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AYANAAYURVEDAby Dr Vijaya Dwarampudi
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17. dr̥ṣṭigatarōgapratiṣēdhādhyāyaḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতো দৃষ্টিগতরোগপ্রতিষেধং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातो दृष्टिगतरोगप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

ত্রযঃ সাধ্যাস্ত্রযোঽসাধ্যা যাপ্যাঃ ষট্ চ ভবন্তি হি |৩|

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त्रयः साध्यास्त्रयोऽसाध्या याप्याः षट् च भवन्ति हि |३|

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Adhikarana 3 (3) · Śloka 3

তত্রৈকস্য প্রতীকারঃ কীর্তিতো ধূমদর্শিনঃ ||৩||

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तत्रैकस्य प्रतीकारः कीर्तितो धूमदर्शिनः ||३||

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Adhikarana 4 (4-5) · Śloka 6

দৃষ্টৌ পিত্তবিদগ্ধাযাং বিদগ্ধাযাং কফেন চ | পিত্তশ্লেষ্মহরং কুর্যাদ্বিধিং শস্ত্রক্ষতাদৃতে ||৪|| নস্যসেকাঞ্জনালেপপুটপাকৈঃ সতর্পণৈঃ | আদ্যে তু ত্রৈফলং পেযং সর্পিস্ত্রৈবৃতমুত্তরে ||৫|| তৈল্বকং চোভযোঃ পথ্যং কেবলং জীর্ণমেব বা |৬|

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दृष्टौ पित्तविदग्धायां विदग्धायां कफेन च | पित्तश्लेष्महरं कुर्याद्विधिं शस्त्रक्षतादृते ||४|| नस्यसेकाञ्जनालेपपुटपाकैः सतर्पणैः | आद्ये तु त्रैफलं पेयं सर्पिस्त्रैवृतमुत्तरे ||५|| तैल्वकं चोभयोः पथ्यं केवलं जीर्णमेव वा |६|

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Adhikarana 5 (6-7) · Śloka 8

গৈরিকং সৈন্ধবং কৃষ্ণা গোদন্তস্য মষী তথা ||৬|| গোমাংসং মরিচং বীজং শিরীষস্য মনঃশিলা | বৃন্তং কপিত্থান্মধুনা স্বযঙ্গুপ্তাফলানি চ ||৭|| চত্বার এতে যোগাঃ স্যুরুভযোরঞ্জনে হিতাঃ |৮|

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गैरिकं सैन्धवं कृष्णा गोदन्तस्य मषी तथा ||६|| गोमांसं मरिचं बीजं शिरीषस्य मनःशिला | वृन्तं कपित्थान्मधुना स्वयङ्गुप्ताफलानि च ||७|| चत्वार एते योगाः स्युरुभयोरञ्जने हिताः |८|

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Adhikarana 6 (8-9) · Śloka 10

কুব্জকাশোকশালাম্রপ্রিযঙ্গুনলিনোত্পলৈঃ ||৮|| পুষ্পৈর্হরেণুকৃষ্ণাহ্বাপথ্যামলকসংযুতৈঃ | সর্পির্মধুযুতৈশ্চূর্ণৈর্বেণুনাড্যামবস্থিতৈঃ ||৯|| অঞ্জযেদ্ দ্বাবপি ভিষক্ পিত্তশ্লেষ্মবিভাবিতৌ |১০|

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कुब्जकाशोकशालाम्रप्रियङ्गुनलिनोत्पलैः ||८|| पुष्पैर्हरेणुकृष्णाह्वापथ्यामलकसंयुतैः | सर्पिर्मधुयुतैश्चूर्णैर्वेणुनाड्यामवस्थितैः ||९|| अञ्जयेद् द्वावपि भिषक् पित्तश्लेष्मविभावितौ |१०|

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Adhikarana 7 (10-11) · Śloka 12

আম্রজম্বূদ্ভবং পুষ্পং তদ্রসেন হরেণুকাম্ ||১০|| পিষ্ট্বা ক্ষৌদ্রাজ্যসংযুক্তং প্রযোজ্যমথবাঽঞ্জনম্ | নলিনোত্পলকিঞ্জল্কগৈরিকৈর্গোশকৃদ্রসৈঃ ||১১|| গুডিকাঞ্জনমেতদ্বা দিনরাত্র্যন্ধযোর্হিতম্ |১২|

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आम्रजम्बूद्भवं पुष्पं तद्रसेन हरेणुकाम् ||१०|| पिष्ट्वा क्षौद्राज्यसंयुक्तं प्रयोज्यमथवाऽञ्जनम् | नलिनोत्पलकिञ्जल्कगैरिकैर्गोशकृद्रसैः ||११|| गुडिकाञ्जनमेतद्वा दिनरात्र्यन्धयोर्हितम् |१२|

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Adhikarana 8 (12) · Śloka 13

রসাঞ্জনরসক্ষৌদ্রতালীশস্বর্ণগৈরিকম্ ||১২|| গোশকৃদ্রসসংযুক্তং পিত্তোপহতদৃষ্টযে |১৩|

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रसाञ्जनरसक्षौद्रतालीशस्वर्णगैरिकम् ||१२|| गोशकृद्रससंयुक्तं पित्तोपहतदृष्टये |१३|

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Adhikarana 9 (13-14) · Śloka 14

শীতং সৌবীরকং বাঽপি পিষ্ট্বাঽথ রসভাবিতম্ ||১৩|| কূর্মপিত্তেন মতিমান্ ভাবযেদ্রৌহিতেন বা | চূর্ণাঞ্জনমিদং নিত্যং প্রযোজ্যং পিত্তশান্তযে ||১৪||

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शीतं सौवीरकं वाऽपि पिष्ट्वाऽथ रसभावितम् ||१३|| कूर्मपित्तेन मतिमान् भावयेद्रौहितेन वा | चूर्णाञ्जनमिदं नित्यं प्रयोज्यं पित्तशान्तये ||१४||

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Adhikarana 10 (15) · Śloka 15

কাশমরীপুষ্পমধুকদার্বীরোধ্ররসাঞ্জনৈঃ | সক্ষৌদ্রমঞ্জনং তদ্বদ্ধিতমত্রামযে সদা ||১৫||

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काशमरीपुष्पमधुकदार्वीरोध्ररसाञ्जनैः | सक्षौद्रमञ्जनं तद्वद्धितमत्रामये सदा ||१५||

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Adhikarana 11 (16) · Śloka 16

স্রোতোজং সৈন্ধবং কৃষ্ণাং রেণুকাং চাপি পেষযেত্ | অজামূত্রেণ তা বর্ত্যঃ ক্ষণদান্ধ্যাঞ্জনে হিতাঃ ||১৬||

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स्रोतोजं सैन्धवं कृष्णां रेणुकां चापि पेषयेत् | अजामूत्रेण ता वर्त्यः क्षणदान्ध्याञ्जने हिताः ||१६||

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Adhikarana 12 (17) · Śloka 18

কালানুসারিবাং কৃষ্ণাং নাগরং মধুকং তথা | তালীশপত্রং ক্ষণদে গাঙ্গেযং চ যকৃদ্রসে ||১৭|| কৃতাস্তা বর্তযঃ পিষ্টাশ্ছাযাশুষ্কাঃ সুখাবহাঃ |১৮|

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कालानुसारिवां कृष्णां नागरं मधुकं तथा | तालीशपत्रं क्षणदे गाङ्गेयं च यकृद्रसे ||१७|| कृतास्ता वर्तयः पिष्टाश्छायाशुष्काः सुखावहाः |१८|

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Adhikarana 13 (18) · Śloka 19

মনঃশিলাভযাব্যোষবলাকালানুসারিবাঃ ||১৮|| সফেনা বর্তযঃ পিষ্টাশ্ছাগক্ষীরসমন্বিতাঃ |১৯|

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मनःशिलाभयाव्योषबलाकालानुसारिवाः ||१८|| सफेना वर्तयः पिष्टाश्छागक्षीरसमन्विताः |१९|

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Adhikarana 14 (19-20) · Śloka 21

গোমূত্রপিত্তমদিরাযকৃদ্ধাত্রীরসে পচেত্ ||১৯|| ক্ষুদ্রাঞ্জনং রসেনান্যদ্যকৃতস্ত্রৈফলেঽপি বা | গোমূত্রাজ্যার্ণবমলপিপ্পলীক্ষৌদ্রকট্ফলৈঃ ||২০|| সৈন্ধবোপহিতং যুঞ্জ্যান্নিহিতং বেণুগহ্বরে |২১|

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गोमूत्रपित्तमदिरायकृद्धात्रीरसे पचेत् ||१९|| क्षुद्राञ्जनं रसेनान्यद्यकृतस्त्रैफलेऽपि वा | गोमूत्राज्यार्णवमलपिप्पलीक्षौद्रकट्फलैः ||२०|| सैन्धवोपहितं युञ्ज्यान्निहितं वेणुगह्वरे |२१|

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Adhikarana 15 (21-22) · Śloka 22

মেদো যকৃদ্ধৃতং চাজং পিপ্পল্যঃ সৈন্ধবং মধু ||২১|| রসমামলকাচ্চাপি পক্বং সম্যঙ্নিধাপযেত্ | কোশে খদিরনির্মাণে তদ্বত্ ক্ষুদ্রাঞ্জনং হিতম্ ||২২||

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मेदो यकृद्धृतं चाजं पिप्पल्यः सैन्धवं मधु ||२१|| रसमामलकाच्चापि पक्वं सम्यङ्निधापयेत् | कोशे खदिरनिर्माणे तद्वत् क्षुद्राञ्जनं हितम् ||२२||

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Adhikarana 16 (23) · Śloka 23

হরেণুমগধাজাস্থিমজ্জৈলাযকৃদন্বিতম্ | যকৃদ্রসেনাঞ্জনং বা শ্লেষ্মোপহতদৃষ্টযে ||২৩||

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हरेणुमगधाजास्थिमज्जैलायकृदन्वितम् | यकृद्रसेनाञ्जनं वा श्लेष्मोपहतदृष्टये ||२३||

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Adhikarana 17 (24) · Śloka 24

বিপাচ্য গোধাযকৃদর্ধপাটিতং সুপূরিতং মাগধিকাভিরগ্নিনা | নিষেবিতং তদ্যকৃদঞ্জনেন নিহন্তি নক্তান্ধ্যমসংশযং খলু ||২৪||

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विपाच्य गोधायकृदर्धपाटितं सुपूरितं मागधिकाभिरग्निना | निषेवितं तद्यकृदञ्जनेन निहन्ति नक्तान्ध्यमसंशयं खलु ||२४||

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Adhikarana 18 (25) · Śloka 25

তথা যকৃচ্ছাগভবং হুতাশনে বিপাচ্য সম্যঙ্মগধাসমন্বিতম্ | প্রযোজিতং পূর্ববদাশ্বসংশযং জযেত্ ক্ষপান্ধ্যং সকৃদঞ্জনান্নৃণাম্ ||২৫||

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तथा यकृच्छागभवं हुताशने विपाच्य सम्यङ्मगधासमन्वितम् | प्रयोजितं पूर्ववदाश्वसंशयं जयेत् क्षपान्ध्यं सकृदञ्जनान्नृणाम् ||२५||

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Adhikarana 19 (26) · Śloka 26

প্লীহা যকৃচ্চাপ্যুপভক্ষিতে উভে প্রকল্প্য শূল্যে ঘৃততৈলসংযুতে | তে সার্ষপস্নেহসমাযুতেঽঞ্জনং নক্তান্ধ্যমাশ্বেব হতঃ প্রযোজিতে ||২৬||

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प्लीहा यकृच्चाप्युपभक्षिते उभे प्रकल्प्य शूल्ये घृततैलसंयुते | ते सार्षपस्नेहसमायुतेऽञ्जनं नक्तान्ध्यमाश्वेव हतः प्रयोजिते ||२६||

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Adhikarana 20 (27) · Śloka 27

নদীজশিম্বীত্রিকটূন্যথাঞ্জনং মনঃশিলা দ্বে চ নিশে য(শ)কৃদ্গবাম্ | সচন্দনেযং গুটিকাঽথবাঽঞ্জনং প্রশস্যতে বৈ দিবসেষ্বপশ্যতাম্ ||২৭||

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नदीजशिम्बीत्रिकटून्यथाञ्जनं मनःशिला द्वे च निशे य(श)कृद्गवाम् | सचन्दनेयं गुटिकाऽथवाऽञ्जनं प्रशस्यते वै दिवसेष्वपश्यताम् ||२७||

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Adhikarana 21 (28) · Śloka 28

ভবন্তি যাপ্যাঃ খলু যে ষডামযা হরেদসৃক্তেষু সিরাবিমোক্ষণৈঃ | বিরেচযেচ্চাপি পুরাণসর্পিষা বিরেচনাঙ্গোপহিতেন সর্বদা ||২৮||

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भवन्ति याप्याः खलु ये षडामया हरेदसृक्तेषु सिराविमोक्षणैः | विरेचयेच्चापि पुराणसर्पिषा विरेचनाङ्गोपहितेन सर्वदा ||२८||

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Adhikarana 22 (29) · Śloka 30

পযোবিমিশ্রং পবনোদ্ভবে হিতং বদন্তি পঞ্চাঙ্গুলতৈলমেব তু | ভবেদ্ধৃতং ত্রৈফলমেব শোধনং বিশেষতঃ শোণিতপিত্তরোগযোঃ ||২৯|| ত্রিবৃদ্বিরেকঃ কফজে প্রশস্যতে ত্রিদোষজে তৈলমুশন্তি তত্কৃতম্ |৩০|

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पयोविमिश्रं पवनोद्भवे हितं वदन्ति पञ्चाङ्गुलतैलमेव तु | भवेद्धृतं त्रैफलमेव शोधनं विशेषतः शोणितपित्तरोगयोः ||२९|| त्रिवृद्विरेकः कफजे प्रशस्यते त्रिदोषजे तैलमुशन्ति तत्कृतम् |३०|

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Adhikarana 23 (30) · Śloka 31

পুরাণসর্পিস্তিমিরেষু সর্বশো হিতং ভবেদাযসভাজনস্থিতম্ ||৩০|| হিতং চ বিদ্যাত্ত্রিফলাঘৃতং সদা কৃতং চ যন্মেষবিষাণনামভিঃ |৩১|

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पुराणसर्पिस्तिमिरेषु सर्वशो हितं भवेदायसभाजनस्थितम् ||३०|| हितं च विद्यात्त्रिफलाघृतं सदा कृतं च यन्मेषविषाणनामभिः |३१|

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Adhikarana 24 (31) · Śloka 32

সদাঽবলিহ্যাত্ত্রিফলং সুচূর্ণিতাং ঘৃতপ্রগাঢাং তিমিরেঽথ পিত্তজে ||৩১|| সমীরজে তৈলযুতাং কফাত্মকে মধুপ্রগাঢাং বিদধীত যুক্তিতঃ |৩২|

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सदाऽवलिह्यात्त्रिफलं सुचूर्णितां घृतप्रगाढां तिमिरेऽथ पित्तजे ||३१|| समीरजे तैलयुतां कफात्मके मधुप्रगाढां विदधीत युक्तितः |३२|

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Adhikarana 25 (32) · Śloka 32

গবাং শকৃত্ক্বাথবিপক্বমুত্তমং হিতং তু তৈলং তিমিরেষু নাবনম্ ||৩২||

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गवां शकृत्क्वाथविपक्वमुत्तमं हितं तु तैलं तिमिरेषु नावनम् ||३२||

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Adhikarana 26 (33) · Śloka 33

হিতং ঘৃতং কেবল এব পৈত্তিকে হ্যজাবিকং যন্মধুরৈর্বিপাচিতম্ |৩৩|

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हितं घृतं केवल एव पैत्तिके ह्यजाविकं यन्मधुरैर्विपाचितम् |३३|

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Adhikarana 27 (33) · Śloka 33

তৈলং স্থিরাদৌ মধুরে চ যদ্গণে তথাঽণুতৈলং পবনাসৃগুত্থযোঃ ||৩৩||

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तैलं स्थिरादौ मधुरे च यद्गणे तथाऽणुतैलं पवनासृगुत्थयोः ||३३||

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Adhikarana 28 (34) · Śloka 34

সহাশ্বগন্ধাতিবলাবরীশৃতং হিতং চ নস্যে ত্রিবৃতং যদীরিতম্ | জলোদ্ভবানূপজমাংসসংস্কৃতাদ্ধৃতং বিধেযং পযসো যদুত্থিতম্ ||৩৪||

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सहाश्वगन्धातिबलावरीशृतं हितं च नस्ये त्रिवृतं यदीरितम् | जलोद्भवानूपजमांससंस्कृताद्धृतं विधेयं पयसो यदुत्थितम् ||३४||

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Adhikarana 29 (35) · Śloka 35

সসৈন্ধবঃ ক্রব্যভুগেণমাংসযোর্হিতঃ সসর্পিঃ সমধুঃ পুটাহ্বযঃ |৩৫|

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ससैन्धवः क्रव्यभुगेणमांसयोर्हितः ससर्पिः समधुः पुटाह्वयः |३५|

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Adhikarana 30 (35) · Śloka 35

বসাঽথ গৃধ্রোরগতাম্রচূডজা সদা প্রশস্তা মধুকান্বিতাঽঞ্জনে ||৩৫||

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वसाऽथ गृध्रोरगताम्रचूडजा सदा प्रशस्ता मधुकान्विताऽञ्जने ||३५||

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Adhikarana 31 (36) · Śloka 36

প্রত্যঞ্জনং স্রোতসি যত্সমুত্থিতং ক্রমাদ্রসক্ষীরঘৃতেষু ভাবিতম্ |৩৬|

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प्रत्यञ्जनं स्रोतसि यत्समुत्थितं क्रमाद्रसक्षीरघृतेषु भावितम् |३६|

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Adhikarana 32 (36-37) · Śloka 37

স্থিতং দশাহত্রযমেতদঞ্জনং কৃষ্ণোরগাস্যে কুশসম্প্রবেষ্টিতে ||৩৬|| তন্মালতীকোরকসৈন্ধবাযুতং সদাঽঞ্জনং স্যাত্তিমিরেঽথ রাগিণি | সুভাবিতং বা পযসা দিনত্রযং কাচাপহং শাস্ত্রবিদঃ প্রচক্ষতে ||৩৭||

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स्थितं दशाहत्रयमेतदञ्जनं कृष्णोरगास्ये कुशसम्प्रवेष्टिते ||३६|| तन्मालतीकोरकसैन्धवायुतं सदाऽञ्जनं स्यात्तिमिरेऽथ रागिणि | सुभावितं वा पयसा दिनत्रयं काचापहं शास्त्रविदः प्रचक्षते ||३७||

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Adhikarana 33 (38) · Śloka 38

হবির্হিতং ক্ষীরভবং তু পৈত্তিকে বদন্তি নস্যে মধুরৌষধৈঃ কৃতম্ | তত্তর্পণে চৈব হিতং প্রযোজিতং সজাঙ্গলস্তেষু চ যঃ পুটাহ্বযঃ ||৩৮||

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हविर्हितं क्षीरभवं तु पैत्तिके वदन्ति नस्ये मधुरौषधैः कृतम् | तत्तर्पणे चैव हितं प्रयोजितं सजाङ्गलस्तेषु च यः पुटाह्वयः ||३८||

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Adhikarana 34 (39) · Śloka 39

রসাঞ্জনক্ষৌদ্রসিতামনঃশিলাঃ ক্ষুদ্রাঞ্জনং তন্মধুকেন সংযুতম্ |৩৯|

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रसाञ्जनक्षौद्रसितामनःशिलाः क्षुद्राञ्जनं तन्मधुकेन संयुतम् |३९|

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Adhikarana 35 (39) · Śloka 39

সমাঞ্জনং বা কনকারোদ্ভবং সুচূর্ণিতং শ্রেষ্ঠমুশন্তি তদ্বিদঃ ||৩৯||

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समाञ्जनं वा कनकारोद्भवं सुचूर्णितं श्रेष्ठमुशन्ति तद्विदः ||३९||

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Adhikarana 36 (40) · Śloka 40

ভিল্লোটগন্ধোদকসেকসেচিতং প্রত্যঞ্জনে চাত্র হিতং তু তুত্থকম্ |৪০|

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भिल्लोटगन्धोदकसेकसेचितं प्रत्यञ्जने चात्र हितं तु तुत्थकम् |४०|

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Adhikarana 37 (40) · Śloka 40

সমেষশৃঙ্গাঞ্জনভাগসম্মিতং জলোদ্ভবং কাচমলং ব্যপোহতি ||৪০||

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समेषशृङ्गाञ्जनभागसम्मितं जलोद्भवं काचमलं व्यपोहति ||४०||

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Adhikarana 38 (41) · Śloka 41

পলাশরোহীতমধূকজা রসাঃ ক্ষৌদ্রেণ যুক্তা মদিরাগ্রমিশ্রিতাঃ |৪১|

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पलाशरोहीतमधूकजा रसाः क्षौद्रेण युक्ता मदिराग्रमिश्रिताः |४१|

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Adhikarana 39 (41) · Śloka 41

উশীরলোধ্রত্রিফলাপ্রিযঙ্গুভিঃ পচেত্তু নস্যং কফরোগশান্তযে ||৪১||

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उशीरलोध्रत्रिफलाप्रियङ्गुभिः पचेत्तु नस्यं कफरोगशान्तये ||४१||

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Adhikarana 40 (42) · Śloka 42

বিডঙ্গপাঠাকিণিহীঙ্গুদীত্বচঃ প্রযোজযেদ্ধূমমুশীরসংযুতাঃ |৪২|

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विडङ्गपाठाकिणिहीङ्गुदीत्वचः प्रयोजयेद्धूममुशीरसंयुताः |४२|

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Adhikarana 41 (42) · Śloka 42

বনস্পতিক্বাথবিপাচিতং ঘৃতং হিতং হরিদ্রানলদে চ তর্পণম্ ||৪২||

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वनस्पतिक्वाथविपाचितं घृतं हितं हरिद्रानलदे च तर्पणम् ||४२||

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Adhikarana 42 (43) · Śloka 43

সমাগধো মাক্ষিকসৈন্ধবাঢ্যঃ সজাঙ্গলঃ স্যাত্ পুটপাক এব চ |৪৩|

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समागधो माक्षिकसैन्धवाढ्यः सजाङ्गलः स्यात् पुटपाक एव च |४३|

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Adhikarana 43 (43) · Śloka 43

মনঃশিলাত্র্যূষণশঙ্খমাক্ষিকৈঃ সসিন্ধুকাসীসরসাঞ্জনৈঃ ক্রিযাঃ ||৪৩||

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मनःशिलात्र्यूषणशङ्खमाक्षिकैः ससिन्धुकासीसरसाञ्जनैः क्रियाः ||४३||

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Adhikarana 44 (44) · Śloka 44

হিতে চ কাসীসরসাঞ্জনে তথা বদন্তি পথ্যে গুডনাগরৈর্যুতে |৪৪|

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हिते च कासीसरसाञ्जने तथा वदन्ति पथ्ये गुडनागरैर्युते |४४|

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Adhikarana 45 (44-45) · Śloka 45

যদঞ্জনং বা বহুশো নিষেচিতং সমূত্রবর্গে ত্রিফলোদকে শৃতে ||৪৪|| নিশাচরাস্থিস্থিতমেতদঞ্জনং ক্ষিপেচ্চ মাসং সলিলেঽস্থিরে পুনঃ | মেষস্য পুষ্পৈর্মধুকেন সংযুতং তদঞ্জনং সর্বকৃতে প্রযোজযেত্ ||৪৫||

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यदञ्जनं वा बहुशो निषेचितं समूत्रवर्गे त्रिफलोदके शृते ||४४|| निशाचरास्थिस्थितमेतदञ्जनं क्षिपेच्च मासं सलिलेऽस्थिरे पुनः | मेषस्य पुष्पैर्मधुकेन संयुतं तदञ्जनं सर्वकृते प्रयोजयेत् ||४५||

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Adhikarana 46 (46) · Śloka 46

ক্রিযাশ্চ সর্বাঃ, ক্ষতজোদ্ভবে হিতঃ ক্রমঃ পরিম্লাযিনি চাপি পিত্তহৃত্ |৪৬|

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क्रियाश्च सर्वाः, क्षतजोद्भवे हितः क्रमः परिम्लायिनि चापि पित्तहृत् |४६|

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Adhikarana 47 (46) · Śloka 46

ক্রমো হিতঃ স্যন্দহরঃ প্রযোজিতঃ সমীক্ষ্য দোষেষু যথাস্বমেব চ ||৪৬||

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क्रमो हितः स्यन्दहरः प्रयोजितः समीक्ष्य दोषेषु यथास्वमेव च ||४६||

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Adhikarana 48 (47) · Śloka 47

দোষোদযে নৈব চ বিপ্লতিঙ্গতে দ্রব্যাণি নস্যাদিষু যোজযেদ্বুধঃ |৪৭|

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दोषोदये नैव च विप्लतिङ्गते द्रव्याणि नस्यादिषु योजयेद्बुधः |४७|

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Adhikarana 49 (47) · Śloka 47

পুনশ্চ কল্পেঽঞ্জনবিস্তরঃ শুভঃ প্রবক্ষ্যতেঽন্যস্তমপীহ যোজযেত্ ||৪৭||

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पुनश्च कल्पेऽञ्जनविस्तरः शुभः प्रवक्ष्यतेऽन्यस्तमपीह योजयेत् ||४७||

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Adhikarana 50 (48) · Śloka 48

ঘৃতং পুরাণং ত্রিফলাং শতাবরীং পটোলমুদ্গামলকং যবানপি | নিষেবমাণস্য নরস্য যত্নতো ভযং সুঘোরাত্তিমিরান্ন বিদ্যতে ||৪৮||

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घृतं पुराणं त्रिफलां शतावरीं पटोलमुद्गामलकं यवानपि | निषेवमाणस्य नरस्य यत्नतो भयं सुघोरात्तिमिरान्न विद्यते ||४८||

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Adhikarana 51 (49) · Śloka 49

শতাবরীপাযস এব কেবলস্তথা কৃতো বাঽঽমলকেষু পাযসঃ | প্রভূতসর্পিস্ত্রিফলোদকোত্তরো যবৌদনো বা তিমিরং ব্যপোহতি ||৪৯||

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शतावरीपायस एव केवलस्तथा कृतो वाऽऽमलकेषु पायसः | प्रभूतसर्पिस्त्रिफलोदकोत्तरो यवौदनो वा तिमिरं व्यपोहति ||४९||

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Adhikarana 52 (50-51) · Śloka 51

জীবন্তিশাকং সুনিষণ্ণকং চ সতণ্ডুলীযং বরবাস্তুকং চ | চিল্লী তথা মূলকপোতিকা চ দৃষ্টের্হিতং শাকুনজাঙ্গলং চ ||৫০|| পটোলকর্কোটককারবেল্লবার্তাকুতর্কারিকরীরজানি | শাকানি শিগ্র্বার্তগলানি চৈব হিতানী দৃষ্টের্ঘৃতসাধিতানি ||৫১||

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जीवन्तिशाकं सुनिषण्णकं च सतण्डुलीयं वरवास्तुकं च | चिल्ली तथा मूलकपोतिका च दृष्टेर्हितं शाकुनजाङ्गलं च ||५०|| पटोलकर्कोटककारवेल्लवार्ताकुतर्कारिकरीरजानि | शाकानि शिग्र्वार्तगलानि चैव हितानी दृष्टेर्घृतसाधितानि ||५१||

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Adhikarana 53 (52) · Śloka 52

বিবর্জযেত্সিরামোক্ষং তিমিরে রাগমাগতে | যন্ত্রেণোত্পীডিতো দোষো নিহন্যাদাশু দর্শনম্ ||৫২||

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विवर्जयेत्सिरामोक्षं तिमिरे रागमागते | यन्त्रेणोत्पीडितो दोषो निहन्यादाशु दर्शनम् ||५२||

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Adhikarana 54 (53) · Śloka 53

অরাগি তিমিরং সাধ্যমাদ্যং পটলমাশ্রিতম্ | কৃচ্ছ্রং দ্বিতীযে রাগি স্যাত্তৃতীযে যাপ্যমুচ্যতে ||৫৩||

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अरागि तिमिरं साध्यमाद्यं पटलमाश्रितम् | कृच्छ्रं द्वितीये रागि स्यात्तृतीये याप्यमुच्यते ||५३||

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Adhikarana 55 (54) · Śloka 54

রাগপ্রাপ্তেষ্বপি হিতাস্তিমিরেষু তথা ক্রিযাঃ | যাপনার্থং যথোদ্দিষ্টাঃ সেব্যাশ্চাপি জলৌকসঃ ||৫৪||

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रागप्राप्तेष्वपि हितास्तिमिरेषु तथा क्रियाः | यापनार्थं यथोद्दिष्टाः सेव्याश्चापि जलौकसः ||५४||

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Adhikarana 56 (55-56) · Śloka 56

শ্লৈষ্মিকে লিঙ্গনাশে তু কর্ম বক্ষ্যামি সিদ্ধযে | ন চেদর্ধেন্দুঘর্মাম্বুবিন্দুমুক্তাকৃতিঃ স্থিরঃ ||৫৫|| বিষমো বা তনুর্মধ্যে রাজিমান্ বা বহুপ্রভঃ | দৃষ্টিস্থো লক্ষ্যতে দোষঃ সরুজো বা সলোহিতঃ ||৫৬||

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श्लैष्मिके लिङ्गनाशे तु कर्म वक्ष्यामि सिद्धये | न चेदर्धेन्दुघर्माम्बुबिन्दुमुक्ताकृतिः स्थिरः ||५५|| विषमो वा तनुर्मध्ये राजिमान् वा बहुप्रभः | दृष्टिस्थो लक्ष्यते दोषः सरुजो वा सलोहितः ||५६||

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Adhikarana 57 (57-60) · Śloka 61

স্নিগ্ধস্বিন্নস্য তস্যাথ কালে নাত্যুষ্ণশীতলে | যন্ত্রিতস্যোপবিষ্টস্য স্বাং নাসাং পশ্যতঃ সমম্ ||৫৭|| মতিমান্ শুক্লভাগৌ দ্বৌ কৃষ্ণান্মুক্ত্বা হ্যপাঙ্গতঃ | উন্মীল্য নযনে সম্যক্ সিরাজালবিবর্জিতে ||৫৮|| নাধো নোর্ধ্বং ন পার্শ্বাভ্যাং ছিদ্রে দৈবকৃতে ততঃ | শলাকযা প্রযত্নেন বিশ্বস্তং যববক্রযা ||৫৯|| মধ্যপ্রদেশিন্যঙ্গুষ্ঠস্থিরহস্তগৃহীতযা | দক্ষিণেন ভিষক্ সব্যং বিধ্যেত্ সব্যেন চেতরত্ ||৬০|| বারিবিন্দ্বাগমঃ সম্যগ্ ভবেচ্ছব্দস্তথা ব্যধে |৬১|

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स्निग्धस्विन्नस्य तस्याथ काले नात्युष्णशीतले | यन्त्रितस्योपविष्टस्य स्वां नासां पश्यतः समम् ||५७|| मतिमान् शुक्लभागौ द्वौ कृष्णान्मुक्त्वा ह्यपाङ्गतः | उन्मील्य नयने सम्यक् सिराजालविवर्जिते ||५८|| नाधो नोर्ध्वं न पार्श्वाभ्यां छिद्रे दैवकृते ततः | शलाकया प्रयत्नेन विश्वस्तं यववक्रया ||५९|| मध्यप्रदेशिन्यङ्गुष्ठस्थिरहस्तगृहीतया | दक्षिणेन भिषक् सव्यं विध्येत् सव्येन चेतरत् ||६०|| वारिबिन्द्वागमः सम्यग् भवेच्छब्दस्तथा व्यधे |६१|

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Adhikarana 58 (61-63) · Śloka 64

সংসিচ্য বিদ্ধমাত্রং তু যোষিত্স্তন্যেন কোবিদঃ ||৬১|| স্থিরে দোষে চলে বাঽপি স্বেদযেদক্ষি বাহ্যতঃ | সম্যক্ শলাকাং সংস্থাপ্য ভঙ্গৈরনিলনাশনৈঃ ||৬২|| শলাকাগ্রেণ তু ততো নির্লিখেদ্দৃষ্টিমণ্ডলম্ | বিধ্যতো যোঽন্যপার্শ্বেঽক্ষ্ণস্তং রুদ্ধ্বা নাসিকাপুটম্ ||৬৩|| উচ্ছিঙ্ঘনেন হর্তব্যো দৃষ্টিমণ্ডলগঃ কফঃ |৬৪|

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संसिच्य विद्धमात्रं तु योषित्स्तन्येन कोविदः ||६१|| स्थिरे दोषे चले वाऽपि स्वेदयेदक्षि बाह्यतः | सम्यक् शलाकां संस्थाप्य भङ्गैरनिलनाशनैः ||६२|| शलाकाग्रेण तु ततो निर्लिखेद्दृष्टिमण्डलम् | विध्यतो योऽन्यपार्श्वेऽक्ष्णस्तं रुद्ध्वा नासिकापुटम् ||६३|| उच्छिङ्घनेन हर्तव्यो दृष्टिमण्डलगः कफः |६४|

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Adhikarana 59 (64-68) · Śloka 68

নিরভ্র ইব ঘর্মাংশুর্যদা দৃষ্টিঃ প্রকাশতে ||৬৪|| তদাঽসৌ লিখিতা সম্যগ্ জ্ঞেযা যা চাপি নির্ব্যথা | (এবং ত্বশক্যে নির্হর্তুং দোষে প্রত্যাগতেঽপি বা ||৬৫|| স্নেহাদ্যৈরুপপন্নস্য ব্যধো ভূযো বিধীযতে) | ততো দৃষ্টেষু রূপেষু শলাকামাহরেচ্ছনৈঃ ||৬৬|| ঘৃতেনাভ্যজ্য নযনং বস্ত্রপট্টেন বেষ্টযেত্ | ততো গৃহে নিরাবাধে শযীতোত্তান এব চ ||৬৭|| উদ্গারকাসক্ষবথুষ্ঠীবনোত্কম্পনানি চ | তত্কালং নাচরেদূর্ধ্বং যন্ত্রণা স্নেহপীতবত্ ||৬৮||

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निरभ्र इव घर्मांशुर्यदा दृष्टिः प्रकाशते ||६४|| तदाऽसौ लिखिता सम्यग् ज्ञेया या चापि निर्व्यथा | (एवं त्वशक्ये निर्हर्तुं दोषे प्रत्यागतेऽपि वा ||६५|| स्नेहाद्यैरुपपन्नस्य व्यधो भूयो विधीयते) | ततो दृष्टेषु रूपेषु शलाकामाहरेच्छनैः ||६६|| घृतेनाभ्यज्य नयनं वस्त्रपट्टेन वेष्टयेत् | ततो गृहे निराबाधे शयीतोत्तान एव च ||६७|| उद्गारकासक्षवथुष्ठीवनोत्कम्पनानि च | तत्कालं नाचरेदूर्ध्वं यन्त्रणा स्नेहपीतवत् ||६८||

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Adhikarana 60 (69) · Śloka 69

ত্র্যহাত্ ত্র্যহাচ্চ ধাবেত কষাযৈরনিলাপহৈঃ | বাযোর্ভযাত্ ত্র্যহাদূর্ধ্বং স্বেদযেদক্ষি পূর্ববত্ ||৬৯||

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त्र्यहात् त्र्यहाच्च धावेत कषायैरनिलापहैः | वायोर्भयात् त्र्यहादूर्ध्वं स्वेदयेदक्षि पूर्ववत् ||६९||

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Adhikarana 61 (70) · Śloka 70

দশাহমেবং সংযম্য হিতং দৃষ্টিপ্রসাদনম্ | পশ্চাত্কর্ম চ সেবেত লঘ্বন্নং চাপি মাত্রযা ||৭০||

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दशाहमेवं संयम्य हितं दृष्टिप्रसादनम् | पश्चात्कर्म च सेवेत लघ्वन्नं चापि मात्रया ||७०||

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Adhikarana 62 (71) · Śloka 71

সিরাব্যধবিধৌ পূর্বং নরা যে চ বিবার্জিতাঃ | ন তেষাং নীলিকাং বিধ্যেদন্যত্রাভিহিতাদ্ভিষক্ ||৭১||

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सिराव्यधविधौ पूर्वं नरा ये च विवार्जिताः | न तेषां नीलिकां विध्येदन्यत्राभिहिताद्भिषक् ||७१||

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Adhikarana 63 (72) · Śloka 72

পূর্যতে শোণিতেনাক্ষি সিরাবেধাদ্বিসর্পতা | তত্র স্ত্রীস্তন্যযষ্ট্যাহ্বপক্বং সেকে হিতং ঘৃতম্ ||৭২||

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पूर्यते शोणितेनाक्षि सिरावेधाद्विसर्पता | तत्र स्त्रीस्तन्ययष्ट्याह्वपक्वं सेके हितं घृतम् ||७२||

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Adhikarana 64 (73-79) · Śloka 79

অপাঙ্গাসন্নবিদ্ধে তু শোফশূলাশ্রুরক্ততাঃ | তত্রোপনাহং ভ্রূমধ্যে কুর্যাচ্চোষ্ণাজ্যসেচনম্ ||৭৩|| ব্যধেনাসন্নকৃষ্ণেন রাগঃ কৃষ্ণং চ পীড্যতে | তত্রাধঃশোধনং সেকঃ সর্পিষা রক্তমোক্ষণম্ ||৭৪|| অথাপ্যুপরি বিদ্ধে তু কষ্টা রুক্ সম্প্রবর্ততে | তত্র কোষ্ণেন হবিষা পরিষেকঃ প্রশস্যতে ||৭৫|| শূলাশ্রুরাগাস্ত্বত্যর্থমধোবেধেন পিচ্ছিলঃ | শলাকামনু চাস্রাবস্তত্র পূর্বচিকিত্সিতম্ ||৭৬|| রাগাশ্রুবেদনাস্তম্ভহর্ষাশ্চাতিবিঘট্টিতে | স্নেহস্বেদৌ হিতৌ তত্র হিতং চাপ্যনুবাসনম্ ||৭৭|| দোষস্ত্বধোঽপকৃষ্টোঽপি তরুণঃ পুনরূর্ধ্বগঃ | কুর্যাচ্ছুক্লারুণং নেত্রং তীব্ররুঙ্নষ্টদর্শনম্ ||৭৮|| মধুরৈস্তত্র সিদ্ধেন ঘৃতেনাক্ষ্ণঃ প্রসেচনম্ | শিরোবস্তিং চ তেনৈব দদ্যান্মাংসৈশ্চ ভোজনম্ ||৭৯||

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अपाङ्गासन्नविद्धे तु शोफशूलाश्रुरक्तताः | तत्रोपनाहं भ्रूमध्ये कुर्याच्चोष्णाज्यसेचनम् ||७३|| व्यधेनासन्नकृष्णेन रागः कृष्णं च पीड्यते | तत्राधःशोधनं सेकः सर्पिषा रक्तमोक्षणम् ||७४|| अथाप्युपरि विद्धे तु कष्टा रुक् सम्प्रवर्तते | तत्र कोष्णेन हविषा परिषेकः प्रशस्यते ||७५|| शूलाश्रुरागास्त्वत्यर्थमधोवेधेन पिच्छिलः | शलाकामनु चास्रावस्तत्र पूर्वचिकित्सितम् ||७६|| रागाश्रुवेदनास्तम्भहर्षाश्चातिविघट्टिते | स्नेहस्वेदौ हितौ तत्र हितं चाप्यनुवासनम् ||७७|| दोषस्त्वधोऽपकृष्टोऽपि तरुणः पुनरूर्ध्वगः | कुर्याच्छुक्लारुणं नेत्रं तीव्ररुङ्नष्टदर्शनम् ||७८|| मधुरैस्तत्र सिद्धेन घृतेनाक्ष्णः प्रसेचनम् | शिरोबस्तिं च तेनैव दद्यान्मांसैश्च भोजनम् ||७९||

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Adhikarana 65 (80) · Śloka 80

দোষস্তু সঞ্জাতবলো ঘনঃ সম্পূর্ণমণ্ডলঃ | প্রাপ্য নশ্যেচ্ছলাকাগ্রং তন্বভ্রমিব মারুতম্ ||৮০||

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दोषस्तु सञ्जातबलो घनः सम्पूर्णमण्डलः | प्राप्य नश्येच्छलाकाग्रं तन्वभ्रमिव मारुतम् ||८०||

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Adhikarana 66 (81) · Śloka 81

মূর্ধাভিঘাতব্যাযামব্যবাযবমিমূর্চ্ছনৈঃ | দোষঃ প্রত্যেতি কোপাচ্চ বিদ্ধোঽতিতরুণশ্চ যঃ ||৮১||

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मूर्धाभिघातव्यायामव्यवायवमिमूर्च्छनैः | दोषः प्रत्येति कोपाच्च विद्धोऽतितरुणश्च यः ||८१||

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Adhikarana 67 (82) · Śloka 83

শলাকা কর্কশা শূলং, খরা দোষপরিপ্লুতিম্ | ব্রণং বিশালং স্থূলাগ্রা, তীক্ষ্ণা হিংস্যাদনেকধা ||৮২|| জলাস্রাবং তু বিষমা, ক্রিযাসঙ্গমথাস্থিরা | করোতি ... |৮৩|

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शलाका कर्कशा शूलं, खरा दोषपरिप्लुतिम् | व्रणं विशालं स्थूलाग्रा, तीक्ष्णा हिंस्यादनेकधा ||८२|| जलास्रावं तु विषमा, क्रियासङ्गमथास्थिरा | करोति ... |८३|

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Adhikarana 68 (83-84) · Śloka 85

... বর্জিতা দোষৈস্তস্মাদেভির্হিতা ভবেত্ ||৮৩|| অষ্টাঙ্গুলাযতা মধ্যে সূত্রেণ পরিবেষ্টিতা | অঙ্গুষ্ঠপর্বসমিতা বক্ত্রযোর্মুকুলাকৃতিঃ ||৮৪|| তাম্রাযসী শাতকুম্ভী শলাকা স্যাদনিন্দিতা |৮৫|

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... वर्जिता दोषैस्तस्मादेभिर्हिता भवेत् ||८३|| अष्टाङ्गुलायता मध्ये सूत्रेण परिवेष्टिता | अङ्गुष्ठपर्वसमिता वक्त्रयोर्मुकुलाकृतिः ||८४|| ताम्रायसी शातकुम्भी शलाका स्यादनिन्दिता |८५|

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Adhikarana 69 (85-86) · Śloka 86

রাগঃ শোফোঽর্বুদং চোষো বুদ্বুদং শূকরাক্ষিতা ||৮৫|| অধিমন্থাদযশ্চান্যে রোগাঃ স্যুর্ব্যধদোষজাঃ | অহিতাচারতো বাঽপি যথাস্বং তানুপাচরেত্ ||৮৬||

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रागः शोफोऽर्बुदं चोषो बुद्बुदं शूकराक्षिता ||८५|| अधिमन्थादयश्चान्ये रोगाः स्युर्व्यधदोषजाः | अहिताचारतो वाऽपि यथास्वं तानुपाचरेत् ||८६||

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Adhikarana 70 (87-94) · Śloka 94

রুজাযামক্ষিরাগে বা যোগান্ ভূযো নিবোধ মে | গৈরিকং সারিবা দূর্বা যবপিষ্টং ঘৃতং পযঃ ||৮৭|| সুখালেপঃ প্রযোজ্যোঽযং বেদনারাগশান্তযে | মৃদুভৃষ্টৈস্তিলৈর্বাঽপি সিদ্ধার্থকসমাযুতৈঃ ||৮৮|| মাতুলুঙ্গরসোপেতৈঃ সুখালেপস্তদর্থকৃত্ | পযস্যাসারিবাপত্রমঞ্জিষ্ঠামধুকৈরপি ||৮৯|| অজাক্ষীরান্বিতৈর্লেপঃ সুখোষ্ণঃ পথ্য উচ্যতে | দারুপদ্মকশুণ্ঠীভিরেবমেব কৃতোঽপি বা ||৯০|| দ্রাক্ষামধুককুষ্ঠৈর্বা তদ্বত্ সৈন্ধবসংযুতৈঃ | রোধ্রসৈন্ধবমৃদ্বীকামধুকৈর্বাঽপ্যজাপযঃ ||৯১|| শৃতং সেকে প্রযোক্তব্যং রুজারাগনিবারণম্ | মধুকোত্পলকুষ্ঠৈর্বা দ্রাক্ষালাক্ষাসিতাযুতৈঃ | সসৈন্ধবৈঃ শৃতং ক্ষীরং রুজারাগনিবর্হণম্ ||৯২|| শতাবরীপৃথক্পর্ণীমুস্তামলকপদ্মকৈঃ | সাজক্ষীরৈঃ শৃতং সর্পির্দাহশূলনিবর্হণম্ ||৯৩|| বাতঘ্নসিদ্ধে পযসি সিদ্ধং সর্পিশ্চতুর্গুণে | কাকোল্যাদিপ্রতীবাপং তদ্যুঞ্জ্যাত্ সর্বকর্মসু ||৯৪||

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रुजायामक्षिरागे वा योगान् भूयो निबोध मे | गैरिकं सारिवा दूर्वा यवपिष्टं घृतं पयः ||८७|| सुखालेपः प्रयोज्योऽयं वेदनारागशान्तये | मृदुभृष्टैस्तिलैर्वाऽपि सिद्धार्थकसमायुतैः ||८८|| मातुलुङ्गरसोपेतैः सुखालेपस्तदर्थकृत् | पयस्यासारिवापत्रमञ्जिष्ठामधुकैरपि ||८९|| अजाक्षीरान्वितैर्लेपः सुखोष्णः पथ्य उच्यते | दारुपद्मकशुण्ठीभिरेवमेव कृतोऽपि वा ||९०|| द्राक्षामधुककुष्ठैर्वा तद्वत् सैन्धवसंयुतैः | रोध्रसैन्धवमृद्वीकामधुकैर्वाऽप्यजापयः ||९१|| शृतं सेके प्रयोक्तव्यं रुजारागनिवारणम् | मधुकोत्पलकुष्ठैर्वा द्राक्षालाक्षासितायुतैः | ससैन्धवैः शृतं क्षीरं रुजारागनिबर्हणम् ||९२|| शतावरीपृथक्पर्णीमुस्तामलकपद्मकैः | साजक्षीरैः शृतं सर्पिर्दाहशूलनिबर्हणम् ||९३|| वातघ्नसिद्धे पयसि सिद्धं सर्पिश्चतुर्गुणे | काकोल्यादिप्रतीवापं तद्युञ्ज्यात् सर्वकर्मसु ||९४||

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Adhikarana 71 (95) · Śloka 95

শাম্যত্যেবং ন চেচ্ছূলং স্নিগ্ধস্বিন্নস্য মোক্ষযেত্ | ততঃ সিরাং দহেদ্বাঽপি মতিমান্ কীর্তিতং যথা ||৯৫||

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शाम्यत्येवं न चेच्छूलं स्निग्धस्विन्नस्य मोक्षयेत् | ततः सिरां दहेद्वाऽपि मतिमान् कीर्तितं यथा ||९५||

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Adhikarana 72 (96-99) · Śloka 99

দৃষ্টেরতঃ প্রসাদার্থমঞ্জনে শৃণু মে শুভে | মেষশৃঙ্গস্য পুষ্পাণি শিরীষধবযোরপি ||৯৬|| সুমনাযাশ্চ পুষ্পাণি মুক্তা বৈদূর্যমেব চ | অজাক্ষীরেণ সম্পিষ্য তাম্রে সপ্তাহমাবপেত্ ||৯৭|| প্রবিধায চ তদ্বর্তীর্যোজযেচ্চাঞ্জনে ভিষক্ | স্রোতোজং বিদ্রুমং ফেনং সাগরস্য মনঃশিলাম্ ||৯৮|| মরিচানি চ তদ্বর্তীঃ কারযেচ্চাপি পূর্ববত্ | দৃষ্টিস্থৈর্যার্থমেতত্তু বিদধ্যাদঞ্জনে হিতম্ ||৯৯||

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दृष्टेरतः प्रसादार्थमञ्जने शृणु मे शुभे | मेषशृङ्गस्य पुष्पाणि शिरीषधवयोरपि ||९६|| सुमनायाश्च पुष्पाणि मुक्ता वैदूर्यमेव च | अजाक्षीरेण सम्पिष्य ताम्रे सप्ताहमावपेत् ||९७|| प्रविधाय च तद्वर्तीर्योजयेच्चाञ्जने भिषक् | स्रोतोजं विद्रुमं फेनं सागरस्य मनःशिलाम् ||९८|| मरिचानि च तद्वर्तीः कारयेच्चापि पूर्ववत् | दृष्टिस्थैर्यार्थमेतत्तु विदध्यादञ्जने हितम् ||९९||

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Adhikarana 73 (100) · Śloka 100

ভূযো বক্ষ্যামি মুখ্যানি বিস্তরেণাঞ্জনানি চ | কল্পে নানাপ্রকারাণি তান্যপীহ প্রযোজযেত্ ||১০০||

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भूयो वक्ष्यामि मुख्यानि विस्तरेणाञ्जनानि च | कल्पे नानाप्रकाराणि तान्यपीह प्रयोजयेत् ||१००||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 17

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযামুত্তরতন্ত্রান্তর্গতে শালাক্যতন্ত্রে দৃষ্টিগতরোগবিজ্ঞানীযো নাম সপ্তদশোঽধ্যাযঃ ||১৭||

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इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते शालाक्यतन्त्रे दृष्टिगतरोगविज्ञानीयो नाम सप्तदशोऽध्यायः ||१७||

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