Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো নযনাভিঘাতপ্রতিষেধং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातो नयनाभिघातप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো নযনাভিঘাতপ্রতিষেধং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातो नयनाभिघातप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 4
অভ্যাহতে তু নযনে বহুধা নরাণাং সংরম্ভরাগতুমুলাসু রুজাসু ধীমান্ | নস্যাস্যলেপপরিষেচনতর্পণাদ্যমুক্তং পুনঃ ক্ষতজপিত্তজশূলপথ্যম্ ||৩|| দৃষ্টিপ্রসাদজননং বিধিমাশু কুর্যাত্ স্নিগ্ধৈর্হিমৈশ্চ মধুরৈশ্চ তথা প্রযোগৈঃ |৪|
अभ्याहते तु नयने बहुधा नराणां संरम्भरागतुमुलासु रुजासु धीमान् | नस्यास्यलेपपरिषेचनतर्पणाद्यमुक्तं पुनः क्षतजपित्तजशूलपथ्यम् ||३|| दृष्टिप्रसादजननं विधिमाशु कुर्यात् स्निग्धैर्हिमैश्च मधुरैश्च तथा प्रयोगैः |४|
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
স্বেদাগ্নিধূমভযশোকরুজাভিঘাতৈরভ্যাহতামপি তথৈব ভিষক্ চিকিত্সেত্ ||৪||
स्वेदाग्निधूमभयशोकरुजाभिघातैरभ्याहतामपि तथैव भिषक् चिकित्सेत् ||४||
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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5
সদ্যোহতে নযন এষ বিধিস্তদূর্ধ্বং স্যন্দেরিতো ভবতি দোষমবেক্ষ্য কার্যঃ |৫|
सद्योहते नयन एष विधिस्तदूर्ध्वं स्यन्देरितो भवति दोषमवेक्ष्य कार्यः |५|
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Adhikarana 5 (5) · Śloka 5
অভ্যাহতং নযনমীষদথাস্যবাষ্পসংস্বেদিতং ভবতি তন্নিরুজং ক্ষণেন ||৫||
अभ्याहतं नयनमीषदथास्यबाष्पसंस्वेदितं भवति तन्निरुजं क्षणेन ||५||
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Adhikarana 6 (6) · Śloka 7
সাধ্যং ক্ষতং পটলমেকমুভে তু কৃচ্ছ্রে ত্রীণি ক্ষতানি পটলানি বিবর্জযেত্তু | স্যাত্ পিচ্চিতং চ নযনং হ্যতি চাবসন্নং স্রস্তং চ্যুতং চ হতদৃক্ চ ভবেত্তু যাপ্যম্ ||৬|| বিস্তীর্ণদৃষ্টিতনুরাগমসত্প্রদর্শি, সাধ্যং যথাস্থিতমনাবিলদর্শনং চ |৭|
साध्यं क्षतं पटलमेकमुभे तु कृच्छ्रे त्रीणि क्षतानि पटलानि विवर्जयेत्तु | स्यात् पिच्चितं च नयनं ह्यति चावसन्नं स्रस्तं च्युतं च हतदृक् च भवेत्तु याप्यम् ||६|| विस्तीर्णदृष्टितनुरागमसत्प्रदर्शि, साध्यं यथास्थितमनाविलदर्शनं च |७|
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Adhikarana 7 (7) · Śloka 7
প্রাণোপরোধবমনক্ষুতকণ্ঠরোধৈরুন্নম্যমাশু নযনং যদতিপ্রবিষ্টম্ ||৭||
प्राणोपरोधवमनक्षुतकण्ठरोधैरुन्नम्यमाशु नयनं यदतिप्रविष्टम् ||७||
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Adhikarana 8 (8) · Śloka 8
নেত্রে বিলম্বিনি বিধির্বিহিতঃ পুরস্তাদুচ্ছিঙ্ঘনং শিরসি বার্যবসেচনং চ |৮|
नेत्रे विलम्बिनि विधिर्विहितः पुरस्तादुच्छिङ्घनं शिरसि वार्यवसेचनं च |८|
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Adhikarana 9 (8) · Śloka 9
ষট্সপ্ততির্নযনজা য ইমে প্রদিষ্টা রোগা ভবন্ত্যমহতাং মহতাং চ তেভ্যঃ ||৮|| স্তন্যপ্রকোপকফমারুতপিত্তরক্তৈর্বালাক্ষিবর্ত্মভব এব কুকূণকোঽন্যঃ |৯|
षट्सप्ततिर्नयनजा य इमे प्रदिष्टा रोगा भवन्त्यमहतां महतां च तेभ्यः ||८|| स्तन्यप्रकोपकफमारुतपित्तरक्तैर्बालाक्षिवर्त्मभव एव कुकूणकोऽन्यः |९|
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Adhikarana 10 (9-10) · Śloka 10
মৃদ্গাতি নেত্রমতিকণ্ডুমথাক্ষিকূটং নাসাললাটমপি তেন শিশুঃ স নিত্যম্ ||৯|| সূর্যপ্রভাং ন সহতে স্রবতি প্রবদ্ধং, তস্যাহরেদ্রুধিরমাশু বিনির্লিখেচ্চ | ক্ষৌদ্রাযুতৈশ্চ কটুভিঃ প্রতিসারযেত্তু মাতুঃ শিশোরভিহিতং চ বিধিং বিদধ্যাত্ ||১০||
मृद्गाति नेत्रमतिकण्डुमथाक्षिकूटं नासाललाटमपि तेन शिशुः स नित्यम् ||९|| सूर्यप्रभां न सहते स्रवति प्रबद्धं, तस्याहरेद्रुधिरमाशु विनिर्लिखेच्च | क्षौद्रायुतैश्च कटुभिः प्रतिसारयेत्तु मातुः शिशोरभिहितं च विधिं विदध्यात् ||१०||
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Adhikarana 11 (11) · Śloka 12
তং বামযেত্তু মধুসৈন্ধবসম্প্রযুক্তৈঃ পীতং পযঃ খলু ফলৈঃ খরমঞ্জরীণাম্ ||১১|| স্যাত্পিপ্পলীলবণমাক্ষিকসংযুতৈর্বা... |১২|
तं वामयेत्तु मधुसैन्धवसम्प्रयुक्तैः पीतं पयः खलु फलैः खरमञ्जरीणाम् ||११|| स्यात्पिप्पलीलवणमाक्षिकसंयुतैर्वा... |१२|
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Adhikarana 12 (12) · Śloka 12
... নৈনং বমন্তমপি বামযিতুং যতেত |১২|
... नैनं वमन्तमपि वामयितुं यतेत |१२|
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Adhikarana 13 (12) · Śloka 12
দত্ত্বা বচামশনদুগ্ধভুজে প্রযোজ্যমূর্ধ্বং ততঃ ফলযুতং বমনং বিধিজ্ঞৈঃ ||১২||
दत्त्वा वचामशनदुग्धभुजे प्रयोज्यमूर्ध्वं ततः फलयुतं वमनं विधिज्ञैः ||१२||
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Adhikarana 14 (13) · Śloka 13
জম্ব্বাম্রধাত্র্যণুদলৈঃ পরিধাবনার্থং কার্যং কষাযমবসেচনমেব চাপি |১৩|
जम्ब्वाम्रधात्र्यणुदलैः परिधावनार्थं कार्यं कषायमवसेचनमेव चापि |१३|
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Adhikarana 15 (13) · Śloka 13
আশ্চ্যোতনে চ হিতমত্র ঘৃতং গুডূচীসিদ্ধং তথাঽঽহুরপি চ ত্রিফলাবিপক্বম্ ||১৩||
आश्च्योतने च हितमत्र घृतं गुडूचीसिद्धं तथाऽऽहुरपि च त्रिफलाविपक्वम् ||१३||
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Adhikarana 16 (14) · Śloka 14
নেপালজামরিচশঙ্খরসাঞ্জনানি সিন্ধুপ্রসূতগুডমাক্ষিকসংযুতানি | স্যাদঞ্জনং, মধুরসামধুকাম্রকৈর্বা ... |১৪|
नेपालजामरिचशङ्खरसाञ्जनानि सिन्धुप्रसूतगुडमाक्षिकसंयुतानि | स्यादञ्जनं, मधुरसामधुकाम्रकैर्वा ... |१४|
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Adhikarana 17 (14) · Śloka 14
... কৃষ্ণাযসং ঘৃতপযো মধু বাঽপি দগ্ধম্ ||১৪||
... कृष्णायसं घृतपयो मधु वाऽपि दग्धम् ||१४||
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Adhikarana 18 (15) · Śloka 15
ব্যোষং পলাণ্ডু মধুকং লবণোত্তমং চ লাক্ষাং চ গৌরিকযুতাং গুটিকাঞ্জনং বা | নিম্বচ্ছদং মধুকদার্বি সতাম্রলোধ্রমিচ্ছন্তি চাত্র ভিষজোঽঞ্জনমংশতুল্যম্ ||১৫||
व्योषं पलाण्डु मधुकं लवणोत्तमं च लाक्षां च गौरिकयुतां गुटिकाञ्जनं वा | निम्बच्छदं मधुकदार्वि सताम्रलोध्रमिच्छन्ति चात्र भिषजोऽञ्जनमंशतुल्यम् ||१५||
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Adhikarana 19 (16) · Śloka 16
স্রোতোজশঙ্খদধিসৈন্ধবমর্ধপক্ষং শুক্রং শিশোর্নুদতি ভাবিতমঞ্জনেন | স্যন্দে কফদভিহিতং ক্রমমাচরেচ্চ বালস্য রোগকুশলোঽক্ষিগদং জিঘাংসুঃ ||১৬||
स्रोतोजशङ्खदधिसैन्धवमर्धपक्षं शुक्रं शिशोर्नुदति भावितमञ्जनेन | स्यन्दे कफदभिहितं क्रममाचरेच्च बालस्य रोगकुशलोऽक्षिगदं जिघांसुः ||१६||
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Adhikarana 20 (17-18) · Śloka 18
সমুদ্র ইব গম্ভীরং নৈব শক্যং চিকিত্সিতম্ | বক্তুং নিরবশেষেণ শ্লোকানামযুতৈরপি ||১৭|| সহস্রৈরপি বা, প্রোক্তমর্থমল্পমতির্নরঃ | তর্কগ্রন্থার্থরহিতো নৈব গৃহ্ণাত্যপণ্ডিতঃ ||১৮||
समुद्र इव गम्भीरं नैव शक्यं चिकित्सितम् | वक्तुं निरवशेषेण श्लोकानामयुतैरपि ||१७|| सहस्रैरपि वा, प्रोक्तमर्थमल्पमतिर्नरः | तर्कग्रन्थार्थरहितो नैव गृह्णात्यपण्डितः ||१८||
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Adhikarana 21 (19-20) · Śloka 20
তদিদং বহুগূঢার্থং চিকিত্সাবীজমীরিতম্ | কুশলেনাভিপন্নং তদ্বহুধাঽভিপ্ররোহতি ||১৯|| তস্মান্মতিমতা নিত্যং নানাশাস্ত্রার্থদর্শিনা | সর্বমূহ্যমগাধার্থং শাস্ত্রমাগমবুদ্ধিনা ||২০||
तदिदं बहुगूढार्थं चिकित्साबीजमीरितम् | कुशलेनाभिपन्नं तद्बहुधाऽभिप्ररोहति ||१९|| तस्मान्मतिमता नित्यं नानाशास्त्रार्थदर्शिना | सर्वमूह्यमगाधार्थं शास्त्रमागमबुद्धिना ||२०||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 19
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযামুত্তরতন্ত্রান্তর্গতে শালাক্যতন্ত্রে নযনাভিঘাতচিকিত্সিতং নামৈকোনবিংশোঽধ্যাযঃ ||১৯||
इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते शालाक्यतन्त्रे नयनाभिघातचिकित्सितं नामैकोनविंशोऽध्यायः ||१९||
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