Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো ব্রণিতোপাসনীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातो व्रणितोपासनीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো ব্রণিতোপাসনীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातो व्रणितोपासनीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
ব্রণিতস্য প্রথমমেবাগারমন্বিচ্ছেত্; তচ্চাগারং প্রশস্তবাস্ত্বাদিকং কার্যম্ ||৩||
व्रणितस्य प्रथममेवागारमन्विच्छेत्; तच्चागारं प्रशस्तवास्त्वादिकं कार्यम् ||३||
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
প্রশস্তবাস্তুনি গৃহে শুচাবাতপবর্জিতে | নিবাতে ন চ রোগাঃ স্যুঃ শারীরাগন্তুমানসাঃ ||৪||
प्रशस्तवास्तुनि गृहे शुचावातपवर्जिते | निवाते न च रोगाः स्युः शारीरागन्तुमानसाः ||४||
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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5
তস্মিঞ্ শযনমসম্বাধং স্বাস্তীর্ণং মনোজ্ঞং প্রাক্শিরস্কং সশস্ত্রং কুর্বীত ||৫||
तस्मिञ् शयनमसम्बाधं स्वास्तीर्णं मनोज्ञं प्राक्शिरस्कं सशस्त्रं कुर्वीत ||५||
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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6
সুখচেষ্টাপ্রচারঃ স্যাত্ স্বাস্তীর্ণে শযনে ব্রণী | প্রাচ্যাং দিশি স্থিতা দেবাস্তত্পূজার্থং চ তচ্ছিরঃ ||৬||
सुखचेष्टाप्रचारः स्यात् स्वास्तीर्णे शयने व्रणी | प्राच्यां दिशि स्थिता देवास्तत्पूजार्थं च तच्छिरः ||६||
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Adhikarana 6 (7) · Śloka 7
তস্মিন্ সুহৃদ্ভিরনুকূলৈঃ প্রিযংবদৈরুপাস্যমানো যথেষ্টমাসীত ||৭||
तस्मिन् सुहृद्भिरनुकूलैः प्रियंवदैरुपास्यमानो यथेष्टमासीत ||७||
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Adhikarana 7 (8) · Śloka 8
সুহৃদো বিক্ষিপন্ত্যাশু কথাভির্ব্রণবেদনাঃ | আশ্বাসযন্তো বহুশঃ স্বনুকূলাঃ প্রিযংবদাঃ ||৮||
सुहृदो विक्षिपन्त्याशु कथाभिर्व्रणवेदनाः | आश्वासयन्तो बहुशः स्वनुकूलाः प्रियंवदाः ||८||
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Adhikarana 8 (9) · Śloka 9
ন চ দিবানিদ্রাবশগঃ স্যাত্ ||৯||
न च दिवानिद्रावशगः स्यात् ||९||
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Adhikarana 9 (10) · Śloka 10
দিবাস্বপ্নাদ্ব্রণে কণ্ডূর্গাত্রাণাং গৌরবং তথা | শ্বযথুর্বেদনা রাগঃ স্রাবশ্চৈব ভৃশং ভবেত্ ||১০||
दिवास्वप्नाद्व्रणे कण्डूर्गात्राणां गौरवं तथा | श्वयथुर्वेदना रागः स्रावश्चैव भृशं भवेत् ||१०||
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Adhikarana 10 (11) · Śloka 11
উত্থানসংবেশনপরিবর্তনচঙ্ক্রমণোচ্চৈর্ভাষণাদ্যাস্বাত্মচেষ্টাস্বপ্রমত্তো ব্রণং সংরক্ষেত্ ||১১||
उत्थानसंवेशनपरिवर्तनचङ्क्रमणोच्चैर्भाषणाद्यास्वात्मचेष्टास्वप्रमत्तो व्रणं संरक्षेत् ||११||
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Adhikarana 11 (12) · Śloka 12
স্থানাসনং চঙ্ক্রমণং দিবাস্বপ্নং তথৈব চ | ব্রণিতো ন নিষেবেত শক্তিমানপি মানবঃ ||১২||
स्थानासनं चङ्क्रमणं दिवास्वप्नं तथैव च | व्रणितो न निषेवेत शक्तिमानपि मानवः ||१२||
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Adhikarana 12 (13) · Śloka 13
উত্থানাদ্যাসনং স্থানং শয্যা চাতিনিষেবিতা | প্রাপ্নুযান্মারুতাদঙ্গরুজস্তস্মাদ্বিবর্জযেত্ ||১৩||
उत्थानाद्यासनं स्थानं शय्या चातिनिषेविता | प्राप्नुयान्मारुतादङ्गरुजस्तस्माद्विवर्जयेत् ||१३||
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Adhikarana 13 (14) · Śloka 14
গম্যানাং চ স্ত্রীণাং সন্দর্শনসম্ভাষণসংস্পর্শনানি দূরত এব পরিহরেত্ ||১৪||
गम्यानां च स्त्रीणां सन्दर्शनसम्भाषणसंस्पर्शनानि दूरत एव परिहरेत् ||१४||
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Adhikarana 14 (15) · Śloka 15
স্ত্রীদর্শনাদিভিঃ শুক্রং কদাচিচ্চলিতং স্রবেত্ | গ্রাম্যধর্মকৃতান্দোষান্ সোঽসংসর্গেঽপ্যবাপ্নুযাত্ ||১৫||
स्त्रीदर्शनादिभिः शुक्रं कदाचिच्चलितं स्रवेत् | ग्राम्यधर्मकृतान्दोषान् सोऽसंसर्गेऽप्यवाप्नुयात् ||१५||
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Adhikarana 15 (16) · Śloka 16
নবধান্যমাষতিলকলাযকুলত্থনিষ্পাবহরিতকশাকাম্ললবণকটুকগুডপিষ্টবিকৃতিবল্লূরশুষ্কশাকাজাবিকানূপৌদক- মাংসবসাশীতোদককৃশরাপাযসদধিদুগ্ধতক্রপ্রভৃতীনি পরিহরেত্ ||১৬||
नवधान्यमाषतिलकलायकुलत्थनिष्पावहरितकशाकाम्ललवणकटुकगुडपिष्टविकृतिवल्लूरशुष्कशाकाजाविकानूपौदक- मांसवसाशीतोदककृशरापायसदधिदुग्धतक्रप्रभृतीनि परिहरेत् ||१६||
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Adhikarana 16 (17) · Śloka 17
তক্রান্তো নবধান্যাদির্যোঽযং বর্গ উদাহৃতঃ | দোষসঞ্জননো হ্যেষ বিজ্ঞেযঃ পূযবর্ধনঃ ||১৭||
तक्रान्तो नवधान्यादिर्योऽयं वर्ग उदाहृतः | दोषसञ्जननो ह्येष विज्ञेयः पूयवर्धनः ||१७||
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Adhikarana 17 (18) · Śloka 18
মদ্যপশ্চ মৈরেযারিষ্টাসবসীধুসুরাবিকারান্ পরিহরেত্ ||১৮||
मद्यपश्च मैरेयारिष्टासवसीधुसुराविकारान् परिहरेत् ||१८||
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Adhikarana 18 (19) · Śloka 19
মদ্যমম্লং তথা রূক্ষং তীক্ষ্ণমুষ্ণং চ বীর্যতঃ | আশুকারি চ তত্ পীতং ক্ষিপ্রং ব্যাপাদযেদ্ব্রণম্ ||১৯||
मद्यमम्लं तथा रूक्षं तीक्ष्णमुष्णं च वीर्यतः | आशुकारि च तत् पीतं क्षिप्रं व्यापादयेद्व्रणम् ||१९||
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Adhikarana 19 (20) · Śloka 20
বাতাতপরজোধূমাবশ্যাযাতিসেবনাতিভোজনানিষ্টভোজনশ্রবণদর্শনের্ষ্যামর্ষভযশোকধ্যানরাত্রিজাগরণবিষমাশন- শযনোপবাসবাগ্ব্যাযামস্থানচঙ্ক্রমণশীতবাতবিরুদ্ধাধ্যশনাজীর্ণমক্ষিকাদ্যা বাধাঃ পরিহরেত্ ||২০||
वातातपरजोधूमावश्यायातिसेवनातिभोजनानिष्टभोजनश्रवणदर्शनेर्ष्यामर्षभयशोकध्यानरात्रिजागरणविषमाशन- शयनोपवासवाग्व्यायामस्थानचङ्क्रमणशीतवातविरुद्धाध्यशनाजीर्णमक्षिकाद्या बाधाः परिहरेत् ||२०||
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Adhikarana 20 (21-22) · Śloka 22
ব্রণিনঃ সম্প্রতপ্তস্য কারণৈরেবমাদিভিঃ | ক্ষীণশোণিতমাংসস্য ভুক্তং সম্যঙ্ন জীর্যতি ||২১|| অজীর্ণাত্ পবনাদীনাং বিভ্রমো বলবান্ ভবেত্ | ততঃ শোফরুজাস্রাবদাহপাকানবাপ্নুযাত্ ||২২||
व्रणिनः सम्प्रतप्तस्य कारणैरेवमादिभिः | क्षीणशोणितमांसस्य भुक्तं सम्यङ्न जीर्यति ||२१|| अजीर्णात् पवनादीनां विभ्रमो बलवान् भवेत् | ततः शोफरुजास्रावदाहपाकानवाप्नुयात् ||२२||
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Adhikarana 21 (23) · Śloka 23
সদা নীচনখরোম্ণা শুচিনা শুক্লবাসসা শান্তিমঙ্গলদেবতাব্রাহ্মণগুরুপরেণ ভবিতব্যমিতি | তত্ কস্য হেতোঃ? হিংসাবিহারাণি হি মহাবীর্যাণি রক্ষাংসি পশুপতিকুবেরকুমারানুচরাণি মাংসশোণিতপ্রিযত্বাত্ ক্ষতজনিমিত্তং ব্রণিনমুপসর্পন্তি, সত্কারার্থং জিঘাংসূনি বা কদাচিত্ ||২৩||
सदा नीचनखरोम्णा शुचिना शुक्लवाससा शान्तिमङ्गलदेवताब्राह्मणगुरुपरेण भवितव्यमिति | तत् कस्य हेतोः? हिंसाविहाराणि हि महावीर्याणि रक्षांसि पशुपतिकुबेरकुमारानुचराणि मांसशोणितप्रियत्वात् क्षतजनिमित्तं व्रणिनमुपसर्पन्ति, सत्कारार्थं जिघांसूनि वा कदाचित् ||२३||
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Adhikarana 22 (24) · Śloka 24
ভবতি চাত্র | তেষাং সত্কারকামানাং প্রযতেতান্তরাত্মনা | ধূপবল্যুপহারাংশ্চ ভক্ষ্যাংশ্চৈবোপহারযেত্ ||২৪||
भवति चात्र | तेषां सत्कारकामानां प्रयतेतान्तरात्मना | धूपबल्युपहारांश्च भक्ष्यांश्चैवोपहारयेत् ||२४||
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Adhikarana 23 (25-26) · Śloka 26
তে তু সন্তর্পিতা আত্মবন্তং ন হিংস্যুঃ | তস্মাত্ সততমতন্দ্রিতো জনপরিবৃতো নিত্যং দীপোদকশস্ত্রস্রগ্দামপুষ্পলাজাদ্যলঙ্কৃতে বেশ্মনি সম্পন্মঙ্গলমনোঽনুকূলাঃ কথাঃ শৃণ্বন্নাসীত ||২৫|| সম্পদাদ্যনুকূলাভিঃ কথাভিঃ প্রীতমানসঃ | আশাবান্ ব্যাধিমোক্ষায ক্ষিপ্রং সুখমবাপ্নুযাত্ ||২৬||
ते तु सन्तर्पिता आत्मवन्तं न हिंस्युः | तस्मात् सततमतन्द्रितो जनपरिवृतो नित्यं दीपोदकशस्त्रस्रग्दामपुष्पलाजाद्यलङ्कृते वेश्मनि सम्पन्मङ्गलमनोऽनुकूलाः कथाः शृण्वन्नासीत ||२५|| सम्पदाद्यनुकूलाभिः कथाभिः प्रीतमानसः | आशावान् व्याधिमोक्षाय क्षिप्रं सुखमवाप्नुयात् ||२६||
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Adhikarana 24 (27) · Śloka 27
ঋগ্যজুঃসামাথর্ববেদাভিহিতৈরপরৈশ্চাশীর্বিধানৈরুপাধ্যাযা ভিষজশ্চ সন্ধ্যযো রক্ষাং কুর্যুঃ ||২৭||
ऋग्यजुःसामाथर्ववेदाभिहितैरपरैश्चाशीर्विधानैरुपाध्याया भिषजश्च सन्ध्ययो रक्षां कुर्युः ||२७||
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Adhikarana 25 (28) · Śloka 28
সর্ষপারিষ্টপত্রাভ্যাং সর্পিষা লবণেন চ | দ্বিরহ্নঃ কারযেদ্ধূপং দশরাত্রমতন্দ্রিতঃ ||২৮||
सर्षपारिष्टपत्राभ्यां सर्पिषा लवणेन च | द्विरह्नः कारयेद्धूपं दशरात्रमतन्द्रितः ||२८||
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Adhikarana 26 (29) · Śloka 29
ছত্রামতিচ্ছত্রাং লাঙ্গূ(ঙ্গ)লীং জটিলাং ব্রহ্মচারিণীং লক্ষ্মীং গুহামতিগুহাং বচামতিবিষাং শতবীর্যাং সহস্রবীর্যাং সিদ্ধার্থকাংশ্চ শিরসা ধারযেত্ ||২৯||
छत्रामतिच्छत्रां लाङ्गू(ङ्ग)लीं जटिलां ब्रह्मचारिणीं लक्ष्मीं गुहामतिगुहां वचामतिविषां शतवीर्यां सहस्रवीर्यां सिद्धार्थकांश्च शिरसा धारयेत् ||२९||
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Adhikarana 27 (30) · Śloka 30
ব্যজ্যেত বালব্যজনৈর্ব্রণং ন চ বিঘট্টযেত্ | ন তুদেন্ন চ কণ্ডূযেচ্ছযানঃ পরিপালযেত্ ||৩০||
व्यज्येत बालव्यजनैर्व्रणं न च विघट्टयेत् | न तुदेन्न च कण्डूयेच्छयानः परिपालयेत् ||३०||
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Adhikarana 28 (31) · Śloka 31
অনেন বিধিনা যুক্তমাদাবেব নিশাচরাঃ | বনং কেশরিণঽঽক্রান্তং বর্জযন্তি মৃগা ইব ||৩১||
अनेन विधिना युक्तमादावेव निशाचराः | वनं केशरिणऽऽक्रान्तं वर्जयन्ति मृगा इव ||३१||
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Adhikarana 29 (32-35) · Śloka 35
জীর্ণশাল্যোদনং স্নিগ্ধমল্পমুষ্ণং দ্রবোত্তরম্ | ভুঞ্জানো জাঙ্গলৈর্মাংসৈঃ শীঘ্রং ব্রণমপোহতি ||৩২|| তণ্ডুলীযকজীবন্তীসুনিষণ্ণকবাস্তুকৈঃ | বালমূলকবার্তাকপটোলৈঃ কারবেল্লকৈঃ ||৩৩|| সদাডিমৈঃ সামলকৈর্ঘৃতভৃষ্টৈঃ সসৈন্ধবৈঃ | অন্যৈরেবঙ্গুণৈর্বাঽপি মুদ্গাদীনাং রসেন বা ||৩৪|| শক্তূন্ বিলেপীং কুল্মাষাঞ্জলং চাপি শৃতং পিবেত্ |৩৫|
जीर्णशाल्योदनं स्निग्धमल्पमुष्णं द्रवोत्तरम् | भुञ्जानो जाङ्गलैर्मांसैः शीघ्रं व्रणमपोहति ||३२|| तण्डुलीयकजीवन्तीसुनिषण्णकवास्तुकैः | बालमूलकवार्ताकपटोलैः कारवेल्लकैः ||३३|| सदाडिमैः सामलकैर्घृतभृष्टैः ससैन्धवैः | अन्यैरेवङ्गुणैर्वाऽपि मुद्गादीनां रसेन वा ||३४|| शक्तून् विलेपीं कुल्माषाञ्जलं चापि शृतं पिबेत् |३५|
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Adhikarana 30 (35-37) · Śloka 37
দিবা ন নিদ্রাবশগো নিবাতগৃহগোচরঃ | ব্রণী বৈদ্যবশে তিষ্ঠঞ্ শীঘ্রং ব্রণমপোহতি ||৩৫|| (ব্রণে শ্বযথুরাযাসাত্ স চ রাগশ্চ জাগারাত্ | তৌ চ রুক্ চ দিবাস্বাপাত্তাশ্চ মৃত্যুশ্চ মৈথুনাত্) ||৩৬|| এবংবৃত্তসমাচারো ব্রণী সম্পদ্যতে সুখী | আযুশ্চ দীর্ঘমাপ্নোতি ধন্বন্তরিবচো যথা ||৩৭||
दिवा न निद्रावशगो निवातगृहगोचरः | व्रणी वैद्यवशे तिष्ठञ् शीघ्रं व्रणमपोहति ||३५|| (व्रणे श्वयथुरायासात् स च रागश्च जागारात् | तौ च रुक् च दिवास्वापात्ताश्च मृत्युश्च मैथुनात्) ||३६|| एवंवृत्तसमाचारो व्रणी सम्पद्यते सुखी | आयुश्च दीर्घमाप्नोति धन्वन्तरिवचो यथा ||३७||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 19
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং সূত্রস্থানে ব্রণিতোপাসনীযো নামৈকোনবিংশোঽধ্যাযঃ ||১৯||
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने व्रणितोपासनीयो नामैकोनविंशोऽध्यायः ||१९||
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