Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ ক্রিযাকল্পং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
View original
अथातः क्रियाकल्पं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ ক্রিযাকল্পং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातः क्रियाकल्पं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
সর্বশাস্ত্রার্থতত্ত্বজ্ঞস্তপোদৃষ্টিরুদারধীঃ | বৈশ্বামিত্রং শশাসাথ শিষ্যং কাশিপতির্মুনিঃ ||৩||
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञस्तपोदृष्टिरुदारधीः | वैश्वामित्रं शशासाथ शिष्यं काशिपतिर्मुनिः ||३||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
তর্পণং পুটপাকশ্চ সেক আশ্চ্যোতনাঞ্জনে | তত্র তত্রোপদিষ্টানি তেষাং ব্যাসং নিবোধ মে ||৪||
तर्पणं पुटपाकश्च सेक आश्च्योतनाञ्जने | तत्र तत्रोपदिष्टानि तेषां व्यासं निबोध मे ||४||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 4 (5-11) · Śloka 11
সংশুদ্ধদেহশিরসো জীর্ণান্নস্য শুভে দিনে | পূর্বাহ্ণে বাঽপরাহ্ণে বা কার্যমক্ষ্ণোস্তু তর্পণম্ ||৫|| বাতাতপরজোহীনে বেশ্মন্যুত্তানশাযিনঃ | আধারৌ মাষচূর্ণেন ক্লিন্নেন পরিমণ্ডলৌ ||৬|| সমৌ দৃঢাবসম্বাধৌ কর্তব্যৌ নেত্রকোশযোঃ | পূরযেদ্ঘৃতমণ্ডস্য বিলীনস্য সুখোদকে ||৭|| আপক্ষ্মাগ্রাত্ততঃ স্থাপ্যং পঞ্চ তদ্বাক্শতানি তু | স্বস্থে, কফে ষট্, পিত্তেঽষ্টৌ, দশ বাতে তদুত্তমম্ ||৮|| রোগস্থানবিশেষেণ কেচিত্ কালং প্রচক্ষতে | যথাক্রমোপদিষ্টেষু ত্রীণ্যেকং পঞ্চ সপ্ত চ ||৯|| দশ দৃষ্ট্যামথাষ্টৌ চ বাক্শতানি বিভাবযেত্ | ততশ্চাপাঙ্গতঃ স্নেহং স্রাবযিত্বাঽক্ষি শোধযেত্ ||১০|| স্বিন্নেন যবপিষ্টেন, স্নেহবীর্যেরিতং ততঃ | যথাস্বং ধূমপানেন কফমস্য বিশোধযেত্ ||১১||
संशुद्धदेहशिरसो जीर्णान्नस्य शुभे दिने | पूर्वाह्णे वाऽपराह्णे वा कार्यमक्ष्णोस्तु तर्पणम् ||५|| वातातपरजोहीने वेश्मन्युत्तानशायिनः | आधारौ माषचूर्णेन क्लिन्नेन परिमण्डलौ ||६|| समौ दृढावसम्बाधौ कर्तव्यौ नेत्रकोशयोः | पूरयेद्घृतमण्डस्य विलीनस्य सुखोदके ||७|| आपक्ष्माग्रात्ततः स्थाप्यं पञ्च तद्वाक्शतानि तु | स्वस्थे, कफे षट्, पित्तेऽष्टौ, दश वाते तदुत्तमम् ||८|| रोगस्थानविशेषेण केचित् कालं प्रचक्षते | यथाक्रमोपदिष्टेषु त्रीण्येकं पञ्च सप्त च ||९|| दश दृष्ट्यामथाष्टौ च वाक्शतानि विभावयेत् | ततश्चापाङ्गतः स्नेहं स्रावयित्वाऽक्षि शोधयेत् ||१०|| स्विन्नेन यवपिष्टेन, स्नेहवीर्येरितं ततः | यथास्वं धूमपानेन कफमस्य विशोधयेत् ||११||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 5 (12) · Śloka 12
একাহং বা ত্র্যহং বাঽপি পঞ্চাহং চেষ্যতে পরম্ |১২|
एकाहं वा त्र्यहं वाऽपि पञ्चाहं चेष्यते परम् |१२|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 6 (12-13) · Śloka 13
তর্পণে তৃপ্তিলিঙ্গানি নেত্রস্যেমানি লক্ষযেত্ ||১২|| সুখস্বপ্নাববোধত্বং বৈশদ্যং বর্ণপাটবম্ | নির্বৃতির্ব্যাধিবিধ্বংসঃ ক্রিযালাঘবমেব চ ||১৩||
तर्पणे तृप्तिलिङ्गानि नेत्रस्येमानि लक्षयेत् ||१२|| सुखस्वप्नावबोधत्वं वैशद्यं वर्णपाटवम् | निर्वृतिर्व्याधिविध्वंसः क्रियालाघवमेव च ||१३||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 7 (14) · Śloka 14
গুর্বাবিলমতিস্নিগ্ধমশ্রুকণ্ডূপদেহবত্ | জ্ঞেযং দোষসমুত্ক্লিষ্টং নেত্রমত্যর্থতর্পিতম্ ||১৪||
गुर्वाविलमतिस्निग्धमश्रुकण्डूपदेहवत् | ज्ञेयं दोषसमुत्क्लिष्टं नेत्रमत्यर्थतर्पितम् ||१४||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 8 (15) · Śloka 15
রূক্ষমাবিলমস্রাঢ্যমসহং রূপদর্শনে | ব্যাধিবৃদ্ধিশ্চ তজ্জ্ঞেযং হীনতর্পিতমক্ষি চ ||১৫||
रूक्षमाविलमस्राढ्यमसहं रूपदर्शने | व्याधिवृद्धिश्च तज्ज्ञेयं हीनतर्पितमक्षि च ||१५||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 9 (16) · Śloka 16
অনযোর্দোষবাহুল্যাত্ প্রযতেত চিকিত্সিতে | ধূমনস্যাঞ্জনৈঃ সেকৈ রূক্ষৈঃ স্নিগ্ধৈশ্চ যোগবিত্ ||১৬||
अनयोर्दोषबाहुल्यात् प्रयतेत चिकित्सिते | धूमनस्याञ्जनैः सेकै रूक्षैः स्निग्धैश्च योगवित् ||१६||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 10 (17) · Śloka 18
তাম্যত্যতিবিশুষ্কং যদ্রূক্ষং যচ্চাতিদারুণম্ | শীর্ণপক্ষ্মাবিলং জিহ্মং রোগক্লিষ্টং চ যদ্ভৃশম্ ||১৭|| তদক্ষি তর্পণাদেব লভেতোর্জামসংশযম্ |১৮|
ताम्यत्यतिविशुष्कं यद्रूक्षं यच्चातिदारुणम् | शीर्णपक्ष्माविलं जिह्मं रोगक्लिष्टं च यद्भृशम् ||१७|| तदक्षि तर्पणादेव लभेतोर्जामसंशयम् |१८|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 11 (18) · Śloka 19
দুর্দিনাত্যুষ্ণশীতেষু চিন্তাযাসভ্রমেষু চ ||১৮|| অশান্তোপদ্রবে চাক্ষ্ণি তর্পণং ন প্রশস্যতে |১৯|
दुर्दिनात्युष्णशीतेषु चिन्तायासभ्रमेषु च ||१८|| अशान्तोपद्रवे चाक्ष्णि तर्पणं न प्रशस्यते |१९|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 12 (19) · Śloka 20
পুটপাকস্তথৈতেষু, নস্যং যেষু চ গর্হিতম্ ||১৯|| তর্পণার্হা ন যে প্রোক্তাঃ স্নেহপানাক্ষমাশ্চ যে |২০|
पुटपाकस्तथैतेषु, नस्यं येषु च गर्हितम् ||१९|| तर्पणार्हा न ये प्रोक्ताः स्नेहपानाक्षमाश्च ये |२०|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 13 (20-21) · Śloka 21
ততঃ প্রশান্তদোষেষু পুটপাকক্ষমেষু চ ||২০|| পুটপাকঃ প্রযোক্তব্যো নেত্রেষু ভিষজা ভবেত্ | স্নেহনো লেখনীযশ্চ রোপণীযশ্চ স ত্রিধা ||২১||
ततः प्रशान्तदोषेषु पुटपाकक्षमेषु च ||२०|| पुटपाकः प्रयोक्तव्यो नेत्रेषु भिषजा भवेत् | स्नेहनो लेखनीयश्च रोपणीयश्च स त्रिधा ||२१||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 14 (22) · Śloka 22
হিতঃ স্নিগ্ধোঽতিরূক্ষস্য স্নিগ্ধস্যাপি চ লেখনঃ | দৃষ্টের্বলার্থমপরঃ পিত্তাসৃগ্ব্রণবাতনুত্ ||২২||
हितः स्निग्धोऽतिरूक्षस्य स्निग्धस्यापि च लेखनः | दृष्टेर्बलार्थमपरः पित्तासृग्व्रणवातनुत् ||२२||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 15 (23) · Śloka 23
স্নেহমাংসবসামজ্জমেদঃস্বাদ্বৌষধৈঃ কৃতঃ | স্নেহনঃ পুটপাকস্তু ধার্যো দ্বে বাক্শতে তু সঃ ||২৩||
स्नेहमांसवसामज्जमेदःस्वाद्वौषधैः कृतः | स्नेहनः पुटपाकस्तु धार्यो द्वे वाक्शते तु सः ||२३||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 16 (24-25) · Śloka 25
জাঙ্গলানাং যকৃন্মাংসৈর্লেখনদ্রব্যসম্ভৃতৈঃ | কৃষ্ণলোহরজস্তাম্রশঙ্খবিদ্রুমসিন্ধুজৈঃ ||২৪|| সমুদ্রফেনকাসীসস্রোতোজদধিমস্তুভিঃ | লেখনো বাক্শতং তস্য পরং ধারণমুচ্যতে ||২৫||
जाङ्गलानां यकृन्मांसैर्लेखनद्रव्यसम्भृतैः | कृष्णलोहरजस्ताम्रशङ्खविद्रुमसिन्धुजैः ||२४|| समुद्रफेनकासीसस्रोतोजदधिमस्तुभिः | लेखनो वाक्शतं तस्य परं धारणमुच्यते ||२५||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 17 (26) · Śloka 26
স্তন্যজাঙ্গলমধ্বাজ্যতিক্তদ্রব্যবিপাচিতঃ | লেখনাত্ত্রিগুণং ধার্যঃ পুটপাকস্তু রোপণঃ ||২৬||
स्तन्यजाङ्गलमध्वाज्यतिक्तद्रव्यविपाचितः | लेखनात्त्रिगुणं धार्यः पुटपाकस्तु रोपणः ||२६||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 18 (27) · Śloka 27
বিতরেত্তর্পণোক্তং তু ধূমং হিত্বা তু রোপণম্ | স্নেহস্বেদৌ দ্বযোঃ কার্যৌ, কার্যো নৈব চ রোপণে ||২৭||
वितरेत्तर्पणोक्तं तु धूमं हित्वा तु रोपणम् | स्नेहस्वेदौ द्वयोः कार्यौ, कार्यो नैव च रोपणे ||२७||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 19 (28) · Śloka 28
একাহং বা দ্ব্যহং বাঽপি ত্র্যহং বাঽপ্যবচারণম্ |২৮|
एकाहं वा द्व्यहं वाऽपि त्र्यहं वाऽप्यवचारणम् |२८|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 20 (28) · Śloka 28
যন্ত্রণা তু ক্রিযাকালাদ্দ্বিগুণং কালমিষ্যতে ||২৮||
यन्त्रणा तु क्रियाकालाद्द्विगुणं कालमिष्यते ||२८||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 21 (29) · Śloka 29
তেজাংস্যনিলমাকাশমাদর্শং ভাস্বরাণি চ | নেক্ষেত তর্পিতে নেত্রে পুটপাককৃতে তথা ||২৯||
तेजांस्यनिलमाकाशमादर्शं भास्वराणि च | नेक्षेत तर्पिते नेत्रे पुटपाककृते तथा ||२९||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 22 (30) · Śloka 30
মিথ্যোপচারাদনযোর্যো ব্যাধিরুপজাযতে | অঞ্জনাশ্চ্যোতনস্বেদৈর্যথাস্বং তমুপাচরেত্ ||৩০||
मिथ्योपचारादनयोर्यो व्याधिरुपजायते | अञ्जनाश्च्योतनस्वेदैर्यथास्वं तमुपाचरेत् ||३०||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 23 (31) · Śloka 31
প্রসন্নবর্ণং বিশদং বাতাতপসহং লঘু | সুখস্বপ্নাববোধ্যক্ষি পুটপাকগুণান্বিতম্ ||৩১||
प्रसन्नवर्णं विशदं वातातपसहं लघु | सुखस्वप्नावबोध्यक्षि पुटपाकगुणान्वितम् ||३१||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 24 (32) · Śloka 32
অতিযোগাদ্রুজঃ শোফঃ পিডকাস্তিমিরোদ্গমঃ |৩২|
अतियोगाद्रुजः शोफः पिडकास्तिमिरोद्गमः |३२|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 25 (32) · Śloka 32
পাকোঽশ্রু হর্ষণং চাপি হীনে দোষোদ্গমস্তথা ||৩২||
पाकोऽश्रु हर्षणं चापि हीने दोषोद्गमस्तथा ||३२||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 26 (33-38) · Śloka 38
অত ঊর্ধ্বং প্রবক্ষ্যামি পুটপাকপ্রসাধনম্ | দ্বৌ বিল্বমাত্রৌ শ্লক্ষ্ণস্য পিণ্ডৌ মাংসস্য পেষিতৌ ||৩৩|| দ্রব্যাণাং বিল্বমাত্রং তু দ্রবাণাং কুডবো মতঃ | তদৈকধ্যং সমালোড্য পত্রৈঃ সুপরিবেষ্টিতম্ ||৩৪|| (কাশ্মরীকুমুদৈরণ্ডপদ্মিনীকদলীভবৈঃ ) | মৃদাবলিপ্তমঙ্গারৈঃ খাদিরৈরবকূলযেত্ ||৩৫|| কতকাশ্মন্তকৈরণ্ডপাটলাবৃষবাদরৈঃ | সক্ষীরদ্রুমকাষ্ঠৈর্বা গোমযৈর্বাঽপি যুক্তিতঃ ||৩৬|| স্বিন্নমুদ্ধৃত্য নিষ্পীড্য রসমাদায তং নৃণাম্ | তর্পণোক্তেন বিধিনা যথাবদবচারযেত্ ||৩৭|| কনীনকে নিষেচ্যঃ স্যান্নিত্যমুত্তানশাযিনঃ | রক্তে পিত্তে চ তৌ শীতৌ কোষ্ণৌ বাতকফাপহৌ ||৩৮||
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि पुटपाकप्रसाधनम् | द्वौ बिल्वमात्रौ श्लक्ष्णस्य पिण्डौ मांसस्य पेषितौ ||३३|| द्रव्याणां बिल्वमात्रं तु द्रवाणां कुडवो मतः | तदैकध्यं समालोड्य पत्रैः सुपरिवेष्टितम् ||३४|| (काश्मरीकुमुदैरण्डपद्मिनीकदलीभवैः ) | मृदावलिप्तमङ्गारैः खादिरैरवकूलयेत् ||३५|| कतकाश्मन्तकैरण्डपाटलावृषबादरैः | सक्षीरद्रुमकाष्ठैर्वा गोमयैर्वाऽपि युक्तितः ||३६|| स्विन्नमुद्धृत्य निष्पीड्य रसमादाय तं नृणाम् | तर्पणोक्तेन विधिना यथावदवचारयेत् ||३७|| कनीनके निषेच्यः स्यान्नित्यमुत्तानशायिनः | रक्ते पित्ते च तौ शीतौ कोष्णौ वातकफापहौ ||३८||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 27 (39-40) · Śloka 40
অত্যুষ্ণতীক্ষ্ণৌ সততং দাহপাককরৌ স্মৃতৌ | অপ্লুতৌ শীতলৌ চাশ্রুস্তম্ভরুগ্ঘর্ষকারকৌ ||৩৯|| অতিমাত্রৌ কষাযত্বসঙ্কোচস্ফুরণাবহৌ | হীনপ্রমাণৌ দোষাণামুত্ক্লেশজননৌ ভৃশম্ ||৪০||
अत्युष्णतीक्ष्णौ सततं दाहपाककरौ स्मृतौ | अप्लुतौ शीतलौ चाश्रुस्तम्भरुग्घर्षकारकौ ||३९|| अतिमात्रौ कषायत्वसङ्कोचस्फुरणावहौ | हीनप्रमाणौ दोषाणामुत्क्लेशजननौ भृशम् ||४०||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 28 (41) · Śloka 42
যুক্তৌ কৃতৌ দাহশোফরুগ্ধর্ষস্রাবনাশনৌ | কণ্ডূপদেহদূষীকারক্তরাজিবিনাশনৌ ||৪১|| তস্মাত্ পরিহরন্ দোষান্ বিদধ্যাত্তৌ সুখাবহৌ |৪২|
युक्तौ कृतौ दाहशोफरुग्धर्षस्रावनाशनौ | कण्डूपदेहदूषीकारक्तराजिविनाशनौ ||४१|| तस्मात् परिहरन् दोषान् विदध्यात्तौ सुखावहौ |४२|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 29 (42) · Śloka 42
ব্যাপদশ্চ যথাদোষং নস্যধূমাঞ্জনৈর্জযেত্ ||৪২||
व्यापदश्च यथादोषं नस्यधूमाञ्जनैर्जयेत् ||४२||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 30 (43) · Śloka 43
আদ্যন্তযোশ্চাপ্যনযোঃ স্বেদ উষ্ণাম্বুচৈলিকঃ | তথা হিতোঽবসানে চ ধূমঃ শ্লেষ্মসমুচ্ছ্রিতৌ ||৪৩||
आद्यन्तयोश्चाप्यनयोः स्वेद उष्णाम्बुचैलिकः | तथा हितोऽवसाने च धूमः श्लेष्मसमुच्छ्रितौ ||४३||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 31 (44) · Śloka 44
যথাদোষোপযুক্তং তু নাতিপ্রবলমোজসা | রোগমাশ্চ্যোতনং হন্তি সেকস্তু বলবত্তরম্ ||৪৪||
यथादोषोपयुक्तं तु नातिप्रबलमोजसा | रोगमाश्च्योतनं हन्ति सेकस्तु बलवत्तरम् ||४४||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 32 (45) · Śloka 45
তৌ ত্রিধৈবোপযুজ্যেতে রোগেষু পুটপাকবত্ |৪৫|
तौ त्रिधैवोपयुज्येते रोगेषु पुटपाकवत् |४५|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 33 (45) · Śloka 46
লেখনে সপ্ত চাষ্টৌ বা বিন্দবঃ স্নৈহিকে দশ ||৪৫|| আশ্চ্যোতনে প্রযোক্তব্যা দ্বাদশৈব তু রোপণে |৪৬|
लेखने सप्त चाष्टौ वा बिन्दवः स्नैहिके दश ||४५|| आश्च्योतने प्रयोक्तव्या द्वादशैव तु रोपणे |४६|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 34 (46) · Śloka 46
সেকস্য দ্বিগুণঃ কালঃ পুটপাকাত্ পরো মতঃ ||৪৬||
सेकस्य द्विगुणः कालः पुटपाकात् परो मतः ||४६||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 35 (47) · Śloka 47
অথবা কার্যনির্বৃত্তেরুপযোগো যথাক্রমম্ |৪৭|
अथवा कार्यनिर्वृत्तेरुपयोगो यथाक्रमम् |४७|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 36 (47) · Śloka 47
পূর্বাপরাহ্ণে মধ্যাহ্নে রুজাকালেষু চোভযোঃ ||৪৭||
पूर्वापराह्णे मध्याह्ने रुजाकालेषु चोभयोः ||४७||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 37 (48) · Śloka 48
যোগাযোগাত্ স্নেহসেকে তর্পণোক্তান্ প্রচক্ষতে |৪৮|
योगायोगात् स्नेहसेके तर्पणोक्तान् प्रचक्षते |४८|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 38 (47-50) · Śloka 51
রোগাঞ্ছিরসি সম্ভূতান্ হত্বাঽতিপ্রবলান্ গুণান্ ||৪৮|| করোতি শিরসো বস্তিরুক্তা যে মূর্ধতৈলিকাঃ | শুদ্ধদেহস্য সাযাহ্নে যথাব্যাধ্যশিতস্য তু ||৪৯|| ঋজ্বাসীনস্য বধ্নীযাদ্বস্তিকোশং ততো দৃঢম্ | যথাব্যাধিশৃতস্নেহপূর্ণং সংযম্য ধারযেত্ ||৫০|| তর্পণোক্তং দশগুণং যথাদোষং বিধানবিত্ |৫১|
रोगाञ्छिरसि सम्भूतान् हत्वाऽतिप्रबलान् गुणान् ||४८|| करोति शिरसो बस्तिरुक्ता ये मूर्धतैलिकाः | शुद्धदेहस्य सायाह्ने यथाव्याध्यशितस्य तु ||४९|| ऋज्वासीनस्य बध्नीयाद्वस्तिकोशं ततो दृढम् | यथाव्याधिशृतस्नेहपूर्णं संयम्य धारयेत् ||५०|| तर्पणोक्तं दशगुणं यथादोषं विधानवित् |५१|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 39 (51-52) · Śloka 52
ব্যক্তরূপেষু দোষেষু শুদ্ধকাযস্য কেবলে ||৫১|| নেত্র এব স্থিতে দোষে প্রাপ্তমঞ্জনমাচরেত্ | লেখনং রোপণং চাপি প্রসাদনমথাপি বা ||৫২||
व्यक्तरूपेषु दोषेषु शुद्धकायस्य केवले ||५१|| नेत्र एव स्थिते दोषे प्राप्तमञ्जनमाचरेत् | लेखनं रोपणं चापि प्रसादनमथापि वा ||५२||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 40 (53) · Śloka 53
তত্র পঞ্চ রসান্ ব্যস্তানাদ্যৈকরসবর্জিতান্ | পঞ্চধা লেখনং যুঞ্জ্যাদ্যথাদোষমতন্দ্রিতঃ ||৫৩||
तत्र पञ्च रसान् व्यस्तानाद्यैकरसवर्जितान् | पञ्चधा लेखनं युञ्ज्याद्यथादोषमतन्द्रितः ||५३||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 41 (54) · Śloka 54
নেত্রবর্ত্মসিরাকোশস্রোতঃশৃঙ্গাটকাশ্রিতম্ | মুখনাসাক্ষিভির্দোষমোজসা স্রাবযেত্তু তত্ ||৫৪||
नेत्रवर्त्मसिराकोशस्रोतःशृङ्गाटकाश्रितम् | मुखनासाक्षिभिर्दोषमोजसा स्रावयेत्तु तत् ||५४||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 42 (55) · Śloka 55
কষাযং তিক্তকং বাঽপি সস্নেহং রোপণং মতম্ | তত্স্নেহশৈত্যাদ্বর্ণ্যং স্যাদ্দৃষ্টেশ্চ বলবর্ধনম্ ||৫৫||
कषायं तिक्तकं वाऽपि सस्नेहं रोपणं मतम् | तत्स्नेहशैत्याद्वर्ण्यं स्याद्दृष्टेश्च बलवर्धनम् ||५५||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 43 (56) · Śloka 56
মধুরং স্নেহসম্পন্নমঞ্জনং তু প্রসাদনম্ | দৃষ্টিদোষপ্রসাদার্থং স্নেহনার্থং চ তদ্ধিতম্ ||৫৬||
मधुरं स्नेहसम्पन्नमञ्जनं तु प्रसादनम् | दृष्टिदोषप्रसादार्थं स्नेहनार्थं च तद्धितम् ||५६||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 44 (57) · Śloka 57
যথাদোষং প্রযোজ্যানি তানি রোগবিশারদৈঃ | অঞ্জনানি যথোক্তানি প্রাহ্ণসাযাহ্নরাত্রিষু ||৫৭||
यथादोषं प्रयोज्यानि तानि रोगविशारदैः | अञ्जनानि यथोक्तानि प्राह्णसायाह्नरात्रिषु ||५७||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 45 (58) · Śloka 58
গুটিকারসচূর্ণানি ত্রিবিধান্যঞ্জনানি তু | যথাপূর্বং বলং তেষাং শ্রেষ্ঠমাহুর্মনীষিণঃ ||৫৮||
गुटिकारसचूर्णानि त्रिविधान्यञ्जनानि तु | यथापूर्वं बलं तेषां श्रेष्ठमाहुर्मनीषिणः ||५८||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 46 (59) · Śloka 59
হরেণুমাত্রা বর্তিঃ স্যাল্লেখনস্য প্রমাণতঃ | প্রসাদনস্য চাধ্যর্ধা দ্বিগুণা রোপণস্য চ ||৫৯||
हरेणुमात्रा वर्तिः स्याल्लेखनस्य प्रमाणतः | प्रसादनस्य चाध्यर्धा द्विगुणा रोपणस्य च ||५९||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 47 (60) · Śloka 60
রসাঞ্জনস্য মাত্রা তু যথাবর্তিমিতা মতা |৬০|
रसाञ्जनस्य मात्रा तु यथावर्तिमिता मता |६०|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 48 (60) · Śloka 60
দ্বিত্রিচতুঃশলাকাশ্চ চূর্ণস্যাপ্যনুপূর্বশঃ ||৬০||
द्वित्रिचतुःशलाकाश्च चूर्णस्याप्यनुपूर्वशः ||६०||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 49 (61) · Śloka 62
তেষাং তুল্যগুণান্যেব বিদধ্যাদ্ভাজনান্যপি | সৌবর্ণং রাজতং শার্ঙ্গং তাম্রং বৈদূর্যকাংস্যজম্ ||৬১|| আযসানি চ যোজ্যানি শলাকাশ্চ যথাক্রমম্ |৬২|
तेषां तुल्यगुणान्येव विदध्याद्भाजनान्यपि | सौवर्णं राजतं शार्ङ्गं ताम्रं वैदूर्यकांस्यजम् ||६१|| आयसानि च योज्यानि शलाकाश्च यथाक्रमम् |६२|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 50 (62) · Śloka 63
বক্ত্রযোর্মুকুলাকারা কলাযপরিমণ্ডলা ||৬২|| অষ্টাঙ্গুলা তনুর্মধ্যে সুকৃতা সাধুনিগ্রহা |৬৩|
वक्त्रयोर्मुकुलाकारा कलायपरिमण्डला ||६२|| अष्टाङ्गुला तनुर्मध्ये सुकृता साधुनिग्रहा |६३|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 51 (63) · Śloka 63
ঔদুম্বর্যশ্মজা বাঽপি শারীরী বা হিতা ভবেত্ ||৬৩||
औदुम्बर्यश्मजा वाऽपि शारीरी वा हिता भवेत् ||६३||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 52 (64-65) · Śloka 65
বামেনাক্ষি বিনির্ভুজ্য হস্তেন সুসমাহিতঃ | শলাকযা দক্ষিণেন ক্ষিপেত্ কানীনমঞ্জনম্ ||৬৪|| আপাঙ্গ্যং বা যথাযোগং কুর্যাচ্চাপি গতাগতম্ | বর্ত্মোপলেপি বা যত্তদঙ্গুল্যৈব প্রযোজযেত্ ||৬৫||
वामेनाक्षि विनिर्भुज्य हस्तेन सुसमाहितः | शलाकया दक्षिणेन क्षिपेत् कानीनमञ्जनम् ||६४|| आपाङ्ग्यं वा यथायोगं कुर्याच्चापि गतागतम् | वर्त्मोपलेपि वा यत्तदङ्गुल्यैव प्रयोजयेत् ||६५||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 53 (66) · Śloka 66
অক্ষি নাত্যন্তযোরঞ্জ্যাদ্বাধমানোঽপি বা ভিষক্ |৬৬|
अक्षि नात्यन्तयोरञ्ज्याद्बाधमानोऽपि वा भिषक् |६६|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 54 (66) · Śloka 67
ন চানির্বান্তদোষেঽক্ষ্ণি ধাবনং সম্প্রযোজযেত্ ||৬৬|| দোষঃ প্রতিনিবৃত্তঃ সন্ হন্যাদ্ দৃষ্টের্বলং তথা |৬৭|
न चानिर्वान्तदोषेऽक्ष्णि धावनं सम्प्रयोजयेत् ||६६|| दोषः प्रतिनिवृत्तः सन् हन्याद् दृष्टेर्बलं तथा |६७|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 55 (67) · Śloka 68
গতদোষমপেতাশ্রু পশ্যেদ্যত্ সম্যগম্ভসা ||৬৭|| প্রক্ষাল্যাক্ষি যথাদোষং কার্যং প্রত্যঞ্জনং ততঃ |৬৮|
गतदोषमपेताश्रु पश्येद्यत् सम्यगम्भसा ||६७|| प्रक्षाल्याक्षि यथादोषं कार्यं प्रत्यञ्जनं ततः |६८|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 56 (68-69) · Śloka 69
শ্রমোদাবর্তরুদিতমদ্যক্রোধভযজ্বরৈঃ ||৬৮|| বেগাঘাতশিরোদোষৈশ্চার্তানাং নেষ্যতেঽঞ্জনম্ | রাগরুক্তিমিরাস্রাবশূলসংরম্ভসম্ভবাত্ ||৬৯||
श्रमोदावर्तरुदितमद्यक्रोधभयज्वरैः ||६८|| वेगाघातशिरोदोषैश्चार्तानां नेष्यतेऽञ्जनम् | रागरुक्तिमिरास्रावशूलसंरम्भसम्भवात् ||६९||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 57 (70-73) · Śloka 73
নিদ্রাক্ষযে ক্রিযাশক্তিং, প্রবাতে দৃগ্বলক্ষযম্ | রজোধূমহতে রাগস্রাবাধীমন্থসম্ভবম্ ||৭০|| সংরম্ভশূলৌ নস্যান্তে, শিরোরুজি শিরোরুজম্ | শিরঃস্নাতেঽতিশীতে চ রবাবনুদিতেঽপি চ ||৭১|| দোষস্থৈর্যাদপার্থং স্যাদ্দোষোত্ক্লেশং করোতি চ | অজীর্ণেঽপ্যেবমেব স্যাত্ স্রোতোমার্গাবরোধনাত্ ||৭২|| দোষবেগোদযে দত্তং কুর্যাত্তাংস্তানুপদ্রবান্ | তস্মাত্ পরিহরন্ দোষানঞ্জনং সাধু যোজযেত্ ||৭৩||
निद्राक्षये क्रियाशक्तिं, प्रवाते दृग्बलक्षयम् | रजोधूमहते रागस्रावाधीमन्थसम्भवम् ||७०|| संरम्भशूलौ नस्यान्ते, शिरोरुजि शिरोरुजम् | शिरःस्नातेऽतिशीते च रवावनुदितेऽपि च ||७१|| दोषस्थैर्यादपार्थं स्याद्दोषोत्क्लेशं करोति च | अजीर्णेऽप्येवमेव स्यात् स्रोतोमार्गावरोधनात् ||७२|| दोषवेगोदये दत्तं कुर्यात्तांस्तानुपद्रवान् | तस्मात् परिहरन् दोषानञ्जनं साधु योजयेत् ||७३||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 58 (74) · Śloka 74
লেখনস্য বিশেষেণ কাল এষ প্রকীর্তিতঃ |৭৪|
लेखनस्य विशेषेण काल एष प्रकीर्तितः |७४|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 59 (74) · Śloka 75
ব্যাপদশ্চ জযেদেতাঃ সেকাশ্চ্যোতনলেপনৈঃ ||৭৪|| যথাস্বং ধূমকবলৈর্নস্যৈশ্চাপি সমুত্থিতাঃ |৭৫|
व्यापदश्च जयेदेताः सेकाश्च्योतनलेपनैः ||७४|| यथास्वं धूमकवलैर्नस्यैश्चापि समुत्थिताः |७५|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 60 (75) · Śloka 76
বিশদং লঘ্বনাস্রাবি ক্রিযাপটু সুনির্মলম্ ||৭৫|| সংশান্তোপদ্রবং নেত্রং বিরিক্তং সম্যগাদিশেত্ |৭৬|
विशदं लघ्वनास्रावि क्रियापटु सुनिर्मलम् ||७५|| संशान्तोपद्रवं नेत्रं विरिक्तं सम्यगादिशेत् |७६|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 61 (76) · Śloka 77
জিহ্মং দারুণদুর্বর্ণং স্রস্তং রূক্ষমতীব চ ||৭৬|| নেত্রং বিরেকাতিযোগে স্যন্দতে চাতিমাত্রশঃ |৭৭|
जिह्मं दारुणदुर्वर्णं स्रस्तं रूक्षमतीव च ||७६|| नेत्रं विरेकातियोगे स्यन्दते चातिमात्रशः |७७|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 62 (77) · Śloka 77
তত্র সন্তর্পণং কার্যং বিধানং চানিলাপহম্ ||৭৭||
तत्र सन्तर्पणं कार्यं विधानं चानिलापहम् ||७७||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 63 (78) · Śloka 78
অক্ষি মন্দবিরিক্তং স্যাদুদগ্রতরদোষবত্ |৭৮|
अक्षि मन्दविरिक्तं स्यादुदग्रतरदोषवत् |७८|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 64 (78) · Śloka 78
ধূমনস্যাঞ্জনৈস্তত্র হিতং দোষাবসেচনম্ ||৭৮||
धूमनस्याञ्जनैस्तत्र हितं दोषावसेचनम् ||७८||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 65 (79) · Śloka 79
স্নেহবর্ণবলোপেতং প্রসন্নং দোষবর্জিতম্ | জ্ঞেযং প্রসাদনে সম্যগুপযুক্তেঽক্ষি নির্বৃতম্ ||৭৯||
स्नेहवर्णबलोपेतं प्रसन्नं दोषवर्जितम् | ज्ञेयं प्रसादने सम्यगुपयुक्तेऽक्षि निर्वृतम् ||७९||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 66 (80) · Śloka 80
কিঞ্জিদ্ধীনবিকারং স্যাত্তর্পণাদ্ধি কৃতাদতি |৮০|
किञ्जिद्धीनविकारं स्यात्तर्पणाद्धि कृतादति |८०|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 67 (80) · Śloka 80
তত্র দোষহরং রূক্ষং ভেষজং শস্যতে মৃদু ||৮০||
तत्र दोषहरं रूक्षं भेषजं शस्यते मृदु ||८०||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 68 (81) · Śloka 81
সাধারণমপি জ্ঞেযমেবং রোপণলক্ষণম্ | প্রসাদনবদাচষ্টে তস্মিন্ যুক্তেঽতিভেষজম্ ||৮১||
साधारणमपि ज्ञेयमेवं रोपणलक्षणम् | प्रसादनवदाचष्टे तस्मिन् युक्तेऽतिभेषजम् ||८१||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 69 (82) · Śloka 82
স্নেহনং রোপণং বাঽপি হীনযুক্তমপার্থকম্ |৮২|
स्नेहनं रोपणं वाऽपि हीनयुक्तमपार्थकम् |८२|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 70 (82) · Śloka 82
কর্তব্যং মাত্রযা তস্মাদঞ্জনং সিদ্ধিমিচ্ছতা ||৮২||
कर्तव्यं मात्रया तस्मादञ्जनं सिद्धिमिच्छता ||८२||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 71 (83) · Śloka 83
পুটপাকক্রিযদ্যাসু ক্রিযাস্বেষৈ(কৈ)ব কল্পনা | সহস্রশশ্চাঞ্জনেষু বীজেনোক্তেন পূজিতাঃ ||৮৩||
पुटपाकक्रियद्यासु क्रियास्वेषै(कै)व कल्पना | सहस्रशश्चाञ्जनेषु बीजेनोक्तेन पूजिताः ||८३||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 72 (84) · Śloka 84
দৃষ্টের্বলবিবৃদ্ধ্যর্থং যাপ্যরোগক্ষযায চ | রাজার্হান্যঞ্জনাগ্র্যাণি নিবোধেমান্যতঃ পরম্ ||৮৪||
दृष्टेर्बलविवृद्ध्यर्थं याप्यरोगक्षयाय च | राजार्हान्यञ्जनाग्र्याणि निबोधेमान्यतः परम् ||८४||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 73 (85-93) · Śloka 93
অষ্টৌ ভাগানঞ্জনস্য নীলোত্পলসমত্বিষঃ | ঔদুম্বরং শাতকুম্ভং রাজতং চ সমাসতঃ ||৮৫|| একাদশৈতান্ ভাগাংস্তু যোজযেত্ কুশলো ভিষক্ | মূষাক্ষিপ্তং তদাধ্মাতমাবৃতং জাতবেদসি ||৮৬|| খদিরাশ্মন্তকাঙ্গারৈর্গোশকৃদ্ভিরথাপি বা | গবাং শকৃদ্রসে মূত্রে দধ্নি সর্পিষি মাক্ষিকে ||৮৭|| তৈলমদ্যবসামজ্জসর্বগন্ধোদকেষু চ | দ্রাক্ষারসেক্ষুত্রিফলারসেষু সুহিমেষু চ ||৮৮|| সারিবাদিকষাযে চ কষাযে চোত্পলাদিকে | নিষেচযেত্ পৃথক্ চৈনং ধ্মাতং ধ্মাতং পুনঃ পুনঃ ||৮৯|| ততোঽন্তরীক্ষে সপ্তাহং প্লোতবদ্ধং স্থিতং জলে | বিশোষ্য চূর্ণযেন্মুক্তাং স্ফটিকং বিদ্রুমং তথা ||৯০|| কালানুসারিবাং চাপি শুচিরাবাপ্য যোগতঃ | এতচ্চূর্ণাঞ্জনং শ্রেষ্ঠং নিহিতং ভাজনে শুভে ||৯১|| দন্তস্ফটিকবৈদূর্যশঙ্খশৈলাসনোদ্ভবে | শাতকুম্ভেঽথ শার্ঙ্গে বা রাজতে বা সুসংস্কৃতে | সহস্রপাকবত্ পূজাং কৃত্বা রাজ্ঞঃ প্রযোজযেত্ ||৯২|| তেনাঞ্জিতাক্ষো নৃপতির্ভবেত্ সর্বজনপ্রিযঃ | অধৃষ্যঃ সর্বভূতানাং দৃষ্টিরোগবিবর্জিতঃ ||৯৩||
अष्टौ भागानञ्जनस्य नीलोत्पलसमत्विषः | औदुम्बरं शातकुम्भं राजतं च समासतः ||८५|| एकादशैतान् भागांस्तु योजयेत् कुशलो भिषक् | मूषाक्षिप्तं तदाध्मातमावृतं जातवेदसि ||८६|| खदिराश्मन्तकाङ्गारैर्गोशकृद्भिरथापि वा | गवां शकृद्रसे मूत्रे दध्नि सर्पिषि माक्षिके ||८७|| तैलमद्यवसामज्जसर्वगन्धोदकेषु च | द्राक्षारसेक्षुत्रिफलारसेषु सुहिमेषु च ||८८|| सारिवादिकषाये च कषाये चोत्पलादिके | निषेचयेत् पृथक् चैनं ध्मातं ध्मातं पुनः पुनः ||८९|| ततोऽन्तरीक्षे सप्ताहं प्लोतबद्धं स्थितं जले | विशोष्य चूर्णयेन्मुक्तां स्फटिकं विद्रुमं तथा ||९०|| कालानुसारिवां चापि शुचिरावाप्य योगतः | एतच्चूर्णाञ्जनं श्रेष्ठं निहितं भाजने शुभे ||९१|| दन्तस्फटिकवैदूर्यशङ्खशैलासनोद्भवे | शातकुम्भेऽथ शार्ङ्गे वा राजते वा सुसंस्कृते | सहस्रपाकवत् पूजां कृत्वा राज्ञः प्रयोजयेत् ||९२|| तेनाञ्जिताक्षो नृपतिर्भवेत् सर्वजनप्रियः | अधृष्यः सर्वभूतानां दृष्टिरोगविवर्जितः ||९३||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 74 (94-97) · Śloka 97
কুষ্ঠং চন্দনমেলাশ্চ পত্রং মধুকমঞ্জনম্ | মেষশৃঙ্গস্য পুষ্পাণি বক্রং রত্নানি সপ্ত চ ||৯৪|| উত্পলস্য বৃহত্যোশ্চ পদ্মস্যাপি চ কেশরম্ | নাগপুষ্পমুশীরাণি পিপ্পলী তুত্থমুত্তমম্ ||৯৫|| কুক্কুটাণ্ডকপালানি দার্বীং পথ্যাং সরোচনাম্ | মরিচান্যক্ষমজ্জানং তুল্যাং চ গৃহগোপিকাম্ ||৯৬|| কৃত্বা সূক্ষ্মং ততশ্চূর্ণং ন্যসেদভ্যর্চ্য পূর্ববত্ | এতদ্ভদ্রোদযং নাম সদৈবার্হতি ভূমিপঃ ||৯৭||
कुष्ठं चन्दनमेलाश्च पत्रं मधुकमञ्जनम् | मेषशृङ्गस्य पुष्पाणि वक्रं रत्नानि सप्त च ||९४|| उत्पलस्य बृहत्योश्च पद्मस्यापि च केशरम् | नागपुष्पमुशीराणि पिप्पली तुत्थमुत्तमम् ||९५|| कुक्कुटाण्डकपालानि दार्वीं पथ्यां सरोचनाम् | मरिचान्यक्षमज्जानं तुल्यां च गृहगोपिकाम् ||९६|| कृत्वा सूक्ष्मं ततश्चूर्णं न्यसेदभ्यर्च्य पूर्ववत् | एतद्भद्रोदयं नाम सदैवार्हति भूमिपः ||९७||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 75 (98-99) · Śloka 99
বক্রং সমরিচং চৈব মাংসীং শৈলেযমেব চ | তুল্যাংশানি সমানৈস্তৈঃ সমগ্রৈশ্চ মনঃশিলা ||৯৮|| পত্রস্য ভাগাশ্চত্বারো দ্বিগুণং সর্বতোঽঞ্জনম্ | তাবচ্চ যষ্টীমধুকং পূর্ববচ্চৈতদঞ্জনম্ ||৯৯||
वक्रं समरिचं चैव मांसीं शैलेयमेव च | तुल्यांशानि समानैस्तैः समग्रैश्च मनःशिला ||९८|| पत्रस्य भागाश्चत्वारो द्विगुणं सर्वतोऽञ्जनम् | तावच्च यष्टीमधुकं पूर्ववच्चैतदञ्जनम् ||९९||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 76 (100-102) · Śloka 102
মনঃশিলাং দেবকাষ্ঠং রজন্যৌ ত্রিফলোষণম্ | লাক্ষালশুনমঞ্জিষ্ঠাসৈন্ধবৈলাঃ সমাক্ষিকাঃ ||১০০|| রোধ্রং সাবরকং চূর্ণমাযসং তাম্রমেব চ | কালানুসারিবাং চৈব কুক্কুটাণ্ডদলানি চ ||১০১|| তুল্যানি পযসা পিষ্ট্বা গুটিকাং কারযেদ্বুধঃ | কণ্ডূতিমিরশুক্লার্মরক্তরাজ্যুপশান্তযে ||১০২||
मनःशिलां देवकाष्ठं रजन्यौ त्रिफलोषणम् | लाक्षालशुनमञ्जिष्ठासैन्धवैलाः समाक्षिकाः ||१००|| रोध्रं सावरकं चूर्णमायसं ताम्रमेव च | कालानुसारिवां चैव कुक्कुटाण्डदलानि च ||१०१|| तुल्यानि पयसा पिष्ट्वा गुटिकां कारयेद्बुधः | कण्डूतिमिरशुक्लार्मरक्तराज्युपशान्तये ||१०२||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 77 (103-104) · Śloka 104
কাংস্যাপমার্জনমসী মধুকং সৈন্ধবং তথা | এরণ্ডমূলং চ সমং বৃহত্যংশদ্বযান্বিতম্ ||১০৩|| আজেন পযসা পিষ্ট্বা তাম্রপাত্রং প্রলেপযেত্ | সপ্তকৃত্বস্তু তা বর্ত্যশ্ছাযাশুষ্কা রুজাপহাঃ ||১০৪||
कांस्यापमार्जनमसी मधुकं सैन्धवं तथा | एरण्डमूलं च समं बृहत्यंशद्वयान्वितम् ||१०३|| आजेन पयसा पिष्ट्वा ताम्रपात्रं प्रलेपयेत् | सप्तकृत्वस्तु ता वर्त्यश्छायाशुष्का रुजापहाः ||१०४||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 78 (105) · Śloka 105
পথ্যাতুত্থকযষ্ট্যাহ্বৈস্তুল্যৈর্মরিচষোডশা | পথ্যা সর্ববিকারেষু বর্তিঃ শীতাম্বুপেষিতা ||১০৫||
पथ्यातुत्थकयष्ट्याह्वैस्तुल्यैर्मरिचषोडशा | पथ्या सर्वविकारेषु वर्तिः शीताम्बुपेषिता ||१०५||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 79 (106) · Śloka 106
রসক্রিযাবিধানেন যথোক্তবিধিকোবিদঃ | পিণ্ডাঞ্জনানি কুর্বীত যথাযোগমতন্দ্রিতঃ ||১০৬||
रसक्रियाविधानेन यथोक्तविधिकोविदः | पिण्डाञ्जनानि कुर्वीत यथायोगमतन्द्रितः ||१०६||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana puShpikA · Śloka 18
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযামুত্তরতন্ত্রান্তর্গতে শালাক্যতন্ত্রে ক্রিযাকল্পো নামাষ্টাদশোঽধ্যাযঃ ||১৮||
इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते शालाक्यतन्त्रे क्रियाकल्पो नामाष्टादशोऽध्यायः ||१८||
🔊 Audio coming soon