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49. chardipratiṣēdhādhyāyaḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতশ্ছর্দিপ্রতিষেধমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातश्छर्दिप्रतिषेधमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3-5) · Śloka 5

অতিদ্রবৈরতিস্নিগ্ধৈরহৃদ্যৈর্লবণৈরতি | অকালে চাতিমাত্রৈশ্চ তথাঽসাত্ম্যৈশ্চ ভোজনৈঃ ||৩|| শ্রমাত্ ক্ষযাত্তথোদ্বেগাদজীর্ণাত্ কৃমিদোষতঃ | নার্যাশ্চাপন্নসত্ত্বাযাস্তথাঽতিদ্রুতমশ্নতঃ ||৪|| অত্যন্তামপরীতস্য ছর্দের্বৈ সম্ভবো ধ্রুবম্ | (বীভত্সৈর্হেতুভিশ্চান্যৈর্দ্রুতমুত্ক্লেশিতো বলাত্ ) ||৫||

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अतिद्रवैरतिस्निग्धैरहृद्यैर्लवणैरति | अकाले चातिमात्रैश्च तथाऽसात्म्यैश्च भोजनैः ||३|| श्रमात् क्षयात्तथोद्वेगादजीर्णात् कृमिदोषतः | नार्याश्चापन्नसत्त्वायास्तथाऽतिद्रुतमश्नतः ||४|| अत्यन्तामपरीतस्य छर्देर्वै सम्भवो ध्रुवम् | (बीभत्सैर्हेतुभिश्चान्यैर्द्रुतमुत्क्लेशितो बलात् ) ||५||

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Adhikarana 3 (6) · Śloka 6

ছাদযন্নাননং বেগৈরর্দযন্নঙ্গভঞ্জনৈঃ | নিরুচ্যতে ছর্দিরিতি দোষো বক্ত্রাদ্বিনিশ্চরন্ ||৬||

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छादयन्नाननं वेगैरर्दयन्नङ्गभञ्जनैः | निरुच्यते छर्दिरिति दोषो वक्त्राद्विनिश्चरन् ||६||

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Adhikarana 4 (7) · Śloka 7

দোষানুদীরযন্ বৃদ্ধানুদানো ব্যানসঙ্গতঃ | ঊর্ধ্বমাগচ্ছতি ভৃশং বিরুদ্ধাহারসেবনাত্ ||৭||

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दोषानुदीरयन् वृद्धानुदानो व्यानसङ्गतः | ऊर्ध्वमागच्छति भृशं विरुद्धाहारसेवनात् ||७||

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Adhikarana 5 (8) · Śloka 8

প্রসেকো হৃদযোত্ক্লেশো ভক্তস্যানভিনন্দনম্ | পূর্বরূপং মতং ছর্দ্যা... |৮|

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प्रसेको हृदयोत्क्लेशो भक्तस्यानभिनन्दनम् | पूर्वरूपं मतं छर्द्या... |८|

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Adhikarana 6 (8) · Śloka 8

... যথাস্বং চ বিভাবযেত্ ||৮||

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... यथास्वं च विभावयेत् ||८||

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Adhikarana 7 (9) · Śloka 9

প্রচ্ছর্দযেত্ ফেনিলমল্পমল্পং শূলার্দিতোঽভ্যর্দিতপার্শ্বপৃষ্ঠঃ | শ্রান্তঃ সঘোষং বহুশঃ কষাযং জীর্ণেঽধিকং সাঽনিলজা বমিস্তু ||৯||

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प्रच्छर्दयेत् फेनिलमल्पमल्पं शूलार्दितोऽभ्यर्दितपार्श्वपृष्ठः | श्रान्तः सघोषं बहुशः कषायं जीर्णेऽधिकं साऽनिलजा वमिस्तु ||९||

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Adhikarana 8 (10) · Śloka 10

যোঽম্লং ভৃশং বা কটুতিক্তবক্ত্রঃ পীতং সরক্তং হরিতং বমেদ্বা | সদাহচোষজ্বরবক্ত্রশোষো মূর্চ্ছান্বিতঃ পিত্তনিমিত্তজা সা ||১০||

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योऽम्लं भृशं वा कटुतिक्तवक्त्रः पीतं सरक्तं हरितं वमेद्वा | सदाहचोषज्वरवक्त्रशोषो मूर्च्छान्वितः पित्तनिमित्तजा सा ||१०||

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Adhikarana 9 (11) · Śloka 11

যো হৃষ্টরোমা মধুরং প্রভূতং শুক্লং হিমং সান্দ্রকফানুবিদ্ধম্ | অভক্তরুগ্গৌরবসাদযুক্তো বমেদ্বমী সা কফকোপজা স্যাত্ ||১১||

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यो हृष्टरोमा मधुरं प्रभूतं शुक्लं हिमं सान्द्रकफानुविद्धम् | अभक्तरुग्गौरवसादयुक्तो वमेद्वमी सा कफकोपजा स्यात् ||११||

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Adhikarana 10 (12) · Śloka 12

সর্বাণি রূপাণি ভবন্তি যস্যাং সা সর্বদোষপ্রভবা মতা তু |১২|

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सर्वाणि रूपाणि भवन्ति यस्यां सा सर्वदोषप्रभवा मता तु |१२|

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Adhikarana 11 (12) · Śloka 12

বীভত্সজা দৌহৃদজাঽঽমজা চ সাত্ম্যপ্রকোপাত্ কৃমিজা চ যা হি | সা পঞ্চমী তাং চ বিভাবযেত্তু দোষোচ্ছ্রযেণৈব যথোক্তমাদৌ ||১২||

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बीभत्सजा दौहृदजाऽऽमजा च सात्म्यप्रकोपात् कृमिजा च या हि | सा पञ्चमी तां च विभावयेत्तु दोषोच्छ्रयेणैव यथोक्तमादौ ||१२||

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Adhikarana 12 (13) · Śloka 13

শূলহৃল্লাসবহুলা কৃমিজা চ বিশেষতঃ | কৃমিহৃদ্রোগতুল্যেন লক্ষণেন চ লক্ষিতা ||১৩||

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शूलहृल्लासबहुला कृमिजा च विशेषतः | कृमिहृद्रोगतुल्येन लक्षणेन च लक्षिता ||१३||

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Adhikarana 13 (14) · Śloka 14

ক্ষীণস্যোপদ্রবৈর্যুক্তাং সাসৃক্পূযাং সচন্দ্রিকাম্ | ছর্দি প্রসক্তাং কুশলো নারভেত চিকিত্সিতুম্ ||১৪||

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क्षीणस्योपद्रवैर्युक्तां सासृक्पूयां सचन्द्रिकाम् | छर्दि प्रसक्तां कुशलो नारभेत चिकित्सितुम् ||१४||

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Adhikarana 14 (15) · Śloka 15

আমাশযোত্ক্লেশভবা হি সর্বাস্তস্মাদ্ধিতং লঙ্ঘনমেব তাসু ||১৫||

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आमाशयोत्क्लेशभवा हि सर्वास्तस्माद्धितं लङ्घनमेव तासु ||१५||

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Adhikarana 15 (16) · Śloka 16

বমীষু বহুদোষাসু ছর্দনং হিতমুচ্যতে | বিরেচনং বা কুর্বীত যথাদোষোচ্ছ্রযং ভিষক্ ||১৬||

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वमीषु बहुदोषासु छर्दनं हितमुच्यते | विरेचनं वा कुर्वीत यथादोषोच्छ्रयं भिषक् ||१६||

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Adhikarana 16 (17) · Śloka 17

সংসর্গশ্চানুপূর্বেণ যথাস্বং ভেষজাযুতঃ |১৭|

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संसर्गश्चानुपूर्वेण यथास्वं भेषजायुतः |१७|

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Adhikarana 17 (17) · Śloka 17

লঘূনি পরিশুষ্কাণি সাত্ম্যান্যন্নানি চাচরেত্ ||১৭||

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लघूनि परिशुष्काणि सात्म्यान्यन्नानि चाचरेत् ||१७||

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Adhikarana 18 (18) · Śloka 18

যথাস্বং চ কষাযাণি জ্বরঘ্নানি প্রযোজযেত্ |১৮|

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यथास्वं च कषायाणि ज्वरघ्नानि प्रयोजयेत् |१८|

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Adhikarana 19 (18-20) · Śloka 20

হন্যাত্ ক্ষীরঘৃতং পীতং ছর্দিং পবনসম্ভবাম্ ||১৮|| সসৈন্ধবং পিবেত্ সর্পির্বাতচ্ছর্দিনিবারণম্ | মুদ্গামলকযূষো বা সসর্পিষ্কঃ সসৈন্ধবঃ | যবাগূং মধুমিশ্রাং বা পঞ্চমূলীকৃতাং পিবেত্ ||১৯|| পিবেদ্বা ব্যক্তসিন্ধূত্থং ফলাম্লং বৈষ্কিরং রসম্ | সুখোষ্ণলবণং চাত্র হিতং স্নেহবিরেচনম্ ||২০||

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हन्यात् क्षीरघृतं पीतं छर्दिं पवनसम्भवाम् ||१८|| ससैन्धवं पिबेत् सर्पिर्वातच्छर्दिनिवारणम् | मुद्गामलकयूषो वा ससर्पिष्कः ससैन्धवः | यवागूं मधुमिश्रां वा पञ्चमूलीकृतां पिबेत् ||१९|| पिबेद्वा व्यक्तसिन्धूत्थं फलाम्लं वैष्किरं रसम् | सुखोष्णलवणं चात्र हितं स्नेहविरेचनम् ||२०||

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Adhikarana 20 (21-22) · Śloka 22

পিত্তোপশমনীযানি পাক্যানি শিশিরাণি চ | কষাযাণ্যুপযুক্তানি ঘ্নন্তি পিত্তকৃতাং বমীম্ ||২১|| শোধনং মধুরৈশ্চাত্র দ্রাক্ষারসসমাযুতৈঃ | বলবত্যাং প্রশংসন্তি সর্পিস্তৈল্বকমেব চ ||২২||

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पित्तोपशमनीयानि पाक्यानि शिशिराणि च | कषायाण्युपयुक्तानि घ्नन्ति पित्तकृतां वमीम् ||२१|| शोधनं मधुरैश्चात्र द्राक्षारससमायुतैः | बलवत्यां प्रशंसन्ति सर्पिस्तैल्वकमेव च ||२२||

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Adhikarana 21 (23) · Śloka 23

আরগ্বধাদিনির্যূহং দশাঙ্গযোগমেব বা | পাযযেতাথ সক্ষৌদ্রং কফজাযাং চিকিত্সকঃ ||২৩||

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आरग्वधादिनिर्यूहं दशाङ्गयोगमेव वा | पाययेताथ सक्षौद्रं कफजायां चिकित्सकः ||२३||

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Adhikarana 22 (24) · Śloka 24

কৃতং গুডূচ্যা বিধিবত্ কষাযং হিমসঞ্জ্ঞিতম্ | তিসৃষ্বপি ভবেত্ পথ্যং মাক্ষিকেণ সমন্বিতম্ ||২৪||

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कृतं गुडूच्या विधिवत् कषायं हिमसञ्ज्ञितम् | तिसृष्वपि भवेत् पथ्यं माक्षिकेण समन्वितम् ||२४||

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Adhikarana 23 (25) · Śloka 26

বীভত্সজাং হৃদ্যতমৈর্দৌহৃদীং কাঙ্ক্ষিতৈঃ ফলৈঃ | লঙ্ঘনৈর্বমনৈশ্চামাং সাত্ম্যৈঃ সাত্ম্যপ্রকোপজাম্ ||২৫|| কৃমিহৃদ্রোগবচ্চাপি কৃমিজাং সাধযেদ্বমীম্ |২৬|

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बीभत्सजां हृद्यतमैर्दौहृदीं काङ्क्षितैः फलैः | लङ्घनैर्वमनैश्चामां सात्म्यैः सात्म्यप्रकोपजाम् ||२५|| कृमिहृद्रोगवच्चापि कृमिजां साधयेद्वमीम् |२६|

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Adhikarana 24 (26) · Śloka 26

বিতরেচ্চ যথাদোষং শস্তং বিধিমনন্তরম্ ||২৬||

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वितरेच्च यथादोषं शस्तं विधिमनन्तरम् ||२६||

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Adhikarana 25 (27-35) · Śloka 35

দধিত্থরসসংসক্তাং পিপ্পলীং মাক্ষিকান্বিতাম্ | মুহুর্মুহুর্নরো লীঢ্বা ছর্দিভ্যঃ প্রবি(তি)মুচ্যতে ||২৭|| সমাক্ষিকা মধুরসা পীতা বা তণ্ডুলাম্বুনা | তর্পণং বা মধুযুতং তিসৃণামপি ভেষজম্ ||২৮|| স্বযঙ্গুপ্তাং সযষ্ট্যাহ্বাং তণ্ডুলাম্বুমধুদ্রবাম্ | পিবেদ্যবাগূমথবা সিদ্ধাং পত্রৈঃ করঞ্জজৈঃ ||২৯|| যুক্তাম্ললবণাঃ পিষ্টাঃ কুস্তুম্বুর্যোঽথবা হিতাঃ | তণ্ডুলাম্বুযুতং খাদেত্ কপিত্থং ত্র্যূষণেন বা ||৩০|| সিতাচন্দনমধ্বাক্তং লিহ্যাদ্বা মক্ষিকাশকৃত্ | পিবেত্ পযোঽগ্নিতপ্তং চ নির্বাপ্য গৃহগোধিকাম্ ||৩১|| সর্পিঃক্ষৌদ্রযুতান্ বাঽপি লাজশক্তূন্ পিবেত্তথা | সর্পিঃক্ষৌদ্রসিতোপেতাং মাগধীং বা লিহেত্তথা ||৩২|| ধাত্রীরসে চন্দনং বা ঘৃষ্টং মুদ্গদলাম্বুনা | কোলামলকমজ্জানং লিহ্যাদ্বা ত্রিসুগন্ধিকম্ ||৩৩|| সক্ষৌদ্রাং শালিলাজানাং যবাগূং বা পিবেন্নরঃ | ঘ্রেযাণ্যুপহরেচ্চাপি মনোঘ্রাণসুখানি চ ||৩৪|| জাঙ্গলানি চ মাংসানি শুভানি পানকানি চ | ভোজনানি বিচিত্রাণি কুর্যাত্সর্বাস্বতন্দ্রিতঃ ||৩৫||

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दधित्थरससंसक्तां पिप्पलीं माक्षिकान्विताम् | मुहुर्मुहुर्नरो लीढ्वा छर्दिभ्यः प्रवि(ति)मुच्यते ||२७|| समाक्षिका मधुरसा पीता वा तण्डुलाम्बुना | तर्पणं वा मधुयुतं तिसृणामपि भेषजम् ||२८|| स्वयङ्गुप्तां सयष्ट्याह्वां तण्डुलाम्बुमधुद्रवाम् | पिबेद्यवागूमथवा सिद्धां पत्रैः करञ्जजैः ||२९|| युक्ताम्ललवणाः पिष्टाः कुस्तुम्बुर्योऽथवा हिताः | तण्डुलाम्बुयुतं खादेत् कपित्थं त्र्यूषणेन वा ||३०|| सिताचन्दनमध्वाक्तं लिह्याद्वा मक्षिकाशकृत् | पिबेत् पयोऽग्नितप्तं च निर्वाप्य गृहगोधिकाम् ||३१|| सर्पिःक्षौद्रयुतान् वाऽपि लाजशक्तून् पिबेत्तथा | सर्पिःक्षौद्रसितोपेतां मागधीं वा लिहेत्तथा ||३२|| धात्रीरसे चन्दनं वा घृष्टं मुद्गदलाम्बुना | कोलामलकमज्जानं लिह्याद्वा त्रिसुगन्धिकम् ||३३|| सक्षौद्रां शालिलाजानां यवागूं वा पिबेन्नरः | घ्रेयाण्युपहरेच्चापि मनोघ्राणसुखानि च ||३४|| जाङ्गलानि च मांसानि शुभानि पानकानि च | भोजनानि विचित्राणि कुर्यात्सर्वास्वतन्द्रितः ||३५||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 49

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযামুত্তরতন্ত্রান্তর্গতে কাযচিকিত্সাতন্ত্রে ছর্দিপ্রতিষেধো নাম (একাদশোঽধ্যাযঃ, আদিতঃ) একোনপঞ্চাশত্তমোঽধ্যাযঃ ||৪৯||

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इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते कायचिकित्सातन्त्रे छर्दिप्रतिषेधो नाम (एकादशोऽध्यायः, आदितः) एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ||४९||

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