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17. āmapakvaiṣaṇīyādhyāyaḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাত আমপক্বৈষণীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथात आमपक्वैषणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

শোফসমুত্থানা গ্রন্থিবিদ্রধ্যলজীপ্রভৃতযঃ প্রাযেণ ব্যাধযোঽভিহিতা অনেকাকৃতযঃ, তৈর্বিলক্ষণঃ পৃথুর্গ্রথিতঃ সমো বিষমো বা ত্বঙ্মাংসস্থাযী দোষসঙ্ঘাতঃ শরীরৈকদেশোত্থিতঃ শোফ ইত্যুচ্যতে ||৩||

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शोफसमुत्थाना ग्रन्थिविद्रध्यलजीप्रभृतयः प्रायेण व्याधयोऽभिहिता अनेकाकृतयः, तैर्विलक्षणः पृथुर्ग्रथितः समो विषमो वा त्वङ्मांसस्थायी दोषसङ्घातः शरीरैकदेशोत्थितः शोफ इत्युच्यते ||३||

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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4

স ষড্বিধো বাতপিত্তকফশোণিতসন্নিপাতাগন্তুনিমিত্তঃ | তস্য দোষরূপব্যঞ্জনৈর্লক্ষণানি ব্যাখ্যাস্যামঃ | তত্র, বাতশোফঃ কৃষ্ণোঽরুণো বা পরুষো মৃদুরনবস্থিতাস্তোদাদযশ্চাত্র বেদনাবিশেষা ভবন্তি; পিত্তশোফঃ পীতো মৃদুঃ সরক্তো বা শীঘ্রানুসার্যোষাদযশ্চাত্র বেদনাবিশেষা ভবন্তি; শ্লেষ্মশ্বযথুঃ পাণ্ডুঃ কঠিনঃ স্নিগ্ধঃ শীতো স্নিগ্ধো মন্দানুসারী কণ্ড্বাদযশ্চাত্র বেদনাবিশেষা ভবন্তি; সর্ববর্ণবেদনঃ সন্নিপাতশ্বযথুঃ; পিত্তবচ্ছোণিতজোঽতিকৃষ্ণশ্চ; পিত্তরক্তলক্ষণ আগন্তুর্লোহিতাবভাসশ্চ ||৪||

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स षड्विधो वातपित्तकफशोणितसन्निपातागन्तुनिमित्तः | तस्य दोषरूपव्यञ्जनैर्लक्षणानि व्याख्यास्यामः | तत्र, वातशोफः कृष्णोऽरुणो वा परुषो मृदुरनवस्थितास्तोदादयश्चात्र वेदनाविशेषा भवन्ति; पित्तशोफः पीतो मृदुः सरक्तो वा शीघ्रानुसार्योषादयश्चात्र वेदनाविशेषा भवन्ति; श्लेष्मश्वयथुः पाण्डुः कठिनः स्निग्धः शीतो स्निग्धो मन्दानुसारी कण्ड्वादयश्चात्र वेदनाविशेषा भवन्ति; सर्ववर्णवेदनः सन्निपातश्वयथुः; पित्तवच्छोणितजोऽतिकृष्णश्च; पित्तरक्तलक्षण आगन्तुर्लोहितावभासश्च ||४||

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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5

স যদা বাহ্যাভ্যন্তরৈঃ ক্রিযাবিশেষৈর্ন সম্ভাবিতঃ প্রশমযিতুং ক্রিযাবিপর্যযাদ্বহুত্বাদ্বা দোষাণাং তদা পাকাভিমুখো ভবতি | তস্যামস্য পচ্যমানস্য পক্বস্য চ লক্ষণমুচ্যমানমুপধারয- | তত্র, মন্দোষ্মতা ত্বক্সবর্ণতা শীতশোফতা স্থৈর্যং মন্দবেদনতাঽল্পশোফতা চামলক্ষণমুদ্দিষ্টং; সূচিভিরিব নিস্তুদ্যতে, দশ্যত ইব পিপীলিকাভিঃ, তাভিশ্চ সংসর্প্যত ইব, ছিদ্যত ইব শস্ত্রেণ, ভিদ্যত ইব শক্তিভিঃ, তাড্যত ইব দণ্ডেন, পীড্যত ইব পাণিনা, ঘট্যত ইব চাঙ্গুল্যা, দহ্যতে পচ্যত ইব চাগ্নিক্ষারাভ্যাম্, ওষচোষপরীদাহাশ্চ ভবন্তি, বৃশ্চিকবিদ্ধ ইব চ স্থানাসনশযনেষু ন শান্তিমুপৈতি, আধ্মাতবস্তিরিবাততশ্চ শোফো ভবতি , ত্বগ্বৈবর্ণ্যং শোফাভিবৃদ্ধির্জ্বরদাহপিপাসা ভক্তারুচিশ্চ পচ্যমানলিঙ্গং; বেদনোপশান্তিঃ পাণ্ডুতাঽল্পশোফতা বলীপ্রাদুর্ভাবস্ত্বক্পরিপুটনং নিম্নদর্শনমঙ্গুল্যাঽবপীডিতে প্রত্যুন্নমনং, বস্তাবিবোদকসঞ্চরণং পূযস্য প্রপীডযত্যেকমন্তমন্তে চাবপীডিতে, মুহুর্মুহুস্তোদঃ কণ্ডূরুন্নততা ব্যাধেরুপদ্রবশান্তির্ভক্তাভিকাঙ্ক্ষা চ পক্বলিঙ্গম্ | কফজেষু তু রোগেষু গম্ভীরগতিত্বাদভিঘাতজেষু বা কেষুচিদসমস্তং পক্বলক্ষণং দৃষ্ট্বা পক্বমপক্বমিতি মন্যমানো ভিষঙ্মোহমুপৈতি; তত্র হি ত্বক্সবর্ণতা শীতশোফতা স্থৈর্যমল্পরুজতাঽশ্মবচ্চ ঘনতা, ন মোহমুপেযাদিতি ||৫||

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स यदा बाह्याभ्यन्तरैः क्रियाविशेषैर्न सम्भावितः प्रशमयितुं क्रियाविपर्ययाद्बहुत्वाद्वा दोषाणां तदा पाकाभिमुखो भवति | तस्यामस्य पच्यमानस्य पक्वस्य च लक्षणमुच्यमानमुपधारय- | तत्र, मन्दोष्मता त्वक्सवर्णता शीतशोफता स्थैर्यं मन्दवेदनताऽल्पशोफता चामलक्षणमुद्दिष्टं; सूचिभिरिव निस्तुद्यते, दश्यत इव पिपीलिकाभिः, ताभिश्च संसर्प्यत इव, छिद्यत इव शस्त्रेण, भिद्यत इव शक्तिभिः, ताड्यत इव दण्डेन, पीड्यत इव पाणिना, घट्यत इव चाङ्गुल्या, दह्यते पच्यत इव चाग्निक्षाराभ्याम्, ओषचोषपरीदाहाश्च भवन्ति, वृश्चिकविद्ध इव च स्थानासनशयनेषु न शान्तिमुपैति, आध्मातबस्तिरिवाततश्च शोफो भवति , त्वग्वैवर्ण्यं शोफाभिवृद्धिर्ज्वरदाहपिपासा भक्तारुचिश्च पच्यमानलिङ्गं; वेदनोपशान्तिः पाण्डुताऽल्पशोफता वलीप्रादुर्भावस्त्वक्परिपुटनं निम्नदर्शनमङ्गुल्याऽवपीडिते प्रत्युन्नमनं, बस्ताविवोदकसञ्चरणं पूयस्य प्रपीडयत्येकमन्तमन्ते चावपीडिते, मुहुर्मुहुस्तोदः कण्डूरुन्नतता व्याधेरुपद्रवशान्तिर्भक्ताभिकाङ्क्षा च पक्वलिङ्गम् | कफजेषु तु रोगेषु गम्भीरगतित्वादभिघातजेषु वा केषुचिदसमस्तं पक्वलक्षणं दृष्ट्वा पक्वमपक्वमिति मन्यमानो भिषङ्मोहमुपैति; तत्र हि त्वक्सवर्णता शीतशोफता स्थैर्यमल्परुजताऽश्मवच्च घनता, न मोहमुपेयादिति ||५||

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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6

ভবন্তি চাত্র- আমং বিপচ্যমানং চ সম্যক্ পক্বং চ যো ভিষক্ | জানীযাত্ স ভবেদ্বৈদ্যঃ শেষাস্তস্করবৃত্তযঃ ||৬||

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भवन्ति चात्र- आमं विपच्यमानं च सम्यक् पक्वं च यो भिषक् | जानीयात् स भवेद्वैद्यः शेषास्तस्करवृत्तयः ||६||

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Adhikarana 6 (7-8) · Śloka 8

বাতাদৃতে নাস্তি রুজা ন পাকঃ পিত্তাদৃতে নাস্তি কফাচ্চ পূযঃ | তস্মাত্ সমস্তান্ পরিপাককালে পচন্তি শোফাংস্ত্রয এব দোষাঃ ||৭|| কালান্তরেণাভ্যুদিতং তু পিত্তং কৃত্বা বশে বাতকফৌ প্রসহ্য | পচত্যতঃ শোণিতমেব পাকো মতোঽপরেষাং বিদুষাং দ্বিতীযঃ ||৮||

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वातादृते नास्ति रुजा न पाकः पित्तादृते नास्ति कफाच्च पूयः | तस्मात् समस्तान् परिपाककाले पचन्ति शोफांस्त्रय एव दोषाः ||७|| कालान्तरेणाभ्युदितं तु पित्तं कृत्वा वशे वातकफौ प्रसह्य | पचत्यतः शोणितमेव पाको मतोऽपरेषां विदुषां द्वितीयः ||८||

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Adhikarana 7 (9) · Śloka 9

তত্র, আমচ্ছেদে মাংসসিরাস্নাযুসন্ধ্যস্থিব্যাপাদনমতিমাত্রং শোণিতাতিপ্রবৃত্তির্বেদনাপ্রাদুর্ভাবোঽবদরণমনেকোপদ্রবদর্শনং ক্ষতবিদ্রধির্বা ভবতি | স যদা ভযমোহাভ্যাং পক্বমপ্যপক্বমিতি মন্যমানশ্চিরমুপেক্ষতে ব্যাধিং বৈদ্যস্তদা গম্ভীরানুগতো দ্বারমলভমানঃ পূযঃ স্বমাশ্রযমবদার্যোত্সঙ্গং মহান্তমবকাশং কৃত্বা নাডীং জনযিত্বা কৃচ্ছ্রসাধ্যো ভবত্যসাধ্যো বেতি ||৯||

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तत्र, आमच्छेदे मांससिरास्नायुसन्ध्यस्थिव्यापादनमतिमात्रं शोणितातिप्रवृत्तिर्वेदनाप्रादुर्भावोऽवदरणमनेकोपद्रवदर्शनं क्षतविद्रधिर्वा भवति | स यदा भयमोहाभ्यां पक्वमप्यपक्वमिति मन्यमानश्चिरमुपेक्षते व्याधिं वैद्यस्तदा गम्भीरानुगतो द्वारमलभमानः पूयः स्वमाश्रयमवदार्योत्सङ्गं महान्तमवकाशं कृत्वा नाडीं जनयित्वा कृच्छ्रसाध्यो भवत्यसाध्यो वेति ||९||

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Adhikarana 8 (10) · Śloka 10

ভবতি চাত্র- যশ্ছিনত্ত্যামমজ্ঞানাদ্যশ্চ পক্বমুপেক্ষতে | শ্বপচাবিব মন্তব্যৌ তাবনিশ্চিতকারিণৌ ||১০||

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भवति चात्र- यश्छिनत्त्याममज्ञानाद्यश्च पक्वमुपेक्षते | श्वपचाविव मन्तव्यौ तावनिश्चितकारिणौ ||१०||

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Adhikarana 9 (11-13) · Śloka 13

প্রাক্ শস্ত্রকর্মণশ্চেষ্টং ভোজযেদাতুরং ভিষক্ | মদ্যপং পাযযেন্মদ্যং তীক্ষ্ণং যো বেদনাঽসহঃ ||১১|| ন মূর্চ্ছত্যন্নসংযোগান্মত্তঃ শস্ত্রং ন বুধ্যতে | তস্মাদবশ্যং ভোক্তব্যং রোগেষূক্তেষু কর্মণি ||১২|| প্রাণো হ্যাভ্যন্তরো নৄণাং বাহ্যপ্রাণগুণান্বিতঃ | ধারযত্যবিরোধেন শরীরং পাঞ্চভৌতিকম্ ||১৩||

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प्राक् शस्त्रकर्मणश्चेष्टं भोजयेदातुरं भिषक् | मद्यपं पाययेन्मद्यं तीक्ष्णं यो वेदनाऽसहः ||११|| न मूर्च्छत्यन्नसंयोगान्मत्तः शस्त्रं न बुध्यते | तस्मादवश्यं भोक्तव्यं रोगेषूक्तेषु कर्मणि ||१२|| प्राणो ह्याभ्यन्तरो नॄणां बाह्यप्राणगुणान्वितः | धारयत्यविरोधेन शरीरं पाञ्चभौतिकम् ||१३||

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Adhikarana 10 (14) · Śloka 14

অল্পো মহান্ বা ক্রিযযা বিনা যঃ সমুচ্ছ্রিতঃ পাকমুপৈতি শোফঃ | বিশালমূলো বিষমং বিদগ্ধঃ স কৃচ্ছ্রতাং যাত্যবগাঢদোষঃ ||১৪||

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अल्पो महान् वा क्रियया विना यः समुच्छ्रितः पाकमुपैति शोफः | विशालमूलो विषमं विदग्धः स कृच्छ्रतां यात्यवगाढदोषः ||१४||

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Adhikarana 11 (15) · Śloka 15

আলেপবিস্রাবণাশোধনৈস্তু সম্যক্ প্রযুক্তৈর্যদি নোপশাম্যেত্ | পচ্যেত শীঘ্রং সমমল্পমূলঃ স পিণ্ডিতশ্চোপরি চোন্নতঃ স্যাত্ ||১৫||

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आलेपविस्रावणाशोधनैस्तु सम्यक् प्रयुक्तैर्यदि नोपशाम्येत् | पच्येत शीघ्रं सममल्पमूलः स पिण्डितश्चोपरि चोन्नतः स्यात् ||१५||

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Adhikarana 12 (16) · Śloka 16

কক্ষং সমাসাদ্য যথৈব বহ্নির্বায্বীরিতঃ সন্দহতি প্রসহ্য | তথৈব পূযোঽপ্যবিনিঃসৃতো হি মাংসং সিরাঃ স্নাযু চ খাদতীহ ||১৬||

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कक्षं समासाद्य यथैव वह्निर्वाय्वीरितः सन्दहति प्रसह्य | तथैव पूयोऽप्यविनिःसृतो हि मांसं सिराः स्नायु च खादतीह ||१६||

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Adhikarana 13 (17-18) · Śloka 18

আদৌ বিম্লাপনং কুর্যাদ্দ্বিতীযমবসেচনম্ | তৃতীযমুপনাহং তু চতুর্থীং পাটনক্রিযাম্ ||১৭|| পঞ্চমং শোধনং কুর্যাত্ ষষ্ঠং রোপণমিষ্যতে | এতে ক্রমা ব্রণস্যোক্তাঃ সপ্তমং বৈকৃতাপহম্ ||১৮||

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आदौ विम्लापनं कुर्याद्द्वितीयमवसेचनम् | तृतीयमुपनाहं तु चतुर्थीं पाटनक्रियाम् ||१७|| पञ्चमं शोधनं कुर्यात् षष्ठं रोपणमिष्यते | एते क्रमा व्रणस्योक्ताः सप्तमं वैकृतापहम् ||१८||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 17

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং সূত্রস্থানে আমপক্বৈষণীযো নাম সপ্তদশোঽধ্যাযঃ ||১৭||

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इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने आमपक्वैषणीयो नाम सप्तदशोऽध्यायः ||१७||

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17. āmapakvaiṣaṇīyādhyāyaḥ — Sushruta Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi