Adhikarana mUtrAghAtanidAnAdhyAyaH (2) · Śloka 2
অতীসারগ্রহণীরোগনিদনানন্তরং মূত্রাঘাতনিদানমেকসম্বন্ধনত্বাদুচ্যত ইত্যাহ - - - - অথাতো মূত্রাঘাতনিদানং ব্যাখ্যাস্যামঃ|
ইতি হ স্মাহুরাত্রেযাদযো মহর্ষযঃ|
(গদ্যসূত্রে)||২||
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अतीसारग्रहणीरोगनिदनानन्तरं मूत्राघातनिदानमेकसम्बन्धनत्वादुच्यत इत्याह - - - - अथातो मूत्राघातनिदानं व्याख्यास्यामः|
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः|
(गद्यसूत्रे)||२||
Adhikarana bastyAdaya ekasambandhanAH (1) · Śloka 1
বস্তিবস্তিশিরোমেঢ্রকটীবৃষণপাযবঃ|
একসম্বন্ধনাঃ প্রোক্তা গুদাস্থিবিবরাশ্রযাঃ||১||
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बस्तिबस्तिशिरोमेढ्रकटीवृषणपायवः|
एकसम्बन्धनाः प्रोक्ता गुदास्थिविवराश्रयाः||१||
Adhikarana mUtrAghAtasaMprAptiH (2-3) · Śloka 3
ননু, অত্র মূত্রাশ্রিতা দোষা অবশ্যং বস্তিং প্রাপ্য বিকুর্বতে|
বস্তেশ্চাধোমুখত্বান্মূত্রান্তঃপ্রবেশো বস্তিমুখেন ন সম্ভাব্যতে, তস্মান্মূত্রাঘাতানুত্পত্তিরেব, ইত্যাশঙ্ক্যাহ - - - - অধোমুখোঽপি বস্তির্হি মূত্রবাহিসিরামুখৈঃ|
পার্শ্বেভ্যঃ পূর্যতে সূক্ষ্মৈঃ স্যন্দমানৈরনারতম্||২||
যৈস্তৈরেব প্রবিশ্যৈনং দোষাঃ কুর্বন্তি বিংশতিম্|
মূত্রাঘাতান্ প্রমেহাংশ্চ কৃচ্ছ্রান্মর্মসমাশ্রযান্||৩||
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ननु, अत्र मूत्राश्रिता दोषा अवश्यं बस्तिं प्राप्य विकुर्वते|
बस्तेश्चाधोमुखत्वान्मूत्रान्तःप्रवेशो बस्तिमुखेन न सम्भाव्यते, तस्मान्मूत्राघातानुत्पत्तिरेव, इत्याशङ्क्याह - - - - अधोमुखोऽपि बस्तिर्हि मूत्रवाहिसिरामुखैः|
पार्श्वेभ्यः पूर्यते सूक्ष्मैः स्यन्दमानैरनारतम्||२||
यैस्तैरेव प्रविश्यैनं दोषाः कुर्वन्ति विंशतिम्|
मूत्राघातान् प्रमेहांश्च कृच्छ्रान्मर्मसमाश्रयान्||३||
Adhikarana vAtajasya lakShaNam (4) · Śloka 4
বস্তিবঙ্ক্ষণমেড্রার্তিযুক্তোঽল্পাল্পং মুহুর্মুহুঃ|
মূত্রযেদ্বাতজে কৃচ্ছ্রে|৪|
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बस्तिवङ्क्षणमेड्रार्तियुक्तोऽल्पाल्पं मुहुर्मुहुः|
मूत्रयेद्वातजे कृच्छ्रे|४|
Adhikarana pittajasya lakShaNam (4-5) · Śloka 5
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পৈত্তে পীতং সদাহরুক্||৪||
রক্তং বা|
|৫|
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पैत्ते पीतं सदाहरुक्||४||
रक्तं वा|
|५|
Adhikarana kaphajasya lakShaNam (5) · Śloka 5
কফজে বস্তিমেড্রগৌরবশোফবান্|
সপিচ্ছং সবিবন্ধং চ|৫|
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कफजे बस्तिमेड्रगौरवशोफवान्|
सपिच्छं सविबन्धं च|५|
Adhikarana tridoShajasya lakShaNam (5) · Śloka 5
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সর্বৈঃ সর্বাত্মকং মলৈঃ||৫||
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सर्वैः सर्वात्मकं मलैः||५||
Adhikarana ashmarIsaMprAptiH (6-7) · Śloka 7
ইদানীমশ্মরীং লক্ষযতি - - - - যদা বাযুর্মুখং বস্তেরাবৃত্য পরিশোষযেত্|
মূত্রং সপিত্তং সকফং সশুক্রং বা তদা ক্রমাত্||৬||
সঞ্জাযতেঽশ্মরী ঘোরা পিত্তাদ্গোরিব রোচনা|
শ্লেষ্মাশ্রযা চ সর্বা স্যাত্|৭|
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इदानीमश्मरीं लक्षयति - - - - यदा वायुर्मुखं बस्तेरावृत्य परिशोषयेत्|
मूत्रं सपित्तं सकफं सशुक्रं वा तदा क्रमात्||६||
सञ्जायतेऽश्मरी घोरा पित्ताद्गोरिव रोचना|
श्लेष्माश्रया च सर्वा स्यात्|७|
Adhikarana ashmaryAH pUrvarUpam (7-8) · Śloka 8
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অথাস্যাঃ পূর্বলক্ষণম্||৭||
বস্ত্যাধ্মানং তদাসন্নদেশেষু পরিতোঽতিরুক্|
মূত্রে চ বস্তগন্ধত্বং মূত্রকৃচ্ছ্রং জ্বরোঽরুচিঃ||৮||
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अथास्याः पूर्वलक्षणम्||७||
बस्त्याध्मानं तदासन्नदेशेषु परितोऽतिरुक्|
मूत्रे च बस्तगन्धत्वं मूत्रकृच्छ्रं ज्वरोऽरुचिः||८||
Adhikarana ashmaryAH sAmAnyalakShaNam (9-10) · Śloka 10
সামান্যলিঙ্গং রুড্নাভিসেবনীবস্তিমূর্ধসু|
বিশীর্ণধারং মূত্রং স্যাত্তযা মার্গনিরোধনে||৯||
তহ্যপাযাত্সুখং মেহেদচ্ছং গোমেদকোপমম্|
তত্সঙ্ক্ষোভাত্ক্ষতে সাস্রমাযাসাচ্চাতিরুগ্ভবেত্||১০||
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सामान्यलिङ्गं रुड्नाभिसेवनीबस्तिमूर्धसु|
विशीर्णधारं मूत्रं स्यात्तया मार्गनिरोधने||९||
तह्यपायात्सुखं मेहेदच्छं गोमेदकोपमम्|
तत्सङ्क्षोभात्क्षते सास्रमायासाच्चातिरुग्भवेत्||१०||
Adhikarana vAtajAyA lakShaNam (11-12) · Śloka 12
তত্র বাতাদ্ভৃশার্ত্যার্তো দন্তান্ খাদতি বেপতে|
মৃদ্গাতি মেহনং নাভিং পীডযত্যনিশং ক্বণন্||১১||
সানিলং মুঞ্চতি শকৃন্মুহুর্মেহতি বিন্দুশঃ|
শ্যাবা রূক্ষাঽশ্মরী চাস্য স্যাচ্চিতা কণ্টকৈরিব||১২||
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तत्र वाताद्भृशार्त्यार्तो दन्तान् खादति वेपते|
मृद्गाति मेहनं नाभिं पीडयत्यनिशं क्वणन्||११||
सानिलं मुञ्चति शकृन्मुहुर्मेहति बिन्दुशः|
श्यावा रूक्षाऽश्मरी चास्य स्याच्चिता कण्टकैरिव||१२||
Adhikarana pittajAyA lakShaNam (13) · Śloka 13
পিত্তেন দহ্যতে বস্তিঃ পচ্যমান ইবোষ্মবান্|
ভল্লাতকাস্থিসংস্থানা রক্তা পীতাঽসিতাঽশ্মরী||১৩||
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पित्तेन दह्यते बस्तिः पच्यमान इवोष्मवान्|
भल्लातकास्थिसंस्थाना रक्ता पीताऽसिताऽश्मरी||१३||
Adhikarana kaphajAyA lakShaNam (14) · Śloka 14
বস্তির্নিস্তুদ্যত ইব শ্লেষ্মণা শীতলো গুরুঃ|
অশ্মরী মহতী শ্লক্ষ্ণা মধুবর্ণাঽথবা সিতা||১৪||
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बस्तिर्निस्तुद्यत इव श्लेष्मणा शीतलो गुरुः|
अश्मरी महती श्लक्ष्णा मधुवर्णाऽथवा सिता||१४||
Adhikarana etAstisro bAlAnAM bhavanti (15) · Śloka 15
এতা ভবন্তি বালানাং তেষামেব চ ভূযসা|
আশ্রযোপচযাল্পত্বাদ্গ্রহণাহরণে সুখাঃ||১৫||
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एता भवन्ति बालानां तेषामेव च भूयसा|
आश्रयोपचयाल्पत्वाद्ग्रहणाहरणे सुखाः||१५||
Adhikarana shukrAshmarI mahatAmeva, shukrAshmaryAH saMprAptiH, shukrAshmaryAH lakShaNam (16-18) · Śloka 18
শুক্রাশ্মরী তু মহতাং জাযতে শুক্রধারণাত্|
স্থানাচ্চ্যুতমমুক্তং হি মুষ্কযোরন্তরেঽনিলঃ||১৬||
শোষযত্যুপসঙ্গৃহ্য শুক্রং তচ্ছুষ্কমশ্মরী|
বস্তিরুক্কৃচ্ছ্রমূত্রত্বমুষ্কশ্বযথুকারিণী||১৭||
তস্যামুত্পন্নমাত্রাযাং শুক্রমেতি বিলীযতে|
পীডিতে ত্ববকাশেঽস্মিন্|১৮|
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शुक्राश्मरी तु महतां जायते शुक्रधारणात्|
स्थानाच्च्युतममुक्तं हि मुष्कयोरन्तरेऽनिलः||१६||
शोषयत्युपसङ्गृह्य शुक्रं तच्छुष्कमश्मरी|
बस्तिरुक्कृच्छ्रमूत्रत्वमुष्कश्वयथुकारिणी||१७||
तस्यामुत्पन्नमात्रायां शुक्रमेति विलीयते|
पीडिते त्ववकाशेऽस्मिन्|१८|
Adhikarana sharkarAyAH lakShaNam (18-19) · Śloka 19
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অশ্মর্যেব চ শর্করা||১৮||
অণুশো বাযুনা ভিন্না সা ত্বস্মিন্ননুলোমগে|
নিরেতি সহ মূত্রেণ প্রতিলোমে বিবধ্যতে||১৯||
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अश्मर्येव च शर्करा||१८||
अणुशो वायुना भिन्ना सा त्वस्मिन्ननुलोमगे|
निरेति सह मूत्रेण प्रतिलोमे विबध्यते||१९||
Adhikarana vAtabasteH lakShaNam (20-23) · Śloka 23
অথ বাতবস্ত্যাদীনাহ - - - - মূত্রসন্ধারিণঃ কুর্যাদ্বুদ্ধ্বা বস্তের্মুখং মরুত্|
মূত্রসঙ্গং রুজং কণ্ডূং কদাচিচ্চ স্বধামতঃ||২০||
প্রচ্যাব্য বস্তিমুদ্বৃত্তং গর্ভাভং স্থূলবিপ্লুতম্|
করোতি তত্র রুগ্দাহস্পন্দনোদ্বেষ্টনানি চ||২১||
বিন্দুশশ্চ প্রবর্তেত মূত্রং বস্তৌ তু পীডতে|
ধারযা দ্বিবিধোঽপ্যেষ বাতবস্তিরিতি স্মৃতঃ||২২||
দুস্তরো দুস্তরতরো দ্বিতীযঃ প্রবলানিলঃ|
|২৩|
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अथ वातबस्त्यादीनाह - - - - मूत्रसन्धारिणः कुर्याद्बुद्ध्वा बस्तेर्मुखं मरुत्|
मूत्रसङ्गं रुजं कण्डूं कदाचिच्च स्वधामतः||२०||
प्रच्याव्य बस्तिमुद्वृत्तं गर्भाभं स्थूलविप्लुतम्|
करोति तत्र रुग्दाहस्पन्दनोद्वेष्टनानि च||२१||
बिन्दुशश्च प्रवर्तेत मूत्रं बस्तौ तु पीडते|
धारया द्विविधोऽप्येष वातबस्तिरिति स्मृतः||२२||
दुस्तरो दुस्तरतरो द्वितीयः प्रबलानिलः|
|२३|
Adhikarana vAtAShThIlAyAH lakShaNam (23-24) · Śloka 24
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শকৃন্মার্গস্য বস্তেশ্চ বাযুরন্তরমাশ্রিতঃ||২৩||
অষ্ঠীলাভং ঘনং গ্রন্থিং করোত্যচলমুন্নতম্|
বাতাষ্ঠীলেতি সাঽঽধ্মানবিণ্মূত্রানিলসঙ্গকৃত্||২৪||
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शकृन्मार्गस्य बस्तेश्च वायुरन्तरमाश्रितः||२३||
अष्ठीलाभं घनं ग्रन्थिं करोत्यचलमुन्नतम्|
वाताष्ठीलेति साऽऽध्मानविण्मूत्रानिलसङ्गकृत्||२४||
Adhikarana vAtakuNDalikAyAH lakShaNam (25-26) · Śloka 26
বিগুণঃ কণ্ডলীভূতো বস্তৌ তীব্রব্যথোঽনিলঃ|
আবিধ্য মূত্রং ভ্রমতি সস্তম্ভোদ্বেষ্টগৌরবঃ||২৫||
মূত্রমল্পাল্পমথবা বিমুঞ্চতি শকৃত্সৃজন্|
বাতকুণ্ডলিকেত্যেষা|২৬|
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विगुणः कण्डलीभूतो बस्तौ तीव्रव्यथोऽनिलः|
आविध्य मूत्रं भ्रमति सस्तम्भोद्वेष्टगौरवः||२५||
मूत्रमल्पाल्पमथवा विमुञ्चति शकृत्सृजन्|
वातकुण्डलिकेत्येषा|२६|
Adhikarana mUtrAtItasya lakShaNam (26-27) · Śloka 27
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মূত্রং তু বিধৃতং চিরম্||২৬||
ন নিরেতি বিবদ্ধং বা মূত্রাতীতং তদল্পরুক্|
|২৭|
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मूत्रं तु विधृतं चिरम्||२६||
न निरेति विबद्धं वा मूत्रातीतं तदल्परुक्|
|२७|
Adhikarana mUtrajaTharasya lakShaNam (27-29) · Śloka 29
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বিধারণাত্প্রতিহিতং বাতোদাবর্তিতং যদা||২৭||
নাভেরধস্তাদুদরং মূত্রমাপূরযেত্তদা|
কুর্যাত্তীব্ররুগাধ্মানমপক্তিং মলসঙ্গ্রহম্||২৮||
তন্মূত্রজঠরম্|
|২৯|
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विधारणात्प्रतिहितं वातोदावर्तितं यदा||२७||
नाभेरधस्तादुदरं मूत्रमापूरयेत्तदा|
कुर्यात्तीव्ररुगाध्मानमपक्तिं मलसङ्ग्रहम्||२८||
तन्मूत्रजठरम्|
|२९|
Adhikarana mUtrotsa~ggasya lakShaNam (29-30) · Śloka 30
ছিদ্রবৈগুণ্যেনানিলেন বা|
আক্ষিপ্তমল্পং মূত্রং তদ্বস্তৌ নালেঽথবা মণৌ||২৯||
স্থিত্বা স্রবেচ্ছনৈঃ পশ্চাত্সরুজং বাঽথ নীরুজম্|
মূত্রোত্সঙ্গঃ স বিচ্ছিন্নতচ্ছেষগুরুশেফসঃ||৩০||
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छिद्रवैगुण्येनानिलेन वा|
आक्षिप्तमल्पं मूत्रं तद्बस्तौ नालेऽथवा मणौ||२९||
स्थित्वा स्रवेच्छनैः पश्चात्सरुजं वाऽथ नीरुजम्|
मूत्रोत्सङ्गः स विच्छिन्नतच्छेषगुरुशेफसः||३०||
Adhikarana mUtragrantheH lakShaNam (31) · Śloka 31
অন্তর্বস্তিমুখে বৃত্তঃ স্থিরোঽল্পঃ সহসা ভবেত্|
অশ্মরীতুল্যরুক্ গ্রন্থির্মূত্রগ্রন্থিঃ স উচ্যতে||৩১||
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अन्तर्बस्तिमुखे वृत्तः स्थिरोऽल्पः सहसा भवेत्|
अश्मरीतुल्यरुक् ग्रन्थिर्मूत्रग्रन्थिः स उच्यते||३१||
Adhikarana mUtrashukrasya lakShaNam (32-33) · Śloka 33
মূত্রিতস্য স্ত্রিযং যাতো বাযুনা শুক্রমুদ্ধতম্|
স্থানাচ্চ্যুতং মূত্রযতঃ প্রাক্ পশ্চাদ্বা প্রবর্ততে||৩২||
ভস্মোদকপ্রতীকাশং মূত্রশুক্রং তদুচ্যতে|
|৩৩|
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मूत्रितस्य स्त्रियं यातो वायुना शुक्रमुद्धतम्|
स्थानाच्च्युतं मूत्रयतः प्राक् पश्चाद्वा प्रवर्तते||३२||
भस्मोदकप्रतीकाशं मूत्रशुक्रं तदुच्यते|
|३३|
Adhikarana viDvighAtasya lakShaNam (33-34) · Śloka 34
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রূক্ষদুর্বলযোর্বাতাদুদাবর্তং শকৃদ্যদা||৩৩||
মূত্রস্রোতোঽনুপর্যেতি সংসৃষ্টং শকৃতা তদা|
মূত্রং বিট্তুল্যগন্ধং স্যাদ্বিড্বিঘাতং তমাদিশেত্||৩৪||
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रूक्षदुर्बलयोर्वातादुदावर्तं शकृद्यदा||३३||
मूत्रस्रोतोऽनुपर्येति संसृष्टं शकृता तदा|
मूत्रं विट्तुल्यगन्धं स्याद्विड्विघातं तमादिशेत्||३४||
Adhikarana uShNavAtasya lakShaNam (35-36) · Śloka 36
পিত্তং ব্যাযামতীক্ষ্ণোষ্ণভোজনাধ্বাতপাদিভিঃ|
প্রবৃদ্ধং বাযুনা ক্ষিপ্তং বস্ত্যুপস্থার্তিদাহবত্||৩৫||
মূত্রং প্রবর্তযেত্পীতং সরক্তং রক্তমেব বা|
উষ্ণং পুনঃপুনঃ কৃচ্ছ্রাদুষ্ণবাতং বদন্তি তম্||৩৬||
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पित्तं व्यायामतीक्ष्णोष्णभोजनाध्वातपादिभिः|
प्रवृद्धं वायुना क्षिप्तं बस्त्युपस्थार्तिदाहवत्||३५||
मूत्रं प्रवर्तयेत्पीतं सरक्तं रक्तमेव वा|
उष्णं पुनःपुनः कृच्छ्रादुष्णवातं वदन्ति तम्||३६||
Adhikarana mUtrakShayasya lakShaNam (37) · Śloka 37
রূক্ষস্য ক্লান্তদেহস্য বস্তিস্থৌ পিত্তমারুতৌ|
মূত্রক্ষযং সরুগ্দাহং জনযেতাং তদাহ্বযম্||৩৭||
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रूक्षस्य क्लान्तदेहस्य बस्तिस्थौ पित्तमारुतौ|
मूत्रक्षयं सरुग्दाहं जनयेतां तदाह्वयम्||३७||
Adhikarana mUtrasAdasya lakShaNam (38-39) · Śloka 39
পিত্তং কফো দ্বাবপি বা সংহন্যেতেঽনিলেন চেত্|
কৃচ্ছ্রান্মূত্রং তদা পীতং রক্তং শ্বেতং ঘনং সৃজেত্||৩৮||
সদাহং রোচনাশঙ্খচূর্ণবর্ণং ভবেচ্চ তত্|
শুষ্কং সমস্তবর্ণং বা মূত্রসাদং বদন্তি তম্||৩৯||
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पित्तं कफो द्वावपि वा संहन्येतेऽनिलेन चेत्|
कृच्छ्रान्मूत्रं तदा पीतं रक्तं श्वेतं घनं सृजेत्||३८||
सदाहं रोचनाशङ्खचूर्णवर्णं भवेच्च तत्|
शुष्कं समस्तवर्णं वा मूत्रसादं वदन्ति तम्||३९||
Adhikarana mUtrapravRuttijAnAmupasaMhAraH (9) · Śloka 9
ইতি বিস্তরতঃ প্রোক্তা রোগা মূত্রাপ্রবৃত্তিজাঃ|
নিদানলক্ষণৈরূর্ধ্বং বক্ষ্যন্তেঽতিপ্রবৃত্তিজাঃ||৪০||
ইতি শ্রীবৈদ্যপতিসিংহগুপ্তসূনুশ্রীমদ্বাগ্ভটবিরচিতাযামষ্টাঙ্গহৃদযসংহিতাযাং তৃতীযে নিদানস্থানে মূত্রাঘাতনিদানং নাম নবমোঽধ্যাযঃ||৯||
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इति विस्तरतः प्रोक्ता रोगा मूत्राप्रवृत्तिजाः|
निदानलक्षणैरूर्ध्वं वक्ष्यन्तेऽतिप्रवृत्तिजाः||४०||
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां तृतीये निदानस्थाने मूत्राघातनिदानं नाम नवमोऽध्यायः||९||