযূরলাবতিত্তিরিগোধাশ্চৈরণ্ডদার্ব্যগ্নিসিদ্ধা এরণ্ডতৈলসিদ্ধা বা নাদ্যাত্; কাংস্যভাজনে দশরাত্রপর্যুষিতং সর্পিঃ; মধু চোষ্ণৈরুষ্ণে বা; মত্স্যপরিপচনে শৃঙ্গবেরপরিপচনে বা সিদ্ধাং কাকমাচীং; তিলকল্কসিদ্ধমুপোদিকাশাকং; নারিকেলেন বরাহবসাপরিভৃষ্টাং বলাকাং; ভাসমঙ্গারশূল্যং নাশ্নীযাদিতি ||১৪||
अतः कर्मविरुद्धान् वक्ष्यामः- कपोतान् सर्षपतैलभृष्टान्नाद्यात्; कपिञ्जलमयूरलावतित्तिरिगोधाश्चैरण्डदार्व्यग्निसिद्धा एरण्डतैलसिद्धा वा नाद्यात्; कांस्यभाजने दशरात्रपर्युषितं सर्पिः; मधु चोष्णैरुष्णे वा; मत्स्यपरिपचने शृङ्गवेरपरिपचने वा सिद्धां काकमाचीं; तिलकल्कसिद्धमुपोदिकाशाकं; नारिकेलेन वराहवसापरिभृष्टां बलाकां; भासमङ्गारशूल्यं नाश्नीयादिति ||१४||
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Adhikarana 12 (15) · Śloka 15
অতো মানবিরুদ্ধান্ বক্ষ্যামঃ- মধ্বম্বুনী মধুসর্পিষী মানতস্তুল্যে নাশ্নীযাত্; স্নেহৌ মধুস্নেহৌ জলস্নেহৌ বা বিশেষাদান্তরীক্ষোদকানুপানৌ ||১৫||
अतो मानविरुद्धान् वक्ष्यामः- मध्वम्बुनी मधुसर्पिषी मानतस्तुल्ये नाश्नीयात्; स्नेहौ मधुस्नेहौ जलस्नेहौ वा विशेषादान्तरीक्षोदकानुपानौ ||१५||
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Adhikarana 13 (16) · Śloka 16
অত ঊর্ধ্বং রসদ্বন্দ্বানি রসতো বীর্যতো বিপাকতশ্চ বিরুদ্ধানি বক্ষ্যামঃ- তত্র মধুরাম্লৌ রসবীর্যবিরুদ্ধৌ, মধুরলবণৌ চ, মধুরকটুকৌ চ সর্বতঃ, মধুরতিক্তৌ রসবিপাকাভ্যাং, মধুরকষাযৌ চ, অম্ললবণৌ রসতঃ, অম্লকটুকৌ রসবিপাকাভ্যাম্, অম্লতিক্তাবম্লকষাযৌ চ সর্বতঃ, লবণকটুকৌ রসবিপাকাভ্যাং, লবণতিক্তৌ লবণকষাযৌ চ সর্বতঃ, কটুতিক্তৌ রসবীর্যাভ্যাং কটুকষাযৌ চ, তিক্তকষাযৌ রসতঃ ||১৬||
अत ऊर्ध्वं रसद्वन्द्वानि रसतो वीर्यतो विपाकतश्च विरुद्धानि वक्ष्यामः- तत्र मधुराम्लौ रसवीर्यविरुद्धौ, मधुरलवणौ च, मधुरकटुकौ च सर्वतः, मधुरतिक्तौ रसविपाकाभ्यां, मधुरकषायौ च, अम्ललवणौ रसतः, अम्लकटुकौ रसविपाकाभ्याम्, अम्लतिक्तावम्लकषायौ च सर्वतः, लवणकटुकौ रसविपाकाभ्यां, लवणतिक्तौ लवणकषायौ च सर्वतः, कटुतिक्तौ रसवीर्याभ्यां कटुकषायौ च, तिक्तकषायौ रसतः ||१६||
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Adhikarana 14 (17) · Śloka 17
তরতমযোগযুক্তাংশ্চ ভাবানতিস্নিগ্ধানতিরূক্ষানত্যুষ্ণানতিশীতানিত্যেবমাদীন্ বিবর্জযেত্ ||১৭||
तरतमयोगयुक्तांश्च भावानतिस्निग्धानतिरूक्षानत्युष्णानतिशीतानित्येवमादीन् विवर्जयेत् ||१७||
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Adhikarana 15 (18) · Śloka 18
ভবন্তি চাত্র- বিরুদ্ধান্যেবমাদীনি বীর্যতো যানি কানিচিত্ | তান্যেকান্তাহিতান্যেব শেষং বিদ্যাদ্ধিতাহিতম্ ||১৮||
भवन्ति चात्र- विरुद्धान्येवमादीनि वीर्यतो यानि कानिचित् | तान्येकान्ताहितान्येव शेषं विद्याद्धिताहितम् ||१८||
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Adhikarana 16 (19) · Śloka 19
ব্যাধিমিন্দ্রিযদৌর্বল্যং মরণং চাধিগচ্ছতি | বিরুদ্ধরসবীর্যাণি ভুঞ্জানোঽনাত্মবান্নরঃ ||১৯||
व्याधिमिन्द्रियदौर्बल्यं मरणं चाधिगच्छति | विरुद्धरसवीर्याणि भुञ्जानोऽनात्मवान्नरः ||१९||
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Adhikarana 17 (20) · Śloka 20
যত্কিঞ্চিদ্দোষমুত্ক্লেশ্য ভুক্তং কাযান্ন নির্হরেত্ | রসাদিষ্বযথার্থং বা তদ্বিকারায কল্পতে ||২০||
यत्किञ्चिद्दोषमुत्क्लेश्य भुक्तं कायान्न निर्हरेत् | रसादिष्वयथार्थं वा तद्विकाराय कल्पते ||२०||
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Adhikarana 18 (21) · Śloka 21
বিরুদ্ধাশনজান্ রোগান্ প্রতিহন্তি বিরেচনম্ | বমনং শমনং বাঽপি পূর্বং বা হিতসেবনম্ ||২১||
विरुद्धाशनजान् रोगान् प्रतिहन्ति विरेचनम् | वमनं शमनं वाऽपि पूर्वं वा हितसेवनम् ||२१||
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Adhikarana 19 (22) · Śloka 22
সাত্ম্যতোঽল্পতযা বাঽপি দীপ্তাগ্নেস্তরুণস্য চ | স্নিগ্ধব্যাযামবলিনাং বিরুদ্ধং বিতথং ভবেত্ ||২২||
सात्म्यतोऽल्पतया वाऽपि दीप्ताग्नेस्तरुणस्य च | स्निग्धव्यायामबलिनां विरुद्धं वितथं भवेत् ||२२||
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Adhikarana 20 (23-29) · Śloka 29
অথ বাতগুণান্ বক্ষ্যামঃ- পূর্বঃ সমধুরঃ স্নিগ্ধো লবণশ্চৈব মারুতঃ | গুরুর্বিদাহজননো রক্তপিত্তাভিবর্ধনঃ ||২৩|| ক্ষতানাং বিষজুষ্টানাং ব্রণিনঃ শ্লেষ্মলাশ্চ যে | তেষামেব বিশেষেণ সদা রোগবিবর্ধনঃ ||২৪|| বাতলানাং প্রশস্তশ্চ শ্রান্তানাং কফশোষিণাম্ | মধুরশ্চাবিদাহী চ কষাযানুরসো লঘুঃ | দক্ষিণো মারুতঃ শ্রেষ্ঠশ্চক্ষুষ্যো বলবর্ধনঃ ||২৫|| রক্তপিত্তপ্রশমনো ন চ বাতপ্রকোপণঃ | বিশদো রূক্ষপরুষঃ খরঃ স্নেহবলাপহঃ ||২৬|| পশ্চিমো মারুতস্তীক্ষ্ণঃ কফমেদোবিশোষণঃ | সদ্যঃ প্রাণক্ষযকরঃ শোষণস্তু শরীরিণাম্ ||২৭|| উত্তরো মারুতঃ স্নিগ্ধো মৃদুর্মধুর এব চ | কষাযানুরসঃ শীতো দোষাণাং চাপ্রকোপণঃ ||২৮|| তস্মাচ্চ প্রকৃতিস্থানাং ক্লেদনো বলবর্ধনঃ | ক্ষীণক্ষযবিষার্তানাং বিশেষেণ তু পূজিতঃ ||২৯||
अथ वातगुणान् वक्ष्यामः- पूर्वः समधुरः स्निग्धो लवणश्चैव मारुतः | गुरुर्विदाहजननो रक्तपित्ताभिवर्धनः ||२३|| क्षतानां विषजुष्टानां व्रणिनः श्लेष्मलाश्च ये | तेषामेव विशेषेण सदा रोगविवर्धनः ||२४|| वातलानां प्रशस्तश्च श्रान्तानां कफशोषिणाम् | मधुरश्चाविदाही च कषायानुरसो लघुः | दक्षिणो मारुतः श्रेष्ठश्चक्षुष्यो बलवर्धनः ||२५|| रक्तपित्तप्रशमनो न च वातप्रकोपणः | विशदो रूक्षपरुषः खरः स्नेहबलापहः ||२६|| पश्चिमो मारुतस्तीक्ष्णः कफमेदोविशोषणः | सद्यः प्राणक्षयकरः शोषणस्तु शरीरिणाम् ||२७|| उत्तरो मारुतः स्निग्धो मृदुर्मधुर एव च | कषायानुरसः शीतो दोषाणां चाप्रकोपणः ||२८|| तस्माच्च प्रकृतिस्थानां क्लेदनो बलवर्धनः | क्षीणक्षयविषार्तानां विशेषेण तु पूजितः ||२९||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 20
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং সূত্রস্থানে হিতাহিতীযো নাম বিংশোঽধ্যাযঃ ||২০||
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने हिताहितीयो नाम विंशोऽध्यायः ||२०||
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