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AYANAAYURVEDAby Dr Vijaya Dwarampudi
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45. dravadravyavidhyadhyāyaḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতো দ্রবদ্রব্যবিধিমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातो द्रवद्रव्यविधिमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

পানীযমান্তরীক্ষমনির্দেশ্যরসমমৃতং জীবনং তর্পণং ধারণমাশ্বাসজননং শ্রমক্লমপিপাসামদমূর্চ্ছাতন্দ্রানিদ্রাদাহপ্রশমনমেকান্ততঃ পথ্যতমং চ ||৩||

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पानीयमान्तरीक्षमनिर्देश्यरसममृतं जीवनं तर्पणं धारणमाश्वासजननं श्रमक्लमपिपासामदमूर्च्छातन्द्रानिद्रादाहप्रशमनमेकान्ततः पथ्यतमं च ||३||

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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4

তদেবাবনিপতিতমন্যতমং রসমুপলভতে স্থানবিশেষান্নদীনদসরস্তডাগবাপীকূপচুণ্টীপ্রস্রবণোদ্ভিদবিকিরকেদারপল্বলাদি ষু স্থানেষ্ববস্থিতমিতি ||৪||

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तदेवावनिपतितमन्यतमं रसमुपलभते स्थानविशेषान्नदीनदसरस्तडागवापीकूपचुण्टीप्रस्रवणोद्भिदविकिरकेदारपल्वलादि षु स्थानेष्ववस्थितमिति ||४||

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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5

তত্র, ‘লোহিতকপিলপাণ্ডুনীলপীতশুক্লেষ্ববনিপ্রদেশেষু মধুরাম্ললবণকটুতিক্তকষাযাণি যথাসঙ্খ্যমুদকানি সম্ভবন্তি’ ইত্যেকে ভাষন্তে ||৫||

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तत्र, ‘लोहितकपिलपाण्डुनीलपीतशुक्लेष्ववनिप्रदेशेषु मधुराम्ललवणकटुतिक्तकषायाणि यथासङ्ख्यमुदकानि सम्भवन्ति’ इत्येके भाषन्ते ||५||

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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6

তত্তু ন সম্যক্; পৃথিব্যাদীনামন্যোন্যানুপ্রবেশকৃতঃ সলিলরসো ভবত্যুত্কর্ষাপকর্ষেণ | তত্র, স্বলক্ষণভূযিষ্ঠাযাং ভূমাবম্লং লবণং চ; অম্বুগুণভূযিষ্ঠাযাং মধুরং; তেজোগুণভূযিষ্ঠাযাং কটুকং তিক্তং চ; বাযুগুণভূযিষ্ঠাযাং কষাযম্; আকাশগুণভূযিষ্ঠাযামব্যক্তরসম্, অব্যক্তং হ্যাকাশমিত্যতঃ; তত্ প্রধানমব্যক্তরসত্বাত্, তত্পেযমান্তরীক্ষালাভে ||৬||

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तत्तु न सम्यक्; पृथिव्यादीनामन्योन्यानुप्रवेशकृतः सलिलरसो भवत्युत्कर्षापकर्षेण | तत्र, स्वलक्षणभूयिष्ठायां भूमावम्लं लवणं च; अम्बुगुणभूयिष्ठायां मधुरं; तेजोगुणभूयिष्ठायां कटुकं तिक्तं च; वायुगुणभूयिष्ठायां कषायम्; आकाशगुणभूयिष्ठायामव्यक्तरसम्, अव्यक्तं ह्याकाशमित्यतः; तत् प्रधानमव्यक्तरसत्वात्, तत्पेयमान्तरीक्षालाभे ||६||

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Adhikarana 6 (7) · Śloka 7

তত্রান্তরীক্ষং চতুর্বিধম্ | তদ্যথা- ধারং, কারং, তৌষারং, হৈমমিতি | তেষাং ধারং প্রধানং, লঘুত্বাত্; তত্ পুনর্দ্বিবিধং- গাঙ্গং, সামুদ্রং চেতি | তত্র গাঙ্গমাশ্বযুজে মাসি প্রাযশো বর্ষতি | তযোর্দ্বযোরপি পরীক্ষণং কুর্বীত- শাল্যোদনপিণ্ডমকুথিতমবিদগ্ধং রজতভাজনোপহিতং বর্ষতি দেবে বহিষ্কুর্বীত, স যদি মুহূর্তং স্থিতস্তাদৃশ এব ভবতি তদা গাঙ্গং পততীত্যবগন্তব্যং; বর্ণান্যত্বে সিক্থপ্রক্লেদে চ সামুদ্রমিতি বিদ্যাত্, তন্নোপাদেযম্ | সামুদ্রমপ্যাশ্বযুজে মাসি গৃহীতং গাঙ্গবদ্ভবতি | গাঙ্গং পুনঃ প্রধানং, তদুপাদদীতাশ্বযুজে মাসি | শুচিশুক্লবিততপটৈকদেশচ্যুতমথবা হর্ম্যতলপরিভ্রষ্টমন্যৈর্বা শুচিভির্ভাজনৈর্গৃহীতং সৌবর্ণে রাজতে মৃন্মযে বা পাত্রে নিদধ্যাত্ | তত্ সর্বকালমুপযুঞ্জীত, তস্যালাভে ভৌমম্ | তচ্চাকাশগুণবহুলম্ | তত্ পুনঃ সপ্তবিধম্ | তদ্যথা- কৌপং, নাদেযং, সারসং, তাডাগং, প্রাস্রবণম্, ঔদ্ভিদং, চৌণ্ট্যমিতি ||৭||

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तत्रान्तरीक्षं चतुर्विधम् | तद्यथा- धारं, कारं, तौषारं, हैममिति | तेषां धारं प्रधानं, लघुत्वात्; तत् पुनर्द्विविधं- गाङ्गं, सामुद्रं चेति | तत्र गाङ्गमाश्वयुजे मासि प्रायशो वर्षति | तयोर्द्वयोरपि परीक्षणं कुर्वीत- शाल्योदनपिण्डमकुथितमविदग्धं रजतभाजनोपहितं वर्षति देवे बहिष्कुर्वीत, स यदि मुहूर्तं स्थितस्तादृश एव भवति तदा गाङ्गं पततीत्यवगन्तव्यं; वर्णान्यत्वे सिक्थप्रक्लेदे च सामुद्रमिति विद्यात्, तन्नोपादेयम् | सामुद्रमप्याश्वयुजे मासि गृहीतं गाङ्गवद्भवति | गाङ्गं पुनः प्रधानं, तदुपाददीताश्वयुजे मासि | शुचिशुक्लविततपटैकदेशच्युतमथवा हर्म्यतलपरिभ्रष्टमन्यैर्वा शुचिभिर्भाजनैर्गृहीतं सौवर्णे राजते मृन्मये वा पात्रे निदध्यात् | तत् सर्वकालमुपयुञ्जीत, तस्यालाभे भौमम् | तच्चाकाशगुणबहुलम् | तत् पुनः सप्तविधम् | तद्यथा- कौपं, नादेयं, सारसं, ताडागं, प्रास्रवणम्, औद्भिदं, चौण्ट्यमिति ||७||

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Adhikarana 7 (8) · Śloka 8

তত্র বর্ষাস্বান্তরিক্ষমৌদ্ভিদং বা সেবেত, মহাগুণত্বাত্; শরদি সর্বং, প্রসন্নত্বাত্; হেমন্তে সারসং তাডাগং বা; বসন্তে কৌপং প্রাস্রবণং বা; গ্রীষ্মেঽপ্যেবং; প্রাবৃষি চৌণ্ট্যমনভিবৃষ্টং সর্বং চেতি ||৮||

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तत्र वर्षास्वान्तरिक्षमौद्भिदं वा सेवेत, महागुणत्वात्; शरदि सर्वं, प्रसन्नत्वात्; हेमन्ते सारसं ताडागं वा; वसन्ते कौपं प्रास्रवणं वा; ग्रीष्मेऽप्येवं; प्रावृषि चौण्ट्यमनभिवृष्टं सर्वं चेति ||८||

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Adhikarana 8 (9-10) · Śloka 10

কীটমূত্রপুরীষাণ্ডশবকোথপ্রদূষিতম্ | তৃণপর্ণোত্করযুতং কলুষং বিষসংযুতম্ ||৯|| যোঽবগাহেত বর্ষাসু পিবেদ্বাঽপি নবং জলম্ | স বাহ্যাভ্যন্তরান্ রোগান্ প্রাপ্নুযাত্ ক্ষিপ্রমেব তু ||১০||

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कीटमूत्रपुरीषाण्डशवकोथप्रदूषितम् | तृणपर्णोत्करयुतं कलुषं विषसंयुतम् ||९|| योऽवगाहेत वर्षासु पिबेद्वाऽपि नवं जलम् | स बाह्याभ्यन्तरान् रोगान् प्राप्नुयात् क्षिप्रमेव तु ||१०||

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Adhikarana 9 (11) · Śloka 11

তত্র যত্ পঙ্কশৈবলহঠতৃণপদ্মপত্রপ্রভৃতিভিরবচ্ছন্নং রবিশশিকিরণানিলৈর্নাভিজুষ্টং গন্ধবর্ণরসোপসৃষ্টং তদ্ব্যাপন্নমিতি বিদ্যাত্ | তস্য স্পর্শরূপরসগন্ধবীর্যবিপাকদোষাঃ ষট্ সম্ভবন্তি | তত্র, খরতা পৈচ্ছিল্যমৌষ্ণ্যং দন্তগ্রাহিতা চ স্পর্শদোষঃ, পঙ্কসিকতাশৈবালবহুবর্ণতা রূপদোষঃ; ব্যক্তরসতা রসদোষঃ; অনিষ্টগন্ধতা গন্ধদোষঃ; যদুপযুক্তং তৃষ্ণাগৌরবশূলকফপ্রসেকানাপাদযতি স বির্যদোষঃ; যদুপযুক্তং চিরাদ্বিপচ্যতে বিষ্টম্ভযতি বা স বিপাকদোষ ইতি | ত এতে আন্তরিক্ষে ন সন্তি ||১১||

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तत्र यत् पङ्कशैवलहठतृणपद्मपत्रप्रभृतिभिरवच्छन्नं रविशशिकिरणानिलैर्नाभिजुष्टं गन्धवर्णरसोपसृष्टं तद्व्यापन्नमिति विद्यात् | तस्य स्पर्शरूपरसगन्धवीर्यविपाकदोषाः षट् सम्भवन्ति | तत्र, खरता पैच्छिल्यमौष्ण्यं दन्तग्राहिता च स्पर्शदोषः, पङ्कसिकताशैवालबहुवर्णता रूपदोषः; व्यक्तरसता रसदोषः; अनिष्टगन्धता गन्धदोषः; यदुपयुक्तं तृष्णागौरवशूलकफप्रसेकानापादयति स विर्यदोषः; यदुपयुक्तं चिराद्विपच्यते विष्टम्भयति वा स विपाकदोष इति | त एते आन्तरिक्षे न सन्ति ||११||

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Adhikarana 10 (12) · Śloka 12

ব্যাপন্নস্য চাগ্নিক্বথনং সূর্যাতপপ্রতাপনং তপ্তাযঃপিণ্ডসিকতালোষ্ট্রাণাং বা নির্বাপণং প্রসাদনং চ কর্তব্যং, নাগচম্পকোত্পলপাটলাপুষ্পপ্রভৃতিভিশ্চাধিবাসনমিতি ||১২||

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व्यापन्नस्य चाग्निक्वथनं सूर्यातपप्रतापनं तप्तायःपिण्डसिकतालोष्ट्राणां वा निर्वापणं प्रसादनं च कर्तव्यं, नागचम्पकोत्पलपाटलापुष्पप्रभृतिभिश्चाधिवासनमिति ||१२||

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Adhikarana 11 (13) · Śloka 13

সৌবর্ণে রাজতে তাম্রে কাংস্যে মণিমযেঽপি বা | পুষ্পাবতংসং ভৌমে বা সুগন্ধি সলিলং পিবেত্ ||১৩||

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सौवर्णे राजते ताम्रे कांस्ये मणिमयेऽपि वा | पुष्पावतंसं भौमे वा सुगन्धि सलिलं पिबेत् ||१३||

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Adhikarana 12 (14-16) · Śloka 16

ব্যাপন্নং বর্জযেন্নিত্যং তোযং যচ্চাপ্যনার্তবম্ | দোষসঞ্জননং হ্যেতন্নাদদীতাহিতং তু তত্ ||১৪|| ব্যাপন্নমুদকং যস্তু পিবতীহাপ্রসাদিতম্ | শ্বযথুং পাণ্ডুরোগং চ ত্বগ্দোষমবিপাকতাম্ ||১৫|| শ্বাসকাসপ্রতিশ্যাযশূলগুল্মোদরাণি চ | অন্যান্বা বিষমান্রোগান্প্রাপ্নুযাদচিরেণ সঃ ||১৬||

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व्यापन्नं वर्जयेन्नित्यं तोयं यच्चाप्यनार्तवम् | दोषसञ्जननं ह्येतन्नाददीताहितं तु तत् ||१४|| व्यापन्नमुदकं यस्तु पिबतीहाप्रसादितम् | श्वयथुं पाण्डुरोगं च त्वग्दोषमविपाकताम् ||१५|| श्वासकासप्रतिश्यायशूलगुल्मोदराणि च | अन्यान्वा विषमान्रोगान्प्राप्नुयादचिरेण सः ||१६||

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Adhikarana 13 (17) · Śloka 17

তত্র সপ্ত কলুষস্য প্রসাদনানি ভবন্তি | তদ্যথা- কতকগোমেদকবিসগ্রন্থিশৈবালমূলবস্ত্রাণি মুক্তামণিশ্চেতি ||১৭||

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तत्र सप्त कलुषस्य प्रसादनानि भवन्ति | तद्यथा- कतकगोमेदकबिसग्रन्थिशैवालमूलवस्त्राणि मुक्तामणिश्चेति ||१७||

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Adhikarana 14 (18) · Śloka 18

পঞ্চ নিক্ষেপণানি ভবন্তি | তদ্যথা- ফলকং, ত্র্যষ্টকং, মুঞ্জবলয, উদকমঞ্চিকা, শিক্যং চেতি ||১৮||

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पञ्च निक्षेपणानि भवन्ति | तद्यथा- फलकं, त्र्यष्टकं, मुञ्जवलय, उदकमञ्चिका, शिक्यं चेति ||१८||

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Adhikarana 15 (19) · Śloka 19

সপ্ত শীতীকরণানি ভবন্তি; তদ্যথা- প্রবাতস্থাপনম্, উদকপ্রক্ষেপণং, যষ্টিকাভ্রামণং, ব্যজনং, বস্ত্রোদ্ধরণং, বালুকাপ্রক্ষেপণং, শিক্যাবলম্বনং চেতি ||১৯||

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सप्त शीतीकरणानि भवन्ति; तद्यथा- प्रवातस्थापनम्, उदकप्रक्षेपणं, यष्टिकाभ्रामणं, व्यजनं, वस्त्रोद्धरणं, वालुकाप्रक्षेपणं, शिक्यावलम्बनं चेति ||१९||

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Adhikarana 16 (20) · Śloka 20

নির্গন্ধমব্যক্তরসং তৃষ্ণাঘ্নং শুচি শীতলম্ | অচ্ছং লঘু চ হৃদ্যং চ তোযং গুণবদুচ্যতে ||২০||

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निर्गन्धमव्यक्तरसं तृष्णाघ्नं शुचि शीतलम् | अच्छं लघु च हृद्यं च तोयं गुणवदुच्यते ||२०||

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Adhikarana 17 (21) · Śloka 21

তত্র নদ্যঃ পশ্চিমাভিমুখাঃ পথ্যাঃ, লঘূদকত্বাত্; পূর্বাভিমুখাস্তু ন প্রশস্যন্তে, গুরূদকত্বাত্; দক্ষিণাভিমুখা নাতিদোষলাঃ, সাধারণত্বাত্ | তত্র সহ্যপ্রভবাঃকুষ্ঠং জনযন্তি, বিন্ধ্যপ্রভবাঃ কুষ্ঠং পাণ্ডুরোগং চ, মলযপ্রভবাঃ কৃমীন্, মহেন্দ্রপ্রভবাঃ শ্লীপদোদরাণি, হিমবত্প্রভবা হৃদ্রোগশ্বযথুশিরোরোগশ্লীপদগলগণ্ডান্, প্রাচ্যাবন্ত্যা অপরাবন্ত্যাশ্চার্শাংস্যুপজনযন্তি, পারিযাত্রপ্রভবাঃ পথ্যা বলারোগ্যকর্য ইতি ||২১||

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तत्र नद्यः पश्चिमाभिमुखाः पथ्याः, लघूदकत्वात्; पूर्वाभिमुखास्तु न प्रशस्यन्ते, गुरूदकत्वात्; दक्षिणाभिमुखा नातिदोषलाः, साधारणत्वात् | तत्र सह्यप्रभवाःकुष्ठं जनयन्ति, विन्ध्यप्रभवाः कुष्ठं पाण्डुरोगं च, मलयप्रभवाः कृमीन्, महेन्द्रप्रभवाः श्लीपदोदराणि, हिमवत्प्रभवा हृद्रोगश्वयथुशिरोरोगश्लीपदगलगण्डान्, प्राच्यावन्त्या अपरावन्त्याश्चार्शांस्युपजनयन्ति, पारियात्रप्रभवाः पथ्या बलारोग्यकर्य इति ||२१||

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Adhikarana 18 (22) · Śloka 22

নদ্যঃ শীঘ্রবহা লঘ্ব্যঃ প্রোক্তা যাশ্চামলোদকাঃ | গুর্ব্যঃ শৈবালসঞ্ছন্নাঃ কলুষা মন্দগাশ্চ যাঃ ||২২||

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नद्यः शीघ्रवहा लघ्व्यः प्रोक्ता याश्चामलोदकाः | गुर्व्यः शैवालसञ्छन्नाः कलुषा मन्दगाश्च याः ||२२||

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Adhikarana 19 (23) · Śloka 23

প্রাযেণ নদ্যো মরুষু সতিক্তা লবণান্বিতাঃ | লঘ্ব্যঃ সমধুরাশ্চৈব পৌরুষেযা বলে হিতাঃ ||২৩||

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प्रायेण नद्यो मरुषु सतिक्ता लवणान्विताः | लघ्व्यः समधुराश्चैव पौरुषेया बले हिताः ||२३||

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Adhikarana 20 (24) · Śloka 24

তত্র সর্বেষামেব ভৌমানাং গ্রহণং প্রত্যূষসি, তত্র হ্যমলত্বং শৈত্যং চাধিকং ভবতি, স এব চাপাং পরো গুণ ইতি ||২৪||

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तत्र सर्वेषामेव भौमानां ग्रहणं प्रत्यूषसि, तत्र ह्यमलत्वं शैत्यं चाधिकं भवति, स एव चापां परो गुण इति ||२४||

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Adhikarana 21 (25) · Śloka 25

দিবার্ককিরণৈর্জুষ্টং নিশাযামিন্দুরশ্মিভিঃ | অরূক্ষমনভিষ্যন্দি তত্তুল্যং গগনাম্বুনা ||২৫||

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दिवार्ककिरणैर्जुष्टं निशायामिन्दुरश्मिभिः | अरूक्षमनभिष्यन्दि तत्तुल्यं गगनाम्बुना ||२५||

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Adhikarana 22 (26) · Śloka 26

গগনাম্বু ত্রিদোষঘ্নং গৃহীতং যত্ সুভাজনে | বল্যং রসাযনং মেধ্যং পাত্রাপেক্ষি ততঃ পরম্ ||২৬||

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गगनाम्बु त्रिदोषघ्नं गृहीतं यत् सुभाजने | बल्यं रसायनं मेध्यं पात्रापेक्षि ततः परम् ||२६||

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Adhikarana 23 (27) · Śloka 27

রক্ষোঘ্নং শীতলং হ্লাদি জ্বরদাহবিষাপহম্ | চন্দ্রকান্তোদ্ভবং বারি পিত্তঘ্নং বিমলং স্মৃতম্ ||২৭||

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रक्षोघ्नं शीतलं ह्लादि ज्वरदाहविषापहम् | चन्द्रकान्तोद्भवं वारि पित्तघ्नं विमलं स्मृतम् ||२७||

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Adhikarana 24 (28) · Śloka 29

মূর্চ্ছাপিত্তোষ্ণদাহেষু বিষে রক্তে মদাত্যযে | ভ্রমক্লমপরীতেষু তমকে বমথৌ তথা ||২৮|| ঊর্ধ্বগে রক্তপিত্তে চ শীতমম্ভঃ প্রশস্যতে |২৯|

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मूर्च्छापित्तोष्णदाहेषु विषे रक्ते मदात्यये | भ्रमक्लमपरीतेषु तमके वमथौ तथा ||२८|| ऊर्ध्वगे रक्तपित्ते च शीतमम्भः प्रशस्यते |२९|

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Adhikarana 25 (29-30) · Śloka 30

পার্শ্বশূলে প্রতিশ্যাযে বাতরোগে গলগ্রহে ||২৯|| আধ্মানে স্তিমিতে কোষ্ঠে সদ্যঃশুদ্ধে নবজ্বরে | হিক্কাযাং স্নেহপীতে চ শীতাম্বু পরিবর্জযেত্ ||৩০||

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पार्श्वशूले प्रतिश्याये वातरोगे गलग्रहे ||२९|| आध्माने स्तिमिते कोष्ठे सद्यःशुद्धे नवज्वरे | हिक्कायां स्नेहपीते च शीताम्बु परिवर्जयेत् ||३०||

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Adhikarana 26 (31-36) · Śloka 37

নাদেযং বাতলং রূক্ষং দীপনং লঘু লেখনম্ | তদভিষ্যন্দি মধুরং সান্দ্রং গুরু কফাবহম্ ||৩১|| তৃষ্ণাঘ্নং সারসং বল্যং কষাযং মধুরং লঘু | তাডাগং বাতলং স্বাদু কষাযং কটুপাকি চ ||৩২|| বাতশ্লেষ্মহরং বাপ্যং সক্ষারং কটু পিত্তলম্ | সক্ষারং পিত্তলং কৌপং শ্লেষ্মঘ্নং দীপনং লঘু ||৩৩|| চৌণ্ট্যমগ্নিকরং রূক্ষং মধুরং কফকৃন্ন চ | কফঘ্নং দীপনং হৃদ্যং লঘু প্রস্রবণোদ্ভবম্ ||৩৪|| মধুরং পিত্তশমনমবিদাহ্যৌদ্ভিদং স্মৃতম্ | বৈকিরং কটু সক্ষারং শ্লেষ্মঘ্নং লঘু দীপনম্ ||৩৫|| কৈদারং মধুরং প্রোক্তং বিপাকে গুরু দোষলম্ | তদ্বত্পাল্বলমুদ্দিষ্টং বিশেষাদ্দোষলং তু তত্ ||৩৬|| সামুদ্রমুদকং বিস্রং লবণং সর্বদোষকৃত্ |৩৭|

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नादेयं वातलं रूक्षं दीपनं लघु लेखनम् | तदभिष्यन्दि मधुरं सान्द्रं गुरु कफावहम् ||३१|| तृष्णाघ्नं सारसं बल्यं कषायं मधुरं लघु | ताडागं वातलं स्वादु कषायं कटुपाकि च ||३२|| वातश्लेष्महरं वाप्यं सक्षारं कटु पित्तलम् | सक्षारं पित्तलं कौपं श्लेष्मघ्नं दीपनं लघु ||३३|| चौण्ट्यमग्निकरं रूक्षं मधुरं कफकृन्न च | कफघ्नं दीपनं हृद्यं लघु प्रस्रवणोद्भवम् ||३४|| मधुरं पित्तशमनमविदाह्यौद्भिदं स्मृतम् | वैकिरं कटु सक्षारं श्लेष्मघ्नं लघु दीपनम् ||३५|| कैदारं मधुरं प्रोक्तं विपाके गुरु दोषलम् | तद्वत्पाल्वलमुद्दिष्टं विशेषाद्दोषलं तु तत् ||३६|| सामुद्रमुदकं विस्रं लवणं सर्वदोषकृत् |३७|

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Adhikarana 27 (37-38) · Śloka 39

অনেকদোষমানূপং বার্যভিষ্যন্দি গর্হিতম্ ||৩৭|| এভির্দোষৈরসংযুক্তং নিরবদ্যং তু জাঙ্গলম্ | পাকেঽবিদাহি তৃষ্ণাঘ্নং প্রশস্তং প্রীতিবর্ধনম্ ||৩৮|| দীপনং স্বাদু শীতং চ তোযং সাধারণং লঘু |৩৯|

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अनेकदोषमानूपं वार्यभिष्यन्दि गर्हितम् ||३७|| एभिर्दोषैरसंयुक्तं निरवद्यं तु जाङ्गलम् | पाकेऽविदाहि तृष्णाघ्नं प्रशस्तं प्रीतिवर्धनम् ||३८|| दीपनं स्वादु शीतं च तोयं साधारणं लघु |३९|

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Adhikarana 28 (39) · Śloka 40

কফমেদোঽনিলামঘ্নং দীপনং বস্তিশোধনম্ ||৩৯|| শ্বাসকাসজ্বরহরং পথ্যমুষ্ণোদকং সদা |৪০|

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कफमेदोऽनिलामघ्नं दीपनं बस्तिशोधनम् ||३९|| श्वासकासज्वरहरं पथ्यमुष्णोदकं सदा |४०|

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Adhikarana 29 (40) · Śloka 41

যত্ ক্বাথ্যমানং নির্বেগং নিষ্ফেনং নির্মলং লঘু ||৪০|| চতুর্ভাগাবশেষং তু তত্তোযং গুণবত্ স্মৃতম্ |৪১|

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यत् क्वाथ्यमानं निर्वेगं निष्फेनं निर्मलं लघु ||४०|| चतुर्भागावशेषं तु तत्तोयं गुणवत् स्मृतम् |४१|

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Adhikarana 30 (41) · Śloka 42

ন চ পর্যুষিতং দেযং কদাচিদ্বারি জানতা ||৪১|| অম্লীভূতং কফোত্ক্লেদি ন হিতং তত্ পিপাসবে |৪২|

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न च पर्युषितं देयं कदाचिद्वारि जानता ||४१|| अम्लीभूतं कफोत्क्लेदि न हितं तत् पिपासवे |४२|

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Adhikarana 31 (42) · Śloka 43

মদ্যপানাত্সমুদ্ভূতে রোগে পিত্তোত্থিতে তথা ||৪২|| সন্নিপাতসমুত্থে চ শৃতশীতং প্রশস্যতে |৪৩|

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मद्यपानात्समुद्भूते रोगे पित्तोत्थिते तथा ||४२|| सन्निपातसमुत्थे च शृतशीतं प्रशस्यते |४३|

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Adhikarana 32 (43) · Śloka 44

স্নিগ্ধং স্বাদু হিমং হৃদ্যং দীপনং বস্তিশোধনম্ ||৪৩|| বৃষ্যং পিত্তপিপাসাঘ্নং নালিকেরোদকং গুরু |৪৪|

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स्निग्धं स्वादु हिमं हृद्यं दीपनं बस्तिशोधनम् ||४३|| वृष्यं पित्तपिपासाघ्नं नालिकेरोदकं गुरु |४४|

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Adhikarana 33 (44) · Śloka 45

দাহাতীসারপিত্তাসৃঙ্মূর্চ্ছামদ্যবিষার্তিষু ||৪৪|| শৃতশীতং জলং শস্তং তৃষ্ণাচ্ছর্দিভ্রমেষু চ |৪৫|

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दाहातीसारपित्तासृङ्मूर्च्छामद्यविषार्तिषु ||४४|| शृतशीतं जलं शस्तं तृष्णाच्छर्दिभ्रमेषु च |४५|

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Adhikarana 34 (45-46) · Śloka 46

অরোচকে প্রতিশ্যাযে প্রসেকে শ্বযথৌ ক্ষযে ||৪৫|| মন্দেঽগ্নাবুদরে কুষ্ঠে জ্বরে নেত্রামযে তথা | ব্রণে চ মধুমেহে চ পানীযং মন্দমাচরেত্ ||৪৬|| ইতি জলবর্গঃ |

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अरोचके प्रतिश्याये प्रसेके श्वयथौ क्षये ||४५|| मन्देऽग्नावुदरे कुष्ठे ज्वरे नेत्रामये तथा | व्रणे च मधुमेहे च पानीयं मन्दमाचरेत् ||४६|| इति जलवर्गः |

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Adhikarana 35 (47) · Śloka 47

অথ ক্ষীরবর্গঃ | গব্যমাজং তথা চৌষ্ট্রমাবিকং মাহিষং চ যত্ | অশ্বাযাশ্চৈব নার্যাশ্চ করেণূনাং চ যত্পযঃ ||৪৭||

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अथ क्षीरवर्गः | गव्यमाजं तथा चौष्ट्रमाविकं माहिषं च यत् | अश्वायाश्चैव नार्याश्च करेणूनां च यत्पयः ||४७||

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Adhikarana 36 (48) · Śloka 48

তত্ত্বনেকৌষধিরসপ্রসাদং প্রাণদং গুরু | মধুরং পিচ্ছিলং শীতং স্নিগ্ধং শ্লক্ষ্ণং সরং মৃদু | সর্বপ্রাণভৃতাং তস্মাত্ সাত্ম্যং ক্ষীরমিহোচ্যতে ||৪৮||

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तत्त्वनेकौषधिरसप्रसादं प्राणदं गुरु | मधुरं पिच्छिलं शीतं स्निग्धं श्लक्ष्णं सरं मृदु | सर्वप्राणभृतां तस्मात् सात्म्यं क्षीरमिहोच्यते ||४८||

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Adhikarana 37 (49) · Śloka 49

তত্র সর্বমেব ক্ষীরং প্রাণিনামপ্রতিষিদ্ধং জাতিসাত্ম্যাত্, বাতপিত্তশোণিতমানসেষ্বপি বিকারেষ্ববিরুদ্ধং, জীর্ণজ্বরকাসশ্বাসশোষক্ষযগুল্মোন্মাদোদরমূর্চ্ছাভ্রমমদদাহপিপাসাহৃদ্বস্তিদোষ- পাণ্ডুরোগগ্রহণীদোষার্শঃশূলোদাবর্তাতিসারপ্রবাহিকাযোনিরোগগর্ভাস্রাবরক্তপিত্তশ্রমক্লমহরং, পাপ্মাপহং বল্যং বৃষ্যং বাজীকরণং রসাযনং মেধ্যং বযঃস্থাপনমাযুষ্যং জীবনং বৃংহণং সন্ধানং বমনবিরেচনাস্থাপনং তুল্যগুণত্বাচ্চৌজসো বর্ধনং বালবৃদ্ধক্ষতক্ষীণানাং ক্ষুদ্ব্যবাযব্যাযামকর্শিতানাং চ পথ্যতমম্ ||৪৯||

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तत्र सर्वमेव क्षीरं प्राणिनामप्रतिषिद्धं जातिसात्म्यात्, वातपित्तशोणितमानसेष्वपि विकारेष्वविरुद्धं, जीर्णज्वरकासश्वासशोषक्षयगुल्मोन्मादोदरमूर्च्छाभ्रममददाहपिपासाहृद्बस्तिदोष- पाण्डुरोगग्रहणीदोषार्शःशूलोदावर्तातिसारप्रवाहिकायोनिरोगगर्भास्रावरक्तपित्तश्रमक्लमहरं, पाप्मापहं बल्यं वृष्यं वाजीकरणं रसायनं मेध्यं वयःस्थापनमायुष्यं जीवनं बृंहणं सन्धानं वमनविरेचनास्थापनं तुल्यगुणत्वाच्चौजसो वर्धनं बालवृद्धक्षतक्षीणानां क्षुद्व्यवायव्यायामकर्शितानां च पथ्यतमम् ||४९||

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Adhikarana 38 (50) · Śloka 51

অল্পাভিষ্যন্দি গোক্ষীরং স্নিগ্ধং গুরু রসাযনম্ | রক্তপিত্তহরং শীতং মধুরং রসপাকযোঃ ||৫০|| জীবনীযং তথা বাতপিত্তঘ্নং পরমং স্মৃতম্ |৫১|

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अल्पाभिष्यन्दि गोक्षीरं स्निग्धं गुरु रसायनम् | रक्तपित्तहरं शीतं मधुरं रसपाकयोः ||५०|| जीवनीयं तथा वातपित्तघ्नं परमं स्मृतम् |५१|

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Adhikarana 39 (51-52) · Śloka 53

গব্যতুল্যগুণং ত্বাজং বিশেষাচ্ছোষিণাং হিতম্ ||৫১|| দীপনং লঘু সঙ্গ্রাহি শ্বাসকাসাস্রপিত্তনুত্ | অজানামল্পকাযত্বাত্ কটুতিক্তনিষেবণাত্ ||৫২|| নাত্যম্বুপানাদ্ব্যাযামাত্ সর্বব্যাধিহরং পযঃ |৫৩|

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गव्यतुल्यगुणं त्वाजं विशेषाच्छोषिणां हितम् ||५१|| दीपनं लघु सङ्ग्राहि श्वासकासास्रपित्तनुत् | अजानामल्पकायत्वात् कटुतिक्तनिषेवणात् ||५२|| नात्यम्बुपानाद्व्यायामात् सर्वव्याधिहरं पयः |५३|

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Adhikarana 40 (53) · Śloka 54

রূক্ষোষ্ণং লবণং কিঞ্চিদৌষ্ট্রং স্বাদুরসং লঘু ||৫৩|| শোফগুল্মোদরার্শোঘ্নং কৃমিকুষ্ঠবিষাপহম্ |৫৪|

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रूक्षोष्णं लवणं किञ्चिदौष्ट्रं स्वादुरसं लघु ||५३|| शोफगुल्मोदरार्शोघ्नं कृमिकुष्ठविषापहम् |५४|

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Adhikarana 41 (54) · Śloka 55

আবিকং মধুরং স্নিগ্ধং গুরু পিত্তকফাবহম্ ||৫৪|| পথ্যং কেবলবাতেষু কাসে চানিলসম্ভবে |৫৫|

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आविकं मधुरं स्निग्धं गुरु पित्तकफावहम् ||५४|| पथ्यं केवलवातेषु कासे चानिलसम्भवे |५५|

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Adhikarana 42 (55) · Śloka 56

মহাভিষ্যন্দি মধুরং মাহিষং বহ্নিনাশনম্ ||৫৫|| নিদ্রাকরং শীততরং গব্যাত্ স্নিগ্ধতরং গুরু |৫৬|

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महाभिष्यन्दि मधुरं माहिषं वह्निनाशनम् ||५५|| निद्राकरं शीततरं गव्यात् स्निग्धतरं गुरु |५६|

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Adhikarana 43 (56) · Śloka 57

উষ্ণমৈকশফং বল্যং শাখাবাতহরং পযঃ ||৫৬|| মধুরাম্লরসং রূক্ষং লবণানুরসং লঘু |৫৭|

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उष्णमैकशफं बल्यं शाखावातहरं पयः ||५६|| मधुराम्लरसं रूक्षं लवणानुरसं लघु |५७|

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Adhikarana 44 (57) · Śloka 58

নার্যাস্তু মধুরং স্তন্যং কষাযানুরসং হিমম্ ||৫৭|| নস্যাশ্চ্যোতনযোঃ পথ্যং জীবনং লঘু দীপনম্ |৫৮|

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नार्यास्तु मधुरं स्तन्यं कषायानुरसं हिमम् ||५७|| नस्याश्च्योतनयोः पथ्यं जीवनं लघु दीपनम् |५८|

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Adhikarana 45 (58) · Śloka 59

হস্তিন্যা মধুরং বৃষ্যং কষাযানুরসং গুরু ||৫৮|| স্নিগ্ধং স্থৈর্যকরং শীতং চক্ষুষ্যং বলবর্ধনম্ |৫৯|

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हस्तिन्या मधुरं वृष्यं कषायानुरसं गुरु ||५८|| स्निग्धं स्थैर्यकरं शीतं चक्षुष्यं बलवर्धनम् |५९|

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Adhikarana 46 (59) · Śloka 60

প্রাযঃ প্রাভাতিকং ক্ষীরং গুরু বিষ্টম্ভি শীতলম্ ||৫৯|| রাত্র্যাঃ সোমগুণত্বাচ্চ ব্যাযামাভাবতস্তথা |৬০|

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प्रायः प्राभातिकं क्षीरं गुरु विष्टम्भि शीतलम् ||५९|| रात्र्याः सोमगुणत्वाच्च व्यायामाभावतस्तथा |६०|

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Adhikarana 47 (60) · Śloka 61

দিবাকরাভিতপ্তানাং ব্যাযামানিলসেবনাত্ ||৬০|| শ্রমঘ্নং বাতনুচ্চৈব চক্ষুষ্যং চাপরাহ্ণিকম্ |৬১|

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दिवाकराभितप्तानां व्यायामानिलसेवनात् ||६०|| श्रमघ्नं वातनुच्चैव चक्षुष्यं चापराह्णिकम् |६१|

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Adhikarana 48 (61) · Śloka 61

পযোঽভিষ্যন্দি গুর্বামং প্রাযশঃ পরিকীর্তিতম্ ||৬১||

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पयोऽभिष्यन्दि गुर्वामं प्रायशः परिकीर्तितम् ||६१||

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Adhikarana 49 (62) · Śloka 62

তদেবোক্তং লঘুতরমনভিষ্যন্দি বৈ শৃতম্ |৬২|

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तदेवोक्तं लघुतरमनभिष्यन्दि वै शृतम् |६२|

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Adhikarana 50 (62) · Śloka 62

বর্জযিত্বা স্ত্রিযাঃ স্তন্যমামমেব হি তদ্ধিতম্ ||৬২||

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वर्जयित्वा स्त्रियाः स्तन्यमाममेव हि तद्धितम् ||६२||

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Adhikarana 51 (63) · Śloka 63

ধারোষ্ণং গুণবত্ ক্ষীরং বিপরীতমতোঽন্যথা |৬৩|

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धारोष्णं गुणवत् क्षीरं विपरीतमतोऽन्यथा |६३|

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Adhikarana 52 (63) · Śloka 63

তদেবাতিশৃতং শীতং গুরু বৃংহণমুচ্যতে ||৬৩||

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तदेवातिशृतं शीतं गुरु बृंहणमुच्यते ||६३||

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Adhikarana 53 (64) · Śloka 64

অনিষ্টগন্ধমম্লং চ বিবর্ণং বিরসং চ যত্ | বর্জ্যং সলবণং ক্ষীরং যচ্চ বিগ্রথিতং ভবেত্ ||৬৪|| ইতি ক্ষীরবর্গঃ |

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अनिष्टगन्धमम्लं च विवर्णं विरसं च यत् | वर्ज्यं सलवणं क्षीरं यच्च विग्रथितं भवेत् ||६४|| इति क्षीरवर्गः |

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Adhikarana 54 (65) · Śloka 65

অথ দধিবর্গঃ | দধি তু মধুরমম্লমত্যম্লং চেতি; তত্কষাযানুরসং স্নিগ্ধমুষ্ণং পীনসবিষমজ্বরাতিসারারোচকমূত্রকৃচ্ছ্রকার্শ্যাপহং বৃষ্যং প্রাণকরং মঙ্গল্যং চ ||৬৫||

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अथ दधिवर्गः | दधि तु मधुरमम्लमत्यम्लं चेति; तत्कषायानुरसं स्निग्धमुष्णं पीनसविषमज्वरातिसारारोचकमूत्रकृच्छ्रकार्श्यापहं वृष्यं प्राणकरं मङ्गल्यं च ||६५||

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Adhikarana 55 (66) · Śloka 66

মহাভিষ্যন্দি মধুরং কফমেদোবিবর্ধনম্ | কফপিত্তকৃদম্লং স্যাদত্যম্লং রক্তদূষণম্ ||৬৬||

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महाभिष्यन्दि मधुरं कफमेदोविवर्धनम् | कफपित्तकृदम्लं स्यादत्यम्लं रक्तदूषणम् ||६६||

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Adhikarana 56 (67) · Śloka 67

বিদাহি সৃষ্টবিণ্মূত্রং মন্দজাতং ত্রিদোষকৃত্ |৬৭|

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विदाहि सृष्टविण्मूत्रं मन्दजातं त्रिदोषकृत् |६७|

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Adhikarana 57 (67) · Śloka 68

স্নিগ্ধং বিপাকে মধুরং দীপনং বলবর্ধনম্ ||৬৭|| বাতাপহং পবিত্রং চ দধি গব্যং রুচিপ্রদম্ |৬৮|

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स्निग्धं विपाके मधुरं दीपनं बलवर्धनम् ||६७|| वातापहं पवित्रं च दधि गव्यं रुचिप्रदम् |६८|

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Adhikarana 58 (68) · Śloka 69

দধ্যাজং কফপিত্তঘ্নং লঘু বাতক্ষযাপহম্ ||৬৮|| দুর্নামশ্বাসকাসেষু হিতমগ্নেশ্চ দীপনম্ |৬৯|

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दध्याजं कफपित्तघ्नं लघु वातक्षयापहम् ||६८|| दुर्नामश्वासकासेषु हितमग्नेश्च दीपनम् |६९|

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Adhikarana 59 (69) · Śloka 70

বিপাকে মধুরং বৃষ্যং বাতপিত্তপ্রসাদনম্ ||৬৯|| বলাসবর্ধনং স্নিগ্ধং বিশেষাদ্দধি মাহিষম্ |৭০|

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विपाके मधुरं वृष्यं वातपित्तप्रसादनम् ||६९|| बलासवर्धनं स्निग्धं विशेषाद्दधि माहिषम् |७०|

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Adhikarana 60 (70) · Śloka 71

বিপাকে কটু সক্ষারং গুরু ভেদ্যৌষ্ট্রিকং দধি ||৭০|| বাতমর্শাংসি কুষ্ঠানি কৃমীন্ হন্ত্যুদরাণি চ |৭১|

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विपाके कटु सक्षारं गुरु भेद्यौष्ट्रिकं दधि ||७०|| वातमर्शांसि कुष्ठानि कृमीन् हन्त्युदराणि च |७१|

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Adhikarana 61 (71) · Śloka 72

কোপনং কফবাতানাং দুর্নাম্নাং চাবিকং দধি ||৭১|| রসে পাকে চ মধুরমত্যভিষ্যন্দি দোষলম্ |৭২|

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कोपनं कफवातानां दुर्नाम्नां चाविकं दधि ||७१|| रसे पाके च मधुरमत्यभिष्यन्दि दोषलम् |७२|

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Adhikarana 62 (72) · Śloka 73

দীপনীযমচক্ষুষ্যং বাডবং দধি বাতলম্ ||৭২|| রূক্ষমুষ্ণং কষাযং চ কফমূত্রাপহং চ তত্ |৭৩|

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दीपनीयमचक्षुष्यं वाडवं दधि वातलम् ||७२|| रूक्षमुष्णं कषायं च कफमूत्रापहं च तत् |७३|

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Adhikarana 63 (73) · Śloka 74

স্নিগ্ধং বিপাকে মধুরং বল্যং সন্তর্পণং গুরু ||৭৩|| চক্ষুষ্যমগ্র্যং দোষঘ্নং দধি নার্যা গুণোত্তরম্ |৭৪|

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स्निग्धं विपाके मधुरं बल्यं सन्तर्पणं गुरु ||७३|| चक्षुष्यमग्र्यं दोषघ्नं दधि नार्या गुणोत्तरम् |७४|

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Adhikarana 64 (74) · Śloka 75

লঘু পাকে বলাসঘ্নং বীর্যোষ্ণং পক্তিনাশনম্ ||৭৪|| কষাযানুরসং নাগ্যা দধি বর্চোবিবর্ধনম্ |৭৫|

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लघु पाके बलासघ्नं वीर्योष्णं पक्तिनाशनम् ||७४|| कषायानुरसं नाग्या दधि वर्चोविवर्धनम् |७५|

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Adhikarana 65 (75) · Śloka 76

দধীন্যুক্তানি যানীহ গব্যাদীনি পৃথক্ পৃথক্ ||৭৫|| বিজ্ঞেযমেবং সর্বেষু গব্যমেব গুণোত্তরম্ |৭৬|

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दधीन्युक्तानि यानीह गव्यादीनि पृथक् पृथक् ||७५|| विज्ञेयमेवं सर्वेषु गव्यमेव गुणोत्तरम् |७६|

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Adhikarana 66 (76) · Śloka 77

বাতঘ্নং কফকৃত্ স্নিগ্ধং বৃংহণং নাতিপিত্তকৃত্ ||৭৬|| কুর্যাদ্ভক্তাভিলাষং চ দধি যত্ সুপরিস্রুতম্ |৭৭|

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वातघ्नं कफकृत् स्निग्धं बृंहणं नातिपित्तकृत् ||७६|| कुर्याद्भक्ताभिलाषं च दधि यत् सुपरिस्रुतम् |७७|

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Adhikarana 67 (77) · Śloka 78

শৃতাত্ ক্ষীরাত্তু যজ্জাতং গুণবদ্দধি তত্ স্মৃতম্ ||৭৭|| বাতপিত্তহরং রুচ্যং ধাত্বগ্নিবলবর্ধনম্ |৭৮|

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शृतात् क्षीरात्तु यज्जातं गुणवद्दधि तत् स्मृतम् ||७७|| वातपित्तहरं रुच्यं धात्वग्निबलवर्धनम् |७८|

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Adhikarana 68 (78) · Śloka 79

দধ্নঃ সরো গুরুর্বৃষ্যো বিজ্ঞেযোঽনিলনাশনঃ ||৭৮|| বহ্নের্বিধমনশ্চাপি কফশুক্রবিবর্ধনঃ |৭৯|

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दध्नः सरो गुरुर्वृष्यो विज्ञेयोऽनिलनाशनः ||७८|| वह्नेर्विधमनश्चापि कफशुक्रविवर्धनः |७९|

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Adhikarana 69 (79) · Śloka 80

দধি ত্বসারং রূক্ষং চ গ্রাহি বিষ্টম্ভি বাতলম্ ||৭৯|| দীপনীযং লঘুতরং সকষাযং রুচিপ্রদম্ |৮০|

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दधि त्वसारं रूक्षं च ग्राहि विष्टम्भि वातलम् ||७९|| दीपनीयं लघुतरं सकषायं रुचिप्रदम् |८०|

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Adhikarana 70 (80) · Śloka 81

শরদ্গ্রীষ্মবসন্তেষু প্রাযশো দধি গর্হিতম্ ||৮০|| হেমন্তে শিশিরে চৈব বর্ষাসু দধি শস্যতে |৮১|

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शरद्ग्रीष्मवसन्तेषु प्रायशो दधि गर्हितम् ||८०|| हेमन्ते शिशिरे चैव वर्षासु दधि शस्यते |८१|

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Adhikarana 71 (81-83) · Śloka 83

তৃষ্ণাক্লমহরং মস্তু লঘু স্রোতোবিশোধনম্ ||৮১|| অম্লং কষাযং মধুরমবৃষ্যং কফবাতনুত্ | প্রহ্লাদনং প্রীণনং চ ভিনত্ত্যাশু মলং চ তত্ | বলমাবহতে ক্ষিপ্রং ভক্তচ্ছন্দং করোতি চ ||৮২|| স্বাদ্বম্লমত্যম্লকমন্দজাতং তথা শৃতক্ষীরভবং সরশ্চ | অসারমেবং দধি সপ্তধাঽস্মিন্ বর্গে স্মৃতা মস্তুগুণাস্তথৈব ||৮৩|| ইতি দধিবর্গঃ |

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तृष्णाक्लमहरं मस्तु लघु स्रोतोविशोधनम् ||८१|| अम्लं कषायं मधुरमवृष्यं कफवातनुत् | प्रह्लादनं प्रीणनं च भिनत्त्याशु मलं च तत् | बलमावहते क्षिप्रं भक्तच्छन्दं करोति च ||८२|| स्वाद्वम्लमत्यम्लकमन्दजातं तथा शृतक्षीरभवं सरश्च | असारमेवं दधि सप्तधाऽस्मिन् वर्गे स्मृता मस्तुगुणास्तथैव ||८३|| इति दधिवर्गः |

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Adhikarana 72 (84) · Śloka 84

অথ তক্রবর্গঃ | তক্রং তু মধুরমম্লং কষাযানুরসমুষ্ণবীর্যং লঘুরূক্ষমগ্নিদীপনং গরশোফাতিসারগ্রহণীপাণ্ডুরোগার্শঃপ্লীহগুল্মারোচকবিষমজ্বরতৃষ্ণাচ্ছর্দিপ্রসেকশূলভেদঃশ্লেষ্মানিলহরং মধুরবিপাকং হৃদ্যং মূত্রকৃচ্ছ্রস্নেহব্যাপত্প্রশমনমবৃষ্যং চ ||৮৪||

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अथ तक्रवर्गः | तक्रं तु मधुरमम्लं कषायानुरसमुष्णवीर्यं लघुरूक्षमग्निदीपनं गरशोफातिसारग्रहणीपाण्डुरोगार्शःप्लीहगुल्मारोचकविषमज्वरतृष्णाच्छर्दिप्रसेकशूलभेदःश्लेष्मानिलहरं मधुरविपाकं हृद्यं मूत्रकृच्छ्रस्नेहव्यापत्प्रशमनमवृष्यं च ||८४||

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Adhikarana 73 (85) · Śloka 85

মন্থনাদিপৃথগ্ভূতস্নেহমর্ধোদকং চ যত্ | নাতিসান্দ্রদ্রবং তক্রং স্বাদ্বম্লং তুবরং রসে | যত্তু সস্নেহমজলং মথিতং ঘোলমুচ্যতে ||৮৫||

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मन्थनादिपृथग्भूतस्नेहमर्धोदकं च यत् | नातिसान्द्रद्रवं तक्रं स्वाद्वम्लं तुवरं रसे | यत्तु सस्नेहमजलं मथितं घोलमुच्यते ||८५||

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Adhikarana 74 (86) · Śloka 86

নৈব তক্রং ক্ষতে দদ্যান্নোষ্ণকালে ন দুর্বলে | ন মূর্চ্ছাভ্রমদাহেষু ন রোগে রক্তপৈত্তিকে ||৮৬||

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नैव तक्रं क्षते दद्यान्नोष्णकाले न दुर्बले | न मूर्च्छाभ्रमदाहेषु न रोगे रक्तपैत्तिके ||८६||

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Adhikarana 75 (87) · Śloka 87

শীতকালেঽগ্নিমান্দ্যে চ কফোত্থেষ্বামযেষু চ | মার্গাবরোধে দুষ্টে চ বাযৌ তক্রং প্রশস্যতে ||৮৭||

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शीतकालेऽग्निमान्द्ये च कफोत्थेष्वामयेषु च | मार्गावरोधे दुष्टे च वायौ तक्रं प्रशस्यते ||८७||

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Adhikarana 76 (88) · Śloka 88

তত্ পুনর্মধুরং শ্লেষ্মপ্রকোপণং পিত্তপ্রশমনং চ; অম্লং বাতঘ্নং পিত্তকরং চ ||৮৮||

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तत् पुनर्मधुरं श्लेष्मप्रकोपणं पित्तप्रशमनं च; अम्लं वातघ्नं पित्तकरं च ||८८||

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Adhikarana 77 (89) · Śloka 89

বাতেঽম্লং সৈন্ধবোপেতং, স্বাদু পিত্তে সশর্করম্ | পিবেত্তক্রং কফে চাপি ব্যোষক্ষারসমন্বিতম্ ||৮৯||

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वातेऽम्लं सैन्धवोपेतं, स्वादु पित्ते सशर्करम् | पिबेत्तक्रं कफे चापि व्योषक्षारसमन्वितम् ||८९||

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Adhikarana 78 (90) · Śloka 90

গ্রাহিণী বাতলা রূক্ষা দুর্জরা তক্রকূর্চিকা |৯০|

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ग्राहिणी वातला रूक्षा दुर्जरा तक्रकूर्चिका |९०|

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Adhikarana 79 (90) · Śloka 90

তক্রাল্লঘুতরো মণ্ডঃ কূর্চিকাদধিতক্রজঃ ||৯০||

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तक्राल्लघुतरो मण्डः कूर्चिकादधितक्रजः ||९०||

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Adhikarana 80 (91) · Śloka 91

গুরুঃ কিলাটোঽনিলহা পুংস্ত্বনিদ্রাপ্রদঃ স্মৃতঃ |৯১|

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गुरुः किलाटोऽनिलहा पुंस्त्वनिद्राप्रदः स्मृतः |९१|

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Adhikarana 81 (91) · Śloka 91

মধুরৌ বৃংহণৌ বৃষ্যৌ তদ্বত্পীযূষমোরটৌ ||৯১||

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मधुरौ बृंहणौ वृष्यौ तद्वत्पीयूषमोरटौ ||९१||

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Adhikarana 82 (92) · Śloka 92

নবনীতং পুনঃ সদ্যস্কং লঘু সুকুমারং মধুরং কষাযমীষদম্লং শীতলং মেধ্যং দীপনং হৃদ্যং সঙ্গ্রাহি পিত্তানিলহরং বৃষ্যমবিদাহি ক্ষযকাসব্রণশোষার্শোঽর্দিতাপহং, চিরোত্থিতং গুরু কফমেদোবিবর্ধনং বলকরং বৃংহণং শোষঘ্নং বিশেষেণ বালানাং প্রশস্যতে ||৯২||

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नवनीतं पुनः सद्यस्कं लघु सुकुमारं मधुरं कषायमीषदम्लं शीतलं मेध्यं दीपनं हृद्यं सङ्ग्राहि पित्तानिलहरं वृष्यमविदाहि क्षयकासव्रणशोषार्शोऽर्दितापहं, चिरोत्थितं गुरु कफमेदोविवर्धनं बलकरं बृंहणं शोषघ्नं विशेषेण बालानां प्रशस्यते ||९२||

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Adhikarana 83 (93) · Śloka 93

ক্ষীরোত্থং পুনর্নবনীতমুত্কৃষ্টস্নেহমাধুর্যমতিশীতং সৌকুমার্যকরং চক্ষুষ্যং সঙ্গ্রাহি রক্তপিত্তনেত্ররোগহরং প্রসাদনং চ ||৯৩||

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क्षीरोत्थं पुनर्नवनीतमुत्कृष्टस्नेहमाधुर्यमतिशीतं सौकुमार्यकरं चक्षुष्यं सङ्ग्राहि रक्तपित्तनेत्ररोगहरं प्रसादनं च ||९३||

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Adhikarana 84 (94) · Śloka 94

সন্তানিকা পুনর্বাতঘ্নী তর্পণী বৃষ্যা বল্যা স্নিগ্ধা রুচ্যা মধুরা মধুরবিপাকা রক্তপিত্তপ্রসাদনী গুর্বী চ ||৯৪||

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सन्तानिका पुनर्वातघ्नी तर्पणी वृष्या बल्या स्निग्धा रुच्या मधुरा मधुरविपाका रक्तपित्तप्रसादनी गुर्वी च ||९४||

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Adhikarana 85 (95) · Śloka 95

বিকল্প এষ দধ্যাদিঃ শ্রেষ্ঠো গব্যোঽভিবর্ণিতঃ | বিকল্পানবশিষ্টাংস্তু ক্ষীরবীর্যাত্সমাদিশেত্ ||৯৫|| ইতি তক্রবর্গঃ |

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विकल्प एष दध्यादिः श्रेष्ठो गव्योऽभिवर्णितः | विकल्पानवशिष्टांस्तु क्षीरवीर्यात्समादिशेत् ||९५|| इति तक्रवर्गः |

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Adhikarana 86 (96) · Śloka 96

অথ ঘৃতম্ | ঘৃতং তু মধুরং সৌম্যং মৃদু শীতবীর্যমনভিষ্যন্দি স্নেহনমুদাবর্তোন্মাদাপস্মারশূলজ্বরানাহবাতপিত্তপ্রশমনমগ্নিদীপনং স্মৃতিমতিমেধাকান্তিস্বরলাবণ্যসৌকুমার্যৌজস্তেজোবলকরমাযুষ্যং বৃষ্যং মেধ্যং বযঃস্থাপনং গুরু চক্ষুষ্যং শ্লেষ্মাভিবর্ধনং পাপ্মালক্ষ্মীপ্রশমনং বিষহরং রক্ষোঘ্নং চ ||৯৬||

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अथ घृतम् | घृतं तु मधुरं सौम्यं मृदु शीतवीर्यमनभिष्यन्दि स्नेहनमुदावर्तोन्मादापस्मारशूलज्वरानाहवातपित्तप्रशमनमग्निदीपनं स्मृतिमतिमेधाकान्तिस्वरलावण्यसौकुमार्यौजस्तेजोबलकरमायुष्यं वृष्यं मेध्यं वयःस्थापनं गुरु चक्षुष्यं श्लेष्माभिवर्धनं पाप्मालक्ष्मीप्रशमनं विषहरं रक्षोघ्नं च ||९६||

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Adhikarana 87 (97) · Śloka 97

বিপাকে মধুরং শীতং বাতপিত্তবিষাপহম্ | চক্ষুষ্যমগ্র্যং বল্যং চ গব্যং সর্পির্গুণোত্তরম্ ||৯৭||

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विपाके मधुरं शीतं वातपित्तविषापहम् | चक्षुष्यमग्र्यं बल्यं च गव्यं सर्पिर्गुणोत्तरम् ||९७||

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Adhikarana 88 (98) · Śloka 98

আজং ঘৃতং দীপনীযং চক্ষুষ্যং বলবর্ধনম্ | কাসে শ্বাসে ক্ষযে চাপি পথ্যং পাকে চ তল্লঘু ||৯৮||

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आजं घृतं दीपनीयं चक्षुष्यं बलवर्धनम् | कासे श्वासे क्षये चापि पथ्यं पाके च तल्लघु ||९८||

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Adhikarana 89 (99) · Śloka 99

মধুরং রক্তপিত্তঘ্নং গুরু পাকে কফাবহম্ | বাতপিত্তপ্রশমনং সুশীতং মাহিষং ঘৃতম্ ||৯৯||

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मधुरं रक्तपित्तघ्नं गुरु पाके कफावहम् | वातपित्तप्रशमनं सुशीतं माहिषं घृतम् ||९९||

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Adhikarana 90 (100) · Śloka 100

ঔষ্ট্রং কটু ঘৃতং পাকে শোফক্রিমিবিষাপহম্ | দীপনং কফবাতঘ্নং কুষ্ঠগুল্মোদরাপহম্ ||১০০||

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औष्ट्रं कटु घृतं पाके शोफक्रिमिविषापहम् | दीपनं कफवातघ्नं कुष्ठगुल्मोदरापहम् ||१००||

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Adhikarana 91 (101) · Śloka 101

পাকে লঘ্বাবিকং সর্পির্ন চ পিত্তপ্রকোপণম্ | কফেঽনিলে যোনিদোষে শোষে কম্পে চ তদ্ধিতম্ ||১০১||

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पाके लघ्वाविकं सर्पिर्न च पित्तप्रकोपणम् | कफेऽनिले योनिदोषे शोषे कम्पे च तद्धितम् ||१०१||

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Adhikarana 92 (102) · Śloka 102

পাকে লঘূষ্ণবীর্যং চ কষাযং কফনাশনম্ | দীপনং বদ্ধমূত্রং চ বিদ্যাদৈকশফং ঘৃতম্ ||১০২||

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पाके लघूष्णवीर्यं च कषायं कफनाशनम् | दीपनं बद्धमूत्रं च विद्यादैकशफं घृतम् ||१०२||

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Adhikarana 93 (103) · Śloka 103

চক্ষুষ্যমগ্র্যং স্ত্রীণাং তু সর্পিঃ স্যাদমৃতোপমম্ | বৃদ্ধিং করোতি দেহাগ্ন্যোর্লঘুপাকং বিষাপহম্ ||১০৩||

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चक्षुष्यमग्र्यं स्त्रीणां तु सर्पिः स्यादमृतोपमम् | वृद्धिं करोति देहाग्न्योर्लघुपाकं विषापहम् ||१०३||

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Adhikarana 94 (104) · Śloka 104

কষাযং বদ্ধবিণ্মূত্রং তিক্তমগ্নিকরং লঘু | হন্তি কারেণবং সর্পিঃ কফকুষ্ঠবিষক্রিমীন্ ||১০৪||

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कषायं बद्धविण्मूत्रं तिक्तमग्निकरं लघु | हन्ति कारेणवं सर्पिः कफकुष्ठविषक्रिमीन् ||१०४||

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Adhikarana 95 (105) · Śloka 105

ক্ষীরঘৃতং পুনঃ সঙ্গ্রাহি রক্তপিত্তভ্রমমূর্চ্ছাপ্রশমনং নেত্ররোগহিতং চ ||১০৫||

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क्षीरघृतं पुनः सङ्ग्राहि रक्तपित्तभ्रममूर्च्छाप्रशमनं नेत्ररोगहितं च ||१०५||

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Adhikarana 96 (106) · Śloka 106

সর্পির্মণ্ডস্তু মধুরঃ সরো যোনিশ্রোত্রাক্ষিশিরসাং শূলঘ্নো বস্তিনস্যাক্ষিপূরণেষূপদিশ্যতে ||১০৬||

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सर्पिर्मण्डस्तु मधुरः सरो योनिश्रोत्राक्षिशिरसां शूलघ्नो बस्तिनस्याक्षिपूरणेषूपदिश्यते ||१०६||

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Adhikarana 97 (107-111) · Śloka 111

সর্পিঃ পুরাণং সরং কটুবিপাকং ত্রিদোষাপহং মূর্চ্ছামদোন্মাদোদরজ্বরগরশোষাপস্মারযোনিশ্রোত্রাক্ষিশির শূলঘ্নং দীপনং বস্তিনস্যপূরণেষূপদিশ্যতে ||১০৭|| ভবতি চাত্র- পুরাণং তিমিরশ্বাসপীনসজ্বরকাসনুত্ | মূর্চ্ছাকুষ্ঠবিষোন্মাদগ্রহাপস্মারনাশনম্ ||১০৮|| (একাদশশতং চৈব বত্সরানুষিতং ঘৃতম্ | রক্ষোঘ্নং কুম্ভসর্পিঃ স্যাত্ পরতস্তু মহাঘৃতম্ ||১০৯|| পেযং মহাঘৃতং ভূতৈঃ কফঘ্নং পবনাধিকৈঃ | বল্যং পবিত্রং মেধ্যং চ বিশেষাত্তিমিরাপহম্ ||১১০|| সর্বভূতহরং চৈব ঘৃতমেতত্ প্রশস্যতে) ||১১১|| ইতি ঘৃতবর্গঃ |

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सर्पिः पुराणं सरं कटुविपाकं त्रिदोषापहं मूर्च्छामदोन्मादोदरज्वरगरशोषापस्मारयोनिश्रोत्राक्षिशिर शूलघ्नं दीपनं बस्तिनस्यपूरणेषूपदिश्यते ||१०७|| भवति चात्र- पुराणं तिमिरश्वासपीनसज्वरकासनुत् | मूर्च्छाकुष्ठविषोन्मादग्रहापस्मारनाशनम् ||१०८|| (एकादशशतं चैव वत्सरानुषितं घृतम् | रक्षोघ्नं कुम्भसर्पिः स्यात् परतस्तु महाघृतम् ||१०९|| पेयं महाघृतं भूतैः कफघ्नं पवनाधिकैः | बल्यं पवित्रं मेध्यं च विशेषात्तिमिरापहम् ||११०|| सर्वभूतहरं चैव घृतमेतत् प्रशस्यते) ||१११|| इति घृतवर्गः |

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Adhikarana 98 (112-113) · Śloka 113

অথ তৈলানি | তৈলং ত্বাগ্নেযমুষ্ণং তীক্ষ্ণং মধুরং মধুরবিপাকং বৃংহণং প্রীণনং ব্যবাযি সূক্ষ্মং বিশদং গুরু সরং বিকাসি বৃষ্যং ত্বক্প্রসাদনং মেধামার্দবমাংসস্থৈর্যবর্ণবলকরং চক্ষুষ্যং বদ্ধমূত্রং লেখনং তিক্তকষাযানুরসং পাচনমনিলবলাসক্ষযকরং ক্রিমিঘ্নমশিতপিত্তজননং যোনিশিরঃকর্ণশূলপ্রশমনং গর্ভাশযশোধনং চ, তথা ছিন্নভিন্নবিদ্ধোত্পিষ্টচ্যুতমথিতক্ষতপিচ্চিতভগ্নস্ফুটিতক্ষারাগ্নিদগ্ধবিশ্লিষ্টদারিতা ভিহতদুর্ভগ্নমৃগব্যালবিদষ্টপ্রভৃতিষু চ পরিষেকাভ্যঙ্গাবগাহাদিষু তিলতৈলং প্রশস্যতে ||১১২|| তদ্বস্তিষু চ পানেষু নস্যে কর্ণাক্ষিপূরণে | অন্নপানবিধৌ চাপি প্রযোজ্যং বাতশান্তযে ||১১৩||

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अथ तैलानि | तैलं त्वाग्नेयमुष्णं तीक्ष्णं मधुरं मधुरविपाकं बृंहणं प्रीणनं व्यवायि सूक्ष्मं विशदं गुरु सरं विकासि वृष्यं त्वक्प्रसादनं मेधामार्दवमांसस्थैर्यवर्णबलकरं चक्षुष्यं बद्धमूत्रं लेखनं तिक्तकषायानुरसं पाचनमनिलबलासक्षयकरं क्रिमिघ्नमशितपित्तजननं योनिशिरःकर्णशूलप्रशमनं गर्भाशयशोधनं च, तथा छिन्नभिन्नविद्धोत्पिष्टच्युतमथितक्षतपिच्चितभग्नस्फुटितक्षाराग्निदग्धविश्लिष्टदारिता भिहतदुर्भग्नमृगव्यालविदष्टप्रभृतिषु च परिषेकाभ्यङ्गावगाहादिषु तिलतैलं प्रशस्यते ||११२|| तद्बस्तिषु च पानेषु नस्ये कर्णाक्षिपूरणे | अन्नपानविधौ चापि प्रयोज्यं वातशान्तये ||११३||

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Adhikarana 99 (114) · Śloka 114

এরণ্ডতৈলং মধুরমুষ্ণং তীক্ষ্ণং দীপনং কটু কষাযানুরসং সূক্ষ্মং স্রোতোবিশোধনং ত্বচ্যং বৃষ্যং মধুরবিপাকং বযঃস্থাপনং যোনিশুক্রবিশোধনমারোগ্যমেধাকান্তিস্মৃতিবলকরং বাতকফহরমধোভাগদোষহরং চ ||১১৪||

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एरण्डतैलं मधुरमुष्णं तीक्ष्णं दीपनं कटु कषायानुरसं सूक्ष्मं स्रोतोविशोधनं त्वच्यं वृष्यं मधुरविपाकं वयःस्थापनं योनिशुक्रविशोधनमारोग्यमेधाकान्तिस्मृतिबलकरं वातकफहरमधोभागदोषहरं च ||११४||

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Adhikarana 100 (115) · Śloka 115

নিম্বাতসীকুসুম্ভমূলকজীমূতকবৃক্ষককৃতবেধনার্ককম্পিল্লকহস্তিকর্ণপৃথ্বীকাপীলু- করঞ্জেঙ্গুদীশিগ্রুসর্ষপসুবর্চলাবিডঙ্গজ্যোতিষ্মতীফলতৈলানি তীক্ষ্ণানি লঘূন্যুষ্ণবীর্যাণি কটূনি কটুবিপাকানি সরাণ্যনিলকফকৃমিকুষ্ঠপ্রমেহশিরোরোগাপহরাণি চেতি ||১১৫||

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निम्बातसीकुसुम्भमूलकजीमूतकवृक्षककृतवेधनार्ककम्पिल्लकहस्तिकर्णपृथ्वीकापीलु- करञ्जेङ्गुदीशिग्रुसर्षपसुवर्चलाविडङ्गज्योतिष्मतीफलतैलानि तीक्ष्णानि लघून्युष्णवीर्याणि कटूनि कटुविपाकानि सराण्यनिलकफकृमिकुष्ठप्रमेहशिरोरोगापहराणि चेति ||११५||

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Adhikarana 101 (116-119) · Śloka 119

বাতঘ্নং মধুরং তেষু ক্ষৌমং তৈলং বলাপহম্ | কটুপাকমচক্ষুষ্যং স্নিগ্ধোষ্ণং গুরুপিত্তলম্ ||১১৬|| কৃমিঘ্নং সার্ষপং তৈলং কণ্ডূকুষ্ঠাপহং লঘু | কফমেদোনিলহরং লেখনং কটু দীপনম্ ||১১৭|| কৃমিঘ্নমিঙ্গুদীতৈলমীষত্তিক্তং তথা লঘু | কুষ্ঠামযকৃমিহরং দৃষ্টিশুক্রবলাপহম্ ||১১৮|| বিপাকে কটুকং তৈলং কৌসুম্ভং সর্বদোষকৃত্ | রক্তপিত্তকরং তীক্ষ্ণমচক্ষুষ্যং বিদাহি চ ||১১৯||

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वातघ्नं मधुरं तेषु क्षौमं तैलं बलापहम् | कटुपाकमचक्षुष्यं स्निग्धोष्णं गुरुपित्तलम् ||११६|| कृमिघ्नं सार्षपं तैलं कण्डूकुष्ठापहं लघु | कफमेदोनिलहरं लेखनं कटु दीपनम् ||११७|| कृमिघ्नमिङ्गुदीतैलमीषत्तिक्तं तथा लघु | कुष्ठामयकृमिहरं दृष्टिशुक्रबलापहम् ||११८|| विपाके कटुकं तैलं कौसुम्भं सर्वदोषकृत् | रक्तपित्तकरं तीक्ष्णमचक्षुष्यं विदाहि च ||११९||

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Adhikarana 102 (120) · Śloka 120

কিরাততিক্তকাতিমুক্তকবিভীতকনালিকেরকোলাক্ষোডজীবন্তীপ্রিযালকর্বুদার- সূর্যবল্লীত্রপুসৈর্বারুককর্কারুকূষ্মাণ্ডপ্রভৃতীনাং তৈলানি মধুরাণি মধুরবিপাকানি বাতপিত্তপ্রশমনানি শীতবীর্যাণ্যভিষ্যন্দীনি সৃষ্টমূত্রাণ্যগ্নিসাদনানি চেতি ||১২০||

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किराततिक्तकातिमुक्तकबिभीतकनालिकेरकोलाक्षोडजीवन्तीप्रियालकर्बुदार- सूर्यवल्लीत्रपुसैर्वारुककर्कारुकूष्माण्डप्रभृतीनां तैलानि मधुराणि मधुरविपाकानि वातपित्तप्रशमनानि शीतवीर्याण्यभिष्यन्दीनि सृष्टमूत्राण्यग्निसादनानि चेति ||१२०||

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Adhikarana 103 (121) · Śloka 121

মধূককাশ্মর্যপলাশতৈলানি মধুরকষাযাণি কফপিত্তপ্রশমনানি ||১২১||

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मधूककाश्मर्यपलाशतैलानि मधुरकषायाणि कफपित्तप्रशमनानि ||१२१||

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Adhikarana 104 (122) · Śloka 122

তুবরকভল্লাতকতৈলে উষ্ণে মধুরকষাযে তিক্তানুরসে বাতকফকুষ্ঠমেদোমেহকৃমিপ্রশমনে উভযতোভাগদোষহরে চ ||১২২||

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तुवरकभल्लातकतैले उष्णे मधुरकषाये तिक्तानुरसे वातकफकुष्ठमेदोमेहकृमिप्रशमने उभयतोभागदोषहरे च ||१२२||

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Adhikarana 105 (123) · Śloka 123

সরলদেবদারুশিংশপাগুরুগণ্ডীরসারস্নেহাস্তিক্তকটুকষাযা দুষ্টব্রণশোধনাঃ কৃমিকফকুষ্ঠানিলহরাশ্চ ||১২৩||

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सरलदेवदारुशिंशपागुरुगण्डीरसारस्नेहास्तिक्तकटुकषाया दुष्टव्रणशोधनाः कृमिकफकुष्ठानिलहराश्च ||१२३||

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Adhikarana 106 (124) · Śloka 124

তুম্বীকোশাম্রদন্তীদ্রবন্তীশ্যামাসপ্তলানীলিকাকম্পিল্লকশঙ্খিনীস্নেহাস্তিক্তকটুকষাযা অধোভাগদোষহরাঃ কৃমিকফকুষ্ঠানিলহরা দুষ্টব্রণশোধনাশ্চ ||১২৪||

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तुम्बीकोशाम्रदन्तीद्रवन्तीश्यामासप्तलानीलिकाकम्पिल्लकशङ्खिनीस्नेहास्तिक्तकटुकषाया अधोभागदोषहराः कृमिकफकुष्ठानिलहरा दुष्टव्रणशोधनाश्च ||१२४||

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Adhikarana 107 (125) · Śloka 125

যবতিক্তাতৈলং সর্বদোষপ্রশমনমীষত্তিক্তমগ্নিদীপনং লেখনং মেধ্যং পথ্যং চ ||১২৫||

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यवतिक्तातैलं सर्वदोषप्रशमनमीषत्तिक्तमग्निदीपनं लेखनं मेध्यं पथ्यं च ||१२५||

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Adhikarana 108 (126) · Śloka 126

একৈষিকাতৈলং মধুরমতিশীতং পিত্তহরমনিলপ্রকোপণং শ্লেষ্মাভিবর্ধনং চ ||১২৬||

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एकैषिकातैलं मधुरमतिशीतं पित्तहरमनिलप्रकोपणं श्लेष्माभिवर्धनं च ||१२६||

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Adhikarana 109 (127) · Śloka 127

সহকারতৈলমীষত্তিক্তমতিসুগন্ধি বাতকফহরং রূক্ষং মধুরকষাযং রসবন্নাতিপিত্তকরং চ ||১২৭||

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सहकारतैलमीषत्तिक्तमतिसुगन्धि वातकफहरं रूक्षं मधुरकषायं रसवन्नातिपित्तकरं च ||१२७||

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Adhikarana 110 (128) · Śloka 128

ফলোদ্ভবানি তৈলানি যান্যুক্তানীহ কানিচিত্ | গুণান্ কর্ম চ বিজ্ঞায ফলানীব বিনির্দিশেত্ ||১২৮||

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फलोद्भवानि तैलानि यान्युक्तानीह कानिचित् | गुणान् कर्म च विज्ञाय फलानीव विनिर्दिशेत् ||१२८||

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Adhikarana 111 (129) · Śloka 129

যাবন্তঃ স্থাবরাঃ স্নেহাঃ সমাসাত্পরিকীর্তিতাঃ | সর্বে তৈলগুণা জ্ঞেযাঃ সর্বে চানিলনাশনাঃ ||১২৯||

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यावन्तः स्थावराः स्नेहाः समासात्परिकीर्तिताः | सर्वे तैलगुणा ज्ञेयाः सर्वे चानिलनाशनाः ||१२९||

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Adhikarana 112 (130) · Śloka 130

সর্বেভ্যস্ত্বিহ তৈলেভ্যস্তিলতৈলং বিশিষ্যতে | নিষ্পত্তেস্তদ্গুণত্বাচ্চ তৈলত্বমিতরেষ্বপি ||১৩০||

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सर्वेभ्यस्त्विह तैलेभ्यस्तिलतैलं विशिष्यते | निष्पत्तेस्तद्गुणत्वाच्च तैलत्वमितरेष्वपि ||१३०||

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Adhikarana 113 (131) · Śloka 131

গ্রাম্যানূপৌদকানাং চ বসামেদোমজ্জানো গুরূষ্ণমধুরা বাতঘ্নাঃ, জাঙ্গলৈকশফক্রব্যাদাদীনাং লঘুশীতকষাযা রক্তপিত্তঘ্নাঃ, প্রতুদবিষ্কিরাণাং শ্লেষ্মঘ্নাঃ | তত্র ঘৃততৈলবসামেদোমজ্জানো যথোত্তরং গুরুবিপাকা বাতহরাশ্চ ||১৩১|| ইতি তৈলবর্গঃ |

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ग्राम्यानूपौदकानां च वसामेदोमज्जानो गुरूष्णमधुरा वातघ्नाः, जाङ्गलैकशफक्रव्यादादीनां लघुशीतकषाया रक्तपित्तघ्नाः, प्रतुदविष्किराणां श्लेष्मघ्नाः | तत्र घृततैलवसामेदोमज्जानो यथोत्तरं गुरुविपाका वातहराश्च ||१३१|| इति तैलवर्गः |

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Adhikarana 114 (132) · Śloka 132

অথ মধুবর্গঃ | মধু তু মধুরং কষাযানুরসং রূক্ষং শীতমগ্নিদীপনং বর্ণ্যং স্বর্যং লঘু সুকুমারং লেখনং হৃদ্যং বাজীকরণং সন্ধানং শোধনং রোপণং(সঙ্গ্রাহি ) চক্ষুষ্যং প্রসাদনং সূক্ষ্মমার্গানুসারি পিত্তশ্লেষ্মমেদোমেহহিক্কাশ্বাসকাসাতিসারচ্ছর্দিতৃষ্ণাকৃমিবিষপ্রশমনং হ্লাদি ত্রিদোষপ্রশমনং চ; তত্তু লঘুত্বাত্ কফঘ্নং, পৈচ্ছিল্যান্মাধুর্যাত্ কষাযভাবাচ্চ বাতপিত্তঘ্নম্ ||১৩২||

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अथ मधुवर्गः | मधु तु मधुरं कषायानुरसं रूक्षं शीतमग्निदीपनं वर्ण्यं स्वर्यं लघु सुकुमारं लेखनं हृद्यं वाजीकरणं सन्धानं शोधनं रोपणं(सङ्ग्राहि ) चक्षुष्यं प्रसादनं सूक्ष्ममार्गानुसारि पित्तश्लेष्ममेदोमेहहिक्काश्वासकासातिसारच्छर्दितृष्णाकृमिविषप्रशमनं ह्लादि त्रिदोषप्रशमनं च; तत्तु लघुत्वात् कफघ्नं, पैच्छिल्यान्माधुर्यात् कषायभावाच्च वातपित्तघ्नम् ||१३२||

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Adhikarana 115 (133) · Śloka 133

পৌত্তিকং ভ্রামরং ক্ষৌদ্রং মাক্ষিকং ছাত্রমেব চ | আর্ঘ্যমৌদ্দালকং দালমিত্যষ্টৌ মধুজাতযঃ ||১৩৩||

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पौत्तिकं भ्रामरं क्षौद्रं माक्षिकं छात्रमेव च | आर्घ्यमौद्दालकं दालमित्यष्टौ मधुजातयः ||१३३||

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Adhikarana 116 (134-139) · Śloka 140

বিশেষাত্পৌত্তিকং তেষু রূক্ষোষ্ণং সবিষান্বযাত্ | বাতাসৃক্পিত্তকৃচ্ছেদি বিদাহি মদকৃন্মধু ||১৩৪|| পৈচ্ছিল্যাত্ স্বাদুভূযস্ত্বাদ্ভ্রামরং গুরুসঞ্জ্ঞিতম্ | ক্ষৌদ্রং বিশেষতো জ্ঞেযং শীতলং লঘু লেখনম্ ||১৩৫|| তস্মাল্লঘুতরং রূক্ষং মাক্ষিকং প্রবরং স্মৃতম্ | শ্বাসাদিষু চ রোগেষু প্রশস্তং তদ্বিশেষতঃ ||১৩৬|| স্বাদুপাকং গুরু হিমং পিচ্ছিলং রক্তপিত্তজিত্ | শ্বিত্রমেহকৃমিঘ্নং চ বিদ্যাচ্ছাত্রং গুণোত্তরম্ ||১৩৭|| আর্ঘ্যং মধ্বতিচক্ষুষ্যং কফপিত্তহরং পরম্ | কষাযং কটু পাকে চ বল্যং তিক্তমবাতকৃত্ ||১৩৮|| ঔদ্দালকং রুচিকরং স্বর্যং কুষ্ঠবিষাপহম্ | কষাযমম্লমুষ্ণং চ পিত্তকৃত্ কটুপাকি চ ||১৩৯|| ছর্দিমেহপ্রশমনং মধু রূক্ষং দলোদ্ভবম্ |১৪০|

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विशेषात्पौत्तिकं तेषु रूक्षोष्णं सविषान्वयात् | वातासृक्पित्तकृच्छेदि विदाहि मदकृन्मधु ||१३४|| पैच्छिल्यात् स्वादुभूयस्त्वाद्भ्रामरं गुरुसञ्ज्ञितम् | क्षौद्रं विशेषतो ज्ञेयं शीतलं लघु लेखनम् ||१३५|| तस्माल्लघुतरं रूक्षं माक्षिकं प्रवरं स्मृतम् | श्वासादिषु च रोगेषु प्रशस्तं तद्विशेषतः ||१३६|| स्वादुपाकं गुरु हिमं पिच्छिलं रक्तपित्तजित् | श्वित्रमेहकृमिघ्नं च विद्याच्छात्रं गुणोत्तरम् ||१३७|| आर्घ्यं मध्वतिचक्षुष्यं कफपित्तहरं परम् | कषायं कटु पाके च बल्यं तिक्तमवातकृत् ||१३८|| औद्दालकं रुचिकरं स्वर्यं कुष्ठविषापहम् | कषायमम्लमुष्णं च पित्तकृत् कटुपाकि च ||१३९|| छर्दिमेहप्रशमनं मधु रूक्षं दलोद्भवम् |१४०|

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Adhikarana 117 (140) · Śloka 141

বৃংহণীযং মধু নবং নাতিশ্লেষ্মহরং সমম্ ||১৪০|| মেদঃস্থৌল্যাপহং গ্রাহি পুরাণমতিলেখনম্ |১৪১|

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बृंहणीयं मधु नवं नातिश्लेष्महरं समम् ||१४०|| मेदःस्थौल्यापहं ग्राहि पुराणमतिलेखनम् |१४१|

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Adhikarana 118 (141) · Śloka 141

দোষত্রযহরং পক্বমামমম্লং ত্রিদোষকৃত্ ||১৪১||

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दोषत्रयहरं पक्वमाममम्लं त्रिदोषकृत् ||१४१||

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Adhikarana 119 (142) · Śloka 142

তদ্যুক্তং বিবিধৈর্যোগৈর্নিহন্যাদামযান্ বহূন্ | নানাদ্রব্যাত্মকত্বাচ্চ যোগবাহি পরং মধু ||১৪২||

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तद्युक्तं विविधैर्योगैर्निहन्यादामयान् बहून् | नानाद्रव्यात्मकत्वाच्च योगवाहि परं मधु ||१४२||

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Adhikarana 120 (143-145) · Śloka 145

তত্তু নানাদ্রব্যরসগুণবীর্যবিপাকবিরুদ্ধানাং পুষ্পরসানাং মক্ষিকাসম্ভবত্বাচ্চানুষ্ণোপচারম্ ||১৪৩|| উষ্ণৈর্বিরুধ্যতে সর্বং বিষান্বযতযা মধু | উষ্ণার্তমুষ্ণৈরুষ্ণে বা তন্নিহন্তি যথা বিষম্ ||১৪৪|| তত্সৌকুমার্যাচ্চ তথৈব শৈত্যান্নানৌষধীনাং রসসম্ভবাচ্চ | উষ্ণৈর্বিরুধ্যেত বিশেষতশ্চ তথাঽন্তরীক্ষেণ জলেন চাপি ||১৪৫||

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तत्तु नानाद्रव्यरसगुणवीर्यविपाकविरुद्धानां पुष्परसानां मक्षिकासम्भवत्वाच्चानुष्णोपचारम् ||१४३|| उष्णैर्विरुध्यते सर्वं विषान्वयतया मधु | उष्णार्तमुष्णैरुष्णे वा तन्निहन्ति यथा विषम् ||१४४|| तत्सौकुमार्याच्च तथैव शैत्यान्नानौषधीनां रससम्भवाच्च | उष्णैर्विरुध्येत विशेषतश्च तथाऽन्तरीक्षेण जलेन चापि ||१४५||

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Adhikarana 121 (146) · Śloka 146

উষ্ণেন মধু সংযুক্তং বমনেষ্ববচারিতম্ | অপাকাদনবস্থানান্ন বিরুধ্যেত পূর্ববত্ ||১৪৬||

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उष्णेन मधु संयुक्तं वमनेष्ववचारितम् | अपाकादनवस्थानान्न विरुध्येत पूर्ववत् ||१४६||

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Adhikarana 122 (147) · Śloka 147

মধ্বামাত্পরতস্ত্বন্যদামং কষ্টং ন বিদ্যতে | বিরুদ্ধোপক্রমত্বাত্তত্ সর্বং হন্তি যথা বিষম্ ||১৪৭|| ইতি মধুবর্গঃ |

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मध्वामात्परतस्त्वन्यदामं कष्टं न विद्यते | विरुद्धोपक्रमत्वात्तत् सर्वं हन्ति यथा विषम् ||१४७|| इति मधुवर्गः |

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Adhikarana 123 (148-149) · Śloka 150

অথেক্ষুবর্গঃ | ইক্ষবো মধুরা মধুরবিপাকা গুরবঃ শীতাঃ স্নিগ্ধা বল্যা বৃষ্যা মূত্রলা রক্তপিত্তপ্রশমনাঃ কৃমিকফকরাশ্চেতি | তে চানেকবিধাঃ | তদ্যথা- ||১৪৮|| পৌণ্ড্রকো ভীরুকশ্চৈব বংশকঃ শ্বেতপোরকঃ | কান্তারস্তাপসেক্ষুশ্চ কাষ্ঠেক্ষুঃ সূচিপত্রকঃ ||১৪৯|| নৈপালো দীর্ঘপত্রশ্চ নীলপোরোঽথ কোশকৃত্ | ইত্যেতা জাতযঃ স্থৌল্যাদ্, ... |১৫০|

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अथेक्षुवर्गः | इक्षवो मधुरा मधुरविपाका गुरवः शीताः स्निग्धा बल्या वृष्या मूत्रला रक्तपित्तप्रशमनाः कृमिकफकराश्चेति | ते चानेकविधाः | तद्यथा- ||१४८|| पौण्ड्रको भीरुकश्चैव वंशकः श्वेतपोरकः | कान्तारस्तापसेक्षुश्च काष्ठेक्षुः सूचिपत्रकः ||१४९|| नैपालो दीर्घपत्रश्च नीलपोरोऽथ कोशकृत् | इत्येता जातयः स्थौल्याद्, ... |१५०|

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Adhikarana 124 (150-154) · Śloka 155

... গুণান্ বক্ষ্যাম্যতঃ পরম্ ||১৫০|| সুশীতো মধুরঃ স্নিগ্ধো বৃংহণঃ শ্লেষ্মলঃ সরঃ | অবিদাহী গুরুর্বৃষ্যঃ পৌণ্ড্রকো ভীরুকস্তথা ||১৫১|| আভ্যাং তুল্যগুণঃ কিঞ্চিত্সক্ষারো বংশকো মতঃ | বংশবচ্ছ্বেতপোরস্তু কিঞ্চিদুষ্ণঃ স বাতহা ||১৫২|| কান্তারতাপসাবিক্ষূ বংশকানুগতৌ মতৌ | এবঙ্গুণস্তু কাষ্ঠেক্ষুঃ স তু বাতপ্রকোপণঃ ||১৫৩|| সূচীপত্রো নীলপোরৌ নৈপালো দীর্ঘপত্রকঃ | বাতলাঃ কফপিত্তঘ্নাঃ সকষাযা বিদাহিনঃ ||১৫৪|| কোশকারো গুরুঃ শীতো রক্তপিত্তক্ষযাপহঃ |১৫৫|

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... गुणान् वक्ष्याम्यतः परम् ||१५०|| सुशीतो मधुरः स्निग्धो बृंहणः श्लेष्मलः सरः | अविदाही गुरुर्वृष्यः पौण्ड्रको भीरुकस्तथा ||१५१|| आभ्यां तुल्यगुणः किञ्चित्सक्षारो वंशको मतः | वंशवच्छ्वेतपोरस्तु किञ्चिदुष्णः स वातहा ||१५२|| कान्तारतापसाविक्षू वंशकानुगतौ मतौ | एवङ्गुणस्तु काष्ठेक्षुः स तु वातप्रकोपणः ||१५३|| सूचीपत्रो नीलपोरौ नैपालो दीर्घपत्रकः | वातलाः कफपित्तघ्नाः सकषाया विदाहिनः ||१५४|| कोशकारो गुरुः शीतो रक्तपित्तक्षयापहः |१५५|

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Adhikarana 125 (155) · Śloka 156

অতীব মধুরো মূলে মধ্যে মধুর এব তু ||১৫৫|| অগ্রেষ্বক্ষিষু বিজ্ঞেয ইক্ষূণাং লবণো রসঃ ||১৫৬||

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अतीव मधुरो मूले मध्ये मधुर एव तु ||१५५|| अग्रेष्वक्षिषु विज्ञेय इक्षूणां लवणो रसः ||१५६||

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Adhikarana 126 (157) · Śloka 157

অবিদাহী কফকরো বাতপিত্তনিবারণঃ | বক্ত্রপ্রহ্লাদনো বৃষ্যো দন্তনিষ্পীডিতো রসঃ ||১৫৭||

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अविदाही कफकरो वातपित्तनिवारणः | वक्त्रप्रह्लादनो वृष्यो दन्तनिष्पीडितो रसः ||१५७||

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Adhikarana 127 (158) · Śloka 158

গুরুর্বিদাহী বিষ্টম্ভী যান্ত্রিকস্তু প্রকীর্তিতঃ |১৫৮|

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गुरुर्विदाही विष्टम्भी यान्त्रिकस्तु प्रकीर्तितः |१५८|

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Adhikarana 128 (158) · Śloka 158

পক্বো গুরুঃ সরঃ স্নিগ্ধঃ সতীক্ষ্ণঃ কফবাতনুত্ ||১৫৮||

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पक्वो गुरुः सरः स्निग्धः सतीक्ष्णः कफवातनुत् ||१५८||

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Adhikarana 129 (159) · Śloka 159

ফাণিতং গুরু মধুরমভিষ্যন্দি বৃংহণমবৃষ্যং ত্রিদোষকৃচ্চ ||১৫৯||

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फाणितं गुरु मधुरमभिष्यन्दि बृंहणमवृष्यं त्रिदोषकृच्च ||१५९||

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Adhikarana 130 (160) · Śloka 160

গুডঃ সক্ষারমধুরো নাতিশীতঃ স্নিগ্ধো মূত্ররক্তশোধনো নাতিপিত্তজিদ্বাতঘ্নো মেদঃকৃমিকফকরো বল্যো বৃষ্যশ্চ ||১৬০||

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गुडः सक्षारमधुरो नातिशीतः स्निग्धो मूत्ररक्तशोधनो नातिपित्तजिद्वातघ्नो मेदःकृमिकफकरो बल्यो वृष्यश्च ||१६०||

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Adhikarana 131 (161) · Śloka 161

পিত্তঘ্নো মধুরঃ শুদ্ধো বাতঘ্নোঽসৃক্প্রসাদনঃ |১৬১|

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पित्तघ्नो मधुरः शुद्धो वातघ्नोऽसृक्प्रसादनः |१६१|

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Adhikarana 132 (161) · Śloka 161

সপুরাণোঽধিকগুণো গুডঃ পথ্যতমঃ স্মৃতঃ ||১৬১||

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सपुराणोऽधिकगुणो गुडः पथ्यतमः स्मृतः ||१६१||

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Adhikarana 133 (162) · Śloka 162

মত্স্যণ্ডিকাখণ্ডশর্করা বিমলজাতা উত্তরোত্তরং শীতাঃ স্নিগ্ধাঃ গুরুতরা মধুরতরা বৃষ্যা রক্তপিত্তপ্রশমনাস্তৃষ্ণাপ্রশমনাশ্চ ||১৬২||

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मत्स्यण्डिकाखण्डशर्करा विमलजाता उत्तरोत्तरं शीताः स्निग्धाः गुरुतरा मधुरतरा वृष्या रक्तपित्तप्रशमनास्तृष्णाप्रशमनाश्च ||१६२||

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Adhikarana 134 (163) · Śloka 163

যথা যথৈষাং বৈমল্যং মধুরত্বং তথা তথা | স্নেহগৌরবশৈত্যানি সরত্বং চ তথা তথা ||১৬৩||

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यथा यथैषां वैमल्यं मधुरत्वं तथा तथा | स्नेहगौरवशैत्यानि सरत्वं च तथा तथा ||१६३||

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Adhikarana 135 (164) · Śloka 164

যো যো মত্স্যণ্ডিকাখণ্ডশর্করাণাং স্বকো গুণঃ | তেন তেনৈব নির্দেশ্যস্তেষাং বিস্রাবণো গুণঃ ||১৬৪||

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यो यो मत्स्यण्डिकाखण्डशर्कराणां स्वको गुणः | तेन तेनैव निर्देश्यस्तेषां विस्रावणो गुणः ||१६४||

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Adhikarana 136 (165) · Śloka 165

সারস্থিতা সুবিমলা নিঃক্ষারা চ যথা যথা | তথা গুণবতী সর্বা বিজ্ঞেযা শর্করা বুধৈঃ ||১৬৫||

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सारस्थिता सुविमला निःक्षारा च यथा यथा | तथा गुणवती सर्वा विज्ञेया शर्करा बुधैः ||१६५||

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Adhikarana 137 (166) · Śloka 166

মধুশর্করা পুনশ্ছর্দ্যতীসারহরী রূক্ষা ছেদনী প্রসাদনী কষাযমধুরা মধুরবিপাকা চ ||১৬৬||

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मधुशर्करा पुनश्छर्द्यतीसारहरी रूक्षा छेदनी प्रसादनी कषायमधुरा मधुरविपाका च ||१६६||

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Adhikarana 138 (167) · Śloka 167

যবাসশর্করা মধুরকষাযা তিক্তানুরসা শ্লেষ্মহরী সরা চেতি ||১৬৭||

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यवासशर्करा मधुरकषाया तिक्तानुरसा श्लेष्महरी सरा चेति ||१६७||

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Adhikarana 139 (168) · Śloka 168

যাবত্যঃ শর্করাঃ প্রোক্তাঃ সর্বা দাহপ্রণাশনাঃ | রক্তপিত্তপ্রশমনাশ্ছর্দিমূর্চ্ছাতৃষাপহাঃ ||১৬৮||

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यावत्यः शर्कराः प्रोक्ताः सर्वा दाहप्रणाशनाः | रक्तपित्तप्रशमनाश्छर्दिमूर्च्छातृषापहाः ||१६८||

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Adhikarana 140 (169) · Śloka 169

রূক্ষং মধূকপুষ্পোত্থং ফাণিতং বাতপিত্তকৃত্ | কফঘ্নং মধুরং পাকে কষাযং বস্তিদূষণম্ ||১৬৯|| ইতীক্ষুবর্গঃ |

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रूक्षं मधूकपुष्पोत्थं फाणितं वातपित्तकृत् | कफघ्नं मधुरं पाके कषायं बस्तिदूषणम् ||१६९|| इतीक्षुवर्गः |

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Adhikarana 141 (170) · Śloka 171

অথ মদ্যবর্গঃ | সর্বং পিত্তকরং মদ্যমম্লং রোচনদীপনম্ | ভেদনং কফবাতঘ্নং হৃদ্যং বস্তিবিশোধনম্ ||১৭০|| পাকে লঘু বিদাহ্যুষ্ণং তীক্ষ্ণমিন্দ্রিযবোধনম্ | বিকাসি সৃষ্টবিণ্মূত্রং... |১৭১|

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अथ मद्यवर्गः | सर्वं पित्तकरं मद्यमम्लं रोचनदीपनम् | भेदनं कफवातघ्नं हृद्यं बस्तिविशोधनम् ||१७०|| पाके लघु विदाह्युष्णं तीक्ष्णमिन्द्रियबोधनम् | विकासि सृष्टविण्मूत्रं... |१७१|

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Adhikarana 142 (171-173) · Śloka 173

... শৃণু তস্য বিশেষণম্ ||১৭১|| মার্দ্বীকমবিদাহিত্বান্মধুরান্বযতস্তথা | রক্তপিত্তেঽপি সততং বুধৈর্ন প্রতিষিধ্যতে ||১৭২|| মধুরং তদ্ধি রূক্ষং চ কষাযানুরসং লঘু | লঘুপাকি সরং শোষবিষমজ্বরনাশনম্ ||১৭৩||

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... शृणु तस्य विशेषणम् ||१७१|| मार्द्वीकमविदाहित्वान्मधुरान्वयतस्तथा | रक्तपित्तेऽपि सततं बुधैर्न प्रतिषिध्यते ||१७२|| मधुरं तद्धि रूक्षं च कषायानुरसं लघु | लघुपाकि सरं शोषविषमज्वरनाशनम् ||१७३||

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Adhikarana 143 (174) · Śloka 175

মার্দ্বীকাল্পান্তরং কিঞ্চিত্ খার্জূরং বাতকোপনম্ | তদেব বিশদং রুচ্যং কফঘ্নং কর্শনং লঘু ||১৭৪|| কষাযমধুরং হৃদ্যং সুগন্ধীন্দ্রিযবোধনম্ |১৭৫|

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मार्द्वीकाल्पान्तरं किञ्चित् खार्जूरं वातकोपनम् | तदेव विशदं रुच्यं कफघ्नं कर्शनं लघु ||१७४|| कषायमधुरं हृद्यं सुगन्धीन्द्रियबोधनम् |१७५|

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Adhikarana 144 (175) · Śloka 176

কাসার্শোগ্রহণীদোষমূত্রাঘাতানিলাপহা ||১৭৫|| স্তন্যরক্তক্ষযহিতা সুরা বৃংহণদীপনী |১৭৬|

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कासार्शोग्रहणीदोषमूत्राघातानिलापहा ||१७५|| स्तन्यरक्तक्षयहिता सुरा बृंहणदीपनी |१७६|

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Adhikarana 145 (176) · Śloka 177

কাসার্শোগ্রহণীশ্বাসপ্রতিশ্যাযবিনাশনী ||১৭৬|| শ্বেতা মূত্রকফস্তন্যরক্তমাংসকরী সুরা |১৭৭|

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कासार्शोग्रहणीश्वासप्रतिश्यायविनाशनी ||१७६|| श्वेता मूत्रकफस्तन्यरक्तमांसकरी सुरा |१७७|

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Adhikarana 146 (177) · Śloka 178

ছর্দ্যরোচকহৃত্কুক্ষিতোদশূলপ্রমর্দনী ||১৭৭|| প্রসন্না কফবাতার্শোবিবন্ধানাহনাশনী |১৭৮|

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छर्द्यरोचकहृत्कुक्षितोदशूलप्रमर्दनी ||१७७|| प्रसन्ना कफवातार्शोविबन्धानाहनाशनी |१७८|

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Adhikarana 147 (178) · Śloka 179

পিত্তলাঽল্পকফা রূক্ষা যবৈর্বাতপ্রকোপণী |১৭৮| বিষ্টম্ভিনী সুরা গুর্বী... ||১৭৯||

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पित्तलाऽल्पकफा रूक्षा यवैर्वातप्रकोपणी |१७८| विष्टम्भिनी सुरा गुर्वी... ||१७९||

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Adhikarana 148 (178) · Śloka 178

... শ্লেষ্মলং তু মধূলকম্ ||১৭৮||

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... श्लेष्मलं तु मधूलकम् ||१७८||

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Adhikarana 149 (179) · Śloka 179

রূক্ষা নাতিকফা বৃষ্যা পাচনী চাক্ষিকী স্মৃতা ||১৭৯||

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रूक्षा नातिकफा वृष्या पाचनी चाक्षिकी स्मृता ||१७९||

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Adhikarana 150 (180) · Śloka 180

ত্রিদোষো ভেদ্যবৃষ্যশ্চ কোহলো বদনপ্রিযঃ |১৮০|

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त्रिदोषो भेद्यवृष्यश्च कोहलो वदनप्रियः |१८०|

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Adhikarana 151 (180) · Śloka 181

গ্রাহ্যুষ্ণো জগলঃ পক্তা রূক্ষস্তৃট্কফশোফকৃত্ ||১৮০|| হৃদ্যঃ প্রবাহিকাটোপদুর্নামানিলশোষহৃত্ |১৮১|

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ग्राह्युष्णो जगलः पक्ता रूक्षस्तृट्कफशोफकृत् ||१८०|| हृद्यः प्रवाहिकाटोपदुर्नामानिलशोषहृत् |१८१|

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Adhikarana 152 (181) · Śloka 182

বক্কসো হৃতসারত্বাদ্বিষ্টম্ভী বাতকোপনঃ ||১৮১|| দীপনঃ সৃষ্টবিণ্মূত্রো বিশদোঽল্পমদো গুরুঃ |১৮২|

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बक्कसो हृतसारत्वाद्विष्टम्भी वातकोपनः ||१८१|| दीपनः सृष्टविण्मूत्रो विशदोऽल्पमदो गुरुः |१८२|

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Adhikarana 153 (182) · Śloka 182

কষাযো মধুরঃ শীধুর্গৌডঃ পাচনদীপনঃ ||১৮২||

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कषायो मधुरः शीधुर्गौडः पाचनदीपनः ||१८२||

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Adhikarana 154 (183) · Śloka 183

শার্করো মধুরো রুচ্যো দীপনো বস্তিশোধনঃ | বাতঘ্নো মধুরঃ পাকে হৃদ্য ইন্দ্রিযবোধনঃ ||১৮৩||

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शार्करो मधुरो रुच्यो दीपनो बस्तिशोधनः | वातघ्नो मधुरः पाके हृद्य इन्द्रियबोधनः ||१८३||

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Adhikarana 155 (184) · Śloka 184

তদ্বত্ পক্বরসঃ শীধুর্বলবর্ণকরঃ সরঃ | শোফঘ্নো দীপনো হৃদ্যো রুচ্যঃ শ্লেষ্মার্শসাং হিতঃ ||১৮৪||

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तद्वत् पक्वरसः शीधुर्बलवर्णकरः सरः | शोफघ्नो दीपनो हृद्यो रुच्यः श्लेष्मार्शसां हितः ||१८४||

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Adhikarana 156 (185) · Śloka 185

কর্শনঃ শীতরসিকঃ শ্বযথূদরনাশনঃ | বর্ণকৃজ্জরণঃ স্বর্যো বিবন্ধঘ্নোঽর্শসাং হিতঃ ||১৮৫||

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कर्शनः शीतरसिकः श्वयथूदरनाशनः | वर्णकृज्जरणः स्वर्यो विबन्धघ्नोऽर्शसां हितः ||१८५||

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Adhikarana 157 (186) · Śloka 186

আক্ষিকঃ পাণ্ডুরোগঘ্নো ব্রণ্যঃ সঙ্গ্রাহকো লঘুঃ | কষাযমধুরঃ সীধুঃ পিত্তঘ্নোঽসৃক্প্রসাদনঃ ||১৮৬||

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आक्षिकः पाण्डुरोगघ्नो व्रण्यः सङ्ग्राहको लघुः | कषायमधुरः सीधुः पित्तघ्नोऽसृक्प्रसादनः ||१८६||

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Adhikarana 158 (187) · Śloka 187

জাম্ববো বদ্ধনিস্যন্দস্তুবরো বাতকোপনঃ |১৮৭|

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जाम्बवो बद्धनिस्यन्दस्तुवरो वातकोपनः |१८७|

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Adhikarana 159 (187) · Śloka 188

তীক্ষ্ণঃ সুরাসবো হৃদ্যো মূত্রলঃ কফবাতনুত্ ||১৮৭|| মুখপ্রিযঃ স্থিরমদো বিজ্ঞেযোঽনিলনাশনঃ |১৮৮|

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तीक्ष्णः सुरासवो हृद्यो मूत्रलः कफवातनुत् ||१८७|| मुखप्रियः स्थिरमदो विज्ञेयोऽनिलनाशनः |१८८|

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Adhikarana 160 (188) · Śloka 189

লঘুর্মধ্বাসবশ্ছেদী মেহকুষ্ঠবিষাপহঃ ||১৮৮|| তিক্তঃ কষাযঃ শোফঘ্নস্তীক্ষ্ণঃ স্বাদুরবাতকৃত্ |১৮৯|

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लघुर्मध्वासवश्छेदी मेहकुष्ठविषापहः ||१८८|| तिक्तः कषायः शोफघ्नस्तीक्ष्णः स्वादुरवातकृत् |१८९|

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Adhikarana 161 (189) · Śloka 190

তীক্ষ্ণঃ কষাযো মদকৃদ্দুর্নামকফগুল্মহৃত্ ||১৮৯|| কৃমিমেদোনিলহরো মৈরেযো মধুরো গুরুঃ |১৯০|

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तीक्ष्णः कषायो मदकृद्दुर्नामकफगुल्महृत् ||१८९|| कृमिमेदोनिलहरो मैरेयो मधुरो गुरुः |१९०|

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Adhikarana 162 (190) · Śloka 190

বল্যঃ পিত্তহরো বর্ণ্যো হৃদ্যশ্চেক্ষুরসাসবঃ ||১৯০||

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बल्यः पित्तहरो वर्ण्यो हृद्यश्चेक्षुरसासवः ||१९०||

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Adhikarana 163 (191) · Śloka 191

শীধুর্মধূকপুষ্পোত্থো বিহাহ্যগ্নিবলপ্রদঃ | রূক্ষঃ কষাযঃ কফহৃদ্বাতপিত্তপ্রকোপণঃ ||১৯১||

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शीधुर्मधूकपुष्पोत्थो विहाह्यग्निबलप्रदः | रूक्षः कषायः कफहृद्वातपित्तप्रकोपणः ||१९१||

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Adhikarana 164 (192) · Śloka 192

নির্দিশেদ্রসতশ্চান্যান্ কন্দমূলফলাসবান্ |১৯২|

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निर्दिशेद्रसतश्चान्यान् कन्दमूलफलासवान् |१९२|

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Adhikarana 165 (192) · Śloka 193

নবং মদ্যমভিষ্যন্দি গুরু বাতাদিকোপনম্ ||১৯২|| অনিষ্টগন্ধি বিরসমহৃদ্যং চ বিদাহি চ |১৯৩|

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नवं मद्यमभिष्यन्दि गुरु वातादिकोपनम् ||१९२|| अनिष्टगन्धि विरसमहृद्यं च विदाहि च |१९३|

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Adhikarana 166 (193) · Śloka 194

সুগন্ধি দীপনং হৃদ্যং রোচিষ্ণু কৃমিনাশনম্ ||১৯৩|| স্ফুটস্রোতস্করং জীর্ণং লঘু বাতকফাপহম্ |১৯৪|

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सुगन्धि दीपनं हृद्यं रोचिष्णु कृमिनाशनम् ||१९३|| स्फुटस्रोतस्करं जीर्णं लघु वातकफापहम् |१९४|

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Adhikarana 167 (194-195) · Śloka 196

অরিষ্টো দ্রব্যসংযোগসংস্কারাদধিকো গুণৈঃ ||১৯৪|| বহুদোষহরশ্চৈব দোষাণাং শমনশ্চ সঃ | দীপনঃ কফবাতঘ্নঃ সরঃ পিত্তাবিরোধনঃ ||১৯৫|| শূলাধ্মানোদরপ্লীহজ্বরাজীর্ণার্শসাং হিতঃ |১৯৬|

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अरिष्टो द्रव्यसंयोगसंस्कारादधिको गुणैः ||१९४|| बहुदोषहरश्चैव दोषाणां शमनश्च सः | दीपनः कफवातघ्नः सरः पित्ताविरोधनः ||१९५|| शूलाध्मानोदरप्लीहज्वराजीर्णार्शसां हितः |१९६|

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Adhikarana 168 (196) · Śloka 196

পিপ্পল্যাদিকৃতো গুল্মকফরোগহরঃ স্মৃতঃ ||১৯৬||

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पिप्पल्यादिकृतो गुल्मकफरोगहरः स्मृतः ||१९६||

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Adhikarana 169 (197) · Śloka 197

চিকিত্সিতেষু বক্ষ্যন্তেঽরিষ্টা রোগহরাঃ পৃথক্ |১৯৭|

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चिकित्सितेषु वक्ष्यन्तेऽरिष्टा रोगहराः पृथक् |१९७|

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Adhikarana 170 (197) · Śloka 198

অরিষ্টাসবশীধূনাং গুণান্ কর্মাণি চাদিশেত্ ||১৯৭|| বুদ্ধ্যা যথাস্বং সংস্কারমবেক্ষ্য কুশলো ভিষক্ |১৯৮|

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अरिष्टासवशीधूनां गुणान् कर्माणि चादिशेत् ||१९७|| बुद्ध्या यथास्वं संस्कारमवेक्ष्य कुशलो भिषक् |१९८|

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Adhikarana 171 (198-202) · Śloka 203

সান্দ্রং বিদাহি দুর্গন্ধং বিরসং কৃমিলং গুরু ||১৯৮|| অহৃদ্যং তরুণং তীক্ষ্ণমুষ্ণং দুর্ভাজনস্থিতম্ | অল্পৌষধং পর্যুষিতমত্যচ্ছং পিচ্ছিলং চ যত্ ||১৯৯|| তদ্বর্জ্যং সর্বথা মদ্যং কিঞ্চিচ্ছেষং তু যদ্ভবেত্ | তত্র যত্ স্তোকসম্ভারং তরুণং পিচ্ছিলং গুরু ||২০০|| কফপ্রকোপি তন্মদ্যং দুর্জরং চ বিশেষতঃ | পিত্তপ্রকোপি বহলং তীক্ষ্ণমুষ্ণং বিদাহি চ ||২০১|| অহৃদ্যং পেলবং পূতি কৃমিলং বিরসং চ যত্ | তথা পর্যুষিতং চাপি বিদ্যাদনিলকোপনম্ ||২০২|| সর্বদোষৈরুপেতং তু সর্বদোষপ্রকোপণম্ |২০৩|

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सान्द्रं विदाहि दुर्गन्धं विरसं कृमिलं गुरु ||१९८|| अहृद्यं तरुणं तीक्ष्णमुष्णं दुर्भाजनस्थितम् | अल्पौषधं पर्युषितमत्यच्छं पिच्छिलं च यत् ||१९९|| तद्वर्ज्यं सर्वथा मद्यं किञ्चिच्छेषं तु यद्भवेत् | तत्र यत् स्तोकसम्भारं तरुणं पिच्छिलं गुरु ||२००|| कफप्रकोपि तन्मद्यं दुर्जरं च विशेषतः | पित्तप्रकोपि बहलं तीक्ष्णमुष्णं विदाहि च ||२०१|| अहृद्यं पेलवं पूति कृमिलं विरसं च यत् | तथा पर्युषितं चापि विद्यादनिलकोपनम् ||२०२|| सर्वदोषैरुपेतं तु सर्वदोषप्रकोपणम् |२०३|

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Adhikarana 172 (203) · Śloka 204

চিরস্থিতং জাতরসং দীপনং কফবাতজিত্ ||২০৩|| রুচ্যং প্রসন্নং সুরভি মদ্যং সেব্যং মদাবহম্ |২০৪|

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चिरस्थितं जातरसं दीपनं कफवातजित् ||२०३|| रुच्यं प्रसन्नं सुरभि मद्यं सेव्यं मदावहम् |२०४|

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Adhikarana 173 (204-205) · Śloka 205

তস্যানেকপ্রকারস্য মদ্যস্য রসবীর্যতঃ ||২০৪|| সৌক্ষ্ম্যাদৌষ্ণ্যাচ্চ তৈক্ষ্ণ্যাচ্চ বিকাসিত্বাচ্চ বহ্নিনা সমেত্য হৃদযং প্রাপ্য ধমনীরূর্ধ্বমাগতম্ | বিচাল্যেন্দ্রিযচেতাংসি বীর্যং মদযতেঽচিরাত্ ||২০৫||

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तस्यानेकप्रकारस्य मद्यस्य रसवीर्यतः ||२०४|| सौक्ष्म्यादौष्ण्याच्च तैक्ष्ण्याच्च विकासित्वाच्च वह्निना समेत्य हृदयं प्राप्य धमनीरूर्ध्वमागतम् | विचाल्येन्द्रियचेतांसि वीर्यं मदयतेऽचिरात् ||२०५||

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Adhikarana 174 (206) · Śloka 206

চিরেণ শ্লৈষ্মিকে পুংসি পানতো জাযতে মদঃ | অচিরাদ্বাতিকে দৃষ্টঃ, পৈত্তিকে শীঘ্রমেব চ ||২০৬||

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चिरेण श्लैष्मिके पुंसि पानतो जायते मदः | अचिराद्वातिके दृष्टः, पैत्तिके शीघ्रमेव च ||२०६||

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Adhikarana 175 (207-209) · Śloka 209

সাত্ত্বিকে শৌচদাক্ষিণ্যহর্ষমণ্ডনলালসঃ | গীতাধ্যযনসৌভাগ্যসুরতোত্সাহকৃন্মদঃ ||২০৭|| রাজসে দুঃখশীলত্বমাত্মত্যাগং সসাহসম্ | কলহং সানুবন্ধং তু করোতি পুরুষে মদঃ ||২০৮|| অশৌচনিদ্রামাত্সর্যাগম্যাগমনলোলতাঃ | অসত্যভাষণং চাপি কুর্যাদ্ধি তামসে মদঃ ||২০৯||

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सात्त्विके शौचदाक्षिण्यहर्षमण्डनलालसः | गीताध्ययनसौभाग्यसुरतोत्साहकृन्मदः ||२०७|| राजसे दुःखशीलत्वमात्मत्यागं ससाहसम् | कलहं सानुबन्धं तु करोति पुरुषे मदः ||२०८|| अशौचनिद्रामात्सर्यागम्यागमनलोलताः | असत्यभाषणं चापि कुर्याद्धि तामसे मदः ||२०९||

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Adhikarana 176 (210) · Śloka 211

রক্তপিত্তকরং শুক্তং ছেদনং ভুক্তপাচনম্ | বৈস্বর্যং জরণং শ্লেষ্মপাণ্ডুক্রিমিহরং লঘু ||২১০|| তীক্ষ্ণোষ্ণং মূত্রলং হৃদ্যং কফঘ্নং কটুপাকি চ |২১১|

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रक्तपित्तकरं शुक्तं छेदनं भुक्तपाचनम् | वैस्वर्यं जरणं श्लेष्मपाण्डुक्रिमिहरं लघु ||२१०|| तीक्ष्णोष्णं मूत्रलं हृद्यं कफघ्नं कटुपाकि च |२११|

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Adhikarana 177 (211) · Śloka 211

তদ্বত্তদাসুতং সর্বং রোচনং চ বিশেষতঃ ||২১১||

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तद्वत्तदासुतं सर्वं रोचनं च विशेषतः ||२११||

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Adhikarana 178 (212) · Śloka 212

গৌডানি রসশুক্তানি মধুশুক্তানি যানি চ | যথাপূর্বং গুরুতরাণ্যভিষ্যন্দকরাণি চ ||২১২||

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गौडानि रसशुक्तानि मधुशुक्तानि यानि च | यथापूर्वं गुरुतराण्यभिष्यन्दकराणि च ||२१२||

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Adhikarana 179 (213) · Śloka 213

তুষাম্বু দীপনং হৃদ্যং হৃত্পাণ্ডুকৃমিরোগনুত্ | গ্রহণ্যর্শোবিকারঘ্নং ভেদি সৌবীরকং তথা ||২১৩||

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तुषाम्बु दीपनं हृद्यं हृत्पाण्डुकृमिरोगनुत् | ग्रहण्यर्शोविकारघ्नं भेदि सौवीरकं तथा ||२१३||

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Adhikarana 180 (214-216) · Śloka 216

ধান্যাম্লং ধান্যযোনিত্বাজ্জীবনং দাহনাশনম্ | স্পর্শাত্ পানাত্তু পবনকফতৃষ্ণাহরং লঘু ||২১৪|| তৈক্ষ্ণ্যাচ্চ নির্হরেদাশু কফং গণ্ডূষধারণাত্ | মুখবৈরস্যদৌর্গন্ধ্যমলশোষক্লমাপহম্ ||২১৫|| দীপনং জরণং ভেদি হিতমাস্থাপনেষু চ | সমুদ্রমাশ্রিতানাং চ জনানাং সাত্ম্যমুচ্যতে ||২১৬|| ইতি মধ্যবর্গঃ |

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धान्याम्लं धान्ययोनित्वाज्जीवनं दाहनाशनम् | स्पर्शात् पानात्तु पवनकफतृष्णाहरं लघु ||२१४|| तैक्ष्ण्याच्च निर्हरेदाशु कफं गण्डूषधारणात् | मुखवैरस्यदौर्गन्ध्यमलशोषक्लमापहम् ||२१५|| दीपनं जरणं भेदि हितमास्थापनेषु च | समुद्रमाश्रितानां च जनानां सात्म्यमुच्यते ||२१६|| इति मध्यवर्गः |

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Adhikarana 181 (217-219) · Śloka 219

অথ মূত্রাণি | মূত্রাণি গোমহিষ্যজাবিগজহযখরোষ্ট্রাণাং তীক্ষ্ণান্যুষ্ণানি কটূনি তিক্তানি লবণানুরসানি লঘূনি শোধনানি কফবাতকৃমিমেদোবিষগুল্মার্শদরকুষ্ঠশোফারোচকপাণ্ডুরোগহরাণি হৃদ্যানি দীপনানি চ সামান্যতঃ ||২১৭|| ভবতশ্চাত্র- তত্ সর্বং কটু তীক্ষ্ণোষ্ণং লবণানুরসং লঘু | শোধনং কফবাতঘ্নং কৃমিমেদোবিষাপহম্ ||২১৮|| অর্শোজঠরগুল্মঘ্নং শোফারোচকনাশনম্ | পাণ্ডুরোগহরং ভেদি হৃদ্যং দীপনপাচনম্ ||২১৯||

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अथ मूत्राणि | मूत्राणि गोमहिष्यजाविगजहयखरोष्ट्राणां तीक्ष्णान्युष्णानि कटूनि तिक्तानि लवणानुरसानि लघूनि शोधनानि कफवातकृमिमेदोविषगुल्मार्शदरकुष्ठशोफारोचकपाण्डुरोगहराणि हृद्यानि दीपनानि च सामान्यतः ||२१७|| भवतश्चात्र- तत् सर्वं कटु तीक्ष्णोष्णं लवणानुरसं लघु | शोधनं कफवातघ्नं कृमिमेदोविषापहम् ||२१८|| अर्शोजठरगुल्मघ्नं शोफारोचकनाशनम् | पाण्डुरोगहरं भेदि हृद्यं दीपनपाचनम् ||२१९||

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Adhikarana 182 (220-221) · Śloka 221

গোমূত্রং কটু তীক্ষ্ণোষ্ণং সক্ষারত্বান্ন বাতলম্ | লঘ্বগ্নিদীপনং মেধ্যং পিত্তলং কফবাতনুত্ ||২২০|| শূলগুল্মোদরানাহবিরেকাস্থাপনাদিষু | মূত্রপ্রযোগসাধ্যেষু গব্যং মূত্রং প্রযোজযেত্ ||২২১||

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गोमूत्रं कटु तीक्ष्णोष्णं सक्षारत्वान्न वातलम् | लघ्वग्निदीपनं मेध्यं पित्तलं कफवातनुत् ||२२०|| शूलगुल्मोदरानाहविरेकास्थापनादिषु | मूत्रप्रयोगसाध्येषु गव्यं मूत्रं प्रयोजयेत् ||२२१||

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Adhikarana 183 (222) · Śloka 222

দুর্নামোদরশূলেষু কুষ্ঠমেহাবিশুদ্ধিষু | আনাহশোফগুল্মেষু পাণ্ডুরোগে চ মাহিষম্ ||২২২||

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दुर्नामोदरशूलेषु कुष्ठमेहाविशुद्धिषु | आनाहशोफगुल्मेषु पाण्डुरोगे च माहिषम् ||२२२||

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Adhikarana 184 (223) · Śloka 223

কাসশ্বাসাপহং শোফকামলাপাণ্ডুরোগনুত্ | কটুতিক্তান্বিতং ছাগমীষন্মারুতকোপনম্ ||২২৩||

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कासश्वासापहं शोफकामलापाण्डुरोगनुत् | कटुतिक्तान्वितं छागमीषन्मारुतकोपनम् ||२२३||

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Adhikarana 185 (224) · Śloka 224

কাসপ্লীহোদরশ্বাসশোষবর্চোগ্রহে হিতম্ | সক্ষারং তিক্তকটুকমুষ্ণং বাতঘ্নমাবিকম্ ||২২৪||

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कासप्लीहोदरश्वासशोषवर्चोग्रहे हितम् | सक्षारं तिक्तकटुकमुष्णं वातघ्नमाविकम् ||२२४||

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Adhikarana 186 (225) · Śloka 225

দীপনং কটু তীক্ষ্ণোষ্ণং বাতচেতোবিকারনুত্ | আশ্বং কফহরং মূত্রং কৃমিদদ্রুষু শস্যতে ||২২৫||

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दीपनं कटु तीक्ष्णोष्णं वातचेतोविकारनुत् | आश्वं कफहरं मूत्रं कृमिदद्रुषु शस्यते ||२२५||

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Adhikarana 187 (226) · Śloka 226

সতিক্তং লবণং ভেদি বাতঘ্নং পিত্তকোপনম্ | তীক্ষ্ণং ক্ষারে কিলাসে চ নাগং মূত্রং প্রযোজযেত্ ||২২৬||

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सतिक्तं लवणं भेदि वातघ्नं पित्तकोपनम् | तीक्ष्णं क्षारे किलासे च नागं मूत्रं प्रयोजयेत् ||२२६||

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Adhikarana 188 (227) · Śloka 227

গরচেতোবিকারঘ্নং তীক্ষ্ণং গ্রহণিরোগনুত্ | দীপনং গার্দভং মূত্রং কৃমিবাতকফাপহম্ ||২২৭||

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गरचेतोविकारघ्नं तीक्ष्णं ग्रहणिरोगनुत् | दीपनं गार्दभं मूत्रं कृमिवातकफापहम् ||२२७||

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Adhikarana 189 (228) · Śloka 228

শোফকুষ্ঠোদরোন্মাদমারুতক্রিমিনাশনম্ | অর্শোঘ্নং কারভং মূত্রং... |২২৮|

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शोफकुष्ठोदरोन्मादमारुतक्रिमिनाशनम् | अर्शोघ्नं कारभं मूत्रं... |२२८|

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Adhikarana 190 (228) · Śloka 228

... মানুষং চ বিষাপহম্ ||২২৮||

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... मानुषं च विषापहम् ||२२८||

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Adhikarana 191 (229) · Śloka 229

দ্রবদ্রব্যাণি সর্বাণি সমাসাত্ কীর্তিতানি তু | কালদেশবিভাগজ্ঞো নৃপতের্দাতুমর্হতি ||২২৯||

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द्रवद्रव्याणि सर्वाणि समासात् कीर्तितानि तु | कालदेशविभागज्ञो नृपतेर्दातुमर्हति ||२२९||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 45

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং সূত্রস্থানে দ্রবদ্রব্যবিজ্ঞানীযো নাম পঞ্চচত্বারিংশোঽধ্যাযঃ ||৪৫||

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इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने द्रवद्रव्यविज्ञानीयो नाम पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ||४५||

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45. dravadravyavidhyadhyāyaḥ — Sushruta Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi