Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ কর্ণব্যধবন্ধবিধিমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातः कर्णव्यधबन्धविधिमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ কর্ণব্যধবন্ধবিধিমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातः कर्णव्यधबन्धविधिमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
রক্ষাভূষণনিমিত্তং বালস্য কর্ণৌ বিধ্যেতে | তৌ ষষ্ঠে মাসি সপ্তমে বা শুক্লপক্ষে প্রশস্তেষু তিথিকরণমুহূর্তনক্ষত্রেষু কৃতমঙ্গলস্বস্তিবাচনং ধাত্র্যঙ্কে কুমারধরাঙ্কে বা কুমারমুপবেশ্য বালক্রীডনকৈঃ প্রলোভ্যাভিসান্ত্বযন্ ভিষগ্বামহস্তেনাকৃষ্য কর্ণং দৈবকৃতে ছিদ্র আদিত্যকরাবভাসিতে শনৈঃ শনৈর্দক্ষিণহস্তেনর্জু বিধ্যেত্, প্রতনুকং সূচ্যা, বহলমারযা, পূর্বং দক্ষিণং কুমারস্য, বামং কুমার্যাঃ; ততঃ পিচুবর্তিং প্রবেশযেত্ ||৩||
रक्षाभूषणनिमित्तं बालस्य कर्णौ विध्येते | तौ षष्ठे मासि सप्तमे वा शुक्लपक्षे प्रशस्तेषु तिथिकरणमुहूर्तनक्षत्रेषु कृतमङ्गलस्वस्तिवाचनं धात्र्यङ्के कुमारधराङ्के वा कुमारमुपवेश्य बालक्रीडनकैः प्रलोभ्याभिसान्त्वयन् भिषग्वामहस्तेनाकृष्य कर्णं दैवकृते छिद्र आदित्यकरावभासिते शनैः शनैर्दक्षिणहस्तेनर्जु विध्येत्, प्रतनुकं सूच्या, बहलमारया, पूर्वं दक्षिणं कुमारस्य, वामं कुमार्याः; ततः पिचुवर्तिं प्रवेशयेत् ||३||
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
শোণিতবহুত্বেন বেদনযা চান্যদেশবিদ্ধমিতি জানীযাত্, নিরুপদ্রবতযা তদ্দেশবিদ্ধমিতি ||৪||
शोणितबहुत्वेन वेदनया चान्यदेशविद्धमिति जानीयात्, निरुपद्रवतया तद्देशविद्धमिति ||४||
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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5
তত্রাজ্ঞেন যদৃচ্ছযা বিদ্ধাসু সিরাসু কালিকামর্মরিকালোহিতিকাসূপদ্রবা ভবন্তি | তত্র, কালিকাযাং জ্বরো দাহঃ শ্বযথুর্বেদনা চ ভবতি; মর্মরিকাযাং বেদনা জ্বরো গ্রন্থযশ্চ; লোহিতিকাযাং মন্যাস্তম্ভাপতানকশিরোগ্রহকর্ণশূলানি ভবন্তি | তেষু যথাস্বং প্রতিকুর্বীত ||৫||
तत्राज्ञेन यदृच्छया विद्धासु सिरासु कालिकामर्मरिकालोहितिकासूपद्रवा भवन्ति | तत्र, कालिकायां ज्वरो दाहः श्वयथुर्वेदना च भवति; मर्मरिकायां वेदना ज्वरो ग्रन्थयश्च; लोहितिकायां मन्यास्तम्भापतानकशिरोग्रहकर्णशूलानि भवन्ति | तेषु यथास्वं प्रतिकुर्वीत ||५||
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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6
ক্লিষ্টজিহ্মাপ্রশস্তসূচীব্যধাদ্গাঢতরবর্তিত্বাদ্দোষসমুদাযাদপ্রশস্তব্যধাদ্বা যত্র সংরম্ভো বেদনা বা ভবতি তত্র বর্তিমুপহৃত্যাশু মধুকৈরণ্ডমূলমঞ্জিষ্ঠাযবতিলকল্কৈর্মধুঘৃতপ্রগাঢৈরালেপযেত্তাবদ্যাবত্ সুরূঢ ইতি; সুরূঢং চৈনং পুনর্বিধ্যেত্; বিধানং তু পূর্বোক্তমেব ||৬||
क्लिष्टजिह्माप्रशस्तसूचीव्यधाद्गाढतरवर्तित्वाद्दोषसमुदायादप्रशस्तव्यधाद्वा यत्र संरम्भो वेदना वा भवति तत्र वर्तिमुपहृत्याशु मधुकैरण्डमूलमञ्जिष्ठायवतिलकल्कैर्मधुघृतप्रगाढैरालेपयेत्तावद्यावत् सुरूढ इति; सुरूढं चैनं पुनर्विध्येत्; विधानं तु पूर्वोक्तमेव ||६||
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Adhikarana 6 (7) · Śloka 7
তত্র সম্যগ্বিদ্ধমামতৈলেন পরিষেচযেত্, ত্র্যহাত্ত্র্যহাচ্চ বর্তিং স্থূলতরাং দদ্যাত্, পরিষেকং চ তমেব ||৭||
तत्र सम्यग्विद्धमामतैलेन परिषेचयेत्, त्र्यहात्त्र्यहाच्च वर्तिं स्थूलतरां दद्यात्, परिषेकं च तमेव ||७||
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Adhikarana 7 (8) · Śloka 8
অথ ব্যপগতদোষোপদ্রবে কর্ণে বর্ধনার্থং লঘু বর্ধনকং কুর্যাত্ ||৮||
अथ व्यपगतदोषोपद्रवे कर्णे वर्धनार्थं लघु वर्धनकं कुर्यात् ||८||
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Adhikarana 8 (9) · Śloka 9
এবং বিবর্ধিতঃ কর্ণশ্ছিদ্যতে তু দ্বিধা নৃণাম্ | দোষতো বাঽভিঘাতাদ্বা সন্ধানং তস্য মে শৃণু ||৯||
एवं विवर्धितः कर्णश्छिद्यते तु द्विधा नृणाम् | दोषतो वाऽभिघाताद्वा सन्धानं तस्य मे शृणु ||९||
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Adhikarana 9 (10) · Śloka 10
তত্র সমাসেন পঞ্চদশকর্ণবন্ধাকৃতযঃ | তদ্যথা- নেমিসন্ধানক উত্পলভেদ্যকো বল্লূরক আসঙ্গিমো গণ্ডকর্ণ আহার্যো নির্বেধিমো ব্যাযোজিমঃ কপাটসন্ধিকোঽর্ধকপাটসন্ধিকঃ সঙ্ক্ষিপ্তো হীনকর্ণো বল্লীকর্ণো যষ্টিকর্ণঃ কাকৌষ্ঠক ইতি | তেষু, পৃথুলাযতসমোভযপালির্নেমিসন্ধানকঃ, বৃত্তাযতসমোভযপালিরুত্পলভেদ্যকঃ; হ্রস্ববৃত্তসমোভযপালির্বল্লূরকঃ; অভ্যন্তরদীর্ঘৈকপালিরাসঙ্গিমঃ; বাহ্যদীর্ঘৈকপালির্গণ্ডকর্ণঃ; অপালিরুভযতোঽপ্যাহার্যঃ; পীঠোপমপালিরুভযতঃ ক্ষীণপুত্রিকাশ্রিতো নির্বেধিমঃ, স্থূলাণুসমবিষমপালির্ব্যাযোজিমঃ; অভ্যন্তরদীর্ঘৈকপালিরিতরাল্পপালিঃ কপাটসন্ধিকঃ; বাহ্যদীর্ঘৈকপালিরিতরাল্পপালিরর্ধকপাটসন্ধিকঃ | তত্র দশৈতে কর্ণবন্ধবিকল্পাঃ সাধ্যাঃ ; তেষাং স্বনামভিরেবাকৃতযঃ প্রাযেণ ব্যাখ্যাতাঃ সঙ্ক্ষিপ্তাদযঃ পঞ্চাসাধ্যাঃ | তত্র শুষ্কশষ্কুলিরুত্সন্নপালিরিতরাল্পপালিঃ সঙ্ক্ষিপ্তঃ ; অনধিষ্ঠানপালিঃ পর্যন্তযোঃ ক্ষীণমাংসো হীনকর্ণঃ; তনুবিষমাল্পপালির্বল্লীকর্ণঃ; গ্রথিতমাংসস্তব্ধসিরাততসূক্ষ্মপালির্যষ্টিকর্ণঃ; নির্মাংসসঙ্ক্ষিপ্তাগ্রাল্পশোণিতপালিঃ কাকৌষ্ঠক ইতি | বদ্ধেষ্বপি তু শোফদাহরাগপাকপিডকাস্রাবযুক্তা ন সিদ্ধিমুপযান্তি ||১০||
तत्र समासेन पञ्चदशकर्णबन्धाकृतयः | तद्यथा- नेमिसन्धानक उत्पलभेद्यको वल्लूरक आसङ्गिमो गण्डकर्ण आहार्यो निर्वेधिमो व्यायोजिमः कपाटसन्धिकोऽर्धकपाटसन्धिकः सङ्क्षिप्तो हीनकर्णो वल्लीकर्णो यष्टिकर्णः काकौष्ठक इति | तेषु, पृथुलायतसमोभयपालिर्नेमिसन्धानकः, वृत्तायतसमोभयपालिरुत्पलभेद्यकः; ह्रस्ववृत्तसमोभयपालिर्वल्लूरकः; अभ्यन्तरदीर्घैकपालिरासङ्गिमः; बाह्यदीर्घैकपालिर्गण्डकर्णः; अपालिरुभयतोऽप्याहार्यः; पीठोपमपालिरुभयतः क्षीणपुत्रिकाश्रितो निर्वेधिमः, स्थूलाणुसमविषमपालिर्व्यायोजिमः; अभ्यन्तरदीर्घैकपालिरितराल्पपालिः कपाटसन्धिकः; बाह्यदीर्घैकपालिरितराल्पपालिरर्धकपाटसन्धिकः | तत्र दशैते कर्णबन्धविकल्पाः साध्याः ; तेषां स्वनामभिरेवाकृतयः प्रायेण व्याख्याताः सङ्क्षिप्तादयः पञ्चासाध्याः | तत्र शुष्कशष्कुलिरुत्सन्नपालिरितराल्पपालिः सङ्क्षिप्तः ; अनधिष्ठानपालिः पर्यन्तयोः क्षीणमांसो हीनकर्णः; तनुविषमाल्पपालिर्वल्लीकर्णः; ग्रथितमांसस्तब्धसिराततसूक्ष्मपालिर्यष्टिकर्णः; निर्मांससङ्क्षिप्ताग्राल्पशोणितपालिः काकौष्ठक इति | बद्धेष्वपि तु शोफदाहरागपाकपिडकास्रावयुक्ता न सिद्धिमुपयान्ति ||१०||
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Adhikarana 10 (11) · Śloka 11
ভবন্তি চাত্র- যস্য পালিদ্বযমপি কর্ণস্য ন ভবেদিহ | কর্ণপীঠং সমে মধ্যে তস্য বিদ্ধ্বা বিবর্ধযেত্ ||১১||
भवन्ति चात्र- यस्य पालिद्वयमपि कर्णस्य न भवेदिह | कर्णपीठं समे मध्ये तस्य विद्ध्वा विवर्धयेत् ||११||
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Adhikarana 11 (12) · Śloka 12
বাহ্যাযামিহ দীর্ঘাযাং সন্ধিরাভ্যন্তরো ভবেত্ | আভ্যন্তরাযাং দীর্ঘাযাং বাহ্যসন্ঘিরুদাহৃতঃ ||১২||
बाह्यायामिह दीर्घायां सन्धिराभ्यन्तरो भवेत् | आभ्यन्तरायां दीर्घायां बाह्यसन्घिरुदाहृतः ||१२||
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Adhikarana 12 (13) · Śloka 13
একৈব তু ভবেত্ পালিঃ স্থূলা পৃথ্বী স্থিরা চ যা | তাং দ্বিধা পাটযিত্বা তু ছিত্ত্বা চোপরি সন্ধযেত্ ||১৩||
एकैव तु भवेत् पालिः स्थूला पृथ्वी स्थिरा च या | तां द्विधा पाटयित्वा तु छित्त्वा चोपरि सन्धयेत् ||१३||
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Adhikarana 13 (14) · Śloka 14
গণ্ডাদুত্পাট্য মাংসেন সানুবন্ধেন জীবতা | কর্ণপালীমপালেস্তু কুর্যান্নির্লিখ্য শাস্ত্রবিত্ ||১৪||
गण्डादुत्पाट्य मांसेन सानुबन्धेन जीवता | कर्णपालीमपालेस्तु कुर्यान्निर्लिख्य शास्त्रवित् ||१४||
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Adhikarana 14 (15) · Śloka 15
অতোঽন্যতমং বন্ধং চিকীর্ষুরগ্রোপহরণীযোক্তোপসম্ভৃতসম্ভারং বিশেষতশ্চাত্রোপহরেত্ সুরামণ্ডং ক্ষীরমুদকং ধান্যাম্লং কপালচূর্ণং চেতি | ততোঽঙ্গনাং পুরুষং বা গ্রথিতকেশান্তং লঘু ভুক্তবন্তমাপ্তৈঃ সুপরিগৃহীতং চ কৃত্বা, বন্ধমুপধার্য, ছেদ্যভেদ্যলেখ্যব্যধনৈরুপপন্নৈরুপপাদ্য, কর্ণশোণিতমবেক্ষ্য দুষ্টমদুষ্টং বেতি; তত্র বাতদুষ্টে ধান্যাম্লোষ্ণোদকাভ্যাং পিত্তদুষ্টে শীতোদকপযোভ্যাং শ্লেষ্মদুষ্টে সুরামণ্ডোষ্ণোদকাভ্যাং প্রক্ষাল্য কর্ণৌ, পুনরবলিখ্যানুন্নতমহীনমবিষমং চ কর্ণসন্ধিং সন্নিবেশ্য, স্থিতরক্তং সন্দধ্যাত্ | ততো মধুঘৃতেনাভ্যজ্য পিচুপ্রোতযোরন্যতরেণাবগুণ্ঠ্য সূত্রেণানবগাঢমনতিশিথিলং চ বদ্ধ্বা কপালচূর্ণেনাবকীর্যাচারিকমুপদিশেত্, দ্বিব্রণীযোক্তেন চ বিধানেনোপচরেত্ ||১৫||
अतोऽन्यतमं बन्धं चिकीर्षुरग्रोपहरणीयोक्तोपसम्भृतसम्भारं विशेषतश्चात्रोपहरेत् सुरामण्डं क्षीरमुदकं धान्याम्लं कपालचूर्णं चेति | ततोऽङ्गनां पुरुषं वा ग्रथितकेशान्तं लघु भुक्तवन्तमाप्तैः सुपरिगृहीतं च कृत्वा, बन्धमुपधार्य, छेद्यभेद्यलेख्यव्यधनैरुपपन्नैरुपपाद्य, कर्णशोणितमवेक्ष्य दुष्टमदुष्टं वेति; तत्र वातदुष्टे धान्याम्लोष्णोदकाभ्यां पित्तदुष्टे शीतोदकपयोभ्यां श्लेष्मदुष्टे सुरामण्डोष्णोदकाभ्यां प्रक्षाल्य कर्णौ, पुनरवलिख्यानुन्नतमहीनमविषमं च कर्णसन्धिं सन्निवेश्य, स्थितरक्तं सन्दध्यात् | ततो मधुघृतेनाभ्यज्य पिचुप्रोतयोरन्यतरेणावगुण्ठ्य सूत्रेणानवगाढमनतिशिथिलं च बद्ध्वा कपालचूर्णेनावकीर्याचारिकमुपदिशेत्, द्विव्रणीयोक्तेन च विधानेनोपचरेत् ||१५||
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Adhikarana 15 (16) · Śloka 16
ভবতি চাত্র- বিঘট্টনং দিবাস্বপ্নং ব্যাযামমতিভোজনম্ | ব্যবাযমগ্নিসন্তাপং বাক্শ্রমং চ বিবর্জযেত্ ||১৬||
भवति चात्र- विघट्टनं दिवास्वप्नं व्यायाममतिभोजनम् | व्यवायमग्निसन्तापं वाक्श्रमं च विवर्जयेत् ||१६||
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Adhikarana 16 (17) · Śloka 17
ন চাশুদ্ধরক্তমতিপ্রবৃত্তরক্তং ক্ষীণরক্তং বা সন্দধ্যাত্ | স হি বাতদুষ্টে রক্তে রূঢোঽপি পরিপুটনবান্, পিত্তদুষ্টে দাহপাকরাগবেদনাবান্, শ্লেষ্মদুষ্টে স্তব্ধঃ কণ্ডূমান্, অতিপ্রবৃত্তরক্তে শ্যাবশোফবান্, ক্ষীণোঽল্পমাংসো ন বৃদ্ধিমুপৈতি ||১৭||
न चाशुद्धरक्तमतिप्रवृत्तरक्तं क्षीणरक्तं वा सन्दध्यात् | स हि वातदुष्टे रक्ते रूढोऽपि परिपुटनवान्, पित्तदुष्टे दाहपाकरागवेदनावान्, श्लेष्मदुष्टे स्तब्धः कण्डूमान्, अतिप्रवृत्तरक्ते श्यावशोफवान्, क्षीणोऽल्पमांसो न वृद्धिमुपैति ||१७||
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Adhikarana 17 (18-19) · Śloka 19
(আমতৈলেন ত্রিরাত্রং পরিষেচযেত্, ত্রিরাত্রাচ্চ পিচুং পরিবর্তযেত্) | স যদা সুরূঢো নিরুপদ্রবঃ সবর্ণো ভবতি তদৈনং শনৈঃ শনৈরভিবর্ধযেত্ | অতোঽন্যথা সংরম্ভদাহপাকরাগবেদনাবান্, পুনশ্ছিদ্যতে বা ||১৮|| অথাস্যাপ্রদুষ্টস্যাভিবর্ধনার্থমভ্যঙ্গঃ | তদ্যথা- গোধাপ্রতুদবিষ্কিরানূপৌদকবসামজ্জানৌ পযঃ সর্পিস্তৈলং গৌরসর্ষপজং চ যথালাভং সম্ভৃত্যার্কালর্কবলাতিবলানন্তাপামার্গাশ্বগন্ধাবিদারিগন্ধাক্ষীরশুক্লাজলশূকমধুরবর্গপযস্যাপ্রতিবাপং তৈলং বা পাচযিত্বা স্বনুগুপ্তং নিদধ্যাত্ ||১৯||
(आमतैलेन त्रिरात्रं परिषेचयेत्, त्रिरात्राच्च पिचुं परिवर्तयेत्) | स यदा सुरूढो निरुपद्रवः सवर्णो भवति तदैनं शनैः शनैरभिवर्धयेत् | अतोऽन्यथा संरम्भदाहपाकरागवेदनावान्, पुनश्छिद्यते वा ||१८|| अथास्याप्रदुष्टस्याभिवर्धनार्थमभ्यङ्गः | तद्यथा- गोधाप्रतुदविष्किरानूपौदकवसामज्जानौ पयः सर्पिस्तैलं गौरसर्षपजं च यथालाभं सम्भृत्यार्कालर्कबलातिबलानन्तापामार्गाश्वगन्धाविदारिगन्धाक्षीरशुक्लाजलशूकमधुरवर्गपयस्याप्रतिवापं तैलं वा पाचयित्वा स्वनुगुप्तं निदध्यात् ||१९||
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Adhikarana 18 (20) · Śloka 20
স্বেদিতোন্মর্দিতং কর্ণং স্নেহেনৈতেন যোজযেত্ | অথানুপদ্রবঃ সম্যগ্বলবাংশ্চ বিবর্ধতে ||২০||
स्वेदितोन्मर्दितं कर्णं स्नेहेनैतेन योजयेत् | अथानुपद्रवः सम्यग्बलवांश्च विवर्धते ||२०||
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Adhikarana 19 (21) · Śloka 21
যবাশ্বগন্ধাযষ্ট্যাহ্বৈস্তিলৈশ্চোদ্বর্তনং হিতম্ |২১|
यवाश्वगन्धायष्ट्याह्वैस्तिलैश्चोद्वर्तनं हितम् |२१|
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Adhikarana 20 (21) · Śloka 22
শতাবর্যশ্বগন্ধাভ্যাং পযস্যৈরণ্ডজীবনৈঃ ||২১|| তৈলং বিপক্বং সক্ষীরমভ্যঙ্গাত্ পালিবর্ধনম্ |২২|
शतावर्यश्वगन्धाभ्यां पयस्यैरण्डजीवनैः ||२१|| तैलं विपक्वं सक्षीरमभ्यङ्गात् पालिवर्धनम् |२२|
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Adhikarana 21 (22-23) · Śloka 23
যে তু কর্ণা ন বর্ধন্তে স্বেদস্নেহোপপাদিতাঃ ||২২|| তেষামপাঙ্গদেশে তু কুর্যাত্ প্রচ্ছানমেব তু | বাহ্যচ্ছেদং ন কুর্বীত ব্যাপদঃ স্যুস্ততোধ্রুবাঃ ||২৩||
ये तु कर्णा न वर्धन्ते स्वेदस्नेहोपपादिताः ||२२|| तेषामपाङ्गदेशे तु कुर्यात् प्रच्छानमेव तु | बाह्यच्छेदं न कुर्वीत व्यापदः स्युस्ततोध्रुवाः ||२३||
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Adhikarana 22 (24) · Śloka 24
বদ্ধমাত্রং তু যঃ কর্ণং সহসৈবাভিবর্ধযেত্ | আমকোশী সমাধ্মাতঃ ক্ষিপ্রমেব বিমুচ্যতে ||২৪||
बद्धमात्रं तु यः कर्णं सहसैवाभिवर्धयेत् | आमकोशी समाध्मातः क्षिप्रमेव विमुच्यते ||२४||
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Adhikarana 23 (25) · Śloka 25
জাতরোমা সুবর্ত্মা চ শ্লিষ্টসন্ধিঃ সমঃ স্থিরঃ | সুরূঢোঽবেদনো যশ্চ তং কর্ণং বর্ধযেচ্ছনৈঃ ||২৫||
जातरोमा सुवर्त्मा च श्लिष्टसन्धिः समः स्थिरः | सुरूढोऽवेदनो यश्च तं कर्णं वर्धयेच्छनैः ||२५||
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Adhikarana 24 (26) · Śloka 26
অমিতাঃ কর্ণবন্ধাস্তু বিজ্ঞেযাঃ কুশলৈরিহ | যো যথা সুবিশিষ্টঃ স্যাত্তং তথা বিনিযোজযেত্ | (কর্ণপাল্যামযান্নৄণাং পুনর্বক্ষ্যামি সুশ্রুত! | কর্ণপাল্যাং প্রকুপিতা বাতপিত্তকফাস্ত্রযঃ(১) ||২৬|| দ্বিধা বাঽপ্যথ সংসৃষ্টাঃ কুর্বন্তি বিবিধা রুজঃ | বিস্ফোটঃ স্তব্ধতা শোফঃ পাল্যাং দোষে তু বাতিকে(২) ||২৬|| দাহবিস্ফোটজননং শোফঃ পাকশ্চ পৈত্তিকে | কণ্ডূঃ সশ্বযথুঃ স্তম্ভো গুরুত্বং চ কফাত্মকে(৩) ||২৬|| যথাদোষং চ সংশোধ্য কুর্যাত্তেষাং চিকিত্সিতম্ | স্বেদাভ্যঙ্গপরীষেকৈঃ প্রলেপাসৃগ্বিমোক্ষণৈঃ(৪) ||২৬|| মৃদ্বীং ক্রিযাং বৃংহণীযৈর্যথাস্বং ভোজনৈস্তথা | য এবং বেত্তি দোষাণাং চিকিত্সাং কর্তুমর্হতি(৫) ||২৬|| অত ঊর্ধ্বং নামলিঙ্গৈর্বক্ষ্যে পাল্যামুপদ্রবান্ | উত্পাটকশ্চোত্পুটকঃ শ্যাবঃ কণ্ডূযুতো ভৃশম্(৬) ||২৬|| অবমন্থঃ সকণ্ডূকো গ্রন্থিকো জম্বুলস্তথা | স্রাবী চ দাহবাংশ্চৈব শৃণ্বেষাং ক্রমশঃ ক্রিযাম্(৭) ||২৬|| অপামার্গঃ সর্জরসঃ পাটলালকুচত্বচৌ | উত্পাটকে প্রলেপঃ স্যাত্তৈলমেভিশ্চ পাচযেত্(৮) ||২৬|| শম্পাকশিগ্রুপূতীকান্ গোধামেদোঽথ তদ্বসাম্ | বারাহং গব্যমৈণেযং পিত্তং সর্পিশ্চ সংসৃজেত্(৯) ||২৬|| লেপমুত্পুটকে দদ্যাত্তৈলমেভিশ্চ সাধিতম্ | গৌরীং সুগন্ধাং সশ্যামামনন্তাং তণ্ডুলীযকম্(১০) ||২৬|| শ্যাবে প্রলেপনং দদ্যাত্তৈলমেভিশ্চ সাধিতম্ | পাঠাং রসাঞ্জনং ক্ষৌদ্রং তথা স্যাদুষ্ণকাঞ্জিকম্(১১) ||২৬|| দদ্যাল্লেপং সকণ্ডূকে তৈলমেভিশ্চ সাধিতম্ | ব্রণীভূতস্য দেযং স্যাদিদং তৈলং বিজানতা(১২) ||২৬|| মধুকক্ষীরকাকোলীজীবকাদ্যৈর্বিপাচিতম্ | গোধাবরাহসর্পাণাং বসাঃ স্যুঃ কৃতবৃংহণে(১৩) ||২৬|| প্রলেপনমিদং দদ্যাদবসিচ্যাবমন্থকে | প্রপৌণ্ডরীকং মধুকং সমঙ্গাং ধবমেব চ(১৪) ||২৬|| তৈলমেভিশ্চ সম্পক্বং শৃণু কণ্ডূমতঃ ক্রিযাম্ | সহদেবা বিশ্বদেবা অজাক্ষীরং সসৈন্ধবম্ | এতৈরালেপনং দদ্যাত্তৈলমেভিশ্চ সাধিতম্(১৫) ||২৬|| গ্রন্থিকে গুটিকাং পূর্বং স্রাবযেদবপাট্য তু | ততঃ সৈন্ধবচূর্ণং তু ঘৃষ্ট্বা লেপং প্রদাপযেত্(১৬) ||২৬|| লিখিত্বা তত্স্রুতং ঘৃষ্ট্বা চূর্ণৈর্লোধ্রস্য জম্বুলে | ক্ষীরেণ প্রতিসার্যৈনং শুদ্ধং সংরোপযেত্ততঃ(১৭) ||২৬|| মধুপর্ণী মধূকং চ মধুকং মধুনা সহ | লেপঃ স্রাবিণি দাতব্যস্তৈলমেভিশ্চ সাধিতম্(১৮) ||২৬|| পঞ্চবল্কৈঃ সমধুকৈঃ পিষ্টৈস্তৈশ্চ ঘৃতান্বিতৈঃ | জীবকাদ্যৈঃ সসর্পিষ্কৈর্দহ্যমানং প্রলেপযেত্)(১৯) ||২৬||
अमिताः कर्णबन्धास्तु विज्ञेयाः कुशलैरिह | यो यथा सुविशिष्टः स्यात्तं तथा विनियोजयेत् | (कर्णपाल्यामयान्नॄणां पुनर्वक्ष्यामि सुश्रुत! | कर्णपाल्यां प्रकुपिता वातपित्तकफास्त्रयः(१) ||२६|| द्विधा वाऽप्यथ संसृष्टाः कुर्वन्ति विविधा रुजः | विस्फोटः स्तब्धता शोफः पाल्यां दोषे तु वातिके(२) ||२६|| दाहविस्फोटजननं शोफः पाकश्च पैत्तिके | कण्डूः सश्वयथुः स्तम्भो गुरुत्वं च कफात्मके(३) ||२६|| यथादोषं च संशोध्य कुर्यात्तेषां चिकित्सितम् | स्वेदाभ्यङ्गपरीषेकैः प्रलेपासृग्विमोक्षणैः(४) ||२६|| मृद्वीं क्रियां बृंहणीयैर्यथास्वं भोजनैस्तथा | य एवं वेत्ति दोषाणां चिकित्सां कर्तुमर्हति(५) ||२६|| अत ऊर्ध्वं नामलिङ्गैर्वक्ष्ये पाल्यामुपद्रवान् | उत्पाटकश्चोत्पुटकः श्यावः कण्डूयुतो भृशम्(६) ||२६|| अवमन्थः सकण्डूको ग्रन्थिको जम्बुलस्तथा | स्रावी च दाहवांश्चैव शृण्वेषां क्रमशः क्रियाम्(७) ||२६|| अपामार्गः सर्जरसः पाटलालकुचत्वचौ | उत्पाटके प्रलेपः स्यात्तैलमेभिश्च पाचयेत्(८) ||२६|| शम्पाकशिग्रुपूतीकान् गोधामेदोऽथ तद्वसाम् | वाराहं गव्यमैणेयं पित्तं सर्पिश्च संसृजेत्(९) ||२६|| लेपमुत्पुटके दद्यात्तैलमेभिश्च साधितम् | गौरीं सुगन्धां सश्यामामनन्तां तण्डुलीयकम्(१०) ||२६|| श्यावे प्रलेपनं दद्यात्तैलमेभिश्च साधितम् | पाठां रसाञ्जनं क्षौद्रं तथा स्यादुष्णकाञ्जिकम्(११) ||२६|| दद्याल्लेपं सकण्डूके तैलमेभिश्च साधितम् | व्रणीभूतस्य देयं स्यादिदं तैलं विजानता(१२) ||२६|| मधुकक्षीरकाकोलीजीवकाद्यैर्विपाचितम् | गोधावराहसर्पाणां वसाः स्युः कृतबृंहणे(१३) ||२६|| प्रलेपनमिदं दद्यादवसिच्यावमन्थके | प्रपौण्डरीकं मधुकं समङ्गां धवमेव च(१४) ||२६|| तैलमेभिश्च सम्पक्वं शृणु कण्डूमतः क्रियाम् | सहदेवा विश्वदेवा अजाक्षीरं ससैन्धवम् | एतैरालेपनं दद्यात्तैलमेभिश्च साधितम्(१५) ||२६|| ग्रन्थिके गुटिकां पूर्वं स्रावयेदवपाट्य तु | ततः सैन्धवचूर्णं तु घृष्ट्वा लेपं प्रदापयेत्(१६) ||२६|| लिखित्वा तत्स्रुतं घृष्ट्वा चूर्णैर्लोध्रस्य जम्बुले | क्षीरेण प्रतिसार्यैनं शुद्धं संरोपयेत्ततः(१७) ||२६|| मधुपर्णी मधूकं च मधुकं मधुना सह | लेपः स्राविणि दातव्यस्तैलमेभिश्च साधितम्(१८) ||२६|| पञ्चवल्कैः समधुकैः पिष्टैस्तैश्च घृतान्वितैः | जीवकाद्यैः ससर्पिष्कैर्दह्यमानं प्रलेपयेत्)(१९) ||२६||
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Adhikarana 25 (27-31) · Śloka 31
বিশ্লেষিতাযাস্ত্বথ নাসিকাযা বক্ষ্যামি সন্ধানবিধিং যথাবত্ | নাসাপ্রমাণং পৃথিবীরুহাণাং পত্রং গৃহীত্বা ত্ববলম্বি তস্য ||২৭|| তেন প্রমাণেন হি গণ্ডপার্শ্বাদুত্কৃত্য বদ্ধং ত্বথ নাসিকাগ্রম্ | বিলিখ্য চাশু প্রতিসন্দধীত তত্ সাধুবন্ধৈর্ভিষগপ্রমত্তঃ ||২৮|| সুসংহিতং সম্যগতো যথাবন্নাডীদ্বযেনাভিসমীক্ষ্য বদ্ধ্বা | প্রোন্নম্য চৈনামবচূর্ণযেত্তু পতঙ্গযষ্টীমধুকাঞ্জনৈশ্চ ||২৯|| সঞ্ছাদ্য সম্যক্ পিচুনা সিতেন তৈলেন সিঞ্চেদসকৃত্তিলানাম্ | ঘৃতং চ পায্যঃ স নরঃ সুজীর্ণে স্নিগ্ধো বিরেচ্যঃ স যথোপদেশম্ ||৩০|| রূঢং চ সন্ধানমুপাগতং স্যাত্তদর্ধশেষং তু পুনর্নিকৃন্তেত্ | হীনাং পুনর্বর্ধযিতুং যতেত সমাং চ কুর্যাদতিবৃদ্ধমাংসাম্ ||৩১||
विश्लेषितायास्त्वथ नासिकाया वक्ष्यामि सन्धानविधिं यथावत् | नासाप्रमाणं पृथिवीरुहाणां पत्रं गृहीत्वा त्ववलम्बि तस्य ||२७|| तेन प्रमाणेन हि गण्डपार्श्वादुत्कृत्य बद्धं त्वथ नासिकाग्रम् | विलिख्य चाशु प्रतिसन्दधीत तत् साधुबन्धैर्भिषगप्रमत्तः ||२८|| सुसंहितं सम्यगतो यथावन्नाडीद्वयेनाभिसमीक्ष्य बद्ध्वा | प्रोन्नम्य चैनामवचूर्णयेत्तु पतङ्गयष्टीमधुकाञ्जनैश्च ||२९|| सञ्छाद्य सम्यक् पिचुना सितेन तैलेन सिञ्चेदसकृत्तिलानाम् | घृतं च पाय्यः स नरः सुजीर्णे स्निग्धो विरेच्यः स यथोपदेशम् ||३०|| रूढं च सन्धानमुपागतं स्यात्तदर्धशेषं तु पुनर्निकृन्तेत् | हीनां पुनर्वर्धयितुं यतेत समां च कुर्यादतिवृद्धमांसाम् ||३१||
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Adhikarana 26 (32) · Śloka 32
নাডীযোগং বিনৌষ্ঠস্য নাসাসন্ধানবদ্বিধিম্ | য এবমেব জানীযাত্ স রাজ্ঞঃ কর্তুমর্হতি ||৩২||
नाडीयोगं विनौष्ठस्य नासासन्धानवद्विधिम् | य एवमेव जानीयात् स राज्ञः कर्तुमर्हति ||३२||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 16
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং সূত্রস্থানে কর্ণব্যধবন্ধবিধির্নাম ষোডশোঽধ্যাযঃ ||১৬||
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने कर्णव्यधबन्धविधिर्नाम षोडशोऽध्यायः ||१६||
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