Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো দ্রব্যরসগুণবীর্যবিপাকবিজ্ঞানীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১||
যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातो द्रव्यरसगुणवीर्यविपाकविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१||
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
কেচিদাচার্যা ব্রুবতে- দ্রব্যং প্রধানং, কস্মাত্? ব্যবস্থিতত্বাত্, ইহ খলু দ্রব্যং ব্যবস্থিতং ন রসাদযঃ, যথা আমে ফলে যে রসাদযস্তে পক্বে ন সন্তি; নিত্যত্বাচ্চ, নিত্যং হি দ্রব্যমনিত্যা গুণাঃ, যথা কল্কাদিপ্রবিভাগঃ, স এব সম্পন্নরসগন্ধো ব্যাপন্নরসগন্ধো বা ভবতি; স্বজাত্যবস্থানাচ্চ, যথা হি পার্থিবং দ্রব্যমন্যভাবং ন গচ্ছত্যেবং শেষাণি; পঞ্চেন্দ্রিযগ্রহণাশ্চ, পঞ্চভিরিন্দ্রিযৈর্গৃহ্যতে দ্রব্যং ন রসাদযঃ; আশ্রযত্বাচ্চ, দ্রব্যমাশ্রিতা রসাদযঃ; আরম্ভসামর্থ্যাচ্চ, দ্রব্যাশ্রিত আরম্ভঃ, যথা- ‘বিদারিগন্ধাদিমাহৃত্য সঙ্ক্ষুদ্য বিপচেত্’ ইত্যেবমাদিষু ন রসাদিষ্বারম্ভঃ; শাস্ত্রপ্রামাণ্যাচ্চ, শাস্ত্রে হি দ্রব্যং প্রধানমুপদেশে যোগানাং, যথা- ‘মাতুলুঙ্গাগ্নিমন্থৌ চ’ ইত্যাদৌ ন রসাদয উপদিশ্যন্তে; ক্রমাপেক্ষিতত্বাচ্চ রসাদীনাং, রসাদযো হি দ্রব্যক্রমমপেক্ষন্তে, যথা- তরুণে তরুণাঃ সম্পূর্ণে সম্পূর্ণা ইতি; একদেশসাধ্যত্বাচ্চ, দ্রব্যাণামেকদেশেনাপি ব্যাধযঃ সাধ্যন্তে, যথা- মহাবৃক্ষক্ষীরেণেতি; তস্মাদ্দ্রব্যং প্রধানং, ন রসাদযঃ, কস্মাত্? নিরবযবত্বাত্ |
দ্রব্যলক্ষণং তু ‘ক্রিযাগুণবত্ সমবাযিকারণম্’ ইতি ||৩||
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केचिदाचार्या ब्रुवते- द्रव्यं प्रधानं, कस्मात्? व्यवस्थितत्वात्, इह खलु द्रव्यं व्यवस्थितं न रसादयः, यथा आमे फले ये रसादयस्ते पक्वे न सन्ति; नित्यत्वाच्च, नित्यं हि द्रव्यमनित्या गुणाः, यथा कल्कादिप्रविभागः, स एव सम्पन्नरसगन्धो व्यापन्नरसगन्धो वा भवति; स्वजात्यवस्थानाच्च, यथा हि पार्थिवं द्रव्यमन्यभावं न गच्छत्येवं शेषाणि; पञ्चेन्द्रियग्रहणाश्च, पञ्चभिरिन्द्रियैर्गृह्यते द्रव्यं न रसादयः; आश्रयत्वाच्च, द्रव्यमाश्रिता रसादयः; आरम्भसामर्थ्याच्च, द्रव्याश्रित आरम्भः, यथा- ‘विदारिगन्धादिमाहृत्य सङ्क्षुद्य विपचेत्’ इत्येवमादिषु न रसादिष्वारम्भः; शास्त्रप्रामाण्याच्च, शास्त्रे हि द्रव्यं प्रधानमुपदेशे योगानां, यथा- ‘मातुलुङ्गाग्निमन्थौ च’ इत्यादौ न रसादय उपदिश्यन्ते; क्रमापेक्षितत्वाच्च रसादीनां, रसादयो हि द्रव्यक्रममपेक्षन्ते, यथा- तरुणे तरुणाः सम्पूर्णे सम्पूर्णा इति; एकदेशसाध्यत्वाच्च, द्रव्याणामेकदेशेनापि व्याधयः साध्यन्ते, यथा- महावृक्षक्षीरेणेति; तस्माद्द्रव्यं प्रधानं, न रसादयः, कस्मात्? निरवयवत्वात् |
द्रव्यलक्षणं तु ‘क्रियागुणवत् समवायिकारणम्’ इति ||३||
Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
নেত্যাহুরন্যে , রসাস্তু প্রধানং; কস্মাত্? আগমাত্, আগমো হি শাস্ত্রমুচ্যতে; শাস্ত্রে হি রসা অধিকৃতাঃ, যথা- রসাযত্ত আহার ইতি, তস্মিংস্তু প্রাণাঃ; উপদেশাচ্চ, উপদিশ্যন্তে হি রসাঃ, যথা- মধুরাম্ললবণা বাতং শমযন্তি; অনুমানাচ্চ, রসেন হ্যনুমীযতে দ্রব্যং, যথা- মধুরমিতি; ঋষিবচনাচ্চ, ঋষিবচনং বেদো যথা- কিঞ্চিদিজ্যার্থং মধুরমাহরেদিতি, তস্মাদ্রসাঃ প্রধানং; রসেষু গুণসঞ্জ্ঞা |
রসলক্ষণমন্যত্রোপদেক্ষ্যামঃ ||৪||
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नेत्याहुरन्ये , रसास्तु प्रधानं; कस्मात्? आगमात्, आगमो हि शास्त्रमुच्यते; शास्त्रे हि रसा अधिकृताः, यथा- रसायत्त आहार इति, तस्मिंस्तु प्राणाः; उपदेशाच्च, उपदिश्यन्ते हि रसाः, यथा- मधुराम्ललवणा वातं शमयन्ति; अनुमानाच्च, रसेन ह्यनुमीयते द्रव्यं, यथा- मधुरमिति; ऋषिवचनाच्च, ऋषिवचनं वेदो यथा- किञ्चिदिज्यार्थं मधुरमाहरेदिति, तस्माद्रसाः प्रधानं; रसेषु गुणसञ्ज्ञा |
रसलक्षणमन्यत्रोपदेक्ष्यामः ||४||
Adhikarana 4 (5) · Śloka 5
নেত্যাহুরন্যে , বীর্যং প্রধানমিতি |
কস্মাত্? তদ্বশেনৌষধকর্মনিষ্পত্তেঃ |
ইহৌষধকর্মাণ্যূর্ধ্বাধোভাগোভযভাগসংশোধনসংশমনসঙ্গ্রাহিকাগ্নিদীপনপীডনলেখনবৃংহণ- রসাযনবাজীকরণশ্বযথুকরবিলযনদহনদারণমাদনপ্রাণঘ্নবিষপ্রশমনাদীনি বীর্যপ্রাধান্যাদ্ভবন্তি |
তচ্চ বীর্যং দ্বিবিধমুষ্ণং শীতং চ, অগ্নীষোমীযত্বাজ্জগতঃ |
কেচিদষ্টবিধমাহুঃ- শীতমুষ্ণং স্নিগ্ধং রূক্ষং বিশদং পিচ্ছিলং মৃদু তীক্ষ্ণং চেতি |
এতানি বীর্যাণি স্ববলগুণোত্কর্ষাদ্রসমভিভূযাত্মকর্ম কুর্বন্তি |
যথা তাবন্মহত্পঞ্চমূলং কষাযং তিক্তানুরসং বাতং শমযতি, উষ্ণবীর্যত্বাত্; তথা কুলত্থঃ কষাযঃ, কটুকঃ পলাণ্ডুঃ, স্নেহভাবাচ্চ; মধুরশ্চেক্ষুরসো বাতং বর্ধযতি, শীতবীর্যত্বাত্; কটুকা পিপ্পলী পিত্তং শমযতি, মৃদুশীতবীর্যত্বাত্; অম্লমামলকং লবণং সৈন্ধবং চ; তিক্তা কাকমাচী পিত্তং বর্ধযতি, উষ্ণবীর্যত্বাত্, মধুরা মত্স্যাশ্চ; কটুকং মূলকং শ্লেষ্মাণং বর্ধযতি, স্নিগ্ধবীর্যত্বাত্; অম্লং কপিত্থং শ্লেষ্মাণাং শমযতি, রূক্ষবীর্যত্বাত্, মধুরং ক্ষৌদ্রং চ; তদেতন্নিদর্শনমাত্রমুক্তম্ ||৫||
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नेत्याहुरन्ये , वीर्यं प्रधानमिति |
कस्मात्? तद्वशेनौषधकर्मनिष्पत्तेः |
इहौषधकर्माण्यूर्ध्वाधोभागोभयभागसंशोधनसंशमनसङ्ग्राहिकाग्निदीपनपीडनलेखनबृंहण- रसायनवाजीकरणश्वयथुकरविलयनदहनदारणमादनप्राणघ्नविषप्रशमनादीनि वीर्यप्राधान्याद्भवन्ति |
तच्च वीर्यं द्विविधमुष्णं शीतं च, अग्नीषोमीयत्वाज्जगतः |
केचिदष्टविधमाहुः- शीतमुष्णं स्निग्धं रूक्षं विशदं पिच्छिलं मृदु तीक्ष्णं चेति |
एतानि वीर्याणि स्वबलगुणोत्कर्षाद्रसमभिभूयात्मकर्म कुर्वन्ति |
यथा तावन्महत्पञ्चमूलं कषायं तिक्तानुरसं वातं शमयति, उष्णवीर्यत्वात्; तथा कुलत्थः कषायः, कटुकः पलाण्डुः, स्नेहभावाच्च; मधुरश्चेक्षुरसो वातं वर्धयति, शीतवीर्यत्वात्; कटुका पिप्पली पित्तं शमयति, मृदुशीतवीर्यत्वात्; अम्लमामलकं लवणं सैन्धवं च; तिक्ता काकमाची पित्तं वर्धयति, उष्णवीर्यत्वात्, मधुरा मत्स्याश्च; कटुकं मूलकं श्लेष्माणं वर्धयति, स्निग्धवीर्यत्वात्; अम्लं कपित्थं श्लेष्माणां शमयति, रूक्षवीर्यत्वात्, मधुरं क्षौद्रं च; तदेतन्निदर्शनमात्रमुक्तम् ||५||
Adhikarana 5 (6-9) · Śloka 9
ভবন্তি চাত্র- যে রসা বাতশমনা ভবন্তি যদি তেষু বৈ |
রৌক্ষ্যলাঘবশৈত্যানি ন তে হন্যুঃ সমীরণম্ ||৬||
যে রসাঃ পিত্তশমনা ভবন্তি যদি তেষু বৈ |
তৈক্ষ্ণ্যৌষ্ণ্যলঘুতাশ্চৈব ন তে তত্কর্মকারিণঃ ||৭||
যে রসাঃ শ্লেষ্মশমনা ভবন্তি যদি তেষু বৈ |
স্নেহগৌরবশৈত্যানি ন তে তত্কর্মকারিণঃ ||৮||
তস্মাদ্বীর্যং প্রধানমিতি ||৯||
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भवन्ति चात्र- ये रसा वातशमना भवन्ति यदि तेषु वै |
रौक्ष्यलाघवशैत्यानि न ते हन्युः समीरणम् ||६||
ये रसाः पित्तशमना भवन्ति यदि तेषु वै |
तैक्ष्ण्यौष्ण्यलघुताश्चैव न ते तत्कर्मकारिणः ||७||
ये रसाः श्लेष्मशमना भवन्ति यदि तेषु वै |
स्नेहगौरवशैत्यानि न ते तत्कर्मकारिणः ||८||
तस्माद्वीर्यं प्रधानमिति ||९||
Adhikarana 6 (10) · Śloka 10
নেত্যাহুরন্যে , বিপাকঃ প্রধানমিতি |
কস্মাত্? সম্যঙ্মিথ্যাবিপক্বত্বাত্; ইহ সর্বদ্রবাণ্যভ্যবহৃতানি সম্যঙ্মিথ্যাবিপক্বানি গুণং দোষং বা জনযন্তি |
তত্রাহুরন্যে- প্রতি রসং পাক ইতি |
কেচিত্ত্রিবিধমিচ্ছন্তি- মধুরমম্লং কটুকং চেতি |
তত্তু ন সম্যক্, ভূতগুণাদামাচ্চান্যোঽম্লো বিপাকো নাস্তি; পিত্তং হি বিদগ্ধমম্লতামুপৈত্যাগ্নেযত্বাত্; যদ্যেবং লবণোঽপ্যন্যঃ পাকো ভবিষ্যতি, শ্লেষ্মা হি বিদগ্ধো লবণতামুপৈতীতি |
মধুরো মধুরস্যাম্লোঽম্লস্যৈবং সর্বেষামিতি কেচিদাহুঃ; দৃষ্টান্তং চোপদিশন্তি- যথা তাবত্ ক্ষীরমুখাগতং পচ্যমানং মধুরমেব স্যাত্তথা শালিযবমুদ্গাদযঃ প্রকীর্ণাঃ স্বভাবমুত্তরকালেঽপি ন পরিত্যজন্তি তদ্বদিতি |
কেচিদ্বদন্তি- অবলবন্তো বলবতাং বশমাযান্তীতি |
এবমনবস্থিতিঃ, তস্মাদসিদ্ধান্ত এষঃ |
আগমে হি দ্বিবিধ এব পাকো মধুরঃ কটুকশ্চ |
তযোর্মধুরাখ্যো গুরুঃ, কটুকাখ্যো লঘুরিতি |
তত্র পৃথিব্যপ্তেজোবায্বাকাশানাং দ্বৈবিধ্যং ভবতি গুণসাধর্ম্যাদ্গুরুতা লঘুতা চ; পৃথিব্যাপশ্চ গুর্ব্যঃ, শেষাণি লঘূনি; তস্মাদ্দ্বিবিধ এব পাক ইতি ||১০||
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नेत्याहुरन्ये , विपाकः प्रधानमिति |
कस्मात्? सम्यङ्मिथ्याविपक्वत्वात्; इह सर्वद्रवाण्यभ्यवहृतानि सम्यङ्मिथ्याविपक्वानि गुणं दोषं वा जनयन्ति |
तत्राहुरन्ये- प्रति रसं पाक इति |
केचित्त्रिविधमिच्छन्ति- मधुरमम्लं कटुकं चेति |
तत्तु न सम्यक्, भूतगुणादामाच्चान्योऽम्लो विपाको नास्ति; पित्तं हि विदग्धमम्लतामुपैत्याग्नेयत्वात्; यद्येवं लवणोऽप्यन्यः पाको भविष्यति, श्लेष्मा हि विदग्धो लवणतामुपैतीति |
मधुरो मधुरस्याम्लोऽम्लस्यैवं सर्वेषामिति केचिदाहुः; दृष्टान्तं चोपदिशन्ति- यथा तावत् क्षीरमुखागतं पच्यमानं मधुरमेव स्यात्तथा शालियवमुद्गादयः प्रकीर्णाः स्वभावमुत्तरकालेऽपि न परित्यजन्ति तद्वदिति |
केचिद्वदन्ति- अबलवन्तो बलवतां वशमायान्तीति |
एवमनवस्थितिः, तस्मादसिद्धान्त एषः |
आगमे हि द्विविध एव पाको मधुरः कटुकश्च |
तयोर्मधुराख्यो गुरुः, कटुकाख्यो लघुरिति |
तत्र पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशानां द्वैविध्यं भवति गुणसाधर्म्याद्गुरुता लघुता च; पृथिव्यापश्च गुर्व्यः, शेषाणि लघूनि; तस्माद्द्विविध एव पाक इति ||१०||
Adhikarana 7 (11-12) · Śloka 12
ভবন্তি চাত্র- দ্রব্যেষু পচ্যমানেষু যেষ্বম্বুপৃথিবীগুণাঃ |
নির্বর্তন্তেঽধিকাস্তত্র পাকো মধুর উচ্যতে ||১১||
তেজোঽনিলাকাশগুণাঃ পচ্যমানেষু যেষু তু |
নির্বর্তন্তেঽধিকাস্তত্র পাকঃ কটুক উচ্যতে ||১২||
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भवन्ति चात्र- द्रव्येषु पच्यमानेषु येष्वम्बुपृथिवीगुणाः |
निर्वर्तन्तेऽधिकास्तत्र पाको मधुर उच्यते ||११||
तेजोऽनिलाकाशगुणाः पच्यमानेषु येषु तु |
निर्वर्तन्तेऽधिकास्तत्र पाकः कटुक उच्यते ||१२||
Adhikarana 8 (13) · Śloka 13
পৃথক্ত্বদর্শিনামেষ বাদিনাং বাদসঙ্গ্রহঃ |
চতুর্ণামপি সামগ্র্যমিচ্ছন্ত্যত্র বিপশ্চিতঃ ||১৩||
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पृथक्त्वदर्शिनामेष वादिनां वादसङ्ग्रहः |
चतुर्णामपि सामग्र्यमिच्छन्त्यत्र विपश्चितः ||१३||
Adhikarana 9 (14) · Śloka 14
তদ্দ্রব্যমাত্মনা কিঞ্চিত্কিঞ্চিদ্বীর্যেণ সেবিতম্ |
কিঞ্চিদ্রসবিপাকাভ্যাং দোষং হন্তি করোতি বা ||১৪||
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तद्द्रव्यमात्मना किञ्चित्किञ्चिद्वीर्येण सेवितम् |
किञ्चिद्रसविपाकाभ्यां दोषं हन्ति करोति वा ||१४||
Adhikarana 10 (15) · Śloka 15
পাকো নাস্তি বিনা বীর্যাদ্বীর্যং নাস্তি বিনা রসাত্ |
রসো নাস্তি বিনা দ্রব্যাদ্দ্রব্যং শ্রেষ্ঠতমং স্মৃতম্ ||১৫||
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पाको नास्ति विना वीर्याद्वीर्यं नास्ति विना रसात् |
रसो नास्ति विना द्रव्याद्द्रव्यं श्रेष्ठतमं स्मृतम् ||१५||
Adhikarana 11 (16-18) · Śloka 18
জন্ম তু দ্রব্যরসযোরন্যোন্যাপেক্ষিকং স্মৃতম্ |
অন্যোন্যাপেক্ষিকং জন্ম যথা স্যাদ্দেহদেহিনোঃ ||১৬||
বীর্যসঞ্জ্ঞা গুণা যেঽষ্টৌ তেঽপি দ্রব্যাশ্রযাঃ স্মৃতাঃ |
রসেষু ন ভবন্ত্যেতে নির্গুণাস্তু গুণাঃ স্মৃতাঃ ||১৭||
দ্রব্যে দ্রব্যাণি যস্মাদ্ধি বিপচ্যন্তে ন ষড্রসাঃ |
শ্রেষ্ঠং দ্রব্যমতো জ্ঞেযং, শেষা ভাবাস্তদাশ্রযাঃ ||১৮||
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जन्म तु द्रव्यरसयोरन्योन्यापेक्षिकं स्मृतम् |
अन्योन्यापेक्षिकं जन्म यथा स्याद्देहदेहिनोः ||१६||
वीर्यसञ्ज्ञा गुणा येऽष्टौ तेऽपि द्रव्याश्रयाः स्मृताः |
रसेषु न भवन्त्येते निर्गुणास्तु गुणाः स्मृताः ||१७||
द्रव्ये द्रव्याणि यस्माद्धि विपच्यन्ते न षड्रसाः |
श्रेष्ठं द्रव्यमतो ज्ञेयं, शेषा भावास्तदाश्रयाः ||१८||
Adhikarana 12 (19) · Śloka 19
অমীমাংস্যান্যচিন্ত্যানি প্রসিদ্ধানি স্বভাবতঃ |
আগমেনোপযোজ্যানি ভেষজানি বিচক্ষণৈঃ ||১৯||
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अमीमांस्यान्यचिन्त्यानि प्रसिद्धानि स्वभावतः |
आगमेनोपयोज्यानि भेषजानि विचक्षणैः ||१९||
Adhikarana 13 (20-21) · Śloka 21
প্রত্যক্ষলক্ষণফলাঃ প্রসিদ্ধাশ্চ স্বভাবতঃ |
নৌষধীর্হেতুভির্বিদ্বান্ পরীক্ষেত কদাচন ||২০||
সহস্রেণাপি হেতূনাং নাম্বষ্ঠাদির্বিরচযেত্ |
তস্মাত্তিষ্ঠেত্তু মতিমানাগমে ন তু হেতুষু ||২১||
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प्रत्यक्षलक्षणफलाः प्रसिद्धाश्च स्वभावतः |
नौषधीर्हेतुभिर्विद्वान् परीक्षेत कदाचन ||२०||
सहस्रेणापि हेतूनां नाम्बष्ठादिर्विरचयेत् |
तस्मात्तिष्ठेत्तु मतिमानागमे न तु हेतुषु ||२१||
Adhikarana puShpikA · Śloka 40
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং সূত্রস্থানে দ্রব্যগুণরসবীর্যবিপাকবিজ্ঞানীযো নাম চত্বারিংশত্তমোঽধ্যাযঃ ||৪০||
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इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने द्रव्यगुणरसवीर्यविपाकविज्ञानीयो नाम चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः ||४०||