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1. dīrghañjīvitīyō'dhyāyaḥ

Adhikarana 1 (1) · Śloka 1

অথাতো দীর্ঘঞ্জীবিতীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১||

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अथातो दीर्घञ्जीवितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः||१||

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Adhikarana 2 (2) · Śloka 2

ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||

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इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||

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Adhikarana 3 (3) · Śloka 3

দীর্ঘং জীবিতমন্বিচ্ছন্ভরদ্বাজ উপাগমত্| ইন্দ্রমুগ্রতপা বুদ্ধ্বা শরণ্যমমরেশ্বরম্||৩||

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दीर्घं जीवितमन्विच्छन्भरद्वाज उपागमत्| इन्द्रमुग्रतपा बुद्ध्वा शरण्यममरेश्वरम्||३||

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Adhikarana 4 (4-5) · Śloka 5

ব্রহ্মণা হি যথাপ্রোক্তমাযুর্বেদং প্রজাপতিঃ| জগ্রাহ নিখিলেনাদাবশ্বিনৌ তু পুনস্ততঃ||৪|| অশ্বিভ্যাং ভগবাঞ্ছক্রঃ প্রতিপেদে হ কেবলম্| ঋষিপ্রোক্তো ভরদ্বাজস্তস্মাচ্ছক্রমুপাগমত্||৫||

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ब्रह्मणा हि यथाप्रोक्तमायुर्वेदं प्रजापतिः| जग्राह निखिलेनादावश्विनौ तु पुनस्ततः||४|| अश्विभ्यां भगवाञ्छक्रः प्रतिपेदे ह केवलम्| ऋषिप्रोक्तो भरद्वाजस्तस्माच्छक्रमुपागमत्||५||

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Adhikarana 5 (6-7) · Śloka 7

বিঘ্নভূতা যদা রোগাঃ প্রাদুর্ভূতাঃ শরীরিণাম্| তপোপবাসাধ্যযনব্রহ্মচর্যব্রতাযুষাম্ ||৬|| তদা ভূতেষ্বনুক্রোশং পুরস্কৃত্য মহর্ষযঃ| সমেতাঃ পুণ্যকর্মাণঃ পার্শ্বে হিমবতঃ শুভে||৭||

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विघ्नभूता यदा रोगाः प्रादुर्भूताः शरीरिणाम्| तपोपवासाध्ययनब्रह्मचर्यव्रतायुषाम् ||६|| तदा भूतेष्वनुक्रोशं पुरस्कृत्य महर्षयः| समेताः पुण्यकर्माणः पार्श्वे हिमवतः शुभे||७||

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Adhikarana 6 (8-14) · Śloka 15

অঙ্গিরা জমদগ্নিশ্চ বসিষ্ঠঃ কশ্যপো ভৃগুঃ| আত্রেযো গৌতমঃ সাঙ্খ্যঃ পুলস্ত্যো নারদোঽসিতঃ||৮|| অগস্ত্যো বামদেবশ্চ মার্কণ্ডেযাশ্বলাযনৌ| পারিক্ষির্ভিক্ষুরাত্রেযো ভরদ্বাজঃ কপিঞ্জ(ষ্ঠ)লঃ||৯|| বিশ্বামিত্রাশ্মরথ্যৌ চ ভার্গবশ্চ্যবনোঽভিজিত্| গার্গ্যঃ শাণ্ডিল্যকৌণ্ডিল্যৌ(ন্যৌ)বার্ক্ষির্দেবলগালবৌ||১০|| সাঙ্কৃত্যো বৈজবাপিশ্চ কুশিকো বাদরাযণঃ| বডিশঃ শরলোমা চ কাপ্যকাত্যাযনাবুভৌ||১১|| কাঙ্কাযনঃ কৈকশেযো ধৌম্যো মারীচকাশ্যপৌ| শর্করাক্ষো হিরণ্যাক্ষো লোকাক্ষঃ পৈঙ্গিরেব চ||১২|| শৌনকঃ শাকুনেযশ্চ মৈত্রেযো মৈমতাযনিঃ| বৈখানসা বালখিল্যাস্তথা চান্যে মহর্ষযঃ||১৩|| ব্রহ্মজ্ঞানস্য নিধযো দ(য)মস্য নিযমস্য চ| তপসস্তেজসা দীপ্তা হূযমানা ইবাগ্নযঃ||১৪|| সুখোপবিষ্টাস্তে তত্র পুণ্যাং চক্রুঃ কথামিমাম্|১৫|

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अङ्गिरा जमदग्निश्च वसिष्ठः कश्यपो भृगुः| आत्रेयो गौतमः साङ्ख्यः पुलस्त्यो नारदोऽसितः||८|| अगस्त्यो वामदेवश्च मार्कण्डेयाश्वलायनौ| पारिक्षिर्भिक्षुरात्रेयो भरद्वाजः कपिञ्ज(ष्ठ)लः||९|| विश्वामित्राश्मरथ्यौ च भार्गवश्च्यवनोऽभिजित्| गार्ग्यः शाण्डिल्यकौण्डिल्यौ(न्यौ)वार्क्षिर्देवलगालवौ||१०|| साङ्कृत्यो बैजवापिश्च कुशिको बादरायणः| बडिशः शरलोमा च काप्यकात्यायनावुभौ||११|| काङ्कायनः कैकशेयो धौम्यो मारीचकाश्यपौ| शर्कराक्षो हिरण्याक्षो लोकाक्षः पैङ्गिरेव च||१२|| शौनकः शाकुनेयश्च मैत्रेयो मैमतायनिः| वैखानसा वालखिल्यास्तथा चान्ये महर्षयः||१३|| ब्रह्मज्ञानस्य निधयो द(य)मस्य नियमस्य च| तपसस्तेजसा दीप्ता हूयमाना इवाग्नयः||१४|| सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्|१५|

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Adhikarana 7 (15-17) · Śloka 18

ধর্মার্থকামমোক্ষাণামারোগ্যং মূলমুত্তমম্||১৫|| রোগাস্তস্যাপহর্তারঃ শ্রেযসো জীবিতস্য চ| প্রাদুর্ভূতো মনুষ্যাণামন্তরাযো মহানযম্||১৬|| কঃ স্যাত্তেষাং শমোপায ইত্যুক্ত্বা ধ্যানমাস্থিতাঃ| অথ তে শরণং শক্রং দদৃশুর্ধ্যানচক্ষুষা||১৭|| স বক্ষ্যতি শমোপাযং যথাবদমরপ্রভুঃ|১৮|

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धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्||१५|| रोगास्तस्यापहर्तारः श्रेयसो जीवितस्य च| प्रादुर्भूतो मनुष्याणामन्तरायो महानयम्||१६|| कः स्यात्तेषां शमोपाय इत्युक्त्वा ध्यानमास्थिताः| अथ ते शरणं शक्रं ददृशुर्ध्यानचक्षुषा||१७|| स वक्ष्यति शमोपायं यथावदमरप्रभुः|१८|

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Adhikarana 8 (18-23) · Śloka 23

কঃ সহস্রাক্ষভবনং গচ্ছেত্ প্রষ্টুং শচীপতিম্||১৮|| অহমর্থে নিযুজ্যেযমত্রেতি প্রথমং বচঃ| ভরদ্বাজোঽব্রবীত্তস্মাদৃষিভিঃ স নিযোজিতঃ||১৯|| স শক্রভবনং গত্বা সুরর্ষিগণমধ্যগম্ | দদর্শ বলহন্তারং দীপ্যমানমিবানলম্||২০|| সোঽভিগম্য জযাশীর্ভিরভিনন্দ্য সুরেশ্বরম্| প্রোবাচ বিনযাদ্ধীমানৃষীণাং বাক্যমুত্তমম্||২১|| ব্যাধযো হি সমুত্পন্নাঃ সর্বপ্রাণিভযঙ্করাঃ| তদ্ব্রূহি মে শমোপাযং যথাবদমরপ্রভো||২২|| তস্মৈ প্রোবাচ ভগবানাযুর্বেদং শতক্রতুঃ| পদৈরল্পৈর্মতিং বুদ্ধ্বা বিপুলাং পরমর্ষযে||২৩||

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कः सहस्राक्षभवनं गच्छेत् प्रष्टुं शचीपतिम्||१८|| अहमर्थे नियुज्येयमत्रेति प्रथमं वचः| भरद्वाजोऽब्रवीत्तस्मादृषिभिः स नियोजितः||१९|| स शक्रभवनं गत्वा सुरर्षिगणमध्यगम् | ददर्श बलहन्तारं दीप्यमानमिवानलम्||२०|| सोऽभिगम्य जयाशीर्भिरभिनन्द्य सुरेश्वरम्| प्रोवाच विनयाद्धीमानृषीणां वाक्यमुत्तमम्||२१|| व्याधयो हि समुत्पन्नाः सर्वप्राणिभयङ्कराः| तद्ब्रूहि मे शमोपायं यथावदमरप्रभो||२२|| तस्मै प्रोवाच भगवानायुर्वेदं शतक्रतुः| पदैरल्पैर्मतिं बुद्ध्वा विपुलां परमर्षये||२३||

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Adhikarana 9 (24) · Śloka 24

হেতুলিঙ্গৌষধজ্ঞানং স্বস্থাতুরপরাযণম্| ত্রিসূত্রং শাশ্বতং পুণ্যং বুবুধে যং পিতামহঃ||২৪||

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हेतुलिङ्गौषधज्ञानं स्वस्थातुरपरायणम्| त्रिसूत्रं शाश्वतं पुण्यं बुबुधे यं पितामहः||२४||

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Adhikarana 10 (25-26) · Śloka 26

সোঽনন্তপারং ত্রিস্কন্ধমাযুর্বেদং মহামতিঃ| যথাবদচিরাত্ সর্বং বুবুধে তন্মনা মুনিঃ||২৫|| তেনাযুরমিতং লেভে ভরদ্বাজঃ সুখান্বিতম্| ঋষিভ্যোঽনধিকং তচ্চ শশংসানবশেষযন্||২৬||

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सोऽनन्तपारं त्रिस्कन्धमायुर्वेदं महामतिः| यथावदचिरात् सर्वं बुबुधे तन्मना मुनिः||२५|| तेनायुरमितं लेभे भरद्वाजः सुखान्वितम्| ऋषिभ्योऽनधिकं तच्च शशंसानवशेषयन्||२६||

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Adhikarana 11 (27-29) · Śloka 29

ঋষযশ্চ ভরদ্বাজাজ্জগৃহুস্তং প্রজাহিতম্| দীর্ঘমাযুশ্চিকীর্ষন্তো বেদং বর্ধনমাযুষঃ||২৭|| মহর্ষযস্তে দদৃশুর্যথাবজ্জ্ঞানচক্ষুষা| সামান্যং চ বিশেষং চ গুণান্ দ্রব্যাণি কর্ম চ||২৮|| সমবাযং চ তজ্জ্ঞাত্বা তন্ত্রোক্তং বিধিমাস্থিতাঃ| লেভিরে পরমং শর্ম জীবিতং চাপ্যনিত্বরম্ ||২৯||

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ऋषयश्च भरद्वाजाज्जगृहुस्तं प्रजाहितम्| दीर्घमायुश्चिकीर्षन्तो वेदं वर्धनमायुषः||२७|| महर्षयस्ते ददृशुर्यथावज्ज्ञानचक्षुषा| सामान्यं च विशेषं च गुणान् द्रव्याणि कर्म च||२८|| समवायं च तज्ज्ञात्वा तन्त्रोक्तं विधिमास्थिताः| लेभिरे परमं शर्म जीवितं चाप्यनित्वरम् ||२९||

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Adhikarana 12 (30-31) · Śloka 31

অথ মৈত্রীপরঃ পুণ্যমাযুর্বেদং পুনর্বসুঃ| শিষ্যেভ্যো দত্তবান্ ষড্ভ্যঃ সর্বভূতানুকম্পযা||৩০|| অগ্নিবেশশ্চ ভেল(ড)শ্চ জতূকর্ণঃ পরাশরঃ| হারীতঃ ক্ষারপাণিশ্চ জগৃহুস্তন্মুনের্বচঃ||৩১||

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अथ मैत्रीपरः पुण्यमायुर्वेदं पुनर्वसुः| शिष्येभ्यो दत्तवान् षड्भ्यः सर्वभूतानुकम्पया||३०|| अग्निवेशश्च भेल(ड)श्च जतूकर्णः पराशरः| हारीतः क्षारपाणिश्च जगृहुस्तन्मुनेर्वचः||३१||

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Adhikarana 13 (32-40) · Śloka 40

বুদ্ধের্বিশেষস্তত্রাসীন্নোপদেশান্তরং মুনেঃ| তন্ত্রস্য কর্তা প্রথমমগ্নিবেশো যতোঽভবত্||৩২|| অথ ভেলাদযশ্চক্রুঃ স্বং স্বং তন্ত্রং কৃতানি চ| শ্রাবযামাসুরাত্রেযং সর্ষিসঙ্ঘং সুমেধসঃ||৩৩|| শ্রুত্বা সূত্রণমর্থানামৃষযঃ পুণ্যকর্মণাম্| যথাবত্সূত্রিতমিতি প্রহৃষ্টাস্তেঽনুমেনিরে||৩৪|| সর্ব এবাস্তুবংস্তাংশ্চ সর্বভূতহিতৈষিণঃ| সাধু ভূতেষ্বনুক্রোশ ইত্যুচ্চৈরব্রুবন্ সমম্||৩৫|| তং পুণ্যং শুশ্রুবুঃ শব্দং দিবি দেবর্ষযঃ স্থিতাঃ| সামরাঃ পরমর্ষীণাং শ্রুত্বা মুমুদিরে পরম্||৩৬|| অহো সাধ্বিতি নির্ঘোষো লোকাংস্ত্রীনন্ববা(না)দযত্| নভসি স্নিগ্ধগম্ভীরো হর্ষাদ্ভূতৈরুদীরিতঃ||৩৭|| শিবো বাযুর্ববৌ সর্বা ভাভিরুন্মীলিতা দিশঃ| নিপেতুঃ সজলাশ্চৈব দিব্যাঃ কুসুমবৃষ্টযঃ||৩৮|| অথাগ্নিবেশপ্রমুখান্ বিবিশুর্জ্ঞানদেবতাঃ| বুদ্ধিঃ সিদ্ধিঃ স্মৃতির্মেধা ধৃতিঃ কীর্তিঃ ক্ষমা দযা||৩৯|| তানি চানুমতান্যেষাং তন্ত্রাণি পরমর্ষিভিঃ| ভ(ভা)বায ভূতসঙ্ঘানাং প্রতিষ্ঠাং ভুবি লেভিরে||৪০||

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बुद्धेर्विशेषस्तत्रासीन्नोपदेशान्तरं मुनेः| तन्त्रस्य कर्ता प्रथममग्निवेशो यतोऽभवत्||३२|| अथ भेलादयश्चक्रुः स्वं स्वं तन्त्रं कृतानि च| श्रावयामासुरात्रेयं सर्षिसङ्घं सुमेधसः||३३|| श्रुत्वा सूत्रणमर्थानामृषयः पुण्यकर्मणाम्| यथावत्सूत्रितमिति प्रहृष्टास्तेऽनुमेनिरे||३४|| सर्व एवास्तुवंस्तांश्च सर्वभूतहितैषिणः| साधु भूतेष्वनुक्रोश इत्युच्चैरब्रुवन् समम्||३५|| तं पुण्यं शुश्रुवुः शब्दं दिवि देवर्षयः स्थिताः| सामराः परमर्षीणां श्रुत्वा मुमुदिरे परम्||३६|| अहो साध्विति निर्घोषो लोकांस्त्रीनन्ववा(ना)दयत्| नभसि स्निग्धगम्भीरो हर्षाद्भूतैरुदीरितः||३७|| शिवो वायुर्ववौ सर्वा भाभिरुन्मीलिता दिशः| निपेतुः सजलाश्चैव दिव्याः कुसुमवृष्टयः||३८|| अथाग्निवेशप्रमुखान् विविशुर्ज्ञानदेवताः| बुद्धिः सिद्धिः स्मृतिर्मेधा धृतिः कीर्तिः क्षमा दया||३९|| तानि चानुमतान्येषां तन्त्राणि परमर्षिभिः| भ(भा)वाय भूतसङ्घानां प्रतिष्ठां भुवि लेभिरे||४०||

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Adhikarana 14 (41) · Śloka 41

হিতাহিতং সুখং দুঃখমাযুস্তস্য হিতাহিতম্| মানং চ তচ্চ যত্রোক্তমাযুর্বেদঃ স উচ্যতে||৪১||

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हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्| मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते||४१||

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Adhikarana 15 (42) · Śloka 42

শরীরেন্দ্রিযসত্ত্বাত্মসংযোগো ধারি জীবিতম্| নিত্যগশ্চানুবন্ধশ্চ পর্যাযৈরাযুরুচ্যতে||৪২||

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शरीरेन्द्रियसत्त्वात्मसंयोगो धारि जीवितम्| नित्यगश्चानुबन्धश्च पर्यायैरायुरुच्यते||४२||

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Adhikarana 16 (43) · Śloka 43

তস্যাযুষঃ পুণ্যতমো বেদো বেদবিদাং মতঃ| বক্ষ্যতে যন্মনুষ্যাণাং লোকযোরুভযোর্হিতম্ ||৪৩||

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तस्यायुषः पुण्यतमो वेदो वेदविदां मतः| वक्ष्यते यन्मनुष्याणां लोकयोरुभयोर्हितम् ||४३||

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Adhikarana 17 (44) · Śloka 44

সর্বদা সর্বভাবানাং সামান্যং বৃদ্ধিকারণম্| হ্রাসহেতুর্বিশেষশ্চ, প্রবৃত্তিরুভযস্য তু||৪৪||

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सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धिकारणम्| ह्रासहेतुर्विशेषश्च, प्रवृत्तिरुभयस्य तु||४४||

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Adhikarana 18 (45) · Śloka 45

সামান্যমেকত্বকরং, বিশেষস্তু পৃথক্ত্বকৃত্| তুল্যার্থতা হি সামান্যং, বিশেষস্তু বিপর্যযঃ||৪৫||

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सामान्यमेकत्वकरं, विशेषस्तु पृथक्त्वकृत्| तुल्यार्थता हि सामान्यं, विशेषस्तु विपर्ययः||४५||

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Adhikarana 19 (46-47) · Śloka 47

সত্ত্বমাত্মা শরীরং চ ত্রযমেতত্ত্রিদণ্ডবত্| লোকস্তিষ্ঠতি সংযোগাত্তত্র সর্বং প্রতিষ্ঠিতম্||৪৬|| স পুমাংশ্চেতনং তচ্চ তচ্চাধিকরণং স্মৃতম্| বেদস্যাস্য, তদর্থং হি বেদোঽযং সম্প্রকাশিতঃ||৪৭||

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सत्त्वमात्मा शरीरं च त्रयमेतत्त्रिदण्डवत्| लोकस्तिष्ठति संयोगात्तत्र सर्वं प्रतिष्ठितम्||४६|| स पुमांश्चेतनं तच्च तच्चाधिकरणं स्मृतम्| वेदस्यास्य, तदर्थं हि वेदोऽयं सम्प्रकाशितः||४७||

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Adhikarana 20 (48) · Śloka 48

খাদীন্যাত্মা মনঃ কালো দিশশ্চ দ্রব্যসঙ্গ্রহঃ| সেন্দ্রিযং চেতনং দ্রব্যং, নিরিন্দ্রিযমচেতনম্||৪৮||

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खादीन्यात्मा मनः कालो दिशश्च द्रव्यसङ्ग्रहः| सेन्द्रियं चेतनं द्रव्यं, निरिन्द्रियमचेतनम्||४८||

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Adhikarana 21 (49) · Śloka 49

সার্থা গুর্বাদযো বুদ্ধিঃ প্রযত্নান্তাঃ পরাদযঃ| গুণাঃ প্রোক্তাঃ ...|৪৯|

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सार्था गुर्वादयो बुद्धिः प्रयत्नान्ताः परादयः| गुणाः प्रोक्ताः ...|४९|

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Adhikarana 22 (49) · Śloka 49

...প্রযত্নাদি কর্ম চেষ্টিতমুচ্যতে||৪৯||

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...प्रयत्नादि कर्म चेष्टितमुच्यते||४९||

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Adhikarana 23 (50) · Śloka 50

সমবাযোঽপৃথগ্ভাবো ভূম্যাদীনাং গুণৈর্মতঃ| স নিত্যো যত্র হি দ্রব্যং ন তত্রানিযতো গুণঃ||৫০||

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समवायोऽपृथग्भावो भूम्यादीनां गुणैर्मतः| स नित्यो यत्र हि द्रव्यं न तत्रानियतो गुणः||५०||

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Adhikarana 24 (51) · Śloka 51

যত্রাশ্রিতাঃ কর্মগুণাঃ কারণং সমবাযি যত্| তদ্দ্রব্যং ...|৫১|

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यत्राश्रिताः कर्मगुणाः कारणं समवायि यत्| तद्द्रव्यं ...|५१|

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Adhikarana 25 (51) · Śloka 51

...সমবাযী তু নিশ্চেষ্টঃ কারণং গুণঃ||৫১||

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...समवायी तु निश्चेष्टः कारणं गुणः||५१||

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Adhikarana 26 (52) · Śloka 52

সংযোগে চ বিভাগে চ কারণং দ্রব্যমাশ্রিতম্| কর্তব্যস্য ক্রিযা কর্ম কর্ম নান্যদপেক্ষতে||৫২||

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संयोगे च विभागे च कारणं द्रव्यमाश्रितम्| कर्तव्यस्य क्रिया कर्म कर्म नान्यदपेक्षते||५२||

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Adhikarana 27 (53) · Śloka 53

ইত্যুক্তং কারণং...|৫৩|

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इत्युक्तं कारणं...|५३|

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Adhikarana 28 (53) · Śloka 53

... কার্যং ধাতুসাম্যমিহোচ্যতে| ধাতুসাম্যক্রিযা চোক্তা তন্ত্রস্যাস্য প্রযোজনম্||৫৩||

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... कार्यं धातुसाम्यमिहोच्यते| धातुसाम्यक्रिया चोक्ता तन्त्रस्यास्य प्रयोजनम्||५३||

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Adhikarana 29 (54) · Śloka 54

কালবুদ্ধীন্দ্রিযার্থানাং যোগো মিথ্যা ন চাতি চ| দ্বযাশ্রযাণাং ব্যাধীনাং ত্রিবিধো হেতুসঙ্গ্রহঃ||৫৪||

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कालबुद्धीन्द्रियार्थानां योगो मिथ्या न चाति च| द्वयाश्रयाणां व्याधीनां त्रिविधो हेतुसङ्ग्रहः||५४||

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Adhikarana 30 (55) · Śloka 55

শরীরং সত্ত্বসঞ্জ্ঞং চ ব্যাধীনামাশ্রযো মতঃ| তথা সুখানাং, যোগস্তু সুখানাং কারণং সমঃ||৫৫||

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शरीरं सत्त्वसञ्ज्ञं च व्याधीनामाश्रयो मतः| तथा सुखानां, योगस्तु सुखानां कारणं समः||५५||

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Adhikarana 31 (56) · Śloka 56

নির্বিকারঃ পরস্ত্বাত্মা সত্ত্বভূতগুণেন্দ্রিযৈঃ| চৈতন্যে কারণং নিত্যো দ্রষ্টা পশ্যতি হি ক্রিযাঃ||৫৬||

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निर्विकारः परस्त्वात्मा सत्त्वभूतगुणेन्द्रियैः| चैतन्ये कारणं नित्यो द्रष्टा पश्यति हि क्रियाः||५६||

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Adhikarana 32 (57) · Śloka 57

বাযুঃ পিত্তং কফশ্চোক্তঃ শারীরো দোষসঙ্গ্রহঃ| মানসঃ পুনরুদ্দিষ্টো রজশ্চ তম এব চ||৫৭||

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वायुः पित्तं कफश्चोक्तः शारीरो दोषसङ्ग्रहः| मानसः पुनरुद्दिष्टो रजश्च तम एव च||५७||

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Adhikarana 33 (58) · Śloka 58

প্রশাম্যত্যৌষধৈঃ পূর্বো দৈবযুক্তিব্যপাশ্রযৈঃ| মানসো জ্ঞানবিজ্ঞানধৈর্যস্মৃতিসমাধিভিঃ||৫৮||

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प्रशाम्यत्यौषधैः पूर्वो दैवयुक्तिव्यपाश्रयैः| मानसो ज्ञानविज्ञानधैर्यस्मृतिसमाधिभिः||५८||

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Adhikarana 34 (59-61) · Śloka 61

রূক্ষঃ শীতো লঘুঃ সূক্ষ্মশ্চলোঽথ বিশদঃ খরঃ| বিপরীতগুণৈর্দ্রব্যৈর্মারুতঃ সম্প্রশাম্যতি||৫৯|| সস্নেহমুষ্ণং তীক্ষ্ণং চ দ্রবমম্লং সরং কটু| বিপরীতগুণৈঃ পিত্তং দ্রব্যৈরাশু প্রশাম্যতি||৬০|| গুরুশীতমৃদুস্নিগ্ধমধুরস্থিরপিচ্ছিলাঃ| শ্লেষ্মণঃ প্রশমং যান্তি বিপরীতগুণৈর্গুণাঃ||৬১||

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रूक्षः शीतो लघुः सूक्ष्मश्चलोऽथ विशदः खरः| विपरीतगुणैर्द्रव्यैर्मारुतः सम्प्रशाम्यति||५९|| सस्नेहमुष्णं तीक्ष्णं च द्रवमम्लं सरं कटु| विपरीतगुणैः पित्तं द्रव्यैराशु प्रशाम्यति||६०|| गुरुशीतमृदुस्निग्धमधुरस्थिरपिच्छिलाः| श्लेष्मणः प्रशमं यान्ति विपरीतगुणैर्गुणाः||६१||

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Adhikarana 35 (62) · Śloka 63

বিপরীতগুণৈর্দেশমাত্রাকালোপপাদিতৈঃ| ভেষজৈর্বিনিবর্তন্তে বিকারাঃ সাধ্যসম্মতাঃ||৬২|| সাধনং ন ত্বসাধ্যানাং ব্যাধীনামুপদিশ্যতে|৬৩|

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विपरीतगुणैर्देशमात्राकालोपपादितैः| भेषजैर्विनिवर्तन्ते विकाराः साध्यसम्मताः||६२|| साधनं न त्वसाध्यानां व्याधीनामुपदिश्यते|६३|

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Adhikarana 36 (63) · Śloka 63

ভূযশ্চাতো যথাদ্রব্যং গুণকর্মাণি বক্ষ্যতে||৬৩||

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भूयश्चातो यथाद्रव्यं गुणकर्माणि वक्ष्यते||६३||

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Adhikarana 37 (64) · Śloka 64

রসনার্থো রসস্তস্য দ্রব্যমাপঃ ক্ষিতিস্তথা| নির্বৃত্তৌ চ বিশেষে চ প্রত্যযাঃ খাদযস্ত্রযঃ||৬৪||

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रसनार्थो रसस्तस्य द्रव्यमापः क्षितिस्तथा| निर्वृत्तौ च विशेषे च प्रत्ययाः खादयस्त्रयः||६४||

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Adhikarana 38 (65) · Śloka 65

স্বাদুরম্লোঽথ লবণঃ কটুকস্তিক্ত এব চ| কষাযশ্চেতি ষট্কোঽযং রসানাং সঙ্গ্রহঃ স্মৃতঃ||৬৫||

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स्वादुरम्लोऽथ लवणः कटुकस्तिक्त एव च| कषायश्चेति षट्कोऽयं रसानां सङ्ग्रहः स्मृतः||६५||

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Adhikarana 39 (66) · Śloka 1

স্বাদ্বম্ললবণা বাযুং, কষাযস্বাদুতিক্তকাঃ| জযন্তি পিত্তং, শ্লেষ্মাণং কষাযকটুতিক্তকাঃ||৬৬|| (কট্বম্ললবণাঃ পিত্তং, স্বাদ্বম্ললবণাঃ কফম্| কটুতিক্তকষাযাশ্চ কোপযন্তি সমীরণম্ ||১||)|

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स्वाद्वम्ललवणा वायुं, कषायस्वादुतिक्तकाः| जयन्ति पित्तं, श्लेष्माणं कषायकटुतिक्तकाः||६६|| (कट्वम्ललवणाः पित्तं, स्वाद्वम्ललवणाः कफम्| कटुतिक्तकषायाश्च कोपयन्ति समीरणम् ||१||)|

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Adhikarana 40 (67) · Śloka 67

কিঞ্চিদ্দোষপ্রশমনং কিঞ্চিদ্ধাতুপ্রদূষণম্| স্বস্থবৃত্তৌ মতং কিঞ্চিত্ত্রিবিধং দ্রব্যমুচ্যতে||৬৭||

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किञ्चिद्दोषप्रशमनं किञ्चिद्धातुप्रदूषणम्| स्वस्थवृत्तौ मतं किञ्चित्त्रिविधं द्रव्यमुच्यते||६७||

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Adhikarana 41 (68-73) · Śloka 74

তত্ পুনস্ত্রিবিধং প্রোক্তং জঙ্গমৌদ্ভিদপার্থিবম্ | মধূনি গোরসাঃ পিত্তং বসা মজ্জাঽসৃগামিষম্||৬৮|| বিণ্মূত্রচর্মরেতোঽস্থিস্নাযুশৃঙ্গনখাঃ খুরাঃ| জঙ্গমেভ্যঃ প্রযুজ্যন্তে কেশা লোমানি রোচনাঃ||৬৯|| সুবর্ণং সমলাঃ পঞ্চ লোহাঃ সসিকতাঃ সুধা| মনঃশিলালে মণযো লবণং গৈরিকাঞ্জনে||৭০|| ভৌমমৌষধমুদ্দিষ্টমৌদ্ভিদং তু চতুর্বিধম্| বনস্পতিস্তথা বীরুদ্বানস্পত্যস্তথৌষধিঃ||৭১|| ফলৈর্বনস্পতিঃ পুষ্পৈর্বানস্পত্যঃ ফলৈরপি| ওষধ্যঃ ফলপাকান্তাঃ প্রতানৈর্বীরুধঃ স্মৃতাঃ||৭২|| মূলত্বক্সারনির্যাসনাল(ড)স্বরসপল্লবাঃ| ক্ষারাঃ ক্ষীরং ফলং পুষ্পং ভস্ম তৈলানি কণ্টকাঃ||৭৩|| পত্রাণি শুঙ্গাঃ কন্দাশ্চ প্ররোহাশ্চৌদ্ভিদো গণঃ|৭৪|

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तत् पुनस्त्रिविधं प्रोक्तं जङ्गमौद्भिदपार्थिवम् | मधूनि गोरसाः पित्तं वसा मज्जाऽसृगामिषम्||६८|| विण्मूत्रचर्मरेतोऽस्थिस्नायुशृङ्गनखाः खुराः| जङ्गमेभ्यः प्रयुज्यन्ते केशा लोमानि रोचनाः||६९|| सुवर्णं समलाः पञ्च लोहाः ससिकताः सुधा| मनःशिलाले मणयो लवणं गैरिकाञ्जने||७०|| भौममौषधमुद्दिष्टमौद्भिदं तु चतुर्विधम्| वनस्पतिस्तथा वीरुद्वानस्पत्यस्तथौषधिः||७१|| फलैर्वनस्पतिः पुष्पैर्वानस्पत्यः फलैरपि| ओषध्यः फलपाकान्ताः प्रतानैर्वीरुधः स्मृताः||७२|| मूलत्वक्सारनिर्यासनाल(ड)स्वरसपल्लवाः| क्षाराः क्षीरं फलं पुष्पं भस्म तैलानि कण्टकाः||७३|| पत्राणि शुङ्गाः कन्दाश्च प्ररोहाश्चौद्भिदो गणः|७४|

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Adhikarana 42 (74-76) · Śloka 76

মূলিন্যঃ ষোডশৈকোনা ফলিন্যো বিংশতিঃ স্মৃতাঃ||৭৪|| মহাস্নেহাশ্চ চত্বারঃ পঞ্চৈব লবণানি চ| অষ্টৌ মূত্রাণি সঙ্খ্যাতান্যষ্টাবেব পযাংসি চ||৭৫|| শোধনার্থাশ্চ ষড্ বৃক্ষাঃ পুনর্বসুনিদর্শিতাঃ| য এতান্ বেত্তি সংযোক্তুং বিকারেষু স বেদবিত্||৭৬||

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मूलिन्यः षोडशैकोना फलिन्यो विंशतिः स्मृताः||७४|| महास्नेहाश्च चत्वारः पञ्चैव लवणानि च| अष्टौ मूत्राणि सङ्ख्यातान्यष्टावेव पयांसि च||७५|| शोधनार्थाश्च षड् वृक्षाः पुनर्वसुनिदर्शिताः| य एतान् वेत्ति संयोक्तुं विकारेषु स वेदवित्||७६||

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Adhikarana 43 (77-79) · Śloka 80

হস্তিদন্তী হৈমবতী শ্যামা ত্রিবৃদধোগুডা| সপ্তলা শ্বেতনামা চ প্রত্যক্শ্রেণী গবাক্ষ্যপি||৭৭|| জ্যোতিষ্মতী চ বিম্বী চ শণপুষ্পী বিষাণিকা| অজগন্ধা দ্রবন্তী চ ক্ষীরিণী চাত্র ষোডশী||৭৮|| শণপুষ্পী চ বিম্বী চ চ্ছর্দনে হৈমবত্যপি| শ্বেতা জ্যোতিষ্মতী চৈব যোজ্যা শীর্ষবিরেচনে||৭৯|| একাদশাবশিষ্টা যাঃ প্রযোজ্যাস্তা বিরেচনে| ইত্যুক্তা নামকর্মভ্যাং মূলিন্যঃ...|৮০|

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हस्तिदन्ती हैमवती श्यामा त्रिवृदधोगुडा| सप्तला श्वेतनामा च प्रत्यक्श्रेणी गवाक्ष्यपि||७७|| ज्योतिष्मती च बिम्बी च शणपुष्पी विषाणिका| अजगन्धा द्रवन्ती च क्षीरिणी चात्र षोडशी||७८|| शणपुष्पी च बिम्बी च च्छर्दने हैमवत्यपि| श्वेता ज्योतिष्मती चैव योज्या शीर्षविरेचने||७९|| एकादशावशिष्टा याः प्रयोज्यास्ता विरेचने| इत्युक्ता नामकर्मभ्यां मूलिन्यः...|८०|

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Adhikarana 44 (80-85) · Śloka 86

...ফলিনীঃ শৃণু||৮০|| শঙ্খিন্যথ বিডঙ্গানি ত্রপুষং মদনানি চ| ধামার্গবমথেক্ষ্বাকু জীমূতং কৃতবেধনম্| আনূপং স্থলজং চৈব ক্লীতকং দ্বিবিধং স্মৃতম্||৮১|| প্রকীর্যা চোদকীর্যা চ প্রত্যক্পুষ্পা তথাঽভযা| অন্তঃকোটরপুষ্পী চ হস্তিপর্ণ্যাশ্চ শারদম্||৮২|| কম্পিল্লকারগ্বধযোঃ ফলং যত্ কুটজস্য চ| ধামার্গবমথেক্ষ্বাকু জীমূতং কৃতবেধনম্||৮৩|| মদনং কুটজং চৈব ত্রপুষং হস্তিপর্ণিনী| এতানি বমনে চৈব যোজ্যান্যাস্থাপনেষু চ||৮৪|| নস্তঃ প্রচ্ছর্দনে চৈব প্রত্যক্পুষ্পা বিধীযতে| দশ যান্যবশিষ্টানি তান্যুক্তানি বিরেচনে||৮৫|| নামকর্মভিরুক্তানি ফলান্যেকোনবিংশতিঃ|৮৬|

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...फलिनीः शृणु||८०|| शङ्खिन्यथ विडङ्गानि त्रपुषं मदनानि च| धामार्गवमथेक्ष्वाकु जीमूतं कृतवेधनम्| आनूपं स्थलजं चैव क्लीतकं द्विविधं स्मृतम्||८१|| प्रकीर्या चोदकीर्या च प्रत्यक्पुष्पा तथाऽभया| अन्तःकोटरपुष्पी च हस्तिपर्ण्याश्च शारदम्||८२|| कम्पिल्लकारग्वधयोः फलं यत् कुटजस्य च| धामार्गवमथेक्ष्वाकु जीमूतं कृतवेधनम्||८३|| मदनं कुटजं चैव त्रपुषं हस्तिपर्णिनी| एतानि वमने चैव योज्यान्यास्थापनेषु च||८४|| नस्तः प्रच्छर्दने चैव प्रत्यक्पुष्पा विधीयते| दश यान्यवशिष्टानि तान्युक्तानि विरेचने||८५|| नामकर्मभिरुक्तानि फलान्येकोनविंशतिः|८६|

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Adhikarana 45 (86-87) · Śloka 88

সর্পিস্তৈলং বসা মজ্জা স্নেহো দিষ্টশ্চতুর্বিধঃ ||৮৬|| পানাভ্যঞ্জনবস্ত্যর্থং নস্যার্থং চৈব যোগতঃ| স্নেহনা জীবনা বর্ণ্যা বলোপচযবর্ধনাঃ||৮৭|| স্নেহা হ্যেতে চ বিহিতা বাতপিত্তকফাপহাঃ|৮৮|

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सर्पिस्तैलं वसा मज्जा स्नेहो दिष्टश्चतुर्विधः ||८६|| पानाभ्यञ्जनबस्त्यर्थं नस्यार्थं चैव योगतः| स्नेहना जीवना वर्ण्या बलोपचयवर्धनाः||८७|| स्नेहा ह्येते च विहिता वातपित्तकफापहाः|८८|

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Adhikarana 46 (88-91) · Śloka 92

সৌবর্চলং সৈন্ধবং চ বিডমৌদ্ভিদমেব চ||৮৮|| সামুদ্রেণ সহৈতানি পঞ্চ স্যুর্লবণানি চ| স্নিগ্ধান্যুষ্ণানি তীক্ষ্ণানি দীপনীযতমানি চ||৮৯|| আলেপনার্থে যুজ্যন্তে স্নেহস্বেদবিধৌ তথা| অধোভাগোর্ধ্বভাগেষু নিরূহেষ্বনুবাসনে||৯০|| অভ্যঞ্জনে ভোজনার্থে শিরসশ্চ বিরেচনে| শস্ত্রকর্মণি বর্ত্যর্থমঞ্জনোত্সাদনেষু চ||৯১|| অজীর্ণানাহযোর্বাতে গুল্মে শূলে তথোদরে| উক্তানি লবণা(নি)...|৯২|

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सौवर्चलं सैन्धवं च विडमौद्भिदमेव च||८८|| सामुद्रेण सहैतानि पञ्च स्युर्लवणानि च| स्निग्धान्युष्णानि तीक्ष्णानि दीपनीयतमानि च||८९|| आलेपनार्थे युज्यन्ते स्नेहस्वेदविधौ तथा| अधोभागोर्ध्वभागेषु निरूहेष्वनुवासने||९०|| अभ्यञ्जने भोजनार्थे शिरसश्च विरेचने| शस्त्रकर्मणि वर्त्यर्थमञ्जनोत्सादनेषु च||९१|| अजीर्णानाहयोर्वाते गुल्मे शूले तथोदरे| उक्तानि लवणा(नि)...|९२|

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Adhikarana 47 (92-104) · Śloka 105

... ন্যূ(ঊ)র্ধ্বং মূত্রাণ্যষ্টৌ নিবোধ মে||৯২|| মুখ্যানি যানি দিষ্টানি সর্বাণ্যাত্রেযশাসনে| অবিমূত্রমজামূত্রং গোমূত্রং মাহিষং চ যত্ ||৯৩|| হস্তিমূত্রমথোষ্ট্রস্য হযস্য চ খরস্য চ| উষ্ণং তীক্ষ্ণমথোঽরূক্ষং কটুকং লবণান্বিতম্||৯৪|| মূত্রমুত্সাদনে যুক্তং যুক্তমালেপনেষু চ| যুক্তমাস্থাপনে মূত্রং যুক্তং চাপি বিরেচনে||৯৫|| স্বেদেষ্বপি চ তদ্যুক্তমানাহেষ্বগদেষু চ| উদরেষ্বথ চার্শঃসু গুল্মিকুষ্ঠিকিলাসিষু ||৯৬|| তদ্যুক্তমুপনাহেষু পরিষেকে তথৈব চ| দীপনীযং বিষঘ্নং চ ক্রিমিঘ্নং চোপদিশ্যতে||৯৭|| পাণ্ডুরোগোপসৃষ্টানামুত্তমং শর্ম চোচ্যতে| শ্লেষ্মাণং শমযেত্ পীতং মারুতং চানুলোমযেত্||৯৮|| কর্ষেত্ পিত্তমধোভাগমিত্যস্মিন্ গুণসঙ্গ্রহঃ| সামান্যেন মযোক্তস্তু পৃথক্ত্বেন প্রবক্ষ্যতে||৯৯|| অবিমূত্রং সতিক্তং স্যাত্ স্নিগ্ধং পিত্তাবিরোধি চ| আজং কষাযমধুরং পথ্যং দোষান্নিহন্তি চ||১০০|| গব্যং সমধুরং কিঞ্চিদ্দোষঘ্নং ক্রিমিকুষ্ঠনুত্| কণ্ডূং চ শমযেত্ পীতং সম্যগ্দোষোদরে হিতম্||১০১|| অর্শঃশোফোদরঘ্নং তু সক্ষারং মাহিষং সরম্| হাস্তিকং লবণং মূত্রং হিতং তু ক্রিমিকুষ্ঠিনাম্||১০২|| প্রশস্তং বদ্ধবিণ্মূত্রবিষশ্লেষ্মামযার্শসাম্| সতিক্তং শ্বাসকাসঘ্নমর্শোঘ্নং চৌষ্ট্রমুচ্যতে||১০৩|| বাজিনাং তিক্তকটুকং কুষ্ঠব্রণবিষাপহম্| খরমূত্রমপস্মারোন্মাদগ্রহবিনাশনম্||১০৪|| ইতীহোক্তানি মূত্রাণি যথাসামর্থ্যযোগতঃ|১০৫|

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... न्यू(ऊ)र्ध्वं मूत्राण्यष्टौ निबोध मे||९२|| मुख्यानि यानि दिष्टानि सर्वाण्यात्रेयशासने| अविमूत्रमजामूत्रं गोमूत्रं माहिषं च यत् ||९३|| हस्तिमूत्रमथोष्ट्रस्य हयस्य च खरस्य च| उष्णं तीक्ष्णमथोऽरूक्षं कटुकं लवणान्वितम्||९४|| मूत्रमुत्सादने युक्तं युक्तमालेपनेषु च| युक्तमास्थापने मूत्रं युक्तं चापि विरेचने||९५|| स्वेदेष्वपि च तद्युक्तमानाहेष्वगदेषु च| उदरेष्वथ चार्शःसु गुल्मिकुष्ठिकिलासिषु ||९६|| तद्युक्तमुपनाहेषु परिषेके तथैव च| दीपनीयं विषघ्नं च क्रिमिघ्नं चोपदिश्यते||९७|| पाण्डुरोगोपसृष्टानामुत्तमं शर्म चोच्यते| श्लेष्माणं शमयेत् पीतं मारुतं चानुलोमयेत्||९८|| कर्षेत् पित्तमधोभागमित्यस्मिन् गुणसङ्ग्रहः| सामान्येन मयोक्तस्तु पृथक्त्वेन प्रवक्ष्यते||९९|| अविमूत्रं सतिक्तं स्यात् स्निग्धं पित्ताविरोधि च| आजं कषायमधुरं पथ्यं दोषान्निहन्ति च||१००|| गव्यं समधुरं किञ्चिद्दोषघ्नं क्रिमिकुष्ठनुत्| कण्डूं च शमयेत् पीतं सम्यग्दोषोदरे हितम्||१०१|| अर्शःशोफोदरघ्नं तु सक्षारं माहिषं सरम्| हास्तिकं लवणं मूत्रं हितं तु क्रिमिकुष्ठिनाम्||१०२|| प्रशस्तं बद्धविण्मूत्रविषश्लेष्मामयार्शसाम्| सतिक्तं श्वासकासघ्नमर्शोघ्नं चौष्ट्रमुच्यते||१०३|| वाजिनां तिक्तकटुकं कुष्ठव्रणविषापहम्| खरमूत्रमपस्मारोन्मादग्रहविनाशनम्||१०४|| इतीहोक्तानि मूत्राणि यथासामर्थ्ययोगतः|१०५|

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Adhikarana 48 (105-113) · Śloka 113

অতঃ ক্ষীরাণি বক্ষ্যন্তে কর্ম চৈষাং গুণাশ্চ যে||১০৫|| অবিক্ষীরমজাক্ষীরং গোক্ষীরং মাহিষং চ যত্| উষ্ট্রীণামথ নাগীনাং বডবাযাঃ স্ত্রিযাস্তথা||১০৬|| প্রাযশো মধুরং স্নিগ্ধং শীতং স্তন্যং পযো মতম্| প্রীণনং বৃংহণং বৃষ্যং মেধ্যং বল্যং মনস্করম্||১০৭|| জীবনীযং শ্রমহরং শ্বাসকাসনিবর্হণম্| হন্তি শোণিতপিত্তং চ সন্ধানং বিহতস্য চ||১০৮|| সর্বপ্রাণভৃতাং সাত্ম্যং শমনং শোধনং তথা| তৃষ্ণাঘ্নং দীপনীযং চ শ্রেষ্ঠং ক্ষীণক্ষতেষু চ||১০৯|| পাণ্ডুরোগেঽম্লপিত্তে চ শোষে গুল্মে তথোদরে| অতীসারে জ্বরে দাহে শ্বযথৌ চ বিশেষতঃ ||১১০|| যোনিশুক্রপ্রদোষেষু মূত্রেষ্বপ্রচুরেষু চ| পুরীষে গ্রথিতে পথ্যং বাতপিত্তবিকারিণাম্||১১১|| নস্যালেপাবগাহেষু বমনাস্থাপনেষু চ| বিরেচনে স্নেহনে চ পযঃ সর্বত্র যুজ্যতে||১১২|| যথাক্রমং ক্ষীরগুণানেকৈকস্য পৃথক্ পৃথক্| অন্নপানাদিকেঽধ্যাযে ভূযো বক্ষ্যাম্যশেষতঃ||১১৩||

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अतः क्षीराणि वक्ष्यन्ते कर्म चैषां गुणाश्च ये||१०५|| अविक्षीरमजाक्षीरं गोक्षीरं माहिषं च यत्| उष्ट्रीणामथ नागीनां वडवायाः स्त्रियास्तथा||१०६|| प्रायशो मधुरं स्निग्धं शीतं स्तन्यं पयो मतम्| प्रीणनं बृंहणं वृष्यं मेध्यं बल्यं मनस्करम्||१०७|| जीवनीयं श्रमहरं श्वासकासनिबर्हणम्| हन्ति शोणितपित्तं च सन्धानं विहतस्य च||१०८|| सर्वप्राणभृतां सात्म्यं शमनं शोधनं तथा| तृष्णाघ्नं दीपनीयं च श्रेष्ठं क्षीणक्षतेषु च||१०९|| पाण्डुरोगेऽम्लपित्ते च शोषे गुल्मे तथोदरे| अतीसारे ज्वरे दाहे श्वयथौ च विशेषतः ||११०|| योनिशुक्रप्रदोषेषु मूत्रेष्वप्रचुरेषु च| पुरीषे ग्रथिते पथ्यं वातपित्तविकारिणाम्||१११|| नस्यालेपावगाहेषु वमनास्थापनेषु च| विरेचने स्नेहने च पयः सर्वत्र युज्यते||११२|| यथाक्रमं क्षीरगुणानेकैकस्य पृथक् पृथक्| अन्नपानादिकेऽध्याये भूयो वक्ष्याम्यशेषतः||११३||

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Adhikarana 49 (114-115) · Śloka 115

অথাপরে ত্রযো বৃক্ষাঃ পৃথগ্যে ফলমূলিভিঃ| স্নুহ্যর্কাশ্মন্তকাস্তেষামিদং কর্ম পৃথক্ পৃথক্||১১৪|| বমনেঽশ্মন্তকং বিদ্যাত্ স্নুহীক্ষীরং বিরেচনে| ক্ষীরমর্কস্য বিজ্ঞেযং বমনে সবিরেচনে||১১৫||

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अथापरे त्रयो वृक्षाः पृथग्ये फलमूलिभिः| स्नुह्यर्काश्मन्तकास्तेषामिदं कर्म पृथक् पृथक्||११४|| वमनेऽश्मन्तकं विद्यात् स्नुहीक्षीरं विरेचने| क्षीरमर्कस्य विज्ञेयं वमने सविरेचने||११५||

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Adhikarana 50 (116-119) · Śloka 119

ইমাংস্ত্রীনপরান্ বৃক্ষানাহুর্যেষাং হিতাস্ত্বচঃ| পূতীকঃ কৃষ্ণগন্ধা চ তিল্বকশ্চ তথা তরুঃ||১১৬|| বিরেচনে প্রযোক্তব্যঃ পূতীকস্তিল্বকস্তথা| কৃষ্ণগন্ধা পরীসর্পে শোথেষ্বর্শঃসু চোচ্যতে||১১৭|| দদ্রুবিদ্রধিগণ্ডেষু কুষ্ঠেষ্বপ্যলজীষু চ| ষড্বৃক্ষাঞ্ছোধনানেতানপি বিদ্যাদ্বিচক্ষণঃ||১১৮|| ইত্যুক্তাঃ ফলমূলিন্যঃ স্নেহাশ্চ লবণানি চ| মূত্রং ক্ষীরাণি বৃক্ষাশ্চ ষড্ যে দিষ্টপযস্ত্বচঃ||১১৯||

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इमांस्त्रीनपरान् वृक्षानाहुर्येषां हितास्त्वचः| पूतीकः कृष्णगन्धा च तिल्वकश्च तथा तरुः||११६|| विरेचने प्रयोक्तव्यः पूतीकस्तिल्वकस्तथा| कृष्णगन्धा परीसर्पे शोथेष्वर्शःसु चोच्यते||११७|| दद्रुविद्रधिगण्डेषु कुष्ठेष्वप्यलजीषु च| षड्वृक्षाञ्छोधनानेतानपि विद्याद्विचक्षणः||११८|| इत्युक्ताः फलमूलिन्यः स्नेहाश्च लवणानि च| मूत्रं क्षीराणि वृक्षाश्च षड् ये दिष्टपयस्त्वचः||११९||

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Adhikarana 51 (120-123) · Śloka 123

ওষধীর্নামরূপাভ্যাং জানতে হ্যজপা বনে| অবিপাশ্চৈব গোপাশ্চ যে চান্যে বনবাসিনঃ||১২০|| ন নামজ্ঞানমাত্রেণ রূপজ্ঞানেন বা পুনঃ| ওষধীনাং পরাং প্রাপ্তিং কশ্চিদ্বেদিতুমর্হতি||১২১|| যোগবিত্ত্বপ্যরূপজ্ঞস্তাসাং তত্ত্ববিদুচ্যতে| কিং পুনর্যো বিজানীযাদোষধীঃ সর্বথা ভিষক্||১২২|| যোগমাসাং তু যো বিদ্যাদ্দেশকালোপপাদিতম্| পুরুষং পুরুষং বীক্ষ্য স জ্ঞেযো ভিষগুত্তমঃ||১২৩||

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ओषधीर्नामरूपाभ्यां जानते ह्यजपा वने| अविपाश्चैव गोपाश्च ये चान्ये वनवासिनः||१२०|| न नामज्ञानमात्रेण रूपज्ञानेन वा पुनः| ओषधीनां परां प्राप्तिं कश्चिद्वेदितुमर्हति||१२१|| योगवित्त्वप्यरूपज्ञस्तासां तत्त्वविदुच्यते| किं पुनर्यो विजानीयादोषधीः सर्वथा भिषक्||१२२|| योगमासां तु यो विद्याद्देशकालोपपादितम्| पुरुषं पुरुषं वीक्ष्य स ज्ञेयो भिषगुत्तमः||१२३||

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Adhikarana 52 (124-125) · Śloka 125

যথা বিষং যথা শস্ত্রং যথাঽগ্নিরশনির্যথা| তথৌষধমবিজ্ঞাতং বিজ্ঞাতমমৃতং যথা||১২৪|| ঔষধং হ্যনভিজ্ঞাতং নামরূপগুণৈস্ত্রিভিঃ| বিজ্ঞাতং চাপি দুর্যুক্তমনর্থাযোপপদ্যতে||১২৫||

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यथा विषं यथा शस्त्रं यथाऽग्निरशनिर्यथा| तथौषधमविज्ञातं विज्ञातममृतं यथा||१२४|| औषधं ह्यनभिज्ञातं नामरूपगुणैस्त्रिभिः| विज्ञातं चापि दुर्युक्तमनर्थायोपपद्यते||१२५||

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Adhikarana 53 (126-133) · Śloka 133

যোগাদপি বিষং তীক্ষ্ণমুত্তমং ভেষজং ভবেত্| ভেষজং চাপি দুর্যুক্তং তীক্ষ্ণং সম্পদ্যতে বিষম্||১২৬|| তস্মান্ন ভিষজা যুক্তং যুক্তিবাহ্যেন ভেষজম্| ধীমতা কিঞ্চিদাদেযং জীবিতারোগ্যকাঙ্ক্ষিণা||১২৭|| কুর্যান্নিপতিতো মূর্ধ্নি সশেষং বাসবাশনিঃ| সশেষমাতুরং কুর্যান্নত্বজ্ঞমতমৌষধম্||১২৮|| দুঃখিতায শযানায শ্রদ্দধানায রোগিণে| যো ভেষজমবিজ্ঞায প্রাজ্ঞমানী প্রযচ্ছতি||১২৯|| ত্যক্তধর্মস্য পাপস্য মৃত্যুভূতস্য দুর্মতেঃ| নরো নরকপাতী স্যাত্তস্য সম্ভাষণাদপি||১৩০|| বরমাশীবিষবিষং ক্বথিতং তাম্রমেব বা| পীতমত্যগ্নিসন্তপ্তা ভক্ষিতা বাঽপ্যযোগুডাঃ||১৩১|| নতু শ্রুতবতাং বেশং বিভ্রতা শরণাগতাত্| গৃহীতমন্নং পানং বা বিত্তং বা রোগপীডিতাত্||১৩২|| ভিষগ্বুভূষুর্মতিমানতঃ স্বগুণসম্পদি| পরং প্রযত্নমাতিষ্ঠেত্ প্রাণদঃ স্যাদ্যথা নৃণাম্||১৩৩||

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योगादपि विषं तीक्ष्णमुत्तमं भेषजं भवेत्| भेषजं चापि दुर्युक्तं तीक्ष्णं सम्पद्यते विषम्||१२६|| तस्मान्न भिषजा युक्तं युक्तिबाह्येन भेषजम्| धीमता किञ्चिदादेयं जीवितारोग्यकाङ्क्षिणा||१२७|| कुर्यान्निपतितो मूर्ध्नि सशेषं वासवाशनिः| सशेषमातुरं कुर्यान्नत्वज्ञमतमौषधम्||१२८|| दुःखिताय शयानाय श्रद्दधानाय रोगिणे| यो भेषजमविज्ञाय प्राज्ञमानी प्रयच्छति||१२९|| त्यक्तधर्मस्य पापस्य मृत्युभूतस्य दुर्मतेः| नरो नरकपाती स्यात्तस्य सम्भाषणादपि||१३०|| वरमाशीविषविषं क्वथितं ताम्रमेव वा| पीतमत्यग्निसन्तप्ता भक्षिता वाऽप्ययोगुडाः||१३१|| नतु श्रुतवतां वेशं बिभ्रता शरणागतात्| गृहीतमन्नं पानं वा वित्तं वा रोगपीडितात्||१३२|| भिषग्बुभूषुर्मतिमानतः स्वगुणसम्पदि| परं प्रयत्नमातिष्ठेत् प्राणदः स्याद्यथा नृणाम्||१३३||

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Adhikarana 54 (134) · Śloka 134

তদেব যুক্তং ভৈষজ্যং যদারোগ্যায কল্পতে| স চৈব ভিষজাং শ্রেষ্ঠো রোগেভ্যো যঃ প্রমোচযেত্||১৩৪||

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तदेव युक्तं भैषज्यं यदारोग्याय कल्पते| स चैव भिषजां श्रेष्ठो रोगेभ्यो यः प्रमोचयेत्||१३४||

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Adhikarana 55 (135) · Śloka 135

সম্যক্প্রযোগং সর্বেষাং সিদ্ধিরাখ্যাতি কর্মণাম্| সিদ্ধিরাখ্যাতি সর্বৈশ্চ গুণৈর্যুক্তং ভিষক্তমম্||১৩৫||

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सम्यक्प्रयोगं सर्वेषां सिद्धिराख्याति कर्मणाम्| सिद्धिराख्याति सर्वैश्च गुणैर्युक्तं भिषक्तमम्||१३५||

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Adhikarana 56 (136-140) · Śloka 140

তত্র শ্লোকাঃ- আযুর্বেদাগমো হেতুরাগমস্য প্রবর্তনম্| সূত্রণস্যাভ্যনুজ্ঞানমাযুর্বেদস্য নির্ণযঃ||১৩৬|| সম্পূর্ণং কারণং কার্যমাযুর্বেদপ্রযোজনম্| হেতবশ্চৈব দোষাশ্চ ভেষজং সঙ্গ্রহেণ চ||১৩৭|| রসাঃ সপ্রত্যযদ্রব্যাস্ত্রিবিধো দ্রব্যসঙ্গ্রহঃ| মূলিন্যশ্চ ফলিন্যশ্চ স্নেহাশ্চ লবণানি চ||১৩৮|| মূত্রং ক্ষীরাণি বৃক্ষাশ্চ ষড্ যে ক্ষীরত্বগাশ্রযাঃ| কর্মাণি চৈষাং সর্বেষাং যোগাযোগগুণাগুণাঃ||১৩৯|| বৈদ্যাপবাদো যত্রস্থাঃ সর্বে চ ভিষজাং গুণাঃ| সর্বমেতত্ সমাখ্যাতং পূর্বাধ্যাযে মহর্ষিণা||১৪০||

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तत्र श्लोकाः- आयुर्वेदागमो हेतुरागमस्य प्रवर्तनम्| सूत्रणस्याभ्यनुज्ञानमायुर्वेदस्य निर्णयः||१३६|| सम्पूर्णं कारणं कार्यमायुर्वेदप्रयोजनम्| हेतवश्चैव दोषाश्च भेषजं सङ्ग्रहेण च||१३७|| रसाः सप्रत्ययद्रव्यास्त्रिविधो द्रव्यसङ्ग्रहः| मूलिन्यश्च फलिन्यश्च स्नेहाश्च लवणानि च||१३८|| मूत्रं क्षीराणि वृक्षाश्च षड् ये क्षीरत्वगाश्रयाः| कर्माणि चैषां सर्वेषां योगायोगगुणागुणाः||१३९|| वैद्यापवादो यत्रस्थाः सर्वे च भिषजां गुणाः| सर्वमेतत् समाख्यातं पूर्वाध्याये महर्षिणा||१४०||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 1

ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে সূত্রস্থানে দীর্ঘঞ্জীবিতীযো নাম প্রথমোঽধ্যাযঃ||১||

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इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने दीर्घञ्जीवितीयो नाम प्रथमोऽध्यायः||१||

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1. dīrghañjīvitīyō'dhyāyaḥ — Charaka Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi